‘मैं आज से हिंदी ब्लॉगिंग छोड़ रहा हूं। मेरा मन बहुत खिन्न है। एक बहुत बड़ी ज्ञानी हस्ती को मैंने इन्वाइट किया और उनका प्रोग्राम ही कैंसिल कर दिया। यह उनकी बहुत बड़ी इन्सल्ट है। यह उनकी नहीं बल्कि मेरी इन्सल्ट है। जहां हमारी इन्सल्ट हो वहां हमें रहना ही नहीं है।‘
कुछ इस तरह की मनोदशा में, आवेश में आकर खुशदीप जी ने हिंदी ब्लॉगिंग को अलविदा कह डाला, जो कि यक़ीनन ग़लत है। इसे ग़लत कहने वाले केवल हम ही नहीं हैं बल्कि सौ से ज़्यादा ब्लॉगर्स इसे ग़लत बता रहे हैं और जो भी सुनेगा वही इस फ़ैसले को ग़लत बताएगा लेकिन भाई खुशदीप साहब अब तक अड़े पड़े हैं अपनी ग़लती पर। अपनी ग़लती पर अड़े रहना ग़लती करने से भी बड़ी ग़लती है। जो अपनी ग़लती पर अड़ा रहे उसे क्या हक़ है कि वह दूसरों से कहे कि वे अपना भ्रष्टाचार और अपनी ग़लतियां छोड़ दें।
भाई खुशदीप जी ने हिंदी में पोस्ट्स लिखीं, कोई कमाल नहीं किया। जो लिखना जानता है, वह लिख ही लेता है। उन्होंने बहुत से ऊंचे-ऊंचे उसूलों की बातें कीं और बहुत सारी वाह-वाह और टिप्पणियां बटोरीं। हालत यह हो गई कि अगर वे दीवार पर पेशाब करते हुए नंगे बच्चे की फ़ोटो गूगल से उठाकर भी लगा देते थे तो अच्छे ख़ासे लोग अक्ल ताक़ पर रखकर वाह-वाह करने चले आते थे। सब कुछ ठीक चल रहा था तो उनकी ब्लॉगिंग भी ठीक चल रही थी लेकिन जैसे ही दिल पर एक चोट पर पड़ी तो उन्होंने अपने क़लम का सिर क़लम कर डाला।
यह क्या बात हुई ?
आप अपने क़लम की हत्या किस कुसूर के बदले कर रहे हैं ?
जो लोग अपनी बड़ाई में जीते हैं वे मुश्किल इम्तेहान के वक्त ऐसे ही टूट कर बिखर जाया करते हैं। एक पुण्य प्रसून जी के दिल पर चोट का तो इतना अहसास लेकिन पूरी हिंदी ब्लॉगर बिरादरी का दिल जो खुद तोड़ रहे हैं, उसका ज़रा अहसास नहीं है ?
फिर आपमें और सम्मेलन के आयोजकों में अंतर ही क्या बचा ?
उन्होंने भी अपनी मनमानी की और ब्लॉगर्स की और चीफ़ गेस्ट की उपेक्षा की और जनाब भी यही कर रहे हैं ?
आप तो हिंदी की सेवा कर रहे थे ?
आप तो समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए कोशिशें कर रहे थे ?
बल्कि आप तो खुद हमें भी समझा रहे थे कि
‘इंतक़ाम की नीति ठीक नहीं है ?‘
अगर हमारे लिए ठीक नहीं है तो आप खुद इंतक़ाम लेने पर क्यों तुल गए जनाब ?
बल्कि आप तो इंतक़ाम भी नहीं ले रहे हैं, आप तो सरासर जुल्म कर रहे हैं।
हमें जिन दो लेखकों से कुछ प्रॉब्लम थी, उनकी ही आलोचना हम कर रहे थे और वह भी पूरी तरह सैद्धांतिक आधार पर और क़ानूनी दायरे में, जिससे हिंदी ब्लॉगिंग को कोई भी नुक्सान नहीं पहुंच रहा था बल्कि हिंदी ब्लॉगिंग को रोज़ाना पठनीय और मनोरंजक पोस्ट्स मिल रही थीं।
जबकि आप जो कर रहे हैं उससे श्री अविनाश वाचस्पति और श्री रवीन्द्र प्रभात जी का तो एक रत्ती का नुक्सान न होगा लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग अपने एक ब्लॉगर से वंचित हो जाएगी। जिन लोगों ने आपको हर्ट किया आप भी उन्हें हर्ट कीजिए हमारी तरह अगर आपमें हिम्मत है तो लेकिन बेचारी हिंदी और बेकुसूर क़लम पर अपना गुस्सा क्यों निकाला जा रहा है ?
हम पहले ही बता रहे थे कि ये दोनों लोग जो कार्यक्रम कर रहे हैं, उसमें सैद्धांतिक दोष हैं लेकिन तब तो हमारी जनाब ने सुनी नहीं और जब अपने हाथ जला लिए तो हिंदी ब्लॉगिंग से ही अपने हाथ खींच लिए।
जनाब कह रहे हैं कि मुझे पता नहीं था कि ईनाम सी. एम. साहब के हाथों मिलने वाले हैं। चलिए जब आपने देख लिया था कि वे ही दे रहे हैं तो फ्रेश होने के बहाने उठकर इधर-उधर हो जाना चाहिए था न ?
कहते हैं कि एक-दो दोस्तों ने कह दिया था कि पुरस्कार ज़रूर लेना।
हमसे मुहब्बत करने वालों में शराबी और व्यभिचारी भी हैं और दूसरे पाप करने वाले भी, उन्होंने तो आज तक हमसे ग़लत काम करने के लिए न कहा और अगर वे कहेंगे तो हम उन्हें मना कर देंगे।
दोस्तों ने कह दिया था इसलिए ग़लत काम कर लिया। जो आदमी दोस्तों के कहने से सिद्धांतों से समझौता कर ले तो उसकी प्रतिबद्धता अपने दोस्तों के प्रति हुई न कि सिद्धांतों के प्रति। हिंदी ब्लॉगर्स में यह एक आम दोष है।
बल्कि हम तो यह कहेंगे कि जनाब अपने दोस्तों के प्रति भी वफ़ादार नहीं हैं।
जब वे दो दोस्तों के कहने से एक ग़लत काम कर सकते हैं तो सौ दोस्तों के कहने से सही काम क्यों नहीं कर सकते ?
सौ ब्लॉगर कह रहे हैं कि भय्ये ब्लॉगिंग मत छोड़, मत छोड़ पर बंदा है कि अब तक नहीं कहा है कि ठीक है दोस्तो जैसी आपकी इच्छा।
ये हैं जनाब खुशदीप जी। आज़माइश का एक मामूली सा झोंका आया और जड़ समेत उखड़ गए।
जबकि इनके साथ वैसा अपमानजनक रवैय्या तो ब्लॉग जगत ने किया ही नहीं है जैसा कि हमारे साथ किया गया और सारा ब्लॉग जगत इसका गवाह है। जिन्होंने हमारे साथ बदतमीज़ी की हमने उनकी खाल में भुस भर दिया और जिन्होंने हमें प्यार दिया हमने उनका शुक्र अदा किया। कभी एक की सज़ा दूसरे को न दी और हिंदी को तो कभी दी ही नहीं। हिंदी हमारी मातृभाषा है, इसमें लिखना छोड़ने की सोचने से पहले हम मर जाना पसंद करेंगे।
लेकिन जनाब खुशदीप जी कह रहे हैं कि अब हम हिंदी में ब्लॉगिंग नहीं करेंगे, हां, ज़रूरी हुआ तो इंग्लिश में कर लेंगे। अपनी जुबान से परहेज़ और इंग्लिश में करने के लिए तैयार ?
वाह भई वाह, यह कैसा उसूल है ?
यह कैसी सेवा है हिंदी की ?
इनकी कोई बात किसी भी क़ायदे पर पूरी नहीं उतर रही है।
ब्लॉगिंग छोड़नी है तो छोड़ दीजिए लेकिन अपने आप को उसूलपसंद मत दिखाइये।
आप एक मनमौजी आदमी हैं। वक्तगुज़ारी के लिए लिख रहे थे लेकिन अब दिल उखड़ गया है तो भाड़ में जाए ब्लॉगिंग, ऐसा मन बना चुके हैं।
हम बिल्कुल कोई अपील नहीं कर रहे हैं कि
‘खुशदीप जी, आप ब्लॉगिंग न छोड़ें, आप अच्छा लिखते हैं आदि आदि।‘
हम ऐसे किसी आदमी से कोई अपील क्यों करें जिसे अपने अपमान के सामने दूसरों के सम्मान की कोई चिंता ही नहीं है ?
जो आदमी सारे ब्लॉग जगत की बात गिरा रहा है, उससे हम भी अपील करके क्यों ज़िल्लत उठाएं ?
मत लिखना भाई, आज के बाद बिल्कुल कहीं मत लिखना हिंदी में। ब्लॉग ही क्या घर में डायरी भी मत लिखना हिंदी में। बात भी अब इंग्लिश में ही किया कीजिएगा।
सब्ज़ी वाले से लेकर हर हर आदमी से इंग्लिश में ही बात कीजिएगा और कोई पूछे तो बताना उन लोगों को कि एक बार हिंदी ब्लॉगर सम्मेलन में सम्मानित होने गया था, बस तब से ही दिमाग़ घूमा हुआ चल रहा है।
दिमाग़ तो हमारा भी घूमा हुआ है ऐसे बेढब करतब देखकर। दुख की बात यह है कि ये लोग बड़े बने बैठे हैं, हिंदी ब्लॉगिंग के मार्गदर्शक बने बैठे हैं, शर्म आनी चाहिए।
जब हम लिखते हैं तो फिर अपने नफ़े-नुक्सान से बेपरवाह होकर लिखते हैं।
भावनाएं आहत होने की वजह से ब्लॉगिंग छोड़ते तो हम छोड़ते, जब हमने नहीं छोड़ी तो फिर किसी के लिए भी हिंदी ब्लॉगिंग से दामन छुड़ाना जायज़ नहीं है।
हम आज भी खड़े हैं अडिग और अविचल।
जो हमें अपमानित करने की कोशिश करता है तो या तो हम उसे माफ़ कर देते हैं या फिर उससे बदला चुकता कर लेते हैं।
अपना तो सीधा सा उसूल है।
देर तक किसी के लिए हम अपने मन में फ़ितूर पालते ही नहीं।
जिनसे हम लड़-झगड़ लेते हैं, नफ़रत तो हम उनसे भी नहीं करते और हम हिंदी को तो क्या छोड़ेंगे हम तो उनसे भी किनारा नहीं करते जो हमें गालियां देते हैं।
‘हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल‘ में हमने ऐसे कई लोगों को सदस्य बनाया। नतीजा यह है कि आज वे गालियां नहीं देते। वे भी आदमी ही हैं। उनके पास भी दिल है। आज उनका एक ख़याल है तो कल दूसरा भी हो सकता है।
रवीन्द्र जी और अविनाश जी की हमसे ज़्यादा आलोचना तो आज तक किसी ने की ही नहीं होगी लेकिन इसके बावजूद उनके दिल भी शायद यह जानते होंगे कि हमें उनसे रंजिश कुछ भी नहीं है।
अविनाश वाचस्पति जी की एक बड़ी खूबी तो यह है कि आप उन्हें उनकी कमी बताएंगे तो वह तुरंत अपनी ग़लती मान लेंगे। ऐसे आदमी से नाराज़ होना तो बिल्कुल ग़लत है। अविनाश जी को आप उनकी ग़लती बताएं ताकि वे उन्हें सुधार सकें। उनके नमक का इतना हक़ तो बहरहाल बनता ही है।
हमने तो उनका नमक खाया नहीं है लेकिन फिर भी यह सब कह रहे हैं।
ग़लत बात पर चुप हम रह नहीं पाते हालांकि हमारे ‘षटमित्रों‘ ने हमें समझाया था कि आप ऐसे न लिखा करें और हमने भी तय कर लिया था कि अब हम भी दो-टूक न कहकर ज़रा घुमाकर लिखा करेंगे लेकिन...
ख़ैर !