Saturday, November 20, 2010

Hindu Rashtra for a muslim क्या हिन्दू राष्ट्र में एक मुसलमान के लिए कोई जगह नहीं है ?

दुनिया को वेद और उपनिषदों से परिचित कराने वाले हैं ईसाई और मुस्लिम @ सीनियर ब्लॉगर बहन रचना जी ! आपने कहा है कि भाई अमित जी को पूरा अधिकार है कि वे चाहें तो हिन्दू धर्म के बारे में कुछ भी कह सकते हैं, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता लेकिन मुझे अमित जी की तरह हिंदू कल्चर और साहित्य के बारे में कुछ भी कहने का हक़ हासिल नहीं है क्योंकि मैं हिंदू नहीं हूं।
1. पहली बात तो यह है कि हिंदू धर्म के बारे में कुछ भी कहने का हक़ एक हिंदू को क्यों है ?
अगर वह ग़लत बात कहता है, भ्रामक बात कहता है तो उसे हरगिज़ यह हक़ नहीं होना चाहिए। किसी भी विषय पर ग़लत बात कहने की इजाज़त नैतिकता और क़ानून हरगिज़ नहीं देता, धर्म भी नहीं देता।
2. अगर मैं सप्रमाण एक सही बात कहता हूं तो मुझे यह हक़ क्यों हासिल नहीं है ?
3. मैक्समूलर और अन्य पश्चिमी विद्वानों ने हिंदू कल्चर और साहित्य पर बहुत कुछ लिखा है। क्या आप उस सारे साहित्य को निरस्त मानती हैं ?
4. क्या आप उसमें से कभी उद्धरण न देंगी ?
5. पश्चिमी दुनिया आज उपनिषदों की तारीफ़ करती है तो इसके पीछे किसी ब्राह्मण प्रचारक की मेहनत नहीं है कि उसने उपनिषदों से दुनिया को परिचित कराया है बल्कि इसके पीछे एक मुसलमान का, दाराशिकोह की मेहनत है। उसने उपनिषदों का अनुवाद फ़ारसी में कराया। फ़ारसी से उनका अनुवाद पश्चिमी भाषाओं में हुआ और दुनिया ने हिन्दुस्तानी फ़लसफ़े को जाना और उसकी तारीफ़ की। निस्संदेह हिन्दुस्तानी दर्शन कुछ बातों में यूनानी दर्शन से उच्च है। अगर दाराशिकोह भी आपकी तरह मान लेता कि उसे हिन्दू दर्शन के बारे में सोचने और उसका प्रचार करने का हक़ नहीं है तो दुनिया शायद भारतीय दर्शन से इतना परिचित न होती जितना कि आज है।
6. क्या आज बहुत से ग़ैर हिन्दू लोग देश-दुनिया में हिन्दू साहित्य पर शोध नहीं कर रहे हैं ?
7. क्या उनके शोध निबंध को यूनिवर्सिटियां और हिन्दू समाज मान्यता नहीं देता ?
8. क्या बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में जो वेद भाष्य पढ़ाया जाता है वह मैक्समूलर द्वारा संकलित नहीं है ?
  तब केवल मुझ पर ही पाबंदी क्यों ?
9. बहन रचना जी ! आप खुद को हिन्दुत्ववादी कहती हैं और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा तक से ठीक से परिचित नहीं हैं। हिन्दुत्ववादी विचारकों ने मुसलमानों को ‘मुहम्मदी हिन्दू‘ कहकर हिन्दुओं का ही एक प्रकार माना है तब आप कैसे कह सकती हैं कि ‘अनवर, आप हिन्दू नहीं हैं ?‘
मैं हिन्दू हूं, वह भी यूनिक टाइप का
10. मैं खुद भी अपने आप को हिन्दू कहता हूं। तब आप मेरे हिन्दू होने का इन्कार किस आधार पर कर सकती हैं ?
11. मुसलमान होना किसी भी तरह से हिन्दू का विलोम नहीं है कि अगर आदमी मुसलमान है तो वह हिन्दू नहीं हो सकता। कहीं से सिद्ध होता हो तो कृप्या प्रमाण दें। बिना सुबूत के कोई बात कहना न तो एक बुद्धिजीवी को शोभा देता है और न ही उसे मान लेना मेरी आदत है।
12. अगर फिर भी मैं आपकी नज़र में हिन्दू शब्द और साहित्य के बारे में बोलने का अधिकार नहीं रखता तो कृप्या बताएं कि मैं क्या करूं कि वह काम करने के बाद सभी हिन्दू मतावलंबी मुझे हिन्दू स्वीकार कर लें ?
13. अगर हिन्दू शब्द की कोई परिभाषा है तो उसमें प्रवेश करने या उससे बाहर निकलने की कोई विघि तो होती ही होगी, वह विधि क्या है ?
http://mypoeticresponse.blogspot.com/2010/11/blog-post_20.html
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दो पैमानों से नापना छोड़ना होगा
Mr. Tarkeshwar Giri at cps global , New Delhi
@ भाई तारकेश्वर जी ! आपकी विनती मेरे लिए बहुत अहमियत रखती है।
1. आप मेरे लिखे शब्दों पर ध्यान दें तो आप पाएंगे कि मैंने हिन्दू देवी देवताओं का उदाहरण दिया है लेकिन मैंने यह नहीं लिखा है कि मांस खाकर उन्होंने कोई ग़लत काम किया है। मुझे उनका उदाहरण देने का कोई शौक़ नहीं है, मजबूरी में देना पड़ा उनका उदाहरण।
2. भाई अमित जी और बहन दिव्या जी ने हज़रत इबराहीम अलैहिस्सलाम की कुरबानी की मिसाल दी और कहा कि जो पशुबलि करते हैं वे अधम पापी और राक्षस हैं, वे अमन का पैग़ाम दे ही नहीं सकते, वे इंसान ही नहीं हैं। इसी तरह की बहुत सी बेहूदा बातें कीं और नहीं जानते थे कि जिस मांसाहार को वे अधर्म बता रहे हैं। वही मांसाहार उन प्राचीन आर्यों का मुख्य भोजन था जिन्हें धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुआ बताते हैं। इसी प्रसंग में प्रमाण के तौर पर मुझे श्री रामचन्द्र जी व अन्य हिन्दू महापुरूषों का आचरण सामने लाना पड़ा।
मांस मुसलमानों का पवित्र धार्मिक भोजन है
3. आपने मुझे तो टोक दिया लेकिन आपने अमित जी और दिव्या बहन जी व अन्य ब्लागर्स को एक बार भी न कहा कि आप मुस्लिम महापुरूषों का उदाहरण न दें, ऐसा क्यों ? जवाब दीजिए। यह तो ठीक नहीं है कि ब्लागर्स इस्लाम के बारे में भ्रामक जानकारी फैलाते रहें और आप उन्हें बिल्कुल भी न टोकें और जब मैं उनके भ्रम का निवारण करूं तो आप मुझे समझाने के बहाने चुप करने चले आएं ?
4. आप मुझे रोक रहे हैं और खुद मांस की तुलना मदिरा से कर रहे हैं ?
जबकि इस्लाम में मांस एक पवित्र भोजन है और मदिरा व अन्य किसी भी प्रकार का नशा पाप और वर्जित है। खुद मुसलमानों के भोजन की तुलना एक गंदी और नापाक चीज़ से करें और फिर यह उम्मीद भी रखें कि सामने वाला ख़ामोश रहे, यह तरीक़ा ग़लत है।
5. आप देख लीजिए, मेरे जितने भी लेख हैं वे सभी जवाबी हैं। जब भी कोई आदमी इस्लाम के बारे में ग़लत बात फैलाकर लोगों में अज्ञान और नफ़रत के बीज बोएगा तो सही बात बताना मेरा फ़र्ज़ है क्योंकि मैं सही बात जानता हूं। अगर किसी को मेरी बात ग़लत लगती है तो वह सिद्ध कर दे। मैं उसे वापस ले लूंगा, अपनी ही बात के लिए हठ और आग्रह बिल्कुल नहीं करूंगा लेकिन सत्य के लिए आग्रह ज़रूर करूंगा। मैं सत्याग्रह ज़रूर करूंगा हालांकि मैं गांधीवादी नहीं हूं।
शांति के लिए मेरी तरफ़ से एक बेहतरीन आफ़र
मैंने पहले भी कहा था और आज फिर कहता हूं कि मेरे ब्लाग की जिस पोस्ट पर ऐतराज़ हो उसे डिलीट करवा दीजिए लेकिन पहले आप लोग भी इस्लाम के खि़लाफ़ दुर्भावनापूर्ण पोस्ट डिलीट कर दें।
अब आप बताइये कि मेरी कौन सी बात ग़लत है और आपकी कौन सी बात सही है ?
क्यों है न काम की बातें ? 
अब नवाज़ देवबंदी साहब का एक शेर अर्ज़ है-
मेरे  पैमाने में कुछ है उसके पैमाने में कुछ
देख साक़ी हो न जाए तेरे मैख़ाने में कुछ

Intellectual dwarfness राक्षस कौन है ? , बलि के विरोधी या हम सबके पूर्वज ?

एक पैमाने से नापिए सारे झगड़े खत्म हो जाएँगे
इस्लाम एक वैज्ञानिक और व्यवहारिक धर्म है । यह धर्म उसी ईश्वर द्वारा प्रदत्त है जिसने सारे जीव बनाए, जिसने उनके भोजन की व्यवस्था बनाई । उसी ईश्वर ने जन्म के साथ मृत्यु भी बनाई, उसी ने Food chain बनाई । जीव दूसरे जीवों को खाएँ , जीवों की यह प्रकृति भी उसी ने बनाई । उसी ने आहार के अनुसार जीवों के दाँत बनाए ,पाचन क्रिया बनाई । जब से दुनिया आबाद है तब से मनुष्य अपने आहार में दूसरी चीजों के साथ मांस भी लेता आ रहा है । हरेक जाति और समुदाय के ज्ञानी पूर्वज और वीर सैनिक मांस खाते आए हैं यह इतिहास से सिद्ध है ।
विश्व के श्रेष्ठ बुद्धिजीवी और वीर सैनिक आज भी मांस खाते हैं । मुसलमान भी ज्ञानी पूर्वजों और श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों की परंपरा के अनुसार दूसरी चीजों के साथ मांस खाते हैं । जो श्रेष्ठ भोजन खुद खाते हैं वही अन्य गरीब भाइयों को भी मिल जाए । इसकी व्यवस्था इस्लामी पर्व बक़र: ईद में निहित है । कुर्बानी के गोश्त में से एक तिहाई गरीबों को देना लाज़िमी है । यह एक सच्चाई है । जो इसे समझ नहीं पाते उनकी अक़्लें बौनी हैं , जो इसे मानते नहीं हैं उनके दिल छोटे हैं , यही साबित होता है । उनके न मानने से न तो हकीकत बदलेगी और न ही Natural food chain .
कुछ लोग आज की दुनिया मेँ भी अंधविश्वास में जीते हैं और इस्लाम से जलते हैं या फिर ईश्वर की प्राकृतिक और धार्मिक व्यवस्था का ज्ञान नहीं रखते हैँ बल्कि अपने इतिहास की जानकारी भी ठीक से नहीँ रखते , ये नर नारी भावनाओं मेँ बहकर अपनी हद से निकल जाते हैं ।
ये कहते हैं कि जीव को मारना उसका मांस खाना पाप है । जो मांस खाता है वह तामसिक है राक्षस है । मुसलमानों पर निशाना साधने के चक्कर में ये अज्ञानी भाई बहन यह भी भुला देते हैं कि उनकी बदतमीज़ी की लपेट में उनके पूर्वज भी आ रहे हैं । वे पूर्वज, जिन्हें वे साकार ईश्वर मानते हैं ।
A- क्या वे सब दया शांति और ज्ञान से कोरे थे ?
B- क्या उन्होंने कभी अमन का पैग़ाम नहीं दिया ?
C- क्या ये सभी नीच पापी और राक्षस थे ?
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस बदतमीज़ी के काम में उनसे सहमत नहीं हैं । बहन रचना जी उनमें से एक हैं । अपनी ताजा पोस्ट में इस सोच के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है । मैंने उनकी पोस्ट पर कमेँट देते हुए कहा है कि -
@ Great sister रचना जी ! आपके विचार सुंदर और स्पष्ट हैं । आपने सही लिखा है कि हिंदू कल्चर और इस्लाम धर्म में दोनों में पाप पुण्य की परिभाषा में अंतर है । पहले परिभाषा तय कर ली जाए और फिर तर्क वितर्क किया जाए ।
वह दिन आना मुश्किल है क्योंकि अभी तक तो हिंदू शब्द की ही परिभाषा तय नहीं हो पाई है, पाप पुण्य की कैसे तय कर लेंगे ?
2- चलिए फिर भी आपकी नज़र में जो पाप है जिस पर आप इस्लाम और मुसलमानों को नाप रहे हैं उसी पैमाने से अपने पूर्वजों को भी नापिए । हमें कोई ऐतराज न होगा ।
3- रामचंद्र जी भरत जी और हनुमान जी का भोजन क्या था ?
4- क्या शिव जी शेर की खाल पर बैठ कर ध्यान नहीं लगाते थे ?
5- शिवा जी का फूड क्या था ?
6- सिक्ख गुरुओं आहार क्या था ?
7- हमारे सैनिकों और अधिकांश हिंदुओं का भोजन आज क्या है ?
8- उड़ीसा और दक्षिण के वेदपाठी ब्राह्मणों का भोजन आज भी क्या है ?
9- क्या ये सब अमन के दुश्मन और राक्षस हैं ?, अधम और पतित हैं ?
बलि विरोधी जवाब दें ।
एक पैमाने से नापेँगे तो झगड़े खुद ख़त्म हो जाएगे ।
हमारे पूर्वज धर्म और नैतिकता के आदर्श हैं , यह एक स्थापित सत्य है। धर्म और करुणा की जो भी चेतना आज हममें पाई जाती है वह चेतना हम तक उन्हीं से पहुँची है ।
तो फिर क्या बलि के विरोधियों को राक्षस कहा जाएगा ?
नहीं , इन्हें भी राक्षस नहीं कहा जाएगा बल्कि इन्हें ऐसा नादान समझा जाएगा जिन्हें धर्म और महापुरुषों के इतिहास की सही जानकारी नहीं है ।
That's all .

Wednesday, November 17, 2010

Humanity is still alive मालिक सबकी मुराद पूरी करे

मालिक सबका भला करे ,
वेद कुरआन ब्लॉग पर

@ दिव्य बहन दिव्या जी ! आपने मुझे ईद की मुबारकबाद दी , बेशक आपने केवल सुह्रदयता का ही नहीं बल्कि विशाल ह्रदयता का भी परिचय दिया है ।
मालिक आपको दिव्य मार्ग पर चलाए और आपको रियल मंजिल तक पहुँचाए ।
@ भाई तारकेश्वर जी ! आपकी शुभकामनाएं थ्रू SMS मौसूल हुईं और वह भी बिल्कुल सुबह सुबह ।
धन्यवाद !
जिन्होंने मुझे शुभकामनाएं नहीं भेजीं , वे भी मेरा शुभ ही चाहते हैं ऐसा मेरा मानना है ।
मालिक सबका शुभ करे ।
विशेष : तर्क वितर्क से मेरा मक़सद केवल संवाद है और संवाद का मक़सद सत्पथ की निशानदेही करना है ।
किसी के पास सत्य का कोई अन्य सूत्र है तो मैं प्रेमपूर्वक उसका स्वागत करता हूं , अपने कल्याण के लिए , सबके कल्याण के लिए ।
कल्याण सत्य में निहित है ।

Sunday, November 14, 2010

Saturday, October 16, 2010

Dua दुआ ए मगफिरत बराय वालिद ए माजिद जनाब भाई साजिद - Anwer Jamal

साजिद भाई के वालिद साहब का आज इन्तेकाल हो गया है .

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन .
पिछले दिनों उनका एक्सिडेंट हुआ था और उनके साथ सवार दो लोगों की वफ़ात हो गयी थी , उनका इलाज चल रहा था . उनकी हालत लगातार बेहतर हो रही थी लेकिन ...
हम अल्लाह से उनकी मगफिरत की दुआ करते है ,
अल्लाह उनके पस्मान्दगान को सब्र ए जमील अता फरमाए.
आमीन

Thursday, September 30, 2010

Anam, in our hearts आंखें बंद थीं तो गोद में अनम थी - Anwer Jamal

आंखें बंद थीं तो गोद में अनम थी
आंख खुली तो आंखें नम थीं
2 अगस्त 2010 की सुबह को आंख खोलते ही मुझे अपनी वाइफ़ से यह सुनने को मिला। मुझे लगा कि वे शयद कोई sher  सुना रही हैं लेकिन वे मुझे अपने ख्वाब के बारे में बता रही थीं जो उन्होंने उस रात देखा था।
वे मुझसे अक्सर कहती थीं कि इतने दिन हो गये अनम मेरे ख्वाब में नहीं आई क्या उसे ख्वाब में देखने कोई तरीक़ा नहीं है ?
है क्यों नहीं ? आप दुआ कीजिए, अल्लाह आपको उसे दिखा देगा। -मैंने कहा।
दुआ कैसे करूं ?
‘या ख़बीरू अख़बिर्नी‘ यानि ऐ हर चीज़ से बाख़बर मुझे ख़बर दीजिए। आप इस दुआ को ज़बान से अदा कीजिये और अपने मन में इरादा कीजिये अनम को देखने का। किसी से बात मत कीजिए और इस दुआ को पढ़ते-पढ़ते सो जाईये। उन्होंने दो दिन ऐसे ही किया और दूसरे ही दिन उन्हें सपने में अनम नज़र आ गई।
उन्होंने बताया कि पहले मैं डाक्टर कान्ता के नर्सिंग होम में अनम को रोते हुए ढूंढ रही थी जबकि घरवाले हंस बोल रहे थे। मुझे यह भी लगा कि अब अनम होने वाली है और मैं कान्ता से पूछ भी रही हूं कि आपने अनम को देखा है क्या और मैं रो भी रही हूं तभी मैंने अनम को अपनी गोद में और अच्छी सेहत में देखा। उन्होंने बताया कि मैं ख्वाब में भी रो रही थी यह सोचकर कि अनम मुझसे जुदा हो चुकी है। इसी दरम्यान मेरी आंख खुल गई और मेरी आंखें नम थीं और मेरा
दिल और ज़्यादा फूट-फूटकर रोने के लिए चाह रहा था।
अनस ने भी अपनी बहन अनम को देखा।
उसने देखा कि सामने एक बड़ा सा लोहे का दरवाज़ा है उसमें अनस ने एक लात मारी तो दरवाज़ा खुल गया। वहां पर सामने फूलों के ज़ीने पर एक बुज़ुर्ग बैठे हुए थे जिन्होंने सफ़ेद लिबास पहन रखा था और उनके सामने हवा में एक प्लेट थी जिसमें भुना हुआ मुर्ग़ा रखा हुआ था। फिर जब उन्होंने मुर्ग़ा खा लिया तो बचा हुआ मुर्ग़ा सही सलामत होकर हवा में उड़ गया और अनस यह सोचने लगा कि मुर्ग़ा तो हवा में इतना ऊँचा नहीं उड़ता। यह कैसा मुर्ग़ा है ?
फिर अनस ने अनम को ढूंढना शुरू किया ताक अनम उसे नहीं दिखी। फिर अनस ने आवाज़ दी ‘अनम तुम कहां हो ?‘
फिर अनस ने उन बुजुर्ग से पूछा कि ‘क्या आपने अनम को कहीं देखा है ?‘
उन्होंने अपने हाथ के इशारा किया और कहा कि देखो वह सामने खेल रही है अनम।
अनस ने बताया कि
मैंने उसे देखा तो अनम बहुत सारे बच्चों में से निकलकर मेरे पास भागी हुई आई। अनम ने और सभी बच्चों ने सफ़ेद लिबास पहन रखा था। फिर मैंने अनम को गोद में लेने के लिए हाथ उठाये और पूछा -‘अनम तुम्हें दूध चाहिये ?‘
अनम बोली -‘जी‘
तब मैंने अनम को पालने में लिटाया और उसे बोतल से दूध पिलाया । उसके बाद अनस अनम को गादे में लेकर चलने लगा। एकदम से अनस को झटका लगा तो दोनों नीचे गिर पड़े और अनम अनम की गोद में थी। जब अनस ने खड़े होकर देखा तो वह हवाई क़ालीन पर उड़ रहा था। अनम ने अनस को दिखाईं, शहद की, कटहल के बीज की, अख़रोट की, बादाम की।
अनस अनम को लेकर कटहल की नदी में कूद पड़ा और दोनों ने कटहल के बड़े-बड़े बीज खाये।
अनस अनम को लेकर बाहर आया तो एकदम से उड़ने वाला क़ालीन आ गया। अनम ने अनस को ऊपर खींच लिया और उड़ते-उड़ते दोनों एक बड़े से गेट पर आकर रूक गए। इस गेट पर अंग्रेज़ी में लिखा था ‘चिल्ड्रन्स हैवन‘। उर्दू या अरबी में भी कुछ लिखा हुआ था।
फिर अनम ने अनस से पूछा कि ‘भाई साहब, मैं बच्चों के पास जाऊँ ?‘
अनस ने कहा -‘जी‘
अनम के जाते ही चारों तरफ़ सफ़ेद ही सफ़ेद और सन्नाटा दिखाई देने लगा। एकदम अनस गड्ढे में गिर गया और झटका लगते ही उसकी आंख खुल गई।
यह ख्वाब अनस ने अपनी मां से पहले देखा।