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Thursday, December 16, 2010

शहादते कर्बला का मक़सद और पैग़ाम Karbala part 3

इंसान वह है जो सच्चा हो और सच का गवाह हो या कम से कम सच की तलाश में हो। जो तलाश करता है वह पा भी लेता है और जो पा लेता है फिर वह देता भी है। जिसने जो कुछ पाया है उसे सिर्फ़ ख़ुद तक रख ले, यह मुमकिन ही नहीं है। अगर इंसान सच का पाने वाला नहीं बनता तो फिर उसके पास सिवाय झूठ के कुछ नहीं होता।
जहाँ सच होता है वहाँ हरेक ख़ैर व ख़ूबी ख़ुद ब ख़ुद आ जाती है और जहाँ झूठ होता है वहाँ से तमाम ख़ैर व ख़ूबियाँ रूख़्सत हो जाती हैं और वहाँ सिवाय ज़ुल्म ज़्यादती और लूट खसोट के कुछ नहीं होता।
इस ज़मीन पर जितने भी आदमी हैं, वे सब इन्हीँ दो क़िस्मों के हैं। सच और झूठ इंसान के अंदर होता है लेकिन वह इसे बाहर भी ले आता है। सच और झूठ दोनों ही ग़ैर मुजस्सम हैँ, अमूर्त हैं लेकिन इन्हें आदमियों के कर्मों के रूप में देखना मुमकिन है।
रौशनी की ग़ैर मौजूदगी के अहसास का नाम अंधेरा है अंधेरे में चीज़ें नज़र नहीं आतीं और ख़ुद अंधेरा भी नज़र की पकड़ से बाहर की चीज़ है और यही हाल रौशनी का है। रौशनी को भी आज तक कोई आँख देख नहीं पाई है और न ही देख सकती है आँख देखती है चीज़ों को जब रौशनी उन पर पड़ती है।
चीज़ें देखकर इंसान को रौशनी का यक़ीन इस दर्जे में हो जाता है कि वह कहता है उसने रौशनी को देखा है। एक कहता है और दुनिया मानती है। सारी दुनिया भी ऐसे ही देखती और बोलती है। विज्ञान के युग से पहले भी इंसान ऐसे ही बोलता था और आज विज्ञान के युग में भी इंसान ऐसे ही बोलता है। इंसान बोलता है कि 'उसने रौशनी देखी' और दुनिया उसे सच मानती है। दुनिया ही नहीं बल्कि दुनिया की तमाम अदालतें उसके बयान को मानती हैं।

चीजों का देखना रौशनी का देखना मान लिया जाता है क्योंकि रौशनी न होती तो चीज़ें भी नज़र न आतीं।
ईश्वर, ख़ुदा, गॉड, यहोवा, अल्लाह या पालनहार भी प्रकाशस्वरूप है, लाइट, नूर और रौशनी है। रौशनी को रौशन करने वाला वही है। वह न होता तो कोई चीज़ किसी को नज़र न आती बल्कि ख़ुद देखने वाला भी न होता। चीज़ों का यक़ीन रखने वाला इंसान उस हस्ती का यकीन नहीं रखता जिसकी वजह से उसे चीज़ें नज़र आ रही हैं। रौशनी को आँख से देखे बिना रौशनी का यक़ीन करने वाला इंसान कहता है कि ईश्वर की ज्योति और खुदा के नूर को मैं तब मानूंगा जबकि उसे मैं अपनी आँख से देख लूंगा।
क्या रौशनी को देखने के लिए इंसान ने कभी ऐसी शर्त कभी रखी है ?
किसी अंधे ने कभी रखी हो तो रखी हो लेकिन किसी आँख वाले ने, किसी अक़्ल वाले ने तो कभी नहीं रखी।
अक़्ल वाले हमेशा चीज़ें देखकर रौशनी का अहसास करते आए हैं और रौशनी का अहसास ईश्वर की पावन ज्योति और ख़ुदा के मुक़द्दस नूर के दर्शन में जिसके लिए बदल जाए तो समझिये कि इसकी आँख ही नहीं बल्कि इसकी अक़्ल भी सही काम कर रही है और इसका दिल भी और दिल का अहसास भी।
हरेक चीज़ ख़ुदा का तआर्रूफ़ है, ईश्वर का परिचय है क्योंकि रचनाकार का सही परिचय उसकी रचनाओं से मिलता है। रौशनी ख़ुदा का सबसे बड़ा परिचय है, सबसे बड़ी निशानी है। यह इतना बड़ा परिचय है कि दुनिया की हरेक ज़बान में प्रकाश और नूर के लिए जो लफ़्ज़ बोला जाता है उसे खुदा का एक नाम करार दिया गया है।
संस्कृत जैसी कुछ ज़बानों में तो रौशनी को ही नहीं बल्कि रौशनी देने वाली चीजों को अग्नि और सूर्य को भी खुदा का ही एक नाम माना गया है। उसकी वजह भी यही है कि सनातन काल से लोग रौशनी को खुदा का परिचय मानते आए हैं। खुदा के सम्मान की वजह से रौशनी को और उसके स्रोत को भी सम्मान देते आए हैं। समय के साथ कुछ अति और असंतुलन भले ही हो गया हो या फिर अलंकार को समझते में कुछ भूल हो गई हो लेकिन दुनिया खुदा का नाम आज भी नहीं भूली है।
ऐसा बहुत बार हुआ कि एक आदमी खुदा के हुक्म को भूल गया हो और उसने चाहा हो कि ज़माने वाले भी खुदा के हुक्म को भुलाकर उसके हुक्म के गुलाम बन जाएं लेकिन नाम को वह भी नहीं भुला पाया। जिस दिन उसके नाम को भुला दिया जाएगा उस दिन यह दुनिया भी मिट जाएगी और जब उसके हुक्म को भुला दिया जाता है तब इंसाफ़ मिट जाता है और जब इंसाफ़ मिट जाता है तो फिर कमअक़्ल लोग जुल्म की चक्की में पिसकर सही फैसला करने की ताकत भी खो बैठते हैं और अपने जीवन का उद्देश्य और मार्ग भी, जो कि इंसान की अस्ल पूँजी और इंसानियत की बुनियाद है। खुदा का यकीन गँवाने के बाद फिर न तो इंसानियत बचती है और न ही इंसान । इंसान के नाम पर फ़क़त एक वुजूद बचा रह जाता है । फिर उसमें और जानवर में कोई अंतर नहीं रह जाता। खाना पीना और बच्चे पैदा करना ही बस उनका काम रह जाता है बल्कि वे जानवरों है भी बदतर बन जाते हैं । वे जमीन में युद्ध और फ़साद करते हैं , वे जुल्म करते हैं और उससे भी बड़ा जुल्म यह करते हैं कि ऐसा वे खुदा के नाम पर करते हैं ।
सच्चा बादशाह सिर्फ खुदा है और दुनिया में बादशाह होने का हक भी सिर्फ उसी को है जो सच्चा हो । जो सच्चा होगा वही लोगों को सच्चा रास्ता बता सकता है सच के राहियों को उनकी मंजिल तक भी वही पहुँचा सकता है।
जान-माल, इज़्ज़त, शोहरत और हुकूमत के लालची लोग दूसरों की जानें लिया करते हैं और सच्चे बंदे दूसरों की भलाई के लिए अपनी जानें दिया करते हैं। यह एक कसौटी है सच्चे को पहचानने की जिस पर झूठा कभी खरा नहीं उतरता। दुनिया इस कसौटी को पहचानती है इसीलिए वह इमाम हुसैन को सच्चा मानती है।
'सच्चे की गवाही भी सच्ची होती है।' इसे भी दुनिया मानती है । इमाम हुसैन रज़ि. की ज़िंदगी बंदगी की ज़िंदगी है और उनकी मौत एक शहीद की मौत है।
अरबी में शहीद का अर्थ 'गवाह' होता है। 'खुदा मौजूद है और उसका हुक्म भी और किसी भी ज़ालिम को खुदा की जमीन पर नाहक़ ख़ून बहाने और फ़साद करने का हक नहीं है' यही कहने के लिए इमाम हुसैन अपने परिवार और दोस्तों के साथ घर से निकले थे। उन्होंने कहा और ऐसे कहा कि फिर ज़माने के लिए उसे भुलाना मुमकिन न रहा। उनकी सच्ची गवाही के बाद भी अगर किसी को खुदा के वुजूद का यकीन न आए तो इसका मतलब यही है कि उसने ध्यान देने का हक पूरा अदा नहीं किया जो कि मतलूब है।
हक़ीक़त तक पहुंचना है तो हक़ अदा करना ही होगा।

हक़ अदा कीजिए।