इंसान अपने वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकता। आप भी सोचते होंगे और हम भी सोचते हैं। हमने तो अपनी ज़िंदगी फिर भी बहुत अच्छी गुज़ार ली है, हम ऐसा समझते हैं लेकिन आने वाले समय के बारे में सोचते हैं तो हमारे शरीर में पहले तो झुरझुरियां सी दौड़ने लगती हैं।
मारकाट में हम विश्वास नहीं रखते और क्रांति टाइप कोई परिवर्तन भी हम नहीं चाहते नहीं क्योंकि इन सबका नुक्सान भी घूम फिर कर जनता को ही उठाना पड़ता है। जो भी नई व्यवस्था बनेगी। उसमें नेता और पूंजीपति फिर से ऐश मारना शुरू कर देंगे। क़ुर्बानी देते हैं चंद सिरफिरे दीवाने और जनता लेकिन ऐश करने के लिए वे लोग आ जाते हैं, जो ख़ुदग़र्ज़ और बुज़दिल होते हैं। इतिहास के जितने भी उलट-फेर आप देखेंगे तो आपका मन कभी नहीं चाहेगा कि कोई क्रांति यहां हो।
आज नेता निश्चिंत हैं और अदालतें सुस्त हैं। नौकरशाह मज़े कर रहे हैं और मोटा माल कमाकर अपने बच्चों को आला तालीम दिला रहे हैं। पढ़-लिखकर वे भी मोटा माल कमाएंगे। पूंजीपति राजाओं की तरह बसर कर ही रहे हैं। आम जनता की रोज़ी-रोटी, शिक्षा और सुरक्षा सब कुछ अनिश्चित है।
साल भर हो चुका है। 8 मई आई और गुज़र गई किसी ने याद नहीं किया कि 8 मई 2010 सोमालिया के लुटेरों ने देश के 22 नौजवानों को पकड़ लिया था। आज तक उन्होंने छोड़ा नहीं और हमारे पक्षी-विपक्षी नेताओं ने उन्हें छुड़वाया नहीं। यहां गाना बजा रहे हैं ‘यह देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का‘ और मलाई चाटने वाले नाच रहे हैं। उनके समर्थक कह रहे हैं कि यह राष्ट्रवाद है।
कभी इस देश का हाल यह था कि रानी लक्ष्मीबाई ने ज़नाना लिबास उतार कर मर्दाना लिबास पहन लिया और घोड़े पर बैठकर दुश्मन की तरफ़ हमला करने भागीं और आज यह आलम है कि जो लड़ने निकला था भ्रष्टाचारियों से वह मर्दाना लिबास उतार ज़नाना लिबास में लड़ाई के मैदान से ही भाग निकला और फिर औरतों की ही तरह वह रोया भी।
आज जिसके पास चार पैसे या चार आदमियों का जुगाड़ हो गया। वह एमपी और पीएम बनने के सपने देख रहा है। पहले तो केवल भ्रष्टाचारी और ग़ुंडे-बदमाश ही नेतागिरी कर रहे थे और फिर हिजड़े और तवायफ़ें भी नेता बन गए। उसके बाद अब समलैंगिक भी नेता बनकर खड़े हो रहे हैं कि देश को रास्ता हम दिखाएंगे।
आप एक बार देश के सभी नेताओं पर नज़र डाल लीजिए। उनमें सही लोगों के साथ-साथ ये सभी तत्व आपको नज़र आ जाएंगे।
जनता इन सबसे आजिज़ आ चुकी है। जिस पर भी वह विश्वास करती है, वही निकम्मा निकल जाता है। लोगों में निराशा घर कर रही है। जिसकी वजह से जगह-जगह आक्रोश में आकर लोग हत्या-आत्महत्या कर रहे हैं। हम सब एक भयानक भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में सांप्रदायिक राष्ट्रवाद कोढ़ में खाज की तरह समस्या को और ज़्यादा बढ़ा रहा है।
ये हालात हैं जिन्हें हम एक दम तो नहीं बदल सकते लेकिन फिर भी लोगों के दिलों में आशा का दीपक ज़रूर जला सकते हैं। आप कुछ करें या न करें लेकिन लोगों की आशा और उनके सपनों को हरगिज़ मरने न दें। आदमी रोटी-पानी और हवा से नहीं जीता बल्कि वह एक आशा के सहारे जीता है। उसे यह आशा बनी रहती है कि एक समय आएगा, जब सब ठीक हो जाएगा।
वह समय कब आएगा ?
इसे न तो हम जानते हैं और न ही आप लेकिन फिर भी यह आशा तो हम सबके मन में है ही। हमारी कोशिश यही है कि हम लोगों में यह आशा ज़्यादा से ज़्यादा जगाएं कि हर रात के बाद एक सुबह होती ही है और यह लोगों के प्रयास से नहीं होती बल्कि यह मालिक की दया से होती है। जब मालिक का नाम आता है तो मन में दम तोड़ती हुई आस भी ज़िंदा हो जाती है। यही आस लोगों को हिंसा और अनुशासनहीनता से दूर रहने के लिए प्रेरित करती है। निराशा से बचाने वाली चीज़ बुद्धि और नास्तिकता नहीं बल्कि आस्था है। मनुष्य अपने स्वभाव से ही आस्थावान और आशावादी है।
हम सब एक ही तरह के मनुष्य हैं। जिसका भी लहू बहेगा वह भी हमारी तरह का ही एक इंसान होगा। वह किसी का बेटा और किसी का भाई होगा। वह खुदा को मानता हो या चाहे न मानता हो लेकिन फिर भी वह बंदा एक ही खुदा का होगा। ईश्वर-अल्लाह हमारी धार्मिकता को इसी कसौटी पर परखता है कि हम समाज में शांति लाने और उसे बनाए रखने के लिए कितना प्रयास करते हैं ?
यह देश धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है तो यहां सबसे बढ़कर शांति होनी चाहिए।
अगर हम विभिन्न मत और संप्रदायों में भी बंट गए हैं और अपने अपने मत और संप्रदाय को सत्य और श्रेष्ठ मानते हैं तो हमें एक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हुए शांति और परोपकार के प्रयासों में एक दूसरे से बढ़ निकलने के लिए भरपूर कम्प्टीशन करना चाहिए।
अपने देश और अपने समाज को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को बचाने का तरीक़ा आज इसके सिवा कोई दूसरा है नहीं। मैं इसी तरीक़े पर चलता हूं और आपको भी इसी तरीक़े पर चलने की सलाह देता हूं।
आप अपने दीपक ख़ुद बन जाइये, मार्ग आपके सामने ख़ुद प्रकट हो जाएगा। तब आप चलेंगे तो मंज़िल तक ज़रूर पहुंचेंगे और कोई भी राह से भटकाने वाला आपको भटका नहीं पाएगा। आपकी मुक्ति, आपके ज्ञान और आपके पुरूषार्थ पर ही टिकी है। किसी और को इससे बेहतर बात पता हो तो वह हमें बताए !
मारकाट में हम विश्वास नहीं रखते और क्रांति टाइप कोई परिवर्तन भी हम नहीं चाहते नहीं क्योंकि इन सबका नुक्सान भी घूम फिर कर जनता को ही उठाना पड़ता है। जो भी नई व्यवस्था बनेगी। उसमें नेता और पूंजीपति फिर से ऐश मारना शुरू कर देंगे। क़ुर्बानी देते हैं चंद सिरफिरे दीवाने और जनता लेकिन ऐश करने के लिए वे लोग आ जाते हैं, जो ख़ुदग़र्ज़ और बुज़दिल होते हैं। इतिहास के जितने भी उलट-फेर आप देखेंगे तो आपका मन कभी नहीं चाहेगा कि कोई क्रांति यहां हो।
आज नेता निश्चिंत हैं और अदालतें सुस्त हैं। नौकरशाह मज़े कर रहे हैं और मोटा माल कमाकर अपने बच्चों को आला तालीम दिला रहे हैं। पढ़-लिखकर वे भी मोटा माल कमाएंगे। पूंजीपति राजाओं की तरह बसर कर ही रहे हैं। आम जनता की रोज़ी-रोटी, शिक्षा और सुरक्षा सब कुछ अनिश्चित है।
साल भर हो चुका है। 8 मई आई और गुज़र गई किसी ने याद नहीं किया कि 8 मई 2010 सोमालिया के लुटेरों ने देश के 22 नौजवानों को पकड़ लिया था। आज तक उन्होंने छोड़ा नहीं और हमारे पक्षी-विपक्षी नेताओं ने उन्हें छुड़वाया नहीं। यहां गाना बजा रहे हैं ‘यह देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का‘ और मलाई चाटने वाले नाच रहे हैं। उनके समर्थक कह रहे हैं कि यह राष्ट्रवाद है।
कभी इस देश का हाल यह था कि रानी लक्ष्मीबाई ने ज़नाना लिबास उतार कर मर्दाना लिबास पहन लिया और घोड़े पर बैठकर दुश्मन की तरफ़ हमला करने भागीं और आज यह आलम है कि जो लड़ने निकला था भ्रष्टाचारियों से वह मर्दाना लिबास उतार ज़नाना लिबास में लड़ाई के मैदान से ही भाग निकला और फिर औरतों की ही तरह वह रोया भी।
आज जिसके पास चार पैसे या चार आदमियों का जुगाड़ हो गया। वह एमपी और पीएम बनने के सपने देख रहा है। पहले तो केवल भ्रष्टाचारी और ग़ुंडे-बदमाश ही नेतागिरी कर रहे थे और फिर हिजड़े और तवायफ़ें भी नेता बन गए। उसके बाद अब समलैंगिक भी नेता बनकर खड़े हो रहे हैं कि देश को रास्ता हम दिखाएंगे।
आप एक बार देश के सभी नेताओं पर नज़र डाल लीजिए। उनमें सही लोगों के साथ-साथ ये सभी तत्व आपको नज़र आ जाएंगे।
जनता इन सबसे आजिज़ आ चुकी है। जिस पर भी वह विश्वास करती है, वही निकम्मा निकल जाता है। लोगों में निराशा घर कर रही है। जिसकी वजह से जगह-जगह आक्रोश में आकर लोग हत्या-आत्महत्या कर रहे हैं। हम सब एक भयानक भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में सांप्रदायिक राष्ट्रवाद कोढ़ में खाज की तरह समस्या को और ज़्यादा बढ़ा रहा है।
ये हालात हैं जिन्हें हम एक दम तो नहीं बदल सकते लेकिन फिर भी लोगों के दिलों में आशा का दीपक ज़रूर जला सकते हैं। आप कुछ करें या न करें लेकिन लोगों की आशा और उनके सपनों को हरगिज़ मरने न दें। आदमी रोटी-पानी और हवा से नहीं जीता बल्कि वह एक आशा के सहारे जीता है। उसे यह आशा बनी रहती है कि एक समय आएगा, जब सब ठीक हो जाएगा।
वह समय कब आएगा ?
इसे न तो हम जानते हैं और न ही आप लेकिन फिर भी यह आशा तो हम सबके मन में है ही। हमारी कोशिश यही है कि हम लोगों में यह आशा ज़्यादा से ज़्यादा जगाएं कि हर रात के बाद एक सुबह होती ही है और यह लोगों के प्रयास से नहीं होती बल्कि यह मालिक की दया से होती है। जब मालिक का नाम आता है तो मन में दम तोड़ती हुई आस भी ज़िंदा हो जाती है। यही आस लोगों को हिंसा और अनुशासनहीनता से दूर रहने के लिए प्रेरित करती है। निराशा से बचाने वाली चीज़ बुद्धि और नास्तिकता नहीं बल्कि आस्था है। मनुष्य अपने स्वभाव से ही आस्थावान और आशावादी है।
हम सब एक ही तरह के मनुष्य हैं। जिसका भी लहू बहेगा वह भी हमारी तरह का ही एक इंसान होगा। वह किसी का बेटा और किसी का भाई होगा। वह खुदा को मानता हो या चाहे न मानता हो लेकिन फिर भी वह बंदा एक ही खुदा का होगा। ईश्वर-अल्लाह हमारी धार्मिकता को इसी कसौटी पर परखता है कि हम समाज में शांति लाने और उसे बनाए रखने के लिए कितना प्रयास करते हैं ?
यह देश धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है तो यहां सबसे बढ़कर शांति होनी चाहिए।
अगर हम विभिन्न मत और संप्रदायों में भी बंट गए हैं और अपने अपने मत और संप्रदाय को सत्य और श्रेष्ठ मानते हैं तो हमें एक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हुए शांति और परोपकार के प्रयासों में एक दूसरे से बढ़ निकलने के लिए भरपूर कम्प्टीशन करना चाहिए।
अपने देश और अपने समाज को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को बचाने का तरीक़ा आज इसके सिवा कोई दूसरा है नहीं। मैं इसी तरीक़े पर चलता हूं और आपको भी इसी तरीक़े पर चलने की सलाह देता हूं।
आप अपने दीपक ख़ुद बन जाइये, मार्ग आपके सामने ख़ुद प्रकट हो जाएगा। तब आप चलेंगे तो मंज़िल तक ज़रूर पहुंचेंगे और कोई भी राह से भटकाने वाला आपको भटका नहीं पाएगा। आपकी मुक्ति, आपके ज्ञान और आपके पुरूषार्थ पर ही टिकी है। किसी और को इससे बेहतर बात पता हो तो वह हमें बताए !
