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Thursday, July 22, 2010

The flower of jannah एक मासूम कली हमारे आंगन में खिली, हमारे घर को महकाया और फिर जन्नत का फूल बन गई। हमारे दिल उसकी यादों के नूर से हमेशा रौशन रहेंगे . - Anwer Jamal

ऐ अल्लाह! इस बच्ची को हमारी नजात व आसाइश के लिये आगे जाने वाला बना और उसकी जुदाई के सदमे को हमारे लिये बाइसे अज्र और ज़ख़ीरा बना और उसको हमारी ऐसी शिफ़ाअत करने वाला बना जो क़ुबूल कर ली जाये।

-आसान फ़िक्ह, हिस्सा अव्वल, लेखक मुहम्मद यूसुफ़ इस्लाही, मक्तबा ज़िकरा, दिल्ली

दुआ का अरबी उच्चारण यूं है-
अल्लाहुम्मजअल्हा-लना फ़रतंव्व-वज्अल्हा लना अज्रंव-व ज़ुख़रंव-वज्अल्हा लना शाफ़िअंव्व-व मुशफ़्फ़िअः ।
रिश्तेदार और दोस्त आ रहे थे और कुछ आ भी चुके थे। उनके दरम्यान मैं ‘आसान फ़िक्ह‘ खोलकर यह दुआ देख और समझ रहा था। इस दुआ में अनमोल मारिफ़त के ख़ज़ाने और दुखी दिल की तसल्ली का पूरा सामान मौजूद है।
यह दुआ हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पवित्र वचनों में से एक है। इस दुआ को नाबालिग़ बच्ची की मौत के बाद उसकी नमाज़ ए जनाज़ः में पढ़ा जाता है।
मेरी बेटी अनम भी बालिग़ होने से पहले ही चल बसी। वह राम 4 बजे तक ठीक थी, अपनी मां का उसने दूध पिया। रोज़ की तरह आज सुबह भी उसकी मां ने जल्दी जल्दी बच्चों को तैयार किया, उन्हें स्कूल भेजा और उसके बाद उन्होंने अनम को उसके झूले से निकालकर गोद में लिया। गोद में लेते ही उन्होंने देखा कि उसकी आंखे खुली हुई हैं, बदन ठंडा है और गर्दन अकड़ी हुई है। उन्होंने रूआंसा होकर टॉयलेट का दरवाज़ा खटखटाकर मुझे यह इत्तिला दी। मैंने आकर देखा तो नब्ज़, सांस और ताप वहां कुछ भी न था।
मैं अपनी बेटी को लेकर डा. अवतार सिंह गौतम के पास गया। उन्होंने मुआयना करके मेरे फ़ैसले की तस्दीक़ कर दी।
शरीफ साहब , शफ़ीक़ और तनवीर भाई ने क़ब्रिस्तान में उसके लिये छोटी सी क़ब्र खुदवाई, उसके लिये छोटा सा कफ़न लाये।

अनम को नहलाने में शफ़ीक़ भाई और तनवीर भाई ने मेरी मदद की। और लोगों के अलावा मैंने अपने बड़े बेटे अनस को भी कार में अपने साथ ले लिया ताकि वह जीवन के सबसे बड़े सच से रू ब रू हो सके।

पौन बजे उसकी नमाज़ ए जनाज़ा में बक़दर तीन सफ़ आदमी हो गये थे। उसके लिये दुआ की और खुद अपने लिये भी। वापस आया तो हापुड़ से मास्टर अनवार साहब आ गये और अब भी लोगों के आने का सिलसिला लगा हुआ है। जिसे पता चल रहा है वह आ रहा है या फिर उसका फ़ोन आ रहा है। जिन ब्लॉगर्स को अपना क़रीबी समझा उन्हें भी एसएमएस कर दिया। तीन बार की कोशिश में एक बार एसएमएस सैंड हो पाया, सैन्ट करने ही वाला होता था कि किसी न किसी का फ़ोन आ जाता था। फिर कुछ को चाहकर भी न भेज सका।
एक मासूम कली हमारे आंगन में खिली, हमारे घर को महकाया और फिर जन्नत का फूल बन गई। हमारे दिल उसकी यादों के नूर से हमेशा रौशन रहेंगे यहां तक कि हम फिर से उससे जा मिलें।