Monday, July 9, 2012

डा. अनवर जमाल से dinesh gupta की हुई बातचीत--


डा।. अनवर विवाद / रविकर क्षमा-प्रार्थी : मेरे द्वारा डाला गया घी देखिये, जिसने आग भड़काई --

पार्ट -2 में रचना जी से की बातचीत 
पार्ट--3 डा।. अनवर से की बातचीत 
पार्ट--1  कुंडलियाँ 

 पार्ट--3

 डा।. अनवर जमाल से हुई बातचीत--


dinesh gupta
Jul 7 (2 days ago)


to Anwer

भाई जान-
यह पूरी तरह व्यक्तिगत निवेदन है-
आप को यदि कोई विशेष आपत्ति नहीं है तो-
रचना जी के चित्र  वाली पोस्ट को निरस्त कर दें-
सादर-
Dr. Anwer Jamal Khan
Jul 7 (2 days ago)


to me

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आदरणीय भाई साहब,
रचना जी एक आम औरत हैं। आपको उनके फ़ोटो पर चिन्ता हुई, यह जानकर अच्छा लगा।
अगर आप हमारे जवाब से बुरा न मान जाएं तो हम कुछ कहने की इजाज़त चाहेंगे
क्योंकि ब्लॉगिंग का उददेश्य अपने मन की बात बताना है न कि दबाना।
आपकी इजाज़त मिले तो कुछ अर्ज़ किया जाए।
http://www.jagranjunction.com/readerblog/
dinesh gupta
Jul 7 (2 days ago)


to Anwer

भाई  जान आप का बहुत सम्मान है- ब्लॉग वर्ल्ड में-
जब से मैं यहाँ आया हूँ आपका स्नेह मुझे बराबर मिलता रहा है-
इसी अधिकार से निवेदन किया है |
यह व्यक्तिगत और आपसी समझ के अंतर्गत किया हुवा निवेदन है -
हमारे सम्बन्ध ज्यों के त्यों बने  रहेंगे -
आप न करें तब भी-
सादर 
व्यक्तिगत मेल
किया है इसीलिए-
2012/7/7 Dr. Anwer Jamal Khan <eshvani@gmail.com>
Dr. Anwer Jamal Khan
Jul 7 (2 days ago)


to me

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मेरे अज़ीज़ और बुज़ुर्ग भाई ! जब से हम आए हैं। यहां पक्षपात देखते आए हैं।
एक वक्त था जब हमें क़त्ल करने की धमकियां भी दी जाती थीं।
हमारी समझ में यह बात कभी नहीं आई कि एक सही बात जब हम उठाते हैं तो कोई
साथ नहीं देता और जब दूसरों अपने कुल गोत्र या संस्कृति का नर नारी कोई
मुददा उठाता है तो लोग सही ग़लत देखे बिना उसका साथ देते हैं।
आप दिल पर न लेना लेकिन आपको याद होगा कि ख़ुशदीप जी ने आदम-हव्वा अर्थात
मनु-आद्या का नंगा फ़ोटो अपनी पोस्ट पर लगाया और उसे चर्चामंच व अन्य जगह
भी लिंक के साथ लगा दिया गया। सबके माता पिता को सरे आम निर्वस्त्र किया
गया। हमने ख़ुशदीप जी के ब्लॉग पर और चर्चामंच पर जाकर कमेंट किया लेकिन
तब हमें किसी का समर्थन नहीं मिला ?
आपने भी चर्चामंच पर कमेंट किया कि पूर्वजों को पूर्वज ही रहने दो,
उन्हें इश्तेहार न बनाओ।
नतीजा यह है कि चर्चामंच पर वह नंगा चित्र आज तक लगा हुआ है।
क्या महापुरूषों के नंगे चित्र के मुददे पर आपकी प्रतिक्रिया उचित थी ?
क्या तब आपने किसी से कोई व्यक्तिगत निवेदन किया था इस संबंध में ?
नहीं, लेकिन आज आप आप एक आम औरत के लिए व्यक्तिगत निवेदन कर रहे हैं।
एक ही आदमी के दो रवैये !

रचना जी ने ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ मंच के मेम्बर्स को ईमेल करके भड़काया। जो
कभी टिप्पणी करने नहीं आए वे आज त्यागपत्र देने आ रहे हैं। श्रीकान्त
मिश्र आज जा चुके हैं। दीपक बाबा और सुरेश इस ब्लॉग पर कभी कमेंट नहीं
करते। वे भी रचना जी के ही बुलाए हुए आए। रेखा जी ने तो ‘प्यारी मां‘ पर
भी पोस्ट लिखनी छोड़ रखी है लेकिन वह यहां आपत्ति दर्ज करवाने आई हैं।
वन्दना गुप्ता अपना फ़ोटो और नाम हटाने के लिए कह रही हैं और न हटाने पर
कार्रवाई की धमकी दे रही हैं। सब एक मुंह हो रहे हैं, वैरी गुड।
मैं यही देखना और यही दिखाना चाहता था।
यह है बुद्धिजीवियों का हिंदी ब्लॉग जगत ?

रचना जी का बात करने का लहजा आपने देखा ?
कैसे बात करती हैं ?
हर जगह डिक्टेटराना मिज़ाज काम नहीं देता ?

On 7/7/12, dinesh gupta <dcgpth@gmail.com> wrote:
> भाई  जान आप का बहुत सम्मान है- ब्लॉग वर्ल्ड में-
dinesh gupta
Jul 7 (2 days ago)


to Anwer

भाई जान-
विवाद से बचने की कोशिश रहती है मेरी -
यही किया है -
यहाँ पर मेरी पोस्ट है इसीलिए निवेदन किया है-
आभार 
dinesh gupta
Jul 7 (2 days ago)


to Anwer

आप चाहें तो वार्तालाप के अंशो को संपादित कर के प्रकाशित करते हुवे -
मेरे निवेदन पर पोस्ट वापस ले रहे हैं  बोल सकते हैं-
Dr. Anwer Jamal Khan
Jul 7 (2 days ago)


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आपके निवेदन पर हम यह पोस्ट ज़रूर वापस ले लेते या एडिट कर देते लेकिन इस
तरह रचना जी को हमें हरा देने का अहसास होगा और ऐसा कोई अहसास हमने
उन्हें अब होने नहीं दिया।
dinesh gupta
Jul 7 (2 days ago)


to Anwer

मैं सहमत हूँ -
आपसे-

2012/7/7 Dr. Anwer Jamal Khan <eshvani@gmail.com>
आपके निवेदन पर हम यह पोस्ट ज़रूर वापस ले लेते या एडिट कर देते लेकिन इस
dinesh gupta
Jul 7 (2 days ago)


to Anwer

 फिर  भी अगर आप चाहें तो मेरे नाम का प्रयोग कर सकते हैं-
जब चाहे तब -
मैं कोई दबाव बनाने या सहने में एकदम यकीं नहीं रखता -
कृपया पोस्ट को व्यक्तिगत  ही समझें -
सादर-
मेरा फ़ोन निचे लिखा है-
Dr. Anwer Jamal Khan
Jul 7 (2 days ago)


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ठीक है। हम भी किसी को तकलीफ़ पहुंचाने में यक़ीन नहीं रखते।
पूरी पोस्ट हटाना तो हमारे मुमकिन नहीं होगा। आप रचना जी से पूछ लीजिए कि
क्या उनका फ़ोटो हटाने से उनकी तसल्ली हो जाएगी ?
dinesh gupta
Jul 7 (2 days ago)


to Anwer

मैं  उनसे या दीपक बाबा से कोई बात नहीं करना चाहता- आपने मेरी बात पर गौर किया यह पसंद आया |



PART-1

डा।. अनवर विवाद / रविकर क्षमा-प्रार्थी

हाँ साथियों मुझे क्षमा करें।|
मेरी लिखी दो कुंडलियाँ अखाडा बन -गईं ( जिन्हें रचना जी के कहने से हटा दी हैं)
शाहनवाज, रचना,  अनवर दीपक की 20 टिप्पणियां यहीं आई थीं ।
सबसे क्षमा मांग ली है--
आप भी करें -
लीजिये ताज़ी - टिप्पणी -पढ़िए -
  
रचना8 July 2012 04:38
जिस  विवाद  को  आप  ने  घी   डाल  कर  भड़काया  है  उस  पर  कम  से   कम  अपनी  एक  पोस्ट  तो  लगा  ही  देते 
समाज  के  प्रति  , हिन्दू  धर्म  के  प्रति  अपनी  नैतिक  जिम्मेदारी  तो निभा   ही  देते  
मेल  भेज  कर  गलती   स्वीकारते  है  , क्षमा  मांगते   है  
ब्लॉग   पर   भी   मांग  ही  लेते  ||
jis vivaad ko aap ne ghee daal kar bhadkayaa haen us par kam sae kam apni ek post to lagaa hi daetae

samaj kae prati , hindu dharm kae prati apni naetik jimmedari to nibha hi daetae

mail bhej kar galti swikaartae haen , kshmaa mangtaae haen
blog par bhi maang hi laetae
ReplyDelete

डा. अनवर का मेल मिला--

आप बुज़ुर्ग हैं और आपकी बात का सम्मान हम पहले से ही करते हैं। सो, रचना
जी का फ़ोटो और उनका नाम पोस्ट से हटा दिया है।।


  PART-2

अब मेरे द्वारा डाला  गया घी देखिये, जिसने आग भड़काई --

Posted: 04 Jul 2012 03:28 AM PDT
चर्चा बढ़िया संयमित, झिड़की समझ सुझाव  ।
ब्लॉग-वर्ल्ड की  बेहतरी, नहीं कहीं दुर्भाव ।
नहीं कहीं दुर्भाव,  सभी को बहुत बधाई  ।
शाहनवाज पर नाज,  डाक्टर अनवर भाई ।
रचना जी का विषय, सभी धर्मों की नारी । 
धर्म आस्था-प्राण,  तनिक मांगे हुशियारी ।।

एक धर्म की ख़ास, करे नारी पर रचना

सचिवों ने की गड़बड़ी, खुश कर दित्ता बास ।
ऐसी-तैसी कर गये, एक  धर्म की  ख़ास ।

एक  धर्म की  ख़ास, करे नारी पर रचना ।
माफ़ी लेता माँग,  मगर रचना से बचना |


है सच्चा इंसान, अगर गलती वह माने   |
विषय जाइए भूल, यही कह गए सयाने ||

Tuesday, May 22, 2012

बुराई क्या है और बुराई को मिटाने के लिए कोई अपनी जान क्यों गवांए ? Evil

गधों और कुत्तों से बदतर हैं दहेज मांगने वाले
हमने दहेज मांगने वालों का हौसला तोड़ने के लिए यह पोस्ट लिखी तो देहरादून से राजेश कुमारी जी ने अपने कमेंट में कहा कि
अनवर जमाल जी बहुत सटीक और सार्थक बात कही है आजकल इन दहेज़ के लालचियों को इसी भाषा ऐसे ही शब्दों की जरूरत है मेरा बस चले तो इस पोस्ट के कई हजार पोस्टर बनवाकर देश की हर दीवार पर चिपका दूं बहुत बहुत हार्दिक आभार
शुक्रिया राजेश कुमारी जी।
अच्छी बातों का प्रचार ज़्यादा से ज़्यादा होना ही चाहिए।

इस पोस्ट पर कोटा, राजस्थान के जनाब दिनेश राय द्विवेदी जी का कमेंट भी मिला है।
अनवर भाई,
आमिर ने जो भी तीनों मुद्दे सत्यमेव जयते में दिखाए हैं, उनसे सहमति है। लेकिन यह तो टीवी पर बहुत बरसों से दिखाया जा रहा है। लोगों पर उस का कोई असर नहीं होता। लोग शो देखते हैं, भावुक हो कर ताली पीटते हैं, आँसू बहाते हैं और कसमें खाते हैं। समाज वहीं का वहीं रह जाता है। टीवी वाले पैसा बना कर निकल लेते हैं।
यहाँ भी वही होने वाला है।
कोई भी मुद्दा जब तक समाज में सामूहिक रूप से सतत न उठाया जाए तब तक उस का यही अंत होता है।
जरूरत है ऐसे आन्दोलनों की जो समाज में उठें और समाज को इन बुराइयों से मुक्त कराने तक अविराम चलते रहें।
यह भी सोचने की बात है कि इस समाज में ये सब बुराइयाँ आज भी क्यों मौजूद हैं? क्यों कि जो व्यवस्था परिवर्तन होना चाहिए था वह रोक दिया गया। भारत के आजाद होने तक सामन्ती आर्थिक संबंध प्रमुख थे और पूंजीवाद गौण। पूंजीवाद बच्चा था। उस के दो शत्रु एक साथ खड़े हो गए थे. एक तो सामन्तवाद जिसे समाप्त करने की जिम्मेदारी पूंजीवाद की थी। दूसरी मेहनतकश जनता अर्थात किसान, मजदूर और नौकर पेशा लोग। ये पूंजीवाद को खत्म कर देना चाहते थे। पूंजीवाद ने सामंतवाद से हाथ मिला लिया, क्यों कि वह पूंजीवाद को नष्ट नहीं कर सकता था। दोनों मिल कर अब मोर्चा ले रहे हैं। ये सामाजिक बुराइयां,सम्प्रदायवाद, जातिवाद किसान, मजदूर और नौकर पेशा लोगों को एक नहीं होने देते। इस कारण इन सब चीजों को सत्ता का संरक्षण मिलता है।

इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए पूंजीवाद और सामंतवाद के गठजोड़ से बनी वर्तमान फर्जी जनतांत्रिक सत्ता पर हमला बोलना होगा,उसे नष्ट करना होगा उस के स्थान पर वास्तविक जनतंत्र स्थापित करना होगा, मेहनतकश जनता का जनतंत्र।
लेकिन यह सब आमिर नहीं करेंगे। क्यों कि वे भी उसी सत्ता के एक औजार मात्र हैं।
जनाब दिनेश राय द्विवेदी जी के कमेंट का एक जवाब तो हमने अपनी पोस्ट पर ही दे दिया है और थोड़ा सा यहां यह भी कहना है कि
बुराई के ख़ात्मे के लिए एक तो बुराई की पहचान ज़रूरी है और दूसरे उसे ख़त्म करने की इच्छा शक्ति से भरे हुए कार्यकर्ताओं की ज़रूरत है।

बुराई क्या है ?
इसे तय किया जाना ज़रूरी है वर्ना हरेक आदमी जिस बात से दिक्क़त महसूस करेगा, उसी को बुराई घोषित कर देगा।
ग़रीब आदमी पैसे की कमी को बुराई कहेगा और अमीरों के सफ़ाए में अपनी मुक्ति देखेगा तो ऐसे ग़रीबों को पूंजीपति एक बुराई के रूप में देखेंगे और वे उनके सफ़ाए की या दमन की कोशिश करेंगे।
किस की कोशिश सही है और किस की कोशिश ग़लत है ?, यह कैसे तय किया जाएगा ?

वेश्याएं और उनके दलाल ग्राहकों की कमी को अपने लिए बुरा समझेंगे और अपने ग्राहक जुटाने के लिए कोशिश करेंगे तो उनकी कोशिशों को समाज के कुछ लोग बुराई के तौर पर देखेंगे।
बुराई क्या है ?
यह सवाल हर क़दम पर उठेगा।

इसके बाद यह सवाल उठेगा कि एक आदमी पूंजीपति की नौकरी करके अपने बच्चे पाल रहा है। उसके पास घर, बीवी-बच्चे और रोज़गार सब कुछ है।
वह ग़रीब आदमी के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कोई आंदोलन क्यों चलाए और क्यों दुख उठाए ?
आंदोलन और क्रांति में कार्यकर्ताओं की जान भी चली जाती है।
दुख भोगने वाले ग़रीब आंदोलन चलाएं तो समझ में आता है कि वे अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। कुछ पाने की कोशिश में ये ग़रीब मर भी जाते हैं तो ठीक है लेकिन दूसरों का जीवन बेहतर बन जाए, इसके लिए वे क्यों मरें जिनका जीवन आज बेहतर ही है ?
मरने के बाद अगर कुछ मिलने वाला नहीं है और जो कुछ मिलता है, वह सब इसी जीवन में मिलता है तो फिर वे दूसरों के चक्कर में अपना जीवन क्यों गवाएं ?
मरेंगे वे और जीवन बेहतर बनेगा दूसरों का।
दूसरों के चक्कर में कोई भी अक्लमंद आदमी मरना पसंद न करेगा जबकि मरने के बाद कुछ मिलना ही नहीं है, जैसा कि आपकी मान्यता है।

पहली समस्या तो बुराई की पहचान को लेकर खड़ी होती है और दूसरी समस्या इसके सफ़ाए के लिए कार्यकर्ता जुटाने में आती है।

समाज में समस्या है और लोग उसका हल चाहते हैं। उनकी समस्या को लेकर कुछ लोग खड़े होते हैं और वे पूंजीपतियों को डराते हैं कि ग़रीब लोग बहुत ग़ुस्से में हैं।
पूंजीपति उनसे हाथ मिला लेते हैं। ग़रीबों के हक़ के लिए लड़ने वाले पूंजीपतियों की ढाल बन जाते हैं और ग़रीबों के संघर्ष की दिशा बदल देते हैं। ग़रीब लोग उनके नेतृत्व में बरसों नारे लगाते रहते हैं लेकिन कोई सामाजिक क्रांति नहीं आती।
आखि़र कोई भी सामाजिक क्रांति क्यों नहीं आती ?
इसीलिए नहीं आती क्योंकि ग़रीबों के नेता अपना जीवन बेहतर बनाने में जुटे हुए हैं। ग़रीबों के आक्रोश से डराकर वे सरकार और पूंजीपतियों से वसूली करते रहते हैं। इन नेताओं के झोंपड़े महलों में बदल जाते हैं। अगर इन्होंने सचमुच क्रांति की होती तो इनकी जान कब की चली गई होती।
कोई क्यों मरे जबकि ज़िंदगी की हसीन बहारें उसके इस्तक़बाल के लिए तैयार खड़ी हों ?

इन दो सवालों को हल कर लिया जाए तो बुराई का ख़ात्मा किया जा सकता है।
1. बुराई क्या है ?
2. दूसरों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कोई अपना जीवन क्यों गवांए और अपने बीवी बच्चों को दर दर का भिखारी क्यों बनाए ?
जब यह धारणा आम हो जाए कि मरने के बाद कुछ होना नहीं है तो फिर इस ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है क्योंकि वह जानता है कि दुनिया में सज़ा कम ही मिलती है और यह कमज़ोरों को ज़्यादा मिलती है।
देखिए 

Pc0030300.jpg
मुंबई।। हरियाणा के यमुनानगर में एक महिला डॉक्टर द्वारा अबॉर्शन के बाद कन्या भ्रूण को टाइलेट में फ्लश करने के बाद उससे भी भयावह मामला सामने आया है। महाराष्ट्र के बीड में एक ऐसे ही 'डॉक्टर डेथ' का पता चला है, जो कन्या भ्रूण के अबॉर्शन के बाद सबूत मिटाने के लिए उसे अपने कुत्तों को खिला देता था।

Tuesday, May 15, 2012

मुस्लिम छात्र ने खिड़की से कूदकर नंगी लड़कियों से जान बचाई

यमन देश के छात्र के प्रति यौन हिंसा करने के इल्ज़ाम में 5 अमेरिकी छात्राएं गिरफ़्तार
वाशिंगटन (एजेंसियां)। ऐरिज़ोना राज्य के एक कॉलिज में यमन का एक छात्र असाम अश-शरई पढ़ता है। उसके आवास में 5 लड़कियां दाखि़ल हुईं और अंदर से ताला लगाकर अपने कपड़े उतार कर असाम अश-शरई को पकड़ लिया। असाम ने उनकी मिन्नत समाजत की लेकिन वे उस पर यौन संबंध बनाने के लिए दबाव डालती रहीं। उन पर कोई असर न पड़ा और उनकी हरकतें बढ़ती गईं तो असाम ने कहा कि ‘मैं एक दीनदार मुसलमान हूं और इसलाम अपनी बीवी के अलावा किसी दूसरी औरत से नाजायज़ ताल्लुक़ात की इजाज़त नहीं देता।‘
उन पांचों लड़कियों पर इस बात का भी कोई असर नहीं पड़ा तो असाम अश-शरई ने खिड़की से कूदकर अपनी जान बचाई और पुलिस को इत्तिला दी। पुलिस ने पांचों लड़कियों को उसके आवास से गिरफ़्तार कर लिया है। उन लड़कियों ने इल्ज़ाम क़ुबूल करते हुए बताया कि उनकी नज़र में असाम साइकोलोजिकली टेंशन में था। हमने उसे कई बार कहा था कि वह उनके साथ अपनी मर्ज़ी से सेक्स करे लेकिन वह तैयार नहीं हुआ तो उन्हें इस तरह उसके आवास में घुसना पड़ा।
यह वाक़या एक ऐसी यूनिवर्सिटी में हुआ है जिसमें शिक्षा सत्र पूरा होने के बाद 5 हज़ार लड़कियां नंगे होकर मैराथन रेस में हिस्सा लेती हैं। उनकी कपड़ों की निगरानी यूनिवर्सिटी की तरफ़ से की जाती है। उनके कपड़ों को तौला गया तो आधा टन वज़्न हुआ।

यह ख़बर कल 15 मई 2012 को राष्ट्रीय सहारा उर्दू के पृ. 12 पर छपी।
इस ख़बर से इस्लाम और पश्चिमी दुनिया की सोच और किरदार एक साथ सामने आ जाते हैं। पश्चिमी दुनिया का नंगापन हिंदुस्तान में भी आम होता जा रहा है। नई तालीम दिलाने वाले मां-बाप अपनी औलाद के लिए ऊंचे ओहदे का ख़याल तो रखते हैं लेकिन उसके किरदार का क्या होगा ?
इसे वे भुला देते हैं।
यही वजह है कि अकेले बेंगलुरू में ही हर साल 2 हज़ार से ज़्यादा लोग ख़ुदकुशी कर रहे हैं।
नंगेपन और ख़ुदकुशी दोनों का इलाज है इसलामी सोच।

Thursday, April 19, 2012

मुझे गालियां देने वाले इस देश, समाज और मानवता का अहित ही कर रहे हैं Abusive language of so called nationalists

'देश की अखंडता की रक्षा करने के लिए 
अपने मुस्लिम साथियों के साथ श्रीनगर में
पीछे शंकराचार्य हिल दिखाई दे रही है'

'
कोई गाली ऐसी नहीं है जो इन सभ्य और हिन्दू कहे जाने वाले ब्लागर्स ने मुझे न दी हो। पढ़े लिखे लोगों ने, जवान प्रोफ़ैसर्स ने और बूढ़े इंजीनियर ने, हरेक ने मुझे अपने स्तर की स्तरीय और स्तरहीन गालियों से नवाज़ा। मुझे अश्लील गालियां तक दी गईं लेकिन मैंने हरेक को सहा और उन्हें बताया कि आप ग़लतफ़हमी और तास्सुब के शिकार हैं। उनकी दी हुईं गालियां मैंने आज तक अपने ब्लाग पर ऐसे सजा रखी हैं जैसे कोई ईनाम में मिले हुए मोमेन्टम्स को अपने ड्राइंग रूम में सजाता है।
आपमें से किसका दिल है इतना बड़ा ?
अगर आपका दिल इतना बड़ा नहीं है तो बंद कीजिए सुधार का ड्रामा।
‘सुधारक को पहले गालियां खानी होंगी, फिर वह जेल जाएगा और अंततः उसे ज़हर खिलाया जाएगा या उसे गोली मार दी जाएगी।‘
एक सुधारक की नियति यही होती है। जिसे यह नियति अपने लिए मंज़ूर नहीं है वह सुधारक नहीं बन सकता, हां सुधारक का अभिनय ज़रूर कर सकता है।
आप इस समय जिस अनवर जमाल को देख रही हैं। यह मौत के तजर्बे से गुज़रा हुआ अनवर जमाल है। देश की अखंडता की रक्षा के लिए मैं जम्मू कश्मीर गया और अकेला नहीं गया बल्कि अपने दोस्तों को लेकर गया। 325 लोगों का ग्रुप तो मेरे ही साथ था और दूसरे कई ग्रुप और भी थे और उनमें इक्का दुक्का हिन्दू कहलाने वालों के अलावा सभी लोग वे थे जिन्हें मुसलमान कहा जाता है।
जब मैं गया तो मुझे पता नहीं था कि मैं वापस लौटूंगा भी कि नहीं। मैंने अपने घर वालों को, अपने मां-बाप को तब ऐसे ही देखा था जैसे कि मरने वाला इनसान किसी को आख़िरी बार देखता है। अपनी बीवी से तब आख़िरी मुलाक़ात की और अपने बच्चों को यह सोचकर देखा कि अनाथ होने के बाद ये कैसे लगेंगे ?
अपनी बीवी से कहा कि तुम मेरी मौत के बाद ये ये करना और दोबारा शादी ज़रूर कर लेना। उस वक्त भी आपका यह भाई हंस रहा था और हंसा रहा था। सिर्फ़ आपका ही नहीं, जिसे कि बहन कहलाना भी गवारा नहीं है बल्कि चार सगी बहनों का भाई जिनमें से उसे अभी 2 बहनों की शादी भी करनी है। बूढ़े मां-बाप, मासूम बच्चे और जवान बहनें, आख़िर मुझे ज़रूरत क्या थी वहां जाने की ?
मैं मना भी तो कर सकता था।
... लेकिन अगर मैं मना करता तो फिर क्या मैं देशभक्त होता ?
जम्मू कश्मीर जाकर भी मैं केवल श्रीनगर में प्रेस वार्ता करके ही नहीं लौट आया जैसा कि राष्ट्रवादी नेता और उनके पिछलग्गू करके आ जाते हैं बल्कि हमारे ग्रुप ने कूपवाड़ा और सोपोर जैसे इलाक़ों में गन होल्डर्स की मौजूदगी के बावजूद आम लोगों के बीच काम किया, जहां किसी भी तरफ़ से गोलियां आ सकती थीं और हमारी जान जा सकती थी और पिछले टूर में जा भी चुकी थीं। हमला तो ग्रुप पर ही किया गया था लेकिन हमारे वीर सैनिक चपेट में आ गए और ...
हरेक दास्तान बहुत लंबी है। यहां सिर्फ़ उनके बारे में इशारा ही किया जा सकता है। इतना करने के बाद भी न तो हमने कोई प्रेस वार्ता की और न मैंने उस घटना का चर्चा ही किया। मुझे मुसलमान होने की वजह से देश का ग़द्दार कहा गया और आज भी कहा जा रहा है।
एक झलक मैंने अपने फ़ोटो में दिखाई भी तो उसमें भी कश्मीरी भाईयों से एक अपील ही की कि वे ठंडे दिमाग़ से अपने भविष्य के बारे में सोचें।
... लेकिन अगर उत्तर प्रदेश के मुसलमान को भी आप ग़द्दार कहेंगे, अगर आप देश की अखंडता की रक्षा करने वाले मुसलमान को भी मज़हबी लंगूर और मज़हबी कौआ कहेंगे तो क्या वे लोग नेट पर मेरी दुर्दशा देखकर अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त हो पाएंगे ?
मुझे गालियां देने वाले इस देश, समाज और मानवता का अहित ही कर रहे हैं।
तब भी मैंने उनकी गालियां इस आशय से अपने ब्लाग पर व्यक्त होने दीं कि-
गाली देने वाले के मन का बोझ हल्का हो जाए जो कि शाखाओं में उनके मन पर मुसलमानों को ग़द्दार बता बता कर लाद दिया गया है। यह प्रौसेस ‘कैथार्सिस‘ कही जाती है। इसके बाद भड़ास निकल जाती है और आदमी ठीक ठीक सोचने की दशा में आ जाता है।
More more more .........

Tuesday, April 17, 2012

गाय की आड़ में आतंक का खेल

दिव्या जी की कुछ ताज़ा पोस्ट देखकर ऐसा लगता है कि अब उनके लेखन का मक़सद सिर्फ़ जज़्बात भड़काना भर रह गया है।
ऐसी ही एक पोस्ट का लिंक यह है :
http://zealzen.blogspot.in/2012/04/blog-post_7615.html
दिव्या जी ! आप देखेंगी कि इसके बाद भी लोग न भड़केंगे।
इसके बाद आप उन हिंदुओं को क्या कहेंगी ?
जो इतना साफ़ चित्र देखकर भी आपके भड़काने में नहीं आए ?
हो सकता है कि उन्हें भड़कता न देखकर आप ख़ुद ही भड़क जाएं !
अपनी प्यारी पार्टी की हार के बाद आपका मूड वैसे ही उखड़ा हुआ है।

हिंदू भाई आवागमन की मान्यता के अनुसार मानते हैं कि जो गाय काटता है वह मरकर गाय ही बन जाता है ताकि उसे वह काटे जिसे उसने काटा था।
इस हिसाब से पेशावर के ये पठान पिछले जन्म की वो गायें हैं जिन्हें इस क़साई ने काटा था जो कि अब गाय बना पड़ा है।
इस तरह जिसे आप गाय समझ रही हैं यह पिछले जन्म का क़साई है और जो आज क़साई दिख रहे हैं ये पिछले जन्म की गायें हैं।
अब आप तय कीजिए कि आप पिछले जन्म की कई गायों का साथ देंगी या कि एक क़साई का जो कि आज गाय दिख रहा है ?
यहां एक सवाल यह भी वाजिब है कि कुछ हिंदू वर्ग सुअर को भी चारों तरफ़ से छरियां भोंक भोंक मर मारते हैं और फिर खाते हैं। आपने कभी कोई पोस्ट सुअर हत्या के विरोध में नहीं बनाई जबकि हिंदू धर्म के अनुसार वह भी एक अवतार का रूप है। मछली भी विष्णु जी के अवतार का एक रूप है और हिंदुओं में यह बड़े चाव से खाई जाती है।
यह सरासर दोहरा पैमाना है कि विदेश में अफ़ग़ान बाशिंदे गाय काटें तो विरोध और अपनी बग़ल में गाय कट रही हो तो कोई विरोध नहीं और अपना वर्ग सुअर काट रहा हो और मछली खा रहा हो तो कोई विरोध नहीं।

दिव्या जी यह काम ब्लॉगस्पॉट पर कर रही हैं और यहां उनके विरूद्ध शिकायत भी की जा सकती है लेकिन उनके विरूद्ध शिकायत सुनी जाएगी, इसमें संदेह है।
दलितों और कम्युनिस्टों के ब्लॉग्स के विरूद्ध अक्सर शिकायतें की जाती हैं लेकिन उन्हें बंद नहीं किया गया।
दिव्या जी का भी नहीं होगा।
नफ़रतें दिलों में दीवार खड़ी करती हैं और उनका असर समाज पर देर सवेर ज़रूर आता है। देश के दुश्मन यही काम कर रहे हैं।
दिव्या जी थाईलैंड में रहती हैं। गाय वहां भी काटी जाती है। उन्हें गाय से प्रेम होता तो वह थाईलैंड में गाय बचाने के लिए आंदोलन चलातीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें गाय से नहीं बल्कि रूपयों से प्यार है।
उन्हें अपनी नौकरी-व्यापार प्यारा है। सो थाईलैंड में वह गऊ काट कर खाने वालों की सेहत का रख रखाव दिल लगाकर कर रही हैं। उनके राष्ट्रवाद को गाय से प्रेम नहीं है बल्कि मुसलमानों से नफ़रत है।
उन्होंने गूगल से ढूंढा तो उन्हें एक फ़ोटो नज़र आया जिसमें मुसलमान गाय के पास खड़े हैं। उर्दू से वह जाहिल हैं। सो उन्हें पता भी नहीं चला कि उर्दू में यह लिखा है कि ये लोग अफ़ग़ान शरणार्थी हैं जो पेशावर में पनाह लिए हुए हैं।
अगर दिव्या जी को इन अफ़ग़ान नागरिकों के अमल पर ऐतराज़ है तो वहां जाकर उनका विरोध करें। यह ख़याल ही रोंगटे खड़े कर देने वाला है। वहां तो अमेरिका जाकर पछता रहा है।
गूगल से यह तस्वीर ढूंढने में उन्हें सैकड़ों तस्वीरें नज़र आई होंगी लेकिन उन्होंने इस तस्वीर को ही चुना क्योंकि नफ़रत का ज़हर फैलाने का काम इसी तस्वीर के ज़रिये मुमकिन है।
 दारूल उलूम देवबंद हिंदुस्तान के कुछ ख़ास इलाक़ों में मुसलमानों से गाय न काटने के लिए कह चुका है। जिसका मक़सद हिंदुस्तानी समाज को टकराव से बचाना है। उसके इस फ़तवे को मुल्क के बुद्धिजीवियों ने सराहा भी है। इसके बावजूद उन्होंने यह काम किया है।
घर को आग लगाने वाले चराग़ यही हैं और ख़बरदार करना हमारा काम है।
इसके बावजूद भी हमें दिव्या जी से कोई रंजिश नहीं है। हमें पता है कि आदमी पुराना और ग़लत इतिहास पढ़ता है तो मर चुके महमूद ग़ज़नवी का तो कुछ कर नहीं पाता। मौजूदा मुसलमानों को ही ठिकाने लगाने की मुहिम पर निकल खड़ा होता है जो कि कभी पूरी हो नहीं सकती।
आपस का टकराव ख़त्म हो तो भारत की ताक़त दुनिया की अकेली ताक़त होगी।
जो लोग भारत में टकराव की फ़िज़ा बना रहे हैं वे भारत का भला नहीं कर रहे हैं।
विदेशी आतंकवादियों के आने-बुलाने की ज़मीन यही लोग बनाते हैं।
हमें भारत पर हमले के नाम से ही नफ़रत है। इसलिए जब भी अशांति और आतंकवाद के बीज बोये जाते हैं तो हम उनकी जड़ जमने से पहले ही उन्हें कुरेद कर सबको दिखा देते हैं।
चाहे बीज बोने वाला नाराज़ होकर हमें गालियां ही क्यों न बकने लगे !