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Thursday, December 30, 2010

नफ़रत से भरे मीडियाकर्मियों का एक सांकेतिक मनोविश्लेषण Media, my business part 1

प्यारी बहन दिव्या जी ! आपका नाम भी सुंदर है और उपनाम भी और आप ख़ुद भी । ऐसा मैंने हमेशा ही कहा है । सुंदरता के साथ आपमें बुद्धिमत्ता भी है और उत्साह भी और इन सबके साथ है आपमें अपने देश और समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा भी है और इस रास्ते में आने वाली मुश्किलों का सामना करने के लिए फ़ौलादी हौसला भी। इसीलिए मैंने आपको 'अमन के पैग़ाम' ब्लाग पर ब्लाग संसार की पहली लौहकन्या का खिताब भी अता किया है जिस पर आपके किसी Follower तक ने भी आपको मुबारकबाद नहीं दी , यहाँ तक कि मेरे भाई अमित जी तक ने भी नहीं ।
आपमें ख़ूबियां केवल इतनी ही नहीं बल्कि इनसे कहीं ज़्यादा हैं । आपको 'सजेशन ट्रिक' के जरिए अपने रूट से डायवर्ट नहीं किया जा सकता और न ही आप मतभिन्नता ज़ाती रंजिश और बायकॉट तक ही ले जाती हैं । जबकि इस विषय में काफ़ी उम्रदराज़ बुज़ुर्ग तक ग़च्चा खा चुके हैं , ख़ासकर मेरे बारे में । लेकिन आपने मेरी बात का कभी बुरा नहीं माना और न ही मेरे ब्लाग पर ही आना छोड़ा। इसका मतलब है कि हमारे संबध सामान्य हैं ।

आज भी मैंने हमेशा की तरह आपका ब्लाग देखा और आपकी ताजा पोस्ट में एक अंतर्विरोध देखा है । उसी पोस्ट के बारे में मैं आपसे चंद सवाल पूछना चाहता हूँ । सवाल सामान्य हैं लेकिन एक डर है कि कहीं आपको बुरा न लग जाए । हरेक के बुरा मानने की तो मैं खुद परवाह नहीं करता लेकिन जिन्हें मैं सराहता हूं , उनके जज़्बात का खयाल रखने की कोशिश मैं जरूर करता हूँ ।
अगर आप नाराज़ न होने का आश्वासन दें तो मैं अपने सवाल आपके सामने पेश करूं वर्ना तो जाने दूंगा क्योंकि सवाल बहुत अहम नहीं हैं ।

कल मैंने अपनी पोस्ट में बहन दिव्या जी से यह निवेदन किया था । चूंकि उन्होंने मेरे निवेदन का अभी तक कोई उत्तर नहीं दिया है इसलिए मैं उनसे अभी कोई सवाल भी नहीं करूंगा ।
इस पोस्ट में कोई सवाल नहीं किया गया है । आप देख सकते हैं यह पूरी पोस्ट बहन दिव्या जी की तारीफ से भरी हुई है । बेशक इसे एक अच्छी पोस्ट कहा जाना चाहिए लेकिन जिन लोगों के दिलों में दुश्मनी और नफरत हो , ऐसे अच्छे लेख पर भी उनसे कोई सराहना नहीं मिल सकती क्योंकि अगर उन्होंने स्वीकार कर लिया कि सवाल पूछने से पहले इजाजत लेना , तारीफ करना अनवर जमाल का सद्गुण है तो उनका तो वह सारा मिशन ही चौपट हो जाएगा जो कि मुसलमानों की छवि बिगाड़ने के लिए वे बरसों से चलाते आ रहे हैं ।
जनाब रोहित साहब (बोले तो बिंदास वाले) बहन दिव्या जी के ब्लाग पर कह रहे हैं कि मैं अनवर जमाल की पोस्ट पढ़कर आ रहा हूं। उनकी पोस्ट में अंतर्विरोध है।
मैं उनकी बात पर मुस्कुराकर रह गया ।
बहन दिव्या जी ने भी उनसे न पूछा कि भाई उस पोस्ट में तो उन्होंने न कोई मुद्दा उठाया है और न ही कोई सवाल किया है । उसमें तो किसी का विरोध तक नहीं है फिर अंतविरोध कहां से आ गया ?
चापलूसी और नफ़रत की भी हद है ।
मेरे एक पुराने परिचित बंधु हैं । मेरी टिप्पणी को आधार बनाकर वे भी दिव्या जी के कान भरते हुए देखे जा सकते हैं , उन्हें आपत्ति है कि मैंने दिव्या जी को मेनका जैसा सुंदर क्यों कह दिया ?
चलिए , उन्होंने कहा सो कहा । वे तो वेद पुराणों तक की बात को बकवास मानते हैं। फिर मेरी बात पे आपत्ति करने का उनका फ़र्ज़ भी है क्योंकि वे 'राष्ट्रवादी' हैं और आजकल मुसलमानों को किए बिना राष्ट्रवादी सा दिखना मुमकिन नहीं है । ये बंधु मेरे विरोधी हैं लेकिन चापलूस क़िस्म के नहीं हैं

चापलूस तो शायद रोहित जी भी न हों लेकिन उन्होंने मराठी बंधु को पछाड़ने के लिए पहले तो उन्होंने दिव्या जी दंडवत आदि करके लुभाया और फिर ख़ुद को बहन दिव्या जी की नज़र में उनका बहुत बड़ा हमदर्द साबित करने के लिए मुझसे भिड़ गए ।
(हिंदी फिल्मों का घिसा पिटा फ़ॉर्मूला , मनोविज्ञान की समझ रखने वाली दिव्या जी भी इनके सर्कस देखकर ज़रूर हंसती होंगी । ये लाइनें लिखते हुए खुद मेरे ही पेट में बल पड़े जा रहे हैं ।)

बहरहाल (हंसी रोककर) , रोहित जी ने कहा कि 'जो बहन की सुंदरता की उपमा मेनका से दे उसे भारतीय सभ्यता और संस्कार का क्या पता ? इनकी और इन जैसों की सोच पर लानत ।'
ऐसे ऐसे लोग मीडिया में आ गए हैं , पत्रकार बनकर बैठ गए हैं बल्कि रोहित जी तो अभिमन्यु की तरह गर्भ में भी पत्रकारिता का ही ज्ञान अर्जित करते होंगे क्योंकि वे ख़ुद बताते हैं कि अपने पिता जी के पत्रकार होने के कारण आंख खुलते ही पत्रकारिता का माहौल देखा । इतने लंबे समय के शिक्षण लेने और हिंदुओं के दरम्यान रहने के बावजूद बल्कि ख़ुद हिंदू होने के बावजूद भी उन्हें यह तक नहीं पता कि मेनका किसी वेश्या का नहीं बल्कि स्वर्ग की एक अप्सरा का नाम है । सुंदरता की उपमा देने के लिए मेनका का नाम लिया जाता है क्योंकि स्वर्ग की अप्सराओं की ख़ूबसूरती अतुलनीय मानी जाती है और मेनका को सभी अप्सराओं में प्रमुख माना जाता है । यही वजह है कि हिंदू अपनी बेटियों का नाम बेहिचक रखते हैं और प्राय: ये नाम पंडित जी की सलाह के बाद या उनके सुझाव पर ही रखे जाते हैं क्योंकि पंडित जी ही नवजात कन्या की कुंडली बनाते हैं, उनकी राशि और नक्षत्र देखकर उसके नाम का प्रथम अक्षर ज्ञात करके उसके नाम का निर्धारण करते हैं । अगर मेनका या मेनका का नाम घृणित होता तो कोई पंडित सवर्ण समाज को यह नाम रखने की सलाह हरगिज़ न देता और न ही ऐसी घृणित सलाह के बदले में उसके यजमान उसे दक्षिणा , भेंट और उपहार ही देते । हिंदू समाज में मेनका नाम का सामान्य प्रचलन यह सिद्ध करता है कि अपनी बेटी का नाम मेनका रखना एक पुनीत कार्य है क्योंकि नामकरण संस्कार हिंदुओं के सोलह पवित्र संस्कारों में से एक है । इस अवसर पर बहुत से रिश्तेदार और परिचित भी इकठ्ठा होते हैं । नाम में कुछ भी बुराई होती तो कोई तो ऐतराज़ करता ।
रोहित जी का ऐसे पुनीत नाम पर ऐतराज़ करना या तो हिंदू साहित्य और संस्कारों सिर्फ़ उनकी अज्ञानता को दर्शाता है या फिर मुसलमानों के प्रति या सिर्फ़ मेरे प्रति उनके विद्वेष को। मीडिया में ऐसे लोग हैं यह चिँता का विषय है।
[...जारी]