Wednesday, January 12, 2011

हमें पंडे पुरोहित और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहिए - स्वामी विवेकानंद Hunger's cry

लोग कहते हैं कि 
अनवर जमाल ! आप हिंदुओं के धर्म पर , उनकी परंपराओं पर क्यों लिखते हैं ?
भाई आपके साधु-सन्यासी से लेकर आम हिंदुओं तक हरेक ईश्वर की न्याय व्यवस्था और उसकी महिमा के खि़लाफ़ सवाल खड़े क्यों करता है ?
आप सवाल खड़े करना बंद कर दीजिए, अनवर जमाल उनके जवाब देना ख़ुद ब ख़ुद बंद कर देगा। अनवर जमाल ईश्वर और अल्लाह में भेद नहीं करता और न ही उसके बंदों में भेद करता है। अनवर जमाल ईश्वर का भक्त है क्योंकि वह अल्लाह का बंदा है और ईश्वर अल्लाह एक ही पालनहार प्रभु के दो अलग भाषाओं में दो नाम हैं लेकिन जिसके ये नाम हैं वह ख़ुद एक है। वही सबको हवा, पानी और भोजन देता है। आज हवा तो सबको मिल रही है लेकिन साफ़ पानी सबको मयस्सर नहीं है। सबको रोटी मयस्सर नहीं है। लोग परेशान हैं। जीवन काटना उन्हें भारी लग रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है ?
लोग भारत में जिन देवताओं को ईश्वर मानकर उनकी पूजा करते हैं, वे जब दुनिया में इंसान को रोटी नहीं दे सकते तो फिर वे स्वर्ग में अनंत सुख कैसे दे सकते हैं ?
यह सवाल कौन कर रहा है ?
क्या अनवर जमाल कर रहा है ?
नहीं यह सवाल कर रहे हैं स्वामी विवेकानंद जी।
...और वे कह रहे हैं कि
1- भारत को ऊपर उठाया जाना हैं ! गरीबों की भूख मिटाई जानी हैं ! शिक्षा का प्रसार किया जाना है ! पंडे पुरोहितो और धर्म के ठेकेदारों को हटाया जाना है ! हमने पंडे पुरोहित और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहिए ! हमें सामाजिक आतंक नहीं चाहिए !
2- जनता के आध्यात्मिक उत्थान की एक ही शर्त हैए आर्थिक और राजनीतिक पुनर्निर्माण !
3- ‘किसी के कह देने मात्र से अंधों की तरह करोड़ों देवी-देवताओं पर विश्वास न करो।‘
आप इस पूरे लेख को ‘मेरा देश मेरा धर्म‘ पर देख सकते हैं।
क्या स्वामी जी की बात ग़लत है ?
नहीं, अनवर जमाल उनसे सहमत है। स्वामी जी ने साफ़ कर दिया है कि जिन देवताओं को लोग ईश्वर मानकर पूज रहे हैं ये स्वर्ग तो क्या देंगे, वे एक समय की रोटी भी नहीं दे सकते। ये देवी-देवता किसी की समस्या हल नहीं करते बल्कि इनके नाम पर पंडे-पुरोहित सामाजिक आतंक फैलाते हैं। भारत को उपर उठाने के लिए इन्हें हटाया जाना ज़रूरी है। स्वामी जी आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके विचार आंज भी हमारे लिए प्रासंगिक हैं। आज भी जब लोग देव-स्थलों पर जाते हैं तो लौटकर यही कहते हैं कि
‘यह स्थल निस्संदेह देव रहित हैं' -सतीश सक्सेना

भाई साहब ! जब आपको यह पता चल गया है कि यह स्थल देव रहित है तो आप यहां खड़े क्यों हैं ?
चलिए उस स्थल की ओर जहां देव भी है और देववाणी भी। जहां उसकी पूजा तो होती है लेकिन चढ़ावा कोई नहीं चढ़ाया जाता। आर्थिक और राजनैतिक पुनर्निमाण की पूरी योजना आपको वहीं मिलेगी। जब आप वहां पहुंचेगे तो आप देखेंगे कि हर रंग और नस्ल का आदमी चाहे वह अमीर हो या ग़रीब अपने दाता के सामने एक साथ खड़े हैं और एक साथ ही झुक रहे हैं। जो वाणी वे सुन रहे हैं, उसमें एक दूसरे पर ज़ुल्म करना हराम बताया जा रहा है। एक दूसरे की मदद करना फ़ज़ बताया जा रहा है और ब्याज लेना एक घातक मज़र््ा बताकर उससे मुक्ति दिलाई जा रही है। कहा जा रहा है कि तुम पर हराम है अगर तुम्हारा पड़ोसी भूखा सो रहा है और तुम पेट भरकर खा रहे हो।
हरेक बुराई को पाप ही नहीं बल्कि उसे सामाजिक जुर्म भी बताया जा रहा है और उस पर नर्क की यातना से पहले दुनिया में भी दंड दिया जा रहा है और जब ऐसा हो जाता है तो हरेक आदमी को रोटी मिलना निश्चित हो जाता है। तब आदमी कहता है कि वाक़ई यह ईश्वर जो मुझे रोटी दे रहा है वह मुझे स्वर्ग का अनंत सुख भी दे सकता है।
आदमी ईश्वर को अपने अंदर-बाहर हर जगह महसूस करेगा। तब आनंद के लिए किसी समाधि की ज़रूरत नहीं रह जाएगी। वह स्वयमेव आपको उपलब्ध हो जाएगा।
आज आदमी दुखी है तो उसके पीछे ख़ुद उसका नज़रिया ज़िम्मेदार है। जो वास्तव में ईश्वर है उसे पहचानता नहीं, उसकी योजना को मानता नहीं तो अंजाम तबाही के सिवा क्या होगा ?
तब यही होगा कि उन चीज़ों को ईश्वर माना जाएगा जो कि वास्तव में ईश्वर नहीं हैं। उसके नाम पर सामाजिक आतंक फैलाने वाले पंडे-पुरोहित ऐसी परंपराओं में लोगों का अन्न-धन और आबरू तक स्वाहा कर देंगे जो कि वास्तव में धर्म ही नहीं है बल्कि उनका बनाया हुआ दर्शन मात्र है।
अनवर जमाल का कुसूर यह है कि वह सच को सामने क्यों लाता है ?
वह क्यों बताता है कि ग़रीबी और भूख से तड़प-तड़प कर मरती हुई देश की जनता को कैसे बचाया जा सकता है ?
वह क्यों सबके हित की बात करता है ?
आखि़र कैसे इस धरती पर ही स्वर्ग का आभास किया जा सकता है ?
लोक-परलोक का सुख हरेक को अभीष्ट है। दुनिया में जितने भी धर्म-दर्शन हैं, जितने भी वैज्ञानिक अविष्कार हुए हैं, उन सबके पीछे यही भावना है कि सारे इंसानों को सुख प्राप्त हो जाए।
अनवर जमाल पर ऐतराज़ करने वाले बताएं कि स्वामी जी ने अपने दर्शन का प्रचार विदेशियों में क्यों किया ?
तब वे बताएं कि आखि़र अनवर जमाल अपने ही देशवासियों में ‘अटल सत्य‘ का प्रचार क्यों नहीं कर सकता ?
सबने सोचा कि दुनिया का दुख कैसे दूर किया जाए ?
और जो उन्होंने समझा कि यह हल सही है, उसे सबके सामने पेश किया।
खुद स्वामी जी ने भी यही किया। इस्लाम और मुसलमानों पर उनके विचार उनके साहित्य में संग्रहीत हैं। मुसलमानों को उनके द्वारा लिखे गए पत्र भी सुरक्षित हैं और ऐसा करने वाले वे अकेले विद्वान नहीं हैं।
बहरहाल हम तो यह कह रहे हैं कि देश में करोड़ों देवी-देवताओं की पूजा बंद होनी चाहिए। अगर आप हमारे कहने से ऐसा नहीं करते तो स्वामी जी के कहने से ही ऐसा कर लो।
आज स्वामी विवेकानंद जी जन्म दिवस है। इस अवसर पर गहनता से इस बात पर विचार किया जाए कि उन्हें ढेर सारी इज़्ज़्त और मान्यता देने के बावजूद हिंदू समाज ने उनकी बात पर आज तक अमल क्यों नहीं किया ?
जो हिंदू स्वामी विवेकानंद जी को ज्ञानी मानते हैं वे भी उनके सिद्धांतों का पालन नहीं करते, आख़िर क्यों ?
इसी लेख को मैंने एक और तरह से भी लिखा है। और वास्तव में शुरू में वही लिखा था लेकिन बीच में सिस्टम ठप्प हो गया और जब दोबारा लिखना शुरू किया तो फिर गूगल टाइप में नहीं लिखा। इस तरह आपके विचार व्यक्त करने के तरीक़े और उसकी क्रमबद्धता को यह बात भी प्रभावित करती है कि आप किस टूल का उपयोग कर रहे हैं ?
उस लेख को भी मैं आपके सामने लाऊंगा एक थोड़े से ब्रेक के बाद।
तब तब आप इस लेख का आनंद उठाईये और उस लेख में जो लिंक मैंने दिए हैं। तब तक आप एक नज़र उन पर भी डाल लीजिए।
ये रहे लिंक्स आपके लिए एक ज्ञान भेंट के रूप में। कृप्या स्वीकार करें और इन पर विचार भी करें।
1- http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/01/standard-scale-for-moral-values.html?showComment=1294670416731#c4645121125829265744

2- Hunger free India क्या भूखों की समस्या और उपासना पद्धतियों में कोई संबंध है ?- Anwer Jamal

3- 'जो ईश्वर मुझे यहाँ रोटी नहीं दे सकता, वो मुझे स्वर्ग में अनंत सुख कैसे दे सकेगा ?' 

4- पछुआ पवन (pachhua pawan)

5- 'क्‍या सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है  ?'
  
6-  http://satish-saxena.blogspot.com/2010/12/blog-post_04.html

7- कहाँ है मानवता ?

8- महंगाई मार गई...!!
अब आप अपने आप से सवाल कीजिए कि-
देश के अन्न में आग लगाना कौन सी समझदारी है ?
एक तो देश में घी का उत्पादन पहले ही कम है और जो है उसे भी देश के फ़ौजियों और बालकों को देने के बजाए आग में डाल दिया जाए। आपकी इन्हीं परंपराओं के कारण पहले भी हमारे देश की फ़ौजे कमज़ोर रहीं और थोड़े से विदेशी फ़ौजियों से हारीं हैं। कम से कम इतिहास की ग़लतियां अब तो न दोहराओ। इन ज्ञान की बातों को समझने की कोशिश ज़रूर करना।
you can see this article on
http://lucknowbloggersassociation.blogspot.com/2011/01/hungers-cry.html 

Sunday, January 9, 2011

जन्नत के बारे में ग़ालिब के ख़याल की हक़ीक़त Standard scale for moral values

ग़ालिब का शेर
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन 
दिल के बहलाने को गा़लिब ये ख़याल अच्छा है
दिल्ली में आपका भाई अनवर जमाल
ग़ालिब के बुत के पास आपका भाई अनवर जमाल
ग़ालिब का यह शेर बहुत मशहूर हुआ और आज भी जब तब लोग इसे दोहराते रहते हैं। इस शेर को अमूमन आज जन्नत के इंकार के लिए वे लोग पेश करते हैं जो कि जन्नत को वहम मानते हैं और जन्नत के वुजूद में यक़ीन रखने वालों को एक ऐसा आदमी मानते हैं जिनका कि बौद्धिक विकास रूका हुआ है। हरेक आदमी को पूरी आज़ादी है कि वह संविधान के दायरे में रहते हुए जो भी मानना चाहे मान सकता है और अपने नज़रिये का प्रचार भी कर सकता है।

एक आम ग़लती
भाई अमरेंद्र कुमार त्रिपाठी जी ने भी एक बार फिर इस शेर को जब इन्हीं अर्थों में कहा तो मुझे लगा कि कुछ बात ग़ालिब की शायरी और उसके भाव कहना वक्त की ज़रूरत है।
भाई अमरेंद्र जी ! आप आस्ति-नास्तिक, संशयवादी या कुछ और जो भी आप होना चाहें, बेशक हो सकते हैं और अगर आप अपने नज़रिये को अपने शब्दों में कहेंगे तो फिर उसकी ज़िम्मेदारी भी केवल आपकी अपनी ही होगी। आप एक साहित्यकार हैं और आप जानते हैं कि किसी भी साहित्यकार के शब्दों से उसी के भाव को ग्रहण करना चाहिए। उसके शब्दों में अपने भाव को अध्यारोपित करना उस साहित्यकार के साथ ज़ुल्म होता है। आपने ऐसा ही कुछ उर्दू शायर ग़ालिब के साथ किया है। आप हिंदी के साहित्यकार हैं। अफ़सोस कि मैं अभी तक आपको पढ़ नहीं पाया हूं लेकिन आपकी पृष्ठभूमि बता रही है, आपके बारे में लोगों की गवाही बता रही है कि आप एक अच्छे साहित्यकार हैं। इसके बावजूद यह भी सच है कि आप उर्दू नहीं जानते। आप यह भी जानते हैं कि किसी साहित्यकार के साहित्य को ठीक से समझने के लिए मात्र भाषा का ज्ञान ही काफ़ी नहीं हुआ करता बल्कि उसके साथ दूसरी कई और भी चीज़ें दरकार होती हैं। जिनमें से एक यह भी है कि साहित्यकार की मनोदशा और उसके व्यक्तित्व को भी जाना समझा जाए, उसके जीवन के पहलुओं को भी सामने रखा जाए।

ग़ालिब की ज़िंदगी के कुछ पहलू
ग़ालिब का पूरा नाम असदुल्लाह था और उनका तख़ल्लुस पहले ‘असद‘ था बाद में ‘ग़ालिब‘ रखा। असदुल्लाह का अर्थ है अल्लाह का शेर और असद का अर्थ होता है शेर। उनका नाम उनके वालिदैन ने रखा था जिससे पता चलता है कि वे ईश्वर के वुजूद पर यक़ीन भी रखते थे और चाहते थे कि उनका बच्चा भी नेकी के रास्ते पर चले। मिर्ज़ा ग़ालिब द्वारा अपना तख़ल्लुस ‘असद‘ रखना भी यही बताता है कि वे भी ऐसा ही चाहते थे। बाद में किन्हीं कारणों से उन्होंने अपना तख़ल्लुस रखा ‘ग़ालिब‘। अरबी में ग़ालिब प्रभु परमेश्वर का ही एक सगुण नाम है। ‘ग़ालिब‘ का अर्थ है ‘प्रभुत्वशाली, सामर्थ्यवान‘।
पवित्र कुरआन में परमेश्वर की सामर्थ्य का परिचय देने के लिए यह शब्द बार-बार प्रयुक्त हुआ है।
ग़ालिब के वालिदैन इस्लामी मान्यताओं पर विश्वास रखने वाले दीनदार मुसलमान थे और ख़ुद उनकी बीवी भी एक निहायत शरीफ़ और दीनदार औरत थीं लेकिन ख़ुद ग़ालिब एक पक्के पियक्कड़ थे। इसके अलावा वे शतरंज, चैपड़ और जुआ भी खेलते थे। मिर्ज़ा जी का एक सितम पेशा डोमनी से इश्क़ भी उनके जीवन की एक ऐसी ही मशहूर घटना है जैसे कि आपके जीवन में दिव्या जी का आना और फिर चला जाना।

मिर्ज़ा ग़ालिब का नज़रिया अपने बारे में
मिर्ज़ा ग़ालिब इस इश्क़ से पहले काम के आदमी हुआ करते थे लेकिन इस कमबख्त इश्क़ ने उन्हें निकम्मा कर दिया था।
‘इश्क़ ने निकम्मा कर दिया ग़ालिब
वर्ना आदमी हम भी थे काम के‘
कहकर उन्होंने ख़ुद बताया है कि इश्क़ ने उनके जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। ये सभी काम जन्नत में जाने से रूकावट हैं। इस बात को वे जानते थे कि जन्नत में दाख़िल होने के लिए अपने पैदा करने वाले रब का हुक्म मानना और गुनाह से बचना लाज़िमी है, महज़ जन्नत की ख्वाहिश करना या एक मुसलमान के घर पैदा हो जाना या दाढ़ी रखकर कुर्ता-पाजामा और टोपी पहनना या ख़तनाशुदा होना ही काफ़ी नहीं है। उनकी नज़र अपने आमाल पर थी जो कि ख़िलाफ़े इसलाम थे। अपने बुरे आमाल की वजह से वे ख़ुद को कमीना कहते थे।
मस्जिद के ज़ेरे साया इक घर बना लिया है
ये बन्दा  कमीना हमसाया ए ख़ुदा है

इसलाम के प्रति ग़ालिब का विश्वास अटल था
इस शेर से यह भी पता चलता है कि उन्हें ख़ुदा के वुजूद पर भी यक़ीन था और उसकी पवित्रता और उसकी महानता का भी। इसीलिए वे हज के लिए काबा जाना तो चाहते थे लेकिन ख़ुदा से अपने आमाल पर शर्मिंदगी का अहसास उनके अंदर बहुत गहरा था। उनके एक शेर से यह देखा जा सकता है।
काबे किस मुंह से जाओगे ‘ग़ालिब‘
शर्म तुमको मगर नहीं आती
इसी तरह उनके बहुत से शेर हैं जिनसे ख़ुदा और इसलाम के प्रति उनके अटल विश्वास को जाना जा सकता है। उन सबके साथ ही ग़ालिब के इस बहुचर्चित शेर को जब रखकर देखा जाता है तभी उनकी हक़ीक़ी मुराद को समझा जा सकता है।
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन 
दिल के बहलाने को गा़लिब ये ख़याल अच्छा है
इस शेर में ग़ालिब जन्नत के प्रति अपना शक प्रकट नहीं कर रहे हैं बल्कि वे ख़ुद को अयोग्य ठहरा रहे हैं और अपने जैसे लोगों को नसीहत भी दे रहे हैं कि ऐसे आमाल करने वाले लोगों की जन्नत में दाखि़ले  की चाहत महज़ एक ख़याल दिल बहलाने के लिए। ग़ालिब के समय में मुस्लिम समाज कई तरह के पतन का शिकार हो चुका था। ग़ालिब अपने जैसे शायर तो बेशक अकेले थे लेकिन अपनी आदतों और शौक़ में वे अकेले नहीं थे। शराब और शबाब का शौक़ उस समय रईसों और साहित्यकारों का आम चोंचला था जैसा कि आज भी है और जैसा कि उनसे पहले भी था। मूल्य और चरित्र को तबाह कर चुका आदमी और समाज न तो जीते जी कभी शांति पा सकता है और न ही मरने के बाद। हमारा समाज ग़ालिब के समय में भी बर्बाद था और आज भी बर्बाद है।

एक साहित्यकार का फ़र्ज़ क्या होता है ?
ग़ालिब ने अपने समाज को बर्बादी से निकालने और उसे सही रास्ते पर लाने का कोई प्रयास नहीं किया बल्कि अपने आप को भी वे सही रास्ते पर नहीं ला पाए जबकि वे जानते थे कि सही क्या है ?
न सिर्फ़ यह बल्कि वे एक ऐसा साहित्य छोड़कर गए जो आज भी लोगों को उनके जीवन के असली मक़सद से हटाकर शराब और शबाब की ओर आकर्षित कर रहा है।
आपने लिखा है कि ‘साहित्य की सामाजिक उपादेयता को समझकर ही साहित्योन्मुख हूं। स्मरण रहे  साहित्य समाज का दर्पण है और ‘हृदयहीनता की ओर बढ़ रहे कुटुंब का हृदय भी है। धर्म पर आपका अति विश्वास हो सकता है पर मैं ग़ालिब की बात ज़्यादा मुफ़ीद मानता हूं :
‘मुझको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब यह ख़याल अच्छा है‘
आपने जो शेर लिखा है, वह दोषपूर्ण है, सही वह है जो मैंने ऊपर लिखा है। इस शेर से आपने भी दूसरों की तरह ग़लत अर्थ ले लिया है। सही भाव वह है जो मैं ऊपर लिख चुका हूं।
यह सही है कि साहित्य समाज का दर्पण है लेकिन इसकी उपादेयता मात्र यही नहीं है। समाज के मार्गदर्शन में साहित्य की एक अहम भूमिका होती है। साहित्य समाज का दर्पण भी होता है और उसे दिशा भी देता है। ऐसा आप भी मानते होंगे।

विचार वस्तु मात्र हैं
साहित्य में विचार होते हैं। विचार भी एक वस्तु है। दूसरी चीज़ों की तरह विचार भी वही सार्थक होता है जो कि उपयोगी हो। कुछ विचार अनुपयोगी भी होते हैं और कुछ विचार घातक होते हैं। अनुपयोगी विचार आदमी की समय और ऊर्जा को नष्ट करते हैं अतः वे भी नुक्सान ही देते हैं। इस तरह उपयोग की दृष्टि से हम विचार को तीन प्रकार में बांट सकते हैं-
1. लाभकारी
2. व्यर्थ
3. घातक
हमारे साहित्य में ये तीनों ही तरह के विचार आपस में मिश्रित हैं और किसी हिंदी साहित्यकार के पास आज तक कोई पैमाना ऐसा न हुआ जिसके ज़रिये यह जानना मुमकिन होता कि कौन सा विचार लाभकारी है और कौन सा घातक ?

साहित्य का प्रभाव समाज पर
कोई भी साहित्य मात्र इस कारण तो लाभकारी नहीं माना जा सकता कि वह साहित्य है, बल्कि साहित्य का आकलन समाज पर पड़ने वाले उसके प्रभाव से किया जाता है। लोगों के मन और चरित्र पर वह क्या प्रभाव छोड़ता है ?, उन्हें क्या करने की प्रेरणा देता है ?, उसके प्रभाव में आकर लोग क्या करते हैं ?
इन बातों की बुनियाद पर साहित्य को अच्छा या बुरा कहा जाता है। यदि कोई साहित्य शिल्प की दृष्टि से  परफ़ैक्ट है लेकिन उसके प्रभाव में आकर लोग नशे की लत अपना रहे हैं तो उसे अच्छा साहित्य नहीं कहा जा सकता। ग़ालिब के साहित्य पर भी यही बात लागू होती है और आपकी रचनायें मैंने पढ़ी नहीं हैं लेकिन आपकी बात से लगता है कि आप ईश्वर और धर्म को नैतिकता का स्रोत नहीं मानते और न ही इंसान के लिए उनमें विश्वास करना आप इंसान की प्राथमिक आवश्यकता ही मानते हैं।

भूलो मत मूल को
अगर आप अच्छे और बुरे का फ़र्क़ बताने वाले परमेश्वर को ही नज़रअंदाज़ कर देंगे तो फिर आप अपने साहित्य में भी नैतिकता और अच्छाई को क़ायम नहीं रख पाएंगे। ऐसा साहित्य समाज का दर्पण तो अवश्य हो सकता है लेकिन समाज के हितकर हरगिज़ नहीं हो सकता। ऐसे साहित्य का सृजन न केवल आपके जीवन और समय को नष्ट करेगा बल्कि आपके बाद वह हर उस आदमी का समय और चरित्र नष्ट करता रहेगा जो कि उसे पढ़ेगा।

कौन जानता है किसी चीज़ के आख़िरी अंजाम को  ?
आप हरगिज़ ऐसा काम नहीं करना चाहेंगे कि जिसकी अंतिम परिणति आपके लिए और समाज के लिए घातक हो। लेकिन आप कैसे जान सकते हैं कि किस विचार और कर्म की अंतिम परिणति क्या होगी ?
क्योंकि चीज़ें मात्र अपने सामयिक प्रभाव के ऐतबार से ही नहीं देखी जातीं बल्कि वे अपने आख़िरी अंजाम के ऐतबार से भी देखी जाती हैं। कई बार एक बुरा आदमी शुरू में अच्छा लगता है लेकिन बाद में सारी इज़्ज़त को मिट्टी में मिलाकर रख देता है जैसा कि आपके साथ हुआ। कई बार ऐसा होता है कि आदमी शुरूआती नज़रिये के ऐतबार से किसी को ग़लत समझता है लेकिन बाद में उससे नफ़ा पहुंचता है जैसा कि आपको मुझसे पहुंचा। यह तो समझाने के लिए सामने की मिसाल के तौर पर है वर्ना इससे अच्छी मिसालें मौजूद हैं। यानि कुल मिलाकर इंसान का इल्म इतना कम और कमज़ोर है कि वह नहीं जानता कि जो चीज़ अपने पहले परिचय में भली लग रही है उसका अंजाम क्या होगा ?

हरेक मनभावन चीज़ हितकर नहीं होती
किसी भी चीज़ का मन को भा जाना हरगिज़ यह साबित नहीं करता कि वह लाभकारी भी है और न ही किसी चीज़ से विरक्ति का भाव मन में पाया जाना उसे निरर्थक साबित करने के लिए पर्याप्त है। मन और भावनाएं किसी विचार और वस्तु के नफ़े-नुक्सान को परखने के लिए सिरे से ही कोई कसौटी नहीं हैं, जिन पर कि एक साहित्यकार का सारा दारोमदार होता है।
तब नफ़े-नुक्सान को तय करने का असली पैमाना क्या है ?
जब आप उस पैमाने को दरयाफ़्त कर लेंगे तभी आप लाभकारी साहित्य सृजित करने की क्षमता से लैस हो पाएंगे।
क्या आप बता सकते हैं कि व्यक्ति और समाज के लिए सही-ग़लत और नफ़े-नुक्सान को निर्धारित करने का वास्तिक आधार क्या है ?
और उस तक एक साहित्यकार की हैसियत से आप कैसे पहुंचेगे ?
या आप सिरे से ऐसी कोई कोशिश ही ज़रूरी नहीं समझते ?

संवाद से सत्य की प्राप्ति अभीष्ट है
आप सार्थक साहित्य का सृजन कर सकें इसी कामना से यह संवाद आपके लिए क्रिएट किया गया है।
जो ग़लती ग़ालिब कर चुके हैं उसे दोहराना नहीं है बल्कि उसे सुधारना है। अपने और मानव जाति के बेहतर भविष्य के लिए सही-ग़लत के सही पैमाने का निर्धारण बहुत ज़रूरी है।
पहले भारत में लोग हाथ से या लाठी से नापते थे लेकिन आज नापने का स्टैंडर्ड पैमाना मीटर स्वीकार कर लिया गया है और कोई भी राष्ट्रवादी इस पर आपत्ति नहीं करता कि मीटर तो अंग्रेजों की देन है। जब अंग्रेज़ चले गए तो उनका दिया हुआ मीटर यहां क्या कर रहा है ? ,निकालो उनका मीटर देश से बाहर।

सही-ग़लत का मीटर हमसे लो या फिर हमें दो
अंग्रेज़ों का मीटर, थर्मामीटर और बैरोमीटर ग़र्ज़ यह कि उनके सारे मीटर देशवासी आज भी लिए घूम रहे हैं। जो मीटर उनके पास था वह उन्होंने दे दिया और आपने ले भी लिया लेकिन सही-ग़लत का मीटर उनके भी पास नहीं था और न ही आपके पास है। इसीलिए हिंदू भाई सही-ग़लत तो क्या बताएंगे बल्कि सारे मिलकर भी सही-ग़लत की परिभाषा तक नहीं बता सकते।
ऐसा मैं उन्हें नीचा दिखाने के लिए नहीं कह रहा हूं बल्कि एक हक़ीक़त का इज़्हार कर रहा हूं।
जिसे मेरी बात पर ऐतराज़ हो वह मेरे सवाल का सवाल का जवाब देकर दिखाए।
अगर अंग्रेजों के भौतिक मीटर आप ले सकते हैं तो फिर मुसलमानों आप सही-ग़लत नापने का मीटर क्यों नहीं ले सकते ?
अगर आपके पास पहले से ही मौजूद है तो फिर उसे सामने लाईये और हमें भी दीजिए।
आपका मीटर अच्छा हुआ तो हम भी उससे काम लेंगे।

‘वसुधैव कुटुंबकम्‘
: परिवार एक है तो उसका मीटर भी एक हो
अब सारी दुनिया में चीज़ों को नापने और जांचने के मीटर एक हो चुके हैं और विचार भी वस्तु होते हैं लिहाज़ा विचारों को नापने और जांचने के लिए भी कम से कम एक मीटर तो होना ही चाहिए और अगर समाज में बहुत से मीटर प्रचलित हों तो उनमें से जो बेहतर हो उसे सारे विश्व समाज के लिए स्टैंडर्ड मान लिया जाना चाहिए।
भौतिक क्षेत्र में ऐसा हो चुका है। अब सूक्ष्म भाव जगत में भी इस प्रयोग को आज़माने का वक्त आ चुका है। मेरा मिशन यही है। मानव जाति का एकत्व ही मेरा लक्ष्य है। कोई भी बंटवारा मुझे हरगिज़ मंज़ूर नहीं है, आपको भी नहीं होना चाहिए।
 नोट - भाई अमरेंद्र से इस संवाद की पूरी पृष्ठभूमि जानने के लिए देखें उनकी टिप्पणी डा. दिव्या जी के संबंध में।

Thursday, December 30, 2010

नफ़रत से भरे मीडियाकर्मियों का एक सांकेतिक मनोविश्लेषण Media, my business part 1

प्यारी बहन दिव्या जी ! आपका नाम भी सुंदर है और उपनाम भी और आप ख़ुद भी । ऐसा मैंने हमेशा ही कहा है । सुंदरता के साथ आपमें बुद्धिमत्ता भी है और उत्साह भी और इन सबके साथ है आपमें अपने देश और समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा भी है और इस रास्ते में आने वाली मुश्किलों का सामना करने के लिए फ़ौलादी हौसला भी। इसीलिए मैंने आपको 'अमन के पैग़ाम' ब्लाग पर ब्लाग संसार की पहली लौहकन्या का खिताब भी अता किया है जिस पर आपके किसी Follower तक ने भी आपको मुबारकबाद नहीं दी , यहाँ तक कि मेरे भाई अमित जी तक ने भी नहीं ।
आपमें ख़ूबियां केवल इतनी ही नहीं बल्कि इनसे कहीं ज़्यादा हैं । आपको 'सजेशन ट्रिक' के जरिए अपने रूट से डायवर्ट नहीं किया जा सकता और न ही आप मतभिन्नता ज़ाती रंजिश और बायकॉट तक ही ले जाती हैं । जबकि इस विषय में काफ़ी उम्रदराज़ बुज़ुर्ग तक ग़च्चा खा चुके हैं , ख़ासकर मेरे बारे में । लेकिन आपने मेरी बात का कभी बुरा नहीं माना और न ही मेरे ब्लाग पर ही आना छोड़ा। इसका मतलब है कि हमारे संबध सामान्य हैं ।

आज भी मैंने हमेशा की तरह आपका ब्लाग देखा और आपकी ताजा पोस्ट में एक अंतर्विरोध देखा है । उसी पोस्ट के बारे में मैं आपसे चंद सवाल पूछना चाहता हूँ । सवाल सामान्य हैं लेकिन एक डर है कि कहीं आपको बुरा न लग जाए । हरेक के बुरा मानने की तो मैं खुद परवाह नहीं करता लेकिन जिन्हें मैं सराहता हूं , उनके जज़्बात का खयाल रखने की कोशिश मैं जरूर करता हूँ ।
अगर आप नाराज़ न होने का आश्वासन दें तो मैं अपने सवाल आपके सामने पेश करूं वर्ना तो जाने दूंगा क्योंकि सवाल बहुत अहम नहीं हैं ।

कल मैंने अपनी पोस्ट में बहन दिव्या जी से यह निवेदन किया था । चूंकि उन्होंने मेरे निवेदन का अभी तक कोई उत्तर नहीं दिया है इसलिए मैं उनसे अभी कोई सवाल भी नहीं करूंगा ।
इस पोस्ट में कोई सवाल नहीं किया गया है । आप देख सकते हैं यह पूरी पोस्ट बहन दिव्या जी की तारीफ से भरी हुई है । बेशक इसे एक अच्छी पोस्ट कहा जाना चाहिए लेकिन जिन लोगों के दिलों में दुश्मनी और नफरत हो , ऐसे अच्छे लेख पर भी उनसे कोई सराहना नहीं मिल सकती क्योंकि अगर उन्होंने स्वीकार कर लिया कि सवाल पूछने से पहले इजाजत लेना , तारीफ करना अनवर जमाल का सद्गुण है तो उनका तो वह सारा मिशन ही चौपट हो जाएगा जो कि मुसलमानों की छवि बिगाड़ने के लिए वे बरसों से चलाते आ रहे हैं ।
जनाब रोहित साहब (बोले तो बिंदास वाले) बहन दिव्या जी के ब्लाग पर कह रहे हैं कि मैं अनवर जमाल की पोस्ट पढ़कर आ रहा हूं। उनकी पोस्ट में अंतर्विरोध है।
मैं उनकी बात पर मुस्कुराकर रह गया ।
बहन दिव्या जी ने भी उनसे न पूछा कि भाई उस पोस्ट में तो उन्होंने न कोई मुद्दा उठाया है और न ही कोई सवाल किया है । उसमें तो किसी का विरोध तक नहीं है फिर अंतविरोध कहां से आ गया ?
चापलूसी और नफ़रत की भी हद है ।
मेरे एक पुराने परिचित बंधु हैं । मेरी टिप्पणी को आधार बनाकर वे भी दिव्या जी के कान भरते हुए देखे जा सकते हैं , उन्हें आपत्ति है कि मैंने दिव्या जी को मेनका जैसा सुंदर क्यों कह दिया ?
चलिए , उन्होंने कहा सो कहा । वे तो वेद पुराणों तक की बात को बकवास मानते हैं। फिर मेरी बात पे आपत्ति करने का उनका फ़र्ज़ भी है क्योंकि वे 'राष्ट्रवादी' हैं और आजकल मुसलमानों को किए बिना राष्ट्रवादी सा दिखना मुमकिन नहीं है । ये बंधु मेरे विरोधी हैं लेकिन चापलूस क़िस्म के नहीं हैं

चापलूस तो शायद रोहित जी भी न हों लेकिन उन्होंने मराठी बंधु को पछाड़ने के लिए पहले तो उन्होंने दिव्या जी दंडवत आदि करके लुभाया और फिर ख़ुद को बहन दिव्या जी की नज़र में उनका बहुत बड़ा हमदर्द साबित करने के लिए मुझसे भिड़ गए ।
(हिंदी फिल्मों का घिसा पिटा फ़ॉर्मूला , मनोविज्ञान की समझ रखने वाली दिव्या जी भी इनके सर्कस देखकर ज़रूर हंसती होंगी । ये लाइनें लिखते हुए खुद मेरे ही पेट में बल पड़े जा रहे हैं ।)

बहरहाल (हंसी रोककर) , रोहित जी ने कहा कि 'जो बहन की सुंदरता की उपमा मेनका से दे उसे भारतीय सभ्यता और संस्कार का क्या पता ? इनकी और इन जैसों की सोच पर लानत ।'
ऐसे ऐसे लोग मीडिया में आ गए हैं , पत्रकार बनकर बैठ गए हैं बल्कि रोहित जी तो अभिमन्यु की तरह गर्भ में भी पत्रकारिता का ही ज्ञान अर्जित करते होंगे क्योंकि वे ख़ुद बताते हैं कि अपने पिता जी के पत्रकार होने के कारण आंख खुलते ही पत्रकारिता का माहौल देखा । इतने लंबे समय के शिक्षण लेने और हिंदुओं के दरम्यान रहने के बावजूद बल्कि ख़ुद हिंदू होने के बावजूद भी उन्हें यह तक नहीं पता कि मेनका किसी वेश्या का नहीं बल्कि स्वर्ग की एक अप्सरा का नाम है । सुंदरता की उपमा देने के लिए मेनका का नाम लिया जाता है क्योंकि स्वर्ग की अप्सराओं की ख़ूबसूरती अतुलनीय मानी जाती है और मेनका को सभी अप्सराओं में प्रमुख माना जाता है । यही वजह है कि हिंदू अपनी बेटियों का नाम बेहिचक रखते हैं और प्राय: ये नाम पंडित जी की सलाह के बाद या उनके सुझाव पर ही रखे जाते हैं क्योंकि पंडित जी ही नवजात कन्या की कुंडली बनाते हैं, उनकी राशि और नक्षत्र देखकर उसके नाम का प्रथम अक्षर ज्ञात करके उसके नाम का निर्धारण करते हैं । अगर मेनका या मेनका का नाम घृणित होता तो कोई पंडित सवर्ण समाज को यह नाम रखने की सलाह हरगिज़ न देता और न ही ऐसी घृणित सलाह के बदले में उसके यजमान उसे दक्षिणा , भेंट और उपहार ही देते । हिंदू समाज में मेनका नाम का सामान्य प्रचलन यह सिद्ध करता है कि अपनी बेटी का नाम मेनका रखना एक पुनीत कार्य है क्योंकि नामकरण संस्कार हिंदुओं के सोलह पवित्र संस्कारों में से एक है । इस अवसर पर बहुत से रिश्तेदार और परिचित भी इकठ्ठा होते हैं । नाम में कुछ भी बुराई होती तो कोई तो ऐतराज़ करता ।
रोहित जी का ऐसे पुनीत नाम पर ऐतराज़ करना या तो हिंदू साहित्य और संस्कारों सिर्फ़ उनकी अज्ञानता को दर्शाता है या फिर मुसलमानों के प्रति या सिर्फ़ मेरे प्रति उनके विद्वेष को। मीडिया में ऐसे लोग हैं यह चिँता का विषय है।
[...जारी]

Wednesday, December 29, 2010

एक निवेदन ब्लाग जगत की लौहकन्या बहन दिव्या जी से A friendly request

प्यारी बहन दिव्या जी ! आपका नाम भी सुंदर है और उपनाम भी और आप ख़ुद भी । ऐसा मैंने हमेशा ही कहा है । सुंदरता के साथ आपमें बुद्धिमत्ता भी है और उत्साह भी और इन सबके साथ है आपमें अपने देश और समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा और इस रास्ते में आने वाली मुश्किलों का सामना करने के लिए फ़ौलादी हौसला भी। इसीलिए मैंने आपको 'अमन के पैग़ाम' ब्लाग पर ब्लाग संसार की पहली लौहकन्या का खिताब भी अता किया है जिस पर आपके किसी Follower तक ने भी आपको मुबारकबाद नहीं दी , यहाँ तक कि मेरे भाई अमित जी तक ने भी नहीं ।
आपमें ख़ूबियां केवल इतनी ही नहीं बल्कि इनसे कहीं ज़्यादा हैं । आपको 'सजेशन ट्रिक' के जरिए अपने रूट से डायवर्ट नहीं किया जा सकता और न ही आप मतभिन्नता को ज़ाती रंजिश और बायकॉट तक ही ले जाती हैं । जबकि इस विषय में काफ़ी उम्रदराज़ बुज़ुर्ग तक ग़च्चा खा चुके हैं , ख़ासकर मेरे बारे में । लेकिन आपने मेरी बात का कभी बुरा नहीं माना और न ही मेरे ब्लाग पर ही आना छोड़ा। इसका मतलब है कि हमारे संबध सामान्य हैं ।

आज भी मैंने हमेशा की तरह आपका ब्लाग देखा और कांग्रेस के विरोध में प्रकाशित आपकी ताज़ा पोस्ट को पढ़ा तो मैंने उसमें एक अंतर्विरोध देखा । उसी पोस्ट के बारे में आपसे मैं चंद सवाल पूछना चाहता हूँ । सवाल सामान्य हैं लेकिन एक डर है कि कहीं आपको बुरा न लग जाए । हरेक के बुरा मानने की तो मैं खुद परवाह नहीं करता लेकिन जिन्हें मैं सराहता हूं , उनके जज़्बात का खयाल रखने की कोशिश मैं ज़रूर करता हूँ ।
अगर आप नाराज़ न होने का आश्वासन दें तो मैं अपने सवाल दरयाफ़्त कर लूंगा वर्ना जाने दूंगा क्योंकि सवाल बहुत अहम नहीं हैं ।

Monday, December 27, 2010

गाना गाओ इमेज बनाओ Image engineering

आदमी शरीर नहीं है बल्कि आदमी विचार है । खुद आदमी के पास भी विचार है । विचार दौलत भी है और विचार हथियार भी है। टिप्पणियाँ भी लोगों का विचार हैं । जिसके पास जितनी ज्यादा टिप्पणियाँ हैं वह उतना ही समृद्ध है और जिसके पास टिप्पणियाँ कम हैं वह उतना ही बेचारा सा लगता है समृद्ध को । ब्लागिंग में बौर्ज़ुआ कल्चर भी है और माफ़ियागिरी भी । लुटियाचोर और लड़कियों के फ़ॉलोअर से लेकर संत नेता और कलाकार सभी तो हैं ब्लाग जगत में । सांप्रदायिकता भी है और साज़िशें भी । यहाँ धमकियां भी हैं और एंटरटेनमेंट भी। लोग यहाँ हमदर्द बनकर आते हैं बड़े सलीक़े से हैंडल करने की कोशिश करते हैं। अगर आप समझदार हैं और आप कम टिप्पणियों के बावजूद ज़्यादा टिप्पणियों वाले ब्लागर को अपना गॉड फ़ादर नहीं बनाते तो वह अपने गुट के लोगों में आपको नफ़रत फैलाने वाला और देश व समाज के लिए घातक कहेगा , जिन लोगों को उसकी टिप्पणियां चाहियें वे खुद को उससे सहमत जाहिर करेंगे लेकिन अगर आपने उसके आरोप झूठे साबित करके यह दिखा दिया कि ख़ुद को चौधरी बनाने के चक्कर में यह आदमी शुरू से ही मेरी छवि पर लगातार वार करता आ रहा है और मैं इनके बड़ेपन की वजह से टालता आ रहा हूं तो भी उसे परवाह नहीं होगी क्योंकि उसे पता है कि लोगों को संत की तलाश कम है और नाचने गाने वालों की ज़्यादा ।
वह आप पर इल्ज़ाम लगाएगा । आप सफ़ाई देंगे और उससे सवाल करेंगे अगर उसके पास जवाब हुआ तो वह जवाब देगा और अगर उससे जवाब न बन पड़ा तो वह गाना सुनाने लगेगा , नया न बन पड़ा तो पुराना ही सुना देगा।
आप मुंह ताकते रहेंगे उसका कि भाई मुद्दे पर बात चल रही थी हमारी । हमने आपकी पोस्ट पर आपको जवाब दिया है और अब अपने ब्लाग पर हम आपसे कुछ पूछ रहे हैं । आइये ज़रा बताइये कि नफ़रत हम फैला रहे हैं या आप ?
लेकिन वे गाते रहेंगे ।
सुनने वाले समझेंगे कि देखो कितने व्याकुल हैं ?
कितनी पीड़ा के साथ गा रहे हैं ?
उन बेचारों को क्या पता कि पीड़ा तो ये उसे पहुंचाकर आये हैं जो बेचारा गाना भी नहीं जानता ।
अगर आप गाना नहीं जानते तो ब्लाग जगत में आपकी अच्छी इमेज बनना मुश्किल है।
अच्छी इमेज बनाना भी एक हुनर है इसे मैं 'इमेज इंजीनियरिंग' का नाम देता हूं ।
इसका पहला उसूल है कि

'गाना गाओ इमेज बनाओ'
क्योंकि हमारे समाज में आम धारणा यह है कि जो आदमी गाना गाता है वह नफ़रत नहीं फैलाता ।
जबकि यह आदमी अपने विचार के हथियार से आये दिन छवि पर वार करने का ऐलानिया दोषी है।
लेकिन कम टिप्पणी वाले ब्लागर की यहां चलती कब है ?
ख़ैर गाना चलेगा कब तक ?
जल्दी ही छवि पर पुनः प्रहार किया जाएगा । गाना तो मात्र ताज़गी के लिए है वर्ना उनका काम ही ये है कि जिसे मज़बूत देखा उसे सराह लिया और जिसे कमज़ोर देखा उसे 'ग़लत आदमी' ठहरा दिया ।
एक ज़बर्दस्त त्रासदी है यह।

Sunday, December 26, 2010

बंदर क्यों डरते हैं लंगूर से ? One nail drives out another

जनाब सतीश सक्सेना जी मेरे बड़े हैं और मैं उनका आदर करता हूँ और सम्मान भी थोड़ा नहीं करता बल्कि इस ब्लाग जगत में मेरी तरफ से यह अधिकार केवल उन्हीं के लिए रिजर्व है कि वे मुझे जो चाहे कह सकते हैं । अव्वल दिन से मैंने तय कर रखा है कि उनके कहे के बदले में मैं उन्हें कुछ न कहूंगा ।
यानि ऐसा कुछ भी न कहूंगा जो कि एक बुज़ुर्ग को नहीं कहा जाना चाहिए । हां , अगर कहीं उस सच्चे बादशाह की शान में कोई बदतमीज़ी की जाएगी जो कि एक है और सबका मालिक है तो फिर जरूर उन्हें टोका जाएगा लेकिन अदब के साथ या फिर वे किसी समस्या का ग़लत आकलन करके उसका समाधान भी ग़लत पेश करने लगें तो भी मजबूरन बताना ही पड़ेगा कि हुजूर आप बड़े हैं लेकिन आपसे यहाँ चूक हो रही है लेकिन अदब के साथ । न तो एक बड़े को आदर देने का मतलब यह है कि जिस देश और परिवेश में हम रहते हैं उसकी समस्याओं पर ध्यान न दिया जाए , उन्हें दूर करने पर विचार ही न किया जाए और न ही आदर देने का मतलब यह है कि बड़े को उसकी ग़लती भी न बताई जाए । उनके आदर में कमी लाए बिना उनके दावे और आरोप की ग़लती बताई जा सकती है। यह तब और भी ज़रूरी हो जाता है जबकि विषय देशवासियों के कल्याण से जुड़ा हो और मंच भी सार्वजनिक हो । ऐसे में लोगों को ग़लतफ़हमी का शिकार होकर ग़लती कर बैठने से बचाना एक अनिवार्य कर्तव्य बन जाता है ।
A- अपनी ताजा पोस्ट 'काँटे बबूल के' में , जनाब सतीश साहब , आपने मुझे संबोधित करते हुए कहा है कि मुझे दूसरों के धर्म में कमियां नहीं निकालनी चाहियें ऐसा करके मैं एक ग़लत परिपाटी डाल रहा हूं ।
जनाब सतीश जी, आपका यह भी दावा है कि आप ईमानदार हैं ।
अगर वाक़ई आप ईमानदार हैं तो आप बताएं कि क्या दूसरे के धर्म में कमियां निकालने की परिपाटी मैं डाल रहा हूं या मैं पहले से चली आ रही परिपाटी पर प्रहार करके उसे नष्ट कर रहा हूं ?
अगर वाक़ई आप ईमानदार हैं तो बताएं कि जब श्री अरविंद मिश्रा जी हिंदू धर्म की इसलाम से तुलना करके बताते हैं कि हिंदू धर्म में शराब तक पीने की इजाजत है और इसलाम में इस तरह की छूट नहीं है इसलिए इसलाम की तुलना में हिंदू धर्म अत्यंत महान है और इसलाम को सुधारा जाना चाहिए तब आपने मिश्रा जी को धार्मिक लंगूर कहने का साहस क्यों न किया ?
जो कि आपने मुझे बेहिचक कह दिया । क्या सिर्फ इसलिए कि वे बहरहाल एक हिंदू हैं और मैं एक मुस्लिम ?
या फिर इसलिए कि मुझे टिप्पणी देने वाले कम हैं और उन्हें ज्यादा ?
उन्हें नाराज करके आप टिप्पणीकारों को खुद से विमुख नहीं करना चाहते थे ?
मुझे तो आप कई बार कानून की धमकी भी दे चुके हैं लेकिन आपने मिश्रा जी को एक बार भी कानून की धमकी न दी , क्यों भला ?
एक ही जुर्म को करने वाले दो लोगों के साथ आपका बर्ताव अलग अलग क्यों है ?
क्या इसलिए कि दोनों का धर्म अलग है या इसलिए कि आपको दोनों की अमीरी के लेवल में अंतर दिखाई दे रहा है ?
और 'अपेक्षाकृत कमजोर आदमी' को आप आसानी से 'ग़लत' घोषित कर ही देते हैं क्योंकि आपको इसमें अपना कोई नुक़्सान दिखाई नहीं देता । क्या इसी का नाम ईमानदारी है ?
पुराने ब्लागर मिश्रा जी हैं या मैं ?
दूसरे के धर्म में कमी निकालने की परिपाटी मैं शुरू कर रहा हूँ या मुझसे पुराने ब्लागर पहले से ही दूसरों के धर्म में कमियां निकालते आ रहे हैं ?
और आप न सिर्फ चुपचाप देखते आ रहे हैं बल्कि उन्हें टिप्पणियाँ देकर पुष्ट भी करते आ रहे हैं ।
आप बताईये कि इसलाम में कमियां निकालने वालों के ब्लाग पर जाकर आपने कितनी बार अपनी नाराज़गी दिखाई ?
कितनी बार उन्हें क़ानून की धमकी दी और क्या फिर आपने उन्हें टिप्पणी देना बंद किया जैसा कि आप मेरे साथ करते आ रहे हैं ?
अगर आपने नहीं किया है तो फिर या तो आप कुछ लापरवाह और मूडी हैं या आप मुसलमान को जिस पैमाने से नापते हैं , हिंदुओं को भी उसी पैमाने से नापना ज़रूरी नहीं समझते ?
B- 'अमन के पैग़ाम' ब्लाग को उचित समर्थन नहीं मिल रहा है और खुद आपको भी उस ब्लाग पर 20 से भी कम टिप्पणियाँ मिलीं हैं ।
इसका ठीकरा भी आपने मेरे सिर पर फोड़ डाला कि मैं अमन के पैग़ाम पर टिप्पणी करता हूँ इसलिए अमन के पैग़ाम पर अच्छे लेखक को भी लोग उचित सम्मान नहीं दे पाए ।
क्या खूब विश्लेषण किया है ?
टिप्पणी तो मैं आपके और बहन दिव्या जी के ब्लाग पर भी करता हूँ और दोनों ही जगह मॉडरेशन भी लगा है। इसके बावजूद दोनों ही जगह अप्रूवल के बाद मेरी टिप्पणी प्रकाशित भी की जाती है । जिसका मतलब है कि ब्लाग स्वामी को मेरी टिप्पणी में कोई बात काबिले ऐतराज नज़र नहीं आई । मेरी टिप्पणियाँ दोनों ही ब्लाग पर छपीं और इसके बाद भी दोनों ही ब्लाग के लेखकों को लोगों ने बदस्तूर उचित सम्मान देना जारी रखा ।
अत: स्पष्ट है कि अगर लोग किसी लेखक को उचित सम्मान देना चाहें तो मेरी टिप्पणी उनके लिए बाधक नहीं बनती ।

D- इतिहास उन लोगों माफ नहीं करेगा जिन्होंने दोहरे पैमाने अपनाकर सच को सामने आने से रोका होगा और सच यह है कि सबका मालिक एक है । हर चीज उसी के हुक्म की पाबंद है और हरेक इंसान को भी उसके हुक्म की पाबंदी करनी चाहिए ।
देश और समाज का व्यापक हित इसी में है और जो न मानना चाहे और शराब पीकर नई रश्मियों के शबाब के नज़्ज़ारे करना चाहे या और आगे बढ़कर 'गे' बनना चाहे तो बने लेकिन इसलाम में कमी तो न निकाले कि किसी अनवर जमाल को बोलना पड़े ।
लंगूर कभी ख़ुद से नहीं आता । उसे वे लोग लेकर आते हैं जो बंदरों के आतंक से त्रस्त होते हैं और उनसे मुक्ति चाहते हैं । लंगूर जहां होता है । बंदर वहां से पलायन कर जाते हैं जैसा कि ब्लाग जगत में भी अब बंदरों की उछलकूद काफ़ी कम हो चुकी है ।
बंदर को पहचानना हो तो लंगूर को उसके सामने ले आओ, अगर डर कर भाग जाएं तो समझ लीजिए कि वह बंदर था।
एक लंगूर से हज़ारों बंदर डरते हैं ।
क्यों डरते हैं ?
कौन बताएगा ?

('हमारी वाणी' एग्रीगेटर का शुक्रिया कि उसने लोगों की टिप्पणियों की लालसा को कम कर दिया है। अब चिठ्ठाजगत नहीं है, यहाँ
कमेन्ट न करके कुछ और अच्छा पढ़कर अपने वक़्त का सही इस्तेमाल कर लें.)
जनाब सतीश जी का लेख जिसका जवाब मैंने यहाँ दिया है .

Sunday 26 December 2010


कांटे बबूल के -सतीश सक्सेना 

डॉ अनवर जमाल

आपके इस लेख में उठाये प्रश्न और मुझे लिखे पत्र  
"...मेरी नई पोस्ट देखेंऔर बताएं कि जनाब अरविन्द मिश्र की राय से आप कितना
सहमत हैं और इस पोस्ट में आप मुझे जिस रूप रंग में देख रहे हैं , क्या यह
बंद ज़हन की अलामत है ?"

के जवाब में अपना स्पष्टीकरण दे रहा हूँ ....
- आप से नाराजी की, मेरी वजह केवल एक मुद्दे को लेकर है, आपको हिन्दू धर्म के ऊपर अपनी राय और व्याख्या नहीं देनी चाहिए उससे हिन्दू आस्थावान पाठकों को बेहद तकलीफ होती है ! सम्मान पूर्वक भी, हमारी मान्यताओं की व्याख्या करते समय, यह नहीं भूलना चाहिए कि आप हिन्दू धर्म के प्रति आस्थावान नहीं है ! 
ऐसा करके आप मेरे विचार से गलत परिपाटी डाल रहे हैं, जिसका परिणाम यही होगा जिसकी आप शिकायत कर रहे हैं !
-डॉ अनवर जमाल का एक विशेष स्वरूप, हिंदी ब्लॉगजगत में स्थापित हो चूका है ! एस .एम. मासूम  के लेख पर जाकर आप की टिप्पणी का अर्थ, भी लोग अपने हिसाब से लगायेंगे और परिणाम उनके ब्लॉग पर बेहतरीन लेखकों के बावजूद, उस अच्छे काम को उचित सम्मान नहीं मिल पायेगा ! 
इसके अतिरिक्त हर पाठक के दिल में, लेखक का एक प्रभामंडल बन जाता है, टिप्पणियों को क्वालिटी और संख्या , अधिकतर इसी सम्मान पर निर्भर है !    
-आपने मुझ पर शक करके अपनी शक्की मानसिकता का परिचय दिया था उससे मैं बहुत घायल हुआ...यकीन करें मेरी कथनी करनी में फर्क नहीं है और मैं कोई काम किसी को प्रभावित करने के लिए कभी नहीं करता ! मेरे पास बेहतर लेखनी और ईमानदारी है , मैं चाहता तो उस वक्त ही स्पष्ट जवाब दे सकता था मगर मैंने यह उचित नहीं समझा और आपको एक वर्ग विशेष का प्रचारक मानते हुए अपने आपको उस लाइन से ही दूर हटा लिया ! 
-एक बात और, तीर छूटने के बाद, घायल से कोई नहीं कहता कि उसने बेवकूफी में  तीर चलाया ! मर्म बिंध जाने का असर आप मेरे लेखों में ढून्ढ सकते हैं, शायद आपको उस सतीश सक्सेना की जरूरत ही नहीं थी ! खैर , मुझे उसकी कोई शिकायत नहीं ...आपके अपने उद्देश्य हैं जिन्हें आप बेहतर जानते हैं !
  स्थापित लेखक और विद्वान् होने के कारण मैं आपसे तो बिलकुल ही उम्मीद नहीं करता कि आप मान जायेंगे ...बहरहाल लगी चोट,  घायल ही बेहतर जानता है, अनवर भाई ! हमें प्यार की समझ होनी चाहिए !
अगर कभी मेरी बात कभी सच लगे, तो अपने आप को व्यापक देश हित में, बदलने की कोशिश करें लोग आपको वही  प्यार और सम्मान देंगे जिसके लायक आप अपने को मानते हैं  !
योगेन्द्र मौदगिल की दो लाइने मुझे बहुत पसंद हैं ...
" मस्जिद की मीनारें बोलीं, मंदिर के कंगूरों से  !
मुमकिन हो तो देश बचा लो मज़हब के लंगूरों से " 
सादर 
(कृपया इस लेख पर टिप्पणिया न दें  ...अपने सम्मानित पाठकों से क्षमायाचना सहित )

कुछ कमेंट्स जो इस लेख पर आये . 
DR. ANWER JAMAL said...
जब योगेन्द्र मौद्गिल जैसे लोगों को मज़हब में लंगूर नज़र आते हैं और आप जैसे लोगों को उनके विचार पसंद भी आने लगते हैं तो फिर अनवर जमाल को बताना पड़ता है कि लंगूर और बंदर मज़हब को मानने वालों में नहीं होते बल्कि उनमें होते हैं जो कि मज़हब को नहीं मानते । हां , उनके पास से भटक कर मज़हब वालों के पास भी लंगूर आ जाएं या बंदरों के आतंक से मुक्ति पाने और उन्हें डराने के लिए वे लंगूर पाल लें , ऐसा ज़रूर हो सकता है। आप ख़ुद भी देख सकते हैं कि बंदर और लंगूर मस्जिद की मीनारों पर नहीँ होते बल्कि मंदिर के फ़र्श से लेकर कलश तक पर, हर जगह होते हैं। झूठ मैं बोलता नहीं और सच लोगों को हज़्म होता नहीं। जो कोई भी जो कुछ लिखता है उसे केवल ब्लागर्स ही नहीं पढ़ते बल्कि वह मालिक स्वयं भी पढ़ता है । उस न्यायकारी अविनाशी परमेश्वर को साक्षी मानकर आदमी सन्मार्ग पर ख़ुद भी चले और दूसरों को भी सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे , मनुष्य का धर्म यही है और इसी को हिंदू धर्म कहा जाता है । मेरा विचार तो यही है । इसी में मेरी आस्था है और इसी के अनुसार मेरा कर्म भी है। यदि इसके अलावा हिंदू होने के लिए प्राचीन हिंदू ऋषियों की रीति कुछ और हो तो आप बताएं मैं उसे भी पूरा करूंगा, इंशा अल्लाह !
सतीश सक्सेना said...
@ डॉ अनवर जमाल , अफ़सोस है कि आपने मेरा लेख ध्यान से नहीं पढ़ा , मज़हब के लँगूर उन लोगों को कहा जाता है जो लोगों में नफरत फ़ैलाने का काम करते हैं !जो लोग अपने धर्म को छोड़ दूसरे धर्मों की कमियां, विनम्रता से भी बताएं मेरे विचार से वे इस देश के समाज के दोषी हैं ! खैर ... मैं समाज सुधारक नहीं हूँ न धार्मिक नेता अतः मैं यह बहस यहाँ नहीं छेड़ सकता , आप जो कर रहे हैं आप उसके जिम्मेवार खुद हैं ! आपने मेरी चर्चा की अतः यह जवाब देने को मजबूर था !
DR. ANWER JAMAL said...
जनाबे आली ! आप एक कवि हैं और कवि कुछ भी सोचने के लिए आजाद होता है । आपको मैं अपना बड़ा भी मानता हूँ और एक बड़ा अपने छोटे को कुछ भी कहने का पूरा राइट रखता है हमारे क़स्बाई समाज में। आप दूसरे धर्म में नम्रतापूर्वक कमियां निकालने वाले को लंगूर मानते हैं तब तो धृष्टतापूर्वक कमियां निकालने वालों को आप निश्चित ही भेड़िया मानते होंगे ? नाम मैं लूंगा नहीं क्योंकि ... ख़ैर , पूरा दिन गुज़र गया और ले देकर 4 टिप्पणियां ही नज़र आ रही हैं । उनमें भी 3 तो हम बड़े मियां छोटे मियां की ही हैं । ये हुआ तो क्या हुआ ? 'अमन के पैग़ाम' पर भी आपके साथ ऐसा न हुआ जो कि अब आपके निजी ब्लाग पर होता हुआ हर कोई देख रहा है । अब आपको कुछ नए विषय तलाशने होंगे ! अंत में आप मेरे निज अस्तित्व पर कितनी भी चोट करें मैं आपको कभी पलटकर जवाब न दूंगा । बड़ों की डांट डपट और गालियां छोटों को दुआएं बनकर लगते हुए मैं आए दिन देखता हूं । इसीलिए मेरे शब्दों में या मेरे लहजे में आपके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सम्मान है , प्रेम है और कुछ भी नहीं । जीवन जा रहा है और मौत क़रीब से क़रीबतर आती जा रही है । जब हम मरकर उस लोक में इकठ्ठा होंगे जहां आप मेरी आत्मा के भाव को प्रकट देख सकेंगे तब आप यक़ीनन जान लेंगे कि दुनिया में आपसे मेरा प्रेम सच्चा था । एक संवेदनशील आदमी से इतनी आर्द्र विनती पर्याप्त मानी जानी चाहिए । एक यादगार और अनुपम पोस्ट ! कई कोण से !!
सतीश सक्सेना said...
अनवर भाई ... कृपया उपरोक्त पोस्ट दुबारा पढ़ें , वहां सबसे नीचे यह अनुरोध है कि इस पोस्ट पर टिप्पणियां न करें, अगर यह अनुरोध नहीं होता तो आज टिप्पणिया ५० से अधिक होतीं मगर मुझे एक दूसरे को भला बुरा कहने वाली टिप्पणियां यहाँ नहीं चाहिए और न अपनी वाहवाही बाली पोस्ट ! आपकी टिप्पणी प्रकाशित इसीलिए कर रहा हूँ कि विषय आप से ही सम्बंधित है ! मैं हर उस आदमी को बुरा मानता हूँ जो दूसरों की आस्था का मूल्यांकन करे, आपकी आलोचना और आपसे मेरी दूरी का कारण सिर्फ यही है ........ अगर वास्तव मझे अग्रज का दर्जा दे रहे हैं तो आज से हिन्दू धर्म के ऊपर कुछ भी न लिखें न अच्छा न आलोचनात्मक ...यह आपका विषय नहीं है ! जो इस्लाम में कमियां निकालने का प्रयत्न करे उसकी टिप्पणी अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर, यह अहसास कराने का कार्य न करे कि आप जुल्म का शिकार हैं ! कोई सच्चा और सही व्यक्ति दूसरे का मज़ाक नहीं उडाएगा यह कार्य वही करते हैं जो खुद दूषित हैं ! चाहे वह काम किसी भी धर्म के खलाफ क्यों न किया जाए ... आपके प्रेम पर शक नहीं है ! चिंता है आपके सोच की जिसको बदलने में मैं अपने आपको नाकाम मान रहा हूँ ! यह एक महान देश है अनवर भाई हम दोनों इसी जमीन में पैदा हुए और यही मिटटी में मिल जायेंगे ..इस मिटटी और यहाँ के नमक का ख़याल रखते हुए जो दायित्व हैं उन्हें हम दोनों को पूरा करना होगा ! क्षणिक कडवाहट भुलाने वाले और समाज हित में काम करने वालों को देश याद रखता है ! हर हालत में साथ रहकर जीना सीखना पड़ेगा ...अन्यथा इतिहास हरगिज़ माफ़ नहीं करेगा ...
एस.एम.मासूम said...
यहाँ जो बहस हो रही; है उसका कोई मतलब मुझे समझ मैं नहीं आता?आप ज़रा उनलोगों को देखें जिन्होंने लेख़ या कविता; भेजी; है "अमन का पैग़ाम" पे; वोह बड़े और समझदार ब्लोगेर्स हैं. और हकीकत मैं काबिल ए इज्ज़त और काबिल ए फख्र हैं और आप बहुत ध्यान दे देखें उसको पढने वाले और तारीफ करने वाले वोह भी हैं , जिन्होंने कुछ दिन पहले ही ब्लॉगजगत के धर्म युद्ध मैं बड़े बड़े किरदार अदा किये हैं. आज जब वही लोग; अमन और शांति का सन्देश देते हैं, तो किसी को; यह अमन के पैग़ाम की कामयाबी; नहीं लगती . क्यों?कोई तो कारण होगा की आज कुछ लोग अलग अलग बहाने से "अमन का पैग़ाम" के खिलाफ बोल रहे हैं. क्यों? शायद इसका जवाब मैं खुद तलाश रहा हूँ?क्यों की यह तो सत्य है की शांती सन्देश देना कम से कम किसी धर्म के खिलाफ बोलने से तो अच्छा ही है.जबकि यहाँ की बहस; यह बता रही है की दूसरे के धर्म पे व्यंग करना अमन के पैग़ाम देने बेहतर काम है.. मेरे नाम से संबोधित करके बात कही जा रही थी  इसी कारण मेरे लिए कुछ कहना आवश्यक हो गया... ज़रा यह पोस्ट पढ़ लें; शायद आप समझ जाएं..ग़लत कहा हो रहा है.. सतीश जी, किसी ब्लॉग पे टिप्पणी करने वालों की टिप्पणी का असर उस ब्लॉग पे भी; पड सकता है. मैं इस बात से सहमत नहीं. लेकिन इस बात की ख़ुशी; अवश्य हुई की आप ने; हकीकत बयान कर दी और यह बात भी साफ़ हो गयी की अमन के पैग़ाम पे बेहतरीन; लेख़ , कविताओं और ब्लोगेर्स के सहयोह के बाद भी, लोग क्यों नहीं आ रहे?सतीश जी मज़हब के लँगूर उन लोगों को कहा जाता है जो लोगों में नफरत फ़ैलाने का काम करते हैं यह बात सही हैं., लेकिन यह लंगूर सभी धर्म मैं मौजूद हैं. शायद आप इस बात से सहमत होंगे..अमन का पैग़ाम ऐसे ही लंगूरों के को इंसान बनाने के लिए आया है..और ऐसे ही लंगूरों की साजिशों का शिकार भी हो रहा है..सतीश जी यदि मैं ऐसा ब्लोगर भी दिखा सकता हूँ; जिसने दूसरे धर्म का मज़ाक उदय; है अपने ब्लॉग से लेकिन आप की ही नज़र मैं नहीं आ पाया और आप उसकी हिमायत कर गए तो? यह इस लिए कह रहा हूँ क्यों की आप की नज़र मैं आ जाता तो आज आप उसके खिलाफ भी कुछ कह रहे होते ऐसी मुझे आशा है.वैसे एक बात कहता चलूँ कोई व्यक्ति; ज़िंदगी के हर दौर मैं एक जैसा; नहीं रहता. इस लिए जब कोई शांति की बात करे तो उसका साथ दो और जब वही नफरत की बात करे तो उसके खिलाफ बोलो.. क्यों की नफरत व्यक्ति से नहीं उसकी बुराईयों; से की जाती है.. मैं हमेशा कहता हूँ यह ना देखो कौन कर रहा है बल्कि यह देखो क्या कह रहा है..यह लेख़ भी पढ़ लें जो बहुत कुछ कह रहा है..और वहां यह भी बता दें आप के क्या विचार हैं...
सतीश सक्सेना said...
मुझे जो कहना था इस लेख में स्पष्ट कर चुका हूँ ... इसका अर्थ सामान्य है और कोई भी व्यक्ति समझ सकता है बार बार स्पष्टीकरण देना मैं उचित नहीं समझता ! जो समझना ही न चाहें उन्हें समझाने की कोशिश सिर्फ बेवकूफी ही होगी ! आप दोनों को आदर सहित !

Saturday, December 25, 2010

अनवर जमाल एक और रूप अनेक Shades of the sun

जनाब अरविंद मिश्रा जी ब्लाग जगत के बिग ब्लागर्स में से एक हैं, बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं, गुणी हैं और बहुत थोड़ा सा वक्त मैंने उनके साथ गुज़ारा है लेकिन जितना भी गुज़ारा है या ख़ुद ब ख़ुद गुज़रा है, यादगार गुज़रा है। न मैं उन्हें कभी भुला पाऊंगा और शायद न ही वे मुझे। एक लंबे अर्से के बाद आज वे फिर मुझसे मुख़ातिब हुए हैं और मुझे उर्दू और हिंदी दोनों ज़ुबानों में ‘मित्र और दोस्त‘ भी कहा है तो यह हवा के एक ऐसे ख़ुशगवार झोंके की मानिंद है जो किसी चमेली और रात की रानी को छूकर आ रहा हो। बड़े वे हैं ही तो उनके कुछ कहने का अर्थ भी बड़ा ही होना चाहिए। जनाब मिश्रा जी फ़िरक़ापरस्तों को मुंह पर ही फ़िरक़ापरस्त कहने का हौसला रखते हैं। मैंने लखनऊ ब्लागर्स एसोसिएशन के कम्यूनिटी ब्लाग पर यह सवाल पूछा था कि जब ‘अपने महबूब की हर शै से प्यार होता है तो फिर ऐसा क्यों है कि सीता माता से प्यार है लेकिन उनकी ज़मीन से और उस पर आबाद लोगों से प्यार नहीं है। उन्हें ग़रीबी की वजह से अपने से हल्का और तुच्छ क्यों माना जाता है ?
और यही बर्ताव मुसलमानों के साथ क्यों है कि मुस्लिम पीरों के मज़ारों का तो सम्मान किया जा रहा है और उन्हीं मज़ारों का सम्मान करने वाले मुसलमानों की उपेक्षा की जा रही है। पीरों से अपने कामों में मदद मांगने वाले ख़ुद मुसलमानों की मदद करने के लिए क्यों तैयार नहीं हैं ?
क्या इसे ‘वर्चुअल कम्युनलिज़्म‘ कहा जा सकता है ?
इस लेख पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने अपनी पसंद और नापसंद का ज़िक्र किया है और कहा है कि-
हमारे साथ मुश्किल यह है कि हम हिन्दू मुसलमान ,ईमान और कुरआन ,अल्लाह और भगवान् के ऊपर जा ही नहीं पा रहे हैं -दिन रात यही सब...मैं तो तंग और क्लांत हो चला हूँ ,जैसे दुनिया में और कोई मुद्दे,मसायल नहीं हैं ! कुएं से बाहर निकलिए मित्र -ज़रा खिडकियों को खोलिए ,ताजे हवा के झोके और नयी रश्मियों का भी नजारा तो कीजिये -खुदा कसम बड़ा मजा आयेगा!ये दिन रात के स्वच्छ संदेशों और पैगामों की चिल्ल पों बंद कीजिये दोस्त -

ज़ाहिर है कि उन्होंने हम कहकर संबोधित को मेरे साथ ख़ुद को भी संबोधित किया है लेकिन दरअस्ल यह बड़े लोगों का एक स्टाइल होता है दूसरों को समझाने का। वे ख़ुद तो इन सब बातों से ऊपर उठ ही चुके होंगे और उनके दिमाग़ की खिड़कियां भी खुली ही होंगी। अब रही मेरी बात तो आप अगर मुझे ‘हज के बारे में‘ बताते हुए देखेंगे तो कहीं ‘यज्ञ करने वालों के दरम्यान‘ बैठा पाएंगे। आप मुझे एक जगह ‘चर्च में केक काटते हुए‘ देखेंगे तो दूसरी जगह ‘देश अखंडता के लिए जान देने वालों के साथ‘ खड़ा हुआ पाएंगे।
क्या मेरे व्यक्तित्व में   इतने डिफ़रेंट शेड्स और इतनी उदारता देखने के बावजूद भी यह कहना ज़्यादती नहीं है कि मेरे दिमाग़ की खिड़कियां बंद हैं या मैं दूसरे मसायल से नावाक़िफ़ हूं ?
या मेरे बारे में भी यह राय महज़ इसलिए बना ली जाती है कि मैं एक मुसलमान हूं ?
क्या अपने ज़हन के खुलेपन को दिखाने के लिए मैं फ़िल्मी कलाकारों में शामिल हो जाऊं ?
लेकिन अगर मैं ऐसा कर लूं तो क्या तब आप लोग यह मान लेंगे कि अनवर जमाल के ज़हन की खिड़कियां खुली हुई हैं ?
कहीं ऐसा तो नहीं है कि अनवर जमाल के दिमाग़ की खिड़कियां भी खुली हों और आपके लिए उसके दिल के दरवाज़े भी लेकिन ख़ुद आपकी ही खिड़कियां दरवाज़े बंद हों ? (माफ़ी के साथ अर्ज़ है)
...तो लीजिए हम अब आपकी मान्यता पाने की ख़ातिर यह भी करेंगे।
... और लीजिए, देखिए अनवर जमाल को एक टी.वी. और फ़िल्मी कलाकार के रूप में-
यह सीरियल कारपेट मेकर्स की समस्याओं को दिखाता है कि कैसे बिचैलिए दलाल उनका एक्सप्लायटेशन करते हैं। नासिर हुसैन एक बूढ़े कारोबारी हैं और नूर उनकी पोती है। सुलेमान एक दलाल है और ...
यानि कि एक पूरी कहानी है जिसे फिर कभी सुनाया जाएगा। फ़िलहाल तो महज़ यह दिखाना था कि अनवर जमाल के व्यक्तित्व का एक रंग यह भी है कि वह ग्लैमर वल्र्ड का भी हिस्सा है।
अनवर जमाल बहुआयामी प्रतिभा का धनी होने के बावजूद अपने मुसलमान होने की क़ीमत अदा कर रहा है। उसे मिलने वाली टिप्पणियों को देखकर यह जाना जा सकता है।
वर्तमान पोस्ट पर आपकी टिप्पणियों सादर आमंत्रित हैं।
यह पोस्ट जनाब अरविंद मिश्रा के विचारार्थ सार्वजनिक की जाती है।
आपका भाई अनवर जमाल, एक कलाकार के रूप में मेकअप कराते हुए
मुहूर्त शाट के समय प्रोड्यूसर संजेश आहूजा
डी.डी. कश्मीर के लिए बने सीरियल 
‘द कारपेट मेकर‘ के उद्घाटन के अवसर पर 
यूनिट के सदस्य
शूटिंग करते हुए कलाकार
आपका भाई अनवर जमाल
सीमा और अंजलि मां बेटी के रोल में
नासिर हुसैन के रोल में श्रीपाल चौधरी

एक ज़ख्मी के रूप में नूर बनी हुई अंजलि

सीरियल के डायरेक्टर
रंजन शाह विलेन सुलेमान के रोल में