यह ख़त मेरी एक बहन ने अनम की ताज़ियत में भेजा है। इस ब्लॉग पर मैं अनम की हरेक याद को संजो लेना चाहता हूं। इसलिये इसे यहां दर्ज कर रहा हूं-
प्यारी भाभी जान ! अस्-सलामु-अलैकुम । कैसी हो ? , मैं अल्लाह के शुक्र से और आपकी दुआओं से बिल्कुल ठीक हूं और आपकी ख़ैरियत नेक चाहती हूं और बताओ आजकल क्या चल रहा है ?
जबसे अनम का ये हादसा हुआ है किसी काम में दिल ही नहीं लग रहा है। अगर हंसी भी आती है तो एकदम अनम याद आती है तो कभी अकमल आफ़िया और अनस का मासूम चेहरा सामने आ जाता है। रात के 2 बज रहे हैं। अजीब सी घबराहट हो है। सोचा आपको ख़त लिखूं , अल्लाह आपको हिम्मत व हौसला दे। जब मैंने आपको फ़ोन पर रोते सुना तो मेरा दिल फटने को हो गया जबकि फ़ोन पर चेहरा तो नज़र नहीं आता तो जब बच्चे आपको रोते देखते होंगे तो उनका मासूम दिल कितना तड़पता होगा ?
बस आप अपना और भाई साहब का ख़याल रखिये । अल्लाह तआला आपको तंदुरूस्ती दे और बच्चों पर आप दोनों का साया हमेशा रखे। बस अब शारा और आफ़िया ही में आप अनम को ढूंढिये। अल्लाह ने अनम को दुनिया की मुसीबतों से बचकर उसे जन्नत के बाग़ों में भेज दिया है। जहां उससे न कोई हिसाब किताब होगा , बस अब आप बच्चों के लिये ही सही अपनी तरफ़ ध्यान दीजिये क्योंकि अगर भाई साहब ने दिमाग़ पर ले लिया या आपको ही कुछ हो गया तो बच्चों को कौन देखेगा क्योंकि जो कुछ बच्चों के आप हो जाओगे वह कोई और नहीं हो सकता।
अल्लाह तआला आपकी उम्र दराज़ करे। बच्चों को मेरी तरफ़ से बहुत-बहुत प्यार कहियेगा। अगर आप हंसोगी तो बच्चे भी हसेंगे , उनको भी हौसला मिलेगा। अच्छा अब ख़त बन्द करती हूं । लिखने को बहुत कुछ है । यहां रहती हूं तो वहां दिल रहता है। और वहां जाने से पहले यहां आने का ग़म पहले हो जाता है।

