Tuesday, February 15, 2011

हज़रत मुहम्मद साहब स. का आदर्श और विश्व शांति Islam the peace

सच्चे दीन-धर्म का सच्चा बोध
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. इंसानियत पर अहसान करने वालों में सबसे बढ़कर हैं। इंसानियत पर उनके जो अहसान हैं, उन्हें वह कभी भुला नहीं सकती। उन्होंने इंसानियत को भूला हुआ सबक़ याद दिलाया, एक ऐसे वक्त में जबकि दुनिया अपने पालनहार को लगभग भुला चुकी थी या फिर ईश्वर में विश्वास रखने के नाम पर वह तरह तरह के अंधविश्वासों में जकड़ी हुई थी। धर्म का रूप विकृत हो चुका था। धर्म लोगों के जीवन में एक व्यवहार की तरह बाक़ी नहीं बचा था। मात्र कर्मकांड को अंजाम देना, उपासना करना और सभ्य जीवन को छोड़कर एकांतिक साधनाएं करने का नाम धर्म समझा जाने लगा था। ईश्वर के बारे में तरह तरह की कल्पनाएं लोगों के मन में जड़ें जमा चुकी थीं। ईश्वर में भी लोग
खाने-पीने, सोने-जागने, लड़ने-डरने और मौत के डर से मैदान छोड़कर भागने जैसे गुण ही नहीं बल्कि औरतों के साथ मैथुन करने और अपनी संतान के लिए अन्याय करने जैसे गुण भी मानते थे। ईश्वर के बारे में अन्याय और पक्षपात करने जैसी बातें मानने का लाज़िमी नतीजा यही था कि जो पुरोहित खुद को ईश्वर के प्रतिनिधि के तौर पर पेश कर रहे थे और समाज के पेशवा बने बैठे थे, वे खुद अन्याय और पक्षपात कर रहे थे और वास्तव में उन्होंने ईश्वर और उसके संदेशवाहकों के बारे में ऐसी कहानियों को रिवाज ही इसलिए दिया था कि वे समाज के सामने अपने अन्याय और पक्षपात को न्याय और धर्म सिद्ध करके उनका शोषण निर्बाध रूप से कर सकें। ऐसा किसी एक मुल्क में नहीं था बल्कि पूरी दुनिया का हाल यही था जबकि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने उस सच्चे दीन-धर्म को याद दिलाना शुरू किया जिसे हर इलाक़े के इंसानों ने भुला दिया था। ईश्वर, उसकी वाणी, उसका धर्म और उसके संदेशवाहकों के बारे में इंसानियत के पास उस समय शुद्ध ज्ञान का घोर अभाव था। उन्होंने लोगों के अंदर ईश्वर और उसके धर्म का सही बोध जगाने की कोशिश की और मालिक की अपार दया से वे इस कठिन काम में कामयाब भी रहे।
परलोक है इंसान की असल मंज़िल
उन्होंने इंसान की व्यक्तिगत और सामूहिक ज़िंदगी के हरेक पहलू का सुधार किया और उन सभी को ऐसी बुनियादों पर तामीर किया जिससे इंसान दुनिया की ज़िंदगी के साथ परलोक की ज़िंदगी में भी सफल हो सके। परलोक, वह शाश्वत लोक जिसके लिए कि वास्तव में इंसान को रचा गया है और इंसान अपनी उस असल मंज़िल को ही भुला बैठा। सिर्फ़ पैग़म्बरे इस्लाम की मुबारक हस्ती ही थी जिसने अपने समाज को अपनी ज़िंदगी में ही पूरी तरह बदल कर एक ऐसी नस्ल उठाई जिसने पूरी मानव जाति के नज़रिये को ही बदल कर रख दिया। उनके ही प्रभाव की वजह से मानव जाति के ज्ञात इतिहास में पहली बार मानवीय एकत्व, बराबरी और सम्मान जैसे मूल्यों का समाज में रिवाज हो सका। इन मूल्यों पर उन्होंने इतना ज़ोर दिया कि उनके अनुयायियों के ही नहीं बल्कि उनके प्रभाव में आने वाली सारी इंसानियत के चिंतन का यह अटूट हिस्सा बन गया।
उनकी शख्सियत का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों की महज़ ज़बानी तालीम ही नहीं दी बल्कि उसके मुताबिक़ अमल करके भी दुनिया के सामने एक व्यवहारिक आदर्श क़ायम किया। इस वक्त दुनिया में जहां भी मानवीय मूल्य और मानवाधिकार सुरक्षित हैं , वह सब पैग़म्बर स. की तालीम का ही असर है।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब का सबसे बड़ा चमत्कार
चमत्कार को नमस्कार करने वाली दुनिया यह देख सकती है कि यह सब कारनामे उस शख्स ने किये हैं जो बचपन में ही अनाथ हो गया था, बचपन और जवानी की कठिनाईयों से संघर्ष में उन्हें किसी से पढ़ने का अवसर ही न मिला, जीवन का अक्सर हिस्सा ग़रीबों की सोहबत और गुरबत में बीता। वे अनपढ़ थे लेकिन लोगों के चेहरों से झलकने वाली पीड़ा को भी वे पढ़ना जानते थे और उस पीड़ा का अहसास भी वे अपने मन में पढ़ लेते थे जिसे ज़माना अपनी जहालत और गुटबाज़ी की वजह से भोग रहा था। इसका सबसे ज़्यादा शिकार पूरी दुनिया में ग़रीब और कमज़ोर तबक़ा हो रहा था। अरब में भी ग़रीब लोग, गुलाम, औरतें और बच्चे जुल्म की चक्की में पिस रही थीं और उनकी मुक्ति का कोई उपाय किसी अक्ल को सुझाई न देता था। कन्या को पैदा होते ही मार देना वहां आम रिवाज था। व्यक्तिगत सोच की उस क़बीलाई समाज में कोई गुंजाइश ही न थी। एक क़बीला अपने आदमी की हत्या का बदला लेने के लिए दूसरे क़बीले के किसी भी आदमी को मार डालता था और फिर इंतक़ाम का यह सिलसिला कभी बंद नहीं होता था। कई बार तो क़बीले यह तक भूल जाते थे कि यह सिलसिला शुरू किस घटना से हुआ था। उन्हें याद रहता तो बस सिर्फ़ इंतक़ाम। ऐसे ही हालात ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के दिल को तड़पा दिया था और वे घर से अलग होकर मक्का से बाहर एक गुफ़ा ‘हिरा‘ में तन्हाई में बैठे तड़पा करते थे कि इंसानियत का दुख-दर्द दूर कैसे हो ?

उद्धार के लिए ‘अनुपम ज्ञान‘ का अवतरण
तब उनकी तड़प देखकर दयालु पालनहार प्रभु ने उनके अंतःकरण पर अपना ‘ज्ञान‘ अवतरित किया। ऐसा ज्ञान जिसे बनाना किसी अनपढ़ आदमी के तो क्या किसी बड़े से बड़े पढ़े-लिखे आदमी के बस की भी बात नहीं है। सिर्फ़ एक पढ़ा-लिखा आदमी ही नहीं बल्कि विद्वानों की एक पूरी सभा मिलकर भी ‘कुरआन‘ जैसा ज्ञान नहीं बना सकती। पूरी दुनिया के विद्वान मिलकर भी कुरआन जैसी बात कभी न कह सके हैं और न ही आज कह सकते हैं और यह चैलेंज कुरआन के मानने वाले अब नहीं करते बल्कि अपने अवतरण काल से ही यह चैलेंज खुद कुरआन करता है।
आज भी जब किसी देश का संविधान बनाया जाता है तो एक पूरी सभा मिलकर उस संविधान को बनाती है और फिर गुज़रता हुआ वक्त उन्हें उस संविधान के मौलिक सिद्धांतों तक में तब्दीली करने पर मजबूर करता रहता है। बदलते हुए राजनीतिक परिवर्तन भी उन्हें पलटकर रख देते हैं लेकिन इस्लामी क़ानून जिन्हें हज़रत मुहम्मद स. ने अपने मालिक की ओर दुनिया को दिया वह उन प्राकृतिक नियमों ही हिस्सा हैं जो कि खुद इंसानी स्वभाव है, जिसे न कोई दार्शनिक बदल सकता है और न ही कोई राजनीतिक प्रभाव। हरेक दबाव में रहने के बावजूद इंसानियत जैसे ही उन दबावों से मुक्त होकर विचार करेगी तो उसके अंदर से जो मांग उठेगी उसे इस्लामी क़ानून के अलावा किसी अन्य चीज़ से पूरा करना संभव ही नहीं है।
जिन जिन देशों में ऊंचनीच को दार्शनिक पुट देकर सभ्यता का अंग बना दिया गया था और हज़ारों साल तक इंसानियत के अवचेतन तक में उसे बिठा दिया गया, उन देशों में भी जब इंसानियत को सोचने और करने की ज़रा सी आज़ादी मिली तो उन्होंने तुरंत ऊंचनीच के उस सिस्टम पर लात मारकर बराबरी के उसूल को कुबूल कर लिया और फिर बाद में ऊंचनीच के अलम्बरदारों ने भी ऊंचनीच और छूतछात के अमानवीय उसूलों को खुद ही मजबूर होकर कैंसिल कर दिया क्योंकि आज कहीं भी उन उसूलों की पूछ नहीं है बल्कि जो कोई उन उसूलों की तालीम देने की कोशिश करेगा, विश्व भर के सभ्य समाज में ज़लील माना जाएगा। ज़िल्लत के डर से , लोगों द्वारा त्याग दिये जाने और पिछड़ जाने के डर से अपने दर्शन के मौलिक सिद्धांतों को तिलांजलि देकर इस्लाम के उसूलों को अपनाने पर उन्हें मजबूर होना पड़ा। ऐसा क़ायदा-क़ानून एक अनपढ़ व्यक्ति ने दिया है, क्या यह चमत्कार नहीं है ?
क्या यह काफ़ी नहीं है कि आदमी जान ले कि इस्लाम मुहम्मद साहब की देन नहीं है बल्कि दयालु पालनहार की देन है। इस्लाम पालनहार का मानव जाति पर एक महान उपकार है और यह पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के माध्यम से मिला। हज़रत मुहम्मद स. ने इस्लाम के अनुसार व्यवहार करके मानव जाति के हरेक संशय का निराकरण कर दिया है।

पूर्व ज्ञान और पूर्व काल के ऋषियों की पुष्टि कुरआन से
मानव जाति के महान सुधारक और शिक्षक का शिक्षक खुद पालनहार प्रभु है जो सर्वज्ञ है और जिसके सामने हरेक काल की हरेक घटना बिल्कुल स्पष्ट है। उसी ने उनके अंतःकरण पर कुरआन अवतरित किया और कुरआन को भी उसने सदा के लिए सुरक्षित कर दिया है। न तो मुहम्मद साहब स. अपने से पूर्व आने वाले ऋषियों-नबियों का खंडन करते हैं और न ही कुरआन अपने से पूर्व आ चुके ईशवाणी के संस्करणों को ही नकारता है बल्कि इसके विपरीत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. अपने से पूर्व आने वाले तमाम ऋषियों और नबियों की पुष्टि और समर्थन करते हैं और कहते हैं कि उनका आगमन भी उनकी भविष्यवाणी को ही पूरा करता है और वे कोई नया धर्म नहीं सिखा रहे हैं बल्कि वे ‘दीने क़य्यिम‘ अर्थात सनातन धर्म की ही पुनस्र्थापना कर रहे हैं। कुरआन भी जगह-जगह अपने पूर्व अवतरित ईशवाणी के सभी संस्करणों की पुष्टि करता है और कहता है जो ‘ज्ञान‘ ईश्वर की ओर से मानव जाति को पहले मिल चुका है उसके सिद्धांतों को सामने रखकर मुझे परख लीजिए, आपको कोई भी मौलिक अंतर हरगिज़ न मिलेगा।
इस खुली हक़ीक़त के बावजूद कुरआन, इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम पर बेबुनियाद आरोप लगाने में प्रपंची लोग कोई झिझक महसूस नहीं करते। इसका नुक्सान सिर्फ़ मुसलमानों को ही नहीं बल्कि सारी इंसानियत को पहुंचता है क्योंकि पैग़म्बर साहब स. की शिक्षा से हटने के बाद कुछ भी करना सिर्फ़ और सिर्फ़ गुमराही है। इसे जब चाहे और जो चाहे आज़मा सकता है। उनका वुजूद सारी दुनिया के लिए रहमत है क्योंकि उनसे जुड़ने के बाद ही इंसान को सही-ग़लत और जायज़-नाजायज़ का इल्म हासिल हो सकता है जो कि इंसान होने की बुनियादी शर्त है। इंसान को इंसानियत की बुनियाद उपलब्ध कराने वाले आज अगर कोई हैं तो वह केवल पैग़म्बरे इस्लाम स. हैं। यह एक हक़ीक़त भी और दावा और चैलेंज भी। (अलकुरआन, अलअंबिया, 107)

‘ज्ञान‘ का महत्व
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. पर ईश्वरीय प्रकाशना की शुरूआत ‘इक़रा‘ शब्द से हुआ। उन्होंने ज्ञान पाने पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया और सिर्फ़ कुरआन का ही ज्ञान नहीं बल्कि हर वह ज्ञान और कला जो समाज और सभ्यता के लिए नफ़ाबख्श हो। उन्होंने एक बार फ़रमाया-
‘उत्लुबुल इल्मु वलौ काना बिस्सीन‘ (अलहदीस)
‘इल्म हासिल करो चाहे चीन ही क्यों न जाना पड़े।‘
ज़ाहिर है कि चीन में कुरआन और शरीअत का तो इल्म नहीं था लेकिन काग़ज़ आदि बनाने की कई ज़रूरी कलाओं को चीन से सीखा जा सकता था जो कि इल्म को सुरक्षित रखने और उसे फैलाने में अहम रोल अदा कर सकती थीं और उन्होंने अपना अहम रोल अदा किया भी।
इस हदीस से जहां यह पता चलता है कि उन्होंने इल्म हासिल करने पर कितना ज़ोर दिया वहीं यह भी पता चलता है कि उनकी नज़र में हरेक नफ़ाबख्श इल्म हासिल करने के लायक़ था और दीन के मुताबिक़ जायज़ था। उन्होंने इल्म को ‘दीनी इल्म‘ और ‘दुनियावी इल्म‘ के टुकड़ों में तक़सीम नहीं किया था जैसा कि आज के दीनदार कहलाने वाले लोग कर चुके हैं। उनकी नज़र अरब क़ौम को किसी ग़ैर अरब क़ौम पर भी श्रेष्ठता प्राप्त नहीं थी, यह भी इसी हदीस से पता चलता है। अहंकार का पहला नुक्सान यह होता है कि आदमी अपनी क़ौम को सबसे श्रेष्ठ मानकर यह समझने लगता है कि उसकी क़ौम के अलावा दूसरी तमाम क़ौमें घटिया हैं और जो कुछ उनके पास है वह भी घटिया है, हम श्रेष्ठ हैं, हमें किसी घटिया क़ौम से घटिया चीज़ें सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है। इस तरह अहंकार ज्ञान पाने से रोकता है और इंसानियत को नुक्सान पहुंचाता है। इसके विपरीत ज्ञान अहंकार को मिटा डालता है और इंसानियत का कल्याण करता है। दोनों चीज़ें एक साथ एक दिल में जमा नहीं हो सकतीं।

अहंकार बाधक है सत्य अपनाने में
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई को मानने से जो चीज़ रोकती है वह भी केवल अहंकार है वर्ना तो आदमी अगर एक नज़र उनके सुधार कार्यों पर डाल ले तो वह उनकी सच्चाई का क़ायल हो जाता है। उन्होंने लोगों को गुलाम आज़ाद करने की प्रेरणा दी और लोगों ने गुलाम आज़ाद करने शुरू किए और बहुत थोड़े ही अर्से में गुलाम आज़ाद भी हो गए और उनका पुनर्वास भी इस तरह हो गया कि वे बराबरी के दर्जे के साथ उसी समाज का अंग बन गए। उन्होंने नशा छोड़ने का हुक्म दिया और तमाम देहातों और नगरों के लोगों ने अपनी शराब नाली में बहा दी। उन्होंने कन्या की हत्या से रूकने का हुक्म दिया और लोग रूक गए। न सिर्फ़ उनके ज़माने के अनुयायी रूक गए बल्कि उनके बाद के ज़मानों के अनुयायी आज तक इस घिनौने जुर्म से रूके हुए हैं, जिससे आज हुकूमत भी लोगों को रोक पाने में नाकाम है।

पैग़म्बर साहब स. के सुधार कार्य

मुसलमानों की इल्म और अमल की तमाम कमज़ारियों के बावजूद भी मुस्लिम समाज में कन्या भ्रूण हत्या शून्य है तो यह केवल पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षाओं का ही प्रभाव है।
उन्होंने लोगों से कहा कि वे क़र्ज़दारों पर अपना ब्याज माफ़ कर दें, उन्हें बिना ब्याज के क़र्ज़ दें और मालदार लोग सदक़ा-फितरा आदि दान के अलावा ज़रूरतमंदों को अपने बढ़ने वाले माल का 2.5 प्रतिशत हिस्सा उनके कल्याण के लिए दें बिना यह सोचे कि उनसे किसी भी तरह का कोई बदला या फ़ायदा उठाया जाए। लोगों ने ऐसा किया तो समाज के हरेक सदस्य की बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति यक़ीनी हो गई। आज भी अगर लोग ईमानदार हो जाएं और उस समाज की तरह कालाबाज़ारी, जमाख़ोरी और मिलावट छोड़ दें, सूद-ब्याज लेना छोड़ दें और अपने बढ़ने वाले माल का 2.5 प्रतिशत समाज के ज़रूरतमंदों को देने लगें तो समाज से गुरबत और शोषण का सफ़ाया हो जाएगा बिना किसी आंदोलन और बिना किसी क्रांति के। आज दुनिया में अगर ये समस्याएं मौजूद हैं तो केवल इसलिए कि अहंकार और अज्ञान के कारण इंसानियत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षाओं का पालन अपने लिए अनिवार्य नहीं मानती हालांकि वह उन्हें एक महान सुधारक भी मानती है।
उनके आगमन से पहले दुनिया की अक्सर क़ौमें सांप्रदायिकता और धड़ेबंदी की शिकार थी और एक दूसरे का खून बहाना उनके लिए गर्व की बात थी। अरब के क़बीले भी दुनिया की दूसरी क़ौमों की तरह आपस में एक दूसरे का खून बहा रहे थे। उनकी शिक्षा के कारण वह सब खून-ख़राबा बंद हुआ और उसका असर पूरी दुनिया तक पहुंचा।
मानव जाति के उनके उपकारों में से एक यह भी है उन्होंने इस्लाम के आह्वान के बावजूद अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले हरेक मत के लोगों को यह आज़ादी दी कि वे अपने मत पर भी क़ायम रह सकते हैं और अपनी मज़हबी रस्मों को भी अंजाम दे सकते हैं। उनका मत कुछ भी हो लेकिन वे बाहरी हमलावर को एक साझा दुश्मन समझें और सभी लोग एकता के साथ उनका मुक़ाबला करें। इस संधि को ‘मीसाक़े मदीना‘ के नाम से जाना जाता है।

विश्व शांति केवल इस्लाम से
यह सिद्धांत आज भी दुनिया के सामने एक आदर्श है। इसका उद्देश्य भी शांति ही था। इस्लाम केवल शांति है और शांति दुनिया में केवल इस्लाम के उसूलों से ही आ सकती है। इस्लाम केवल व्यक्तिगत शांति की बात नहीं करता बल्कि वह व्यक्तिगत शांति के साथ सामूहिक शांति की बात भी करता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने केवल शांति की बात ही नहीं की बल्कि उन कारणों को भी बताया जिनकी वजह से समाज में ग़रीब और अमीर तबक़ों के दरमियान फ़ासला और नफ़रत दोनों ही बढ़ते हैं। जिनकी वजह से समाज के लड़के और लड़कियों के विवाह देर से होते हैं वे बेचैन और अशांत रहते हैं। ग़र्ज़ यह कि अशांति कि जितने भी रूप और कारण हो सकते थे, उन्होंने उन सबकी निशानदेही भी की और उनका निवारण करके समाज में शांति स्थापित भी की और उन उसूलों पर चलकर आज भी विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है।
आज भी विश्व में जहां भी शांति की कोई भी गंभीर कोशिश चल रही है, आप उसे ग़ौर से देखिए और उसके सिद्धांतों को देखिए, वहां आपको इस्लामी सिद्धांत ही नज़र आएंगे।
पैग़म्बरे इस्लाम स. की विजय की अस्ल ताक़त उनका नज़रिया, उनके उसूल, उनका चरित्र और उनका व्यवहार था। वे इंसान को हर हाल में एक इंसान मानते थे और उसे हर हाल में एक इंसान का सम्मान देते थे चाहे वह इंसान मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम, चाहे ज़िंदा हो या फिर मुर्दा।
पैग़म्बर साहब स. अगर किसी ग़ैर मुस्लिम (यहूदी) का जनाज़ा भी पास से गुज़रते हुए देखते तो खड़े हो जाते थे। इस पर उनके सत्संगी साथी उनसे पूछते थे कि तो आप कहते थे कि ‘क्या यह इंसान नहीं है ?‘ (बुख़ारी)

पैग़म्बरे इस्लाम स. की शिक्षाएं
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षा यह है कि
‘ऐ लोगो ! तुम्हारा रब पालनहार एक है और तुम्हारा बाप भी एक है। तुम सब आदम की औलाद हो और आदम मिट्टी से बने थे। अल्लाह के नज़्दीक तुम में सबसे ज़्यादा प्रतिष्ठित वह है जो तुम में सबसे ज़्यादा जुर्म और पाप से बचने वाला है। किसी अरबी को किसी ग़ैर अरबी पर, किसी गोरे को काले पर बड़ाई हासिल नहीं। बड़ाई सिर्फ़ अल्लाह से डरने के सबब है। यही बड़ाई का पैमाना है, कसौटी है।‘
‘सारी मख्लूक अल्लाह का कुन्बा है, बस तुम में सबसे अच्छा वह है जो अल्लाह के कुन्बे के साथ अच्छा सुलूक करे।‘
‘ख़बरदार, जुल्म न करना, ख़बरदार जुल्म न करना। मेरे बाद मुन्किर न हो जाना कि एक दूसरे की गर्दनें मारने लगो। कोई भी समुदाय सत्य के मार्ग पर रहने के बाद गुमराह हुई है तो उसका सबब यह है कि वे आपस में लड़ बैठे। मुसलमान वह है जिसकी ज़बान और हाथ की तकलीफ़ से लोग महफ़ूज़ रहें। क़ियामत के रोज़ मेरी नज़र में सबसे ज़्यादा प्यारे और मेरे सबसे ज़्यादा क़रीब वह शख्स होगा जिसके अख़लाक़ सबसे अच्छे होंगे। अल्लाह ने मुझे बेहतरीन अख़लाक़ और बेहतरीन आमाल की तकमील के लिए भेजा है। एक मीठा बोल और किसी बात को दरगुज़र कर देना उस सदक़ा और ख़ैरात से बेहतर है जिसके पीछे दुख देना हो। ऐ ईमान वालो, न तो मर्द ही मर्दों का मज़ाक़ उडाएं, मुमकिन है कि वे उनसे बेहतर हों और न ही औरतें औरतों का मज़ाक़ उड़ाएं। हो सकता है कि वे उनसे बेहतर हों और न अपनों पर व्यंग्य करो और न ही एक दूसरे को बुरी उपाधि से पुकारो। बदगुमानी से बचो क्योंकि बाज़ गुमान गुनाह होते हैं और न किसी की टोह में रहो और न ही तुम में से कोई किसी की पीठ पीछे बुराई करे। क्या तुम में से कोई यह बात पसंद करेगा कि अपने मुर्दा भाई का मांस खाए ? तुम उससे नफ़रत करोगे। अल्लाह से डरते रहो और अल्लाह तौबा कुबूल करने वाला है। वादा पूरा करो। क़ियामत के दिन वादे के बारे में लाज़िमी तौर पर पूछा जाएगा। जो कोई अल्लाह और परलोक पर यक़ीन रखता है, वह अपने पड़ोसी को तकलीफ़ न पहुंचाए। खुदा की क़सम वह मोमिन नहीं जिसका पड़ोसी उसके शर से महफ़ूज़ न हो। अल्लाह को यह बात सख्त नापसंद है और वह मोमिन नहीं, जो खुद तो पेट भर कर खाए और उसका पड़ोसी भूखा सो जाए।‘
आज दुनिया में कोई आदमी ऐसा नहीं है जो यह कहे कि उसे इस तालीम की ज़रूरत नहीं है। कोई भी आदमी इस शिक्षा से अच्छी शिक्षा ला नहीं सकता और न ही आज इस शिक्षा को नज़रअंदाज़ करके वह सभ्य समाज में कोई इज़्ज़त ही पा सकता है। दूसरों से ज़्यादा आज खुद मुस्लिम समाज को इस बात की बेहद ज़रूरत है कि वह खुद को पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की तालीम की रौशनी में जांचे और देखे कि उसके पड़ोसी को उससे कोई तकलीफ़ तो नहीं पहुंच रही है। वह इस बात का कितना ध्यान रखता है कि उसके पड़ोस में कोई भूखा, बीमार और परेशान तो नहीं है।

समाज में किसकी प्रतिष्ठा होती है और क्यों ?
याद रखिए, यह समाज उपयोगिता के सिद्धांत पर ही चलता है। अगर आप अपने आस पास के लोगों की तकलीफ़ें दूर करने के लिए भागदौड़ करते हैं, उनकी बीमारी और उनकी मौत के वक्त आप उन्हें सहारा देते हैं तो फिर उनके दिलों में आपके लिए सम्मान पैदा होने से दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती। अगर आपका अख़लाक़ अच्छा है तो फिर लोग खुद ब खुद आपको अच्छा समझेंगे और आपको इज़्ज़त देंगे, आप पर विश्वास करेंगे और अपने अहम कामों में आपको अपना राज़दार बनाएंगे। आपकी नेकी आपको दुनिया में इज़्ज़त दिलाएगी, आपकी साख बनाएगी, आपकी साख आपके लिए समृद्धि का द्वार खोल देगी। एक व्यापारी अपनी साख का ख़याल सबसे ज़्यादा रखता है। उसकी सारी समृद्धि का दारोमदार उसकी साख पर ही होता है।
अगर आज मुसलामान की साख पर सवालिया निशान लगते हैं तो उसका कारण यह नहीं है कि वह इस्लाम पर चलता है बल्कि इसका कारण यह है कि वह इस्लाम पर ठीक से नहीं चलता है। कुरआन पढ़ने और समझने से जी चुराना, उसके हुक्म को नज़रअंदाज़ करके अपनी ख्वाहिश और समाज की रस्मों के मुताबिक़ जीना, ज़कात अदा न करना, औरतों को विरासत में हिस्सा न देना, दहेज लेना और दिखावे और शान के लिए दिलेरी के साथ गुनाह करना आज अक्सर मुसलमानों का अमल है। धड़ेबंदी करना और खून बहाना भी मुसलमानों में देखा जा सकता है। ये तमाम बातें वे हैं जिनसे पैग़म्बरे इस्लाम ने रोका है। मुसलमान वह है जो उन कामों से रूक जाए जिन कामों से पैग़म्बरे इस्लाम स. ने रूकने के लिए कहा है। इस ज़मीन पर शांति की स्थापना के लिए ऐसा करना निहायत ज़रूरी है। मुसलमान ऐसा करेंगे तो उनका आचरण उन लोगों के लिए भी प्रेरणा बनेगा जो कि शांति के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं, जो कि जीवन के उद्देश्य के बारे में सोचते हैं कि जीवन क्यों है और कौन सा मार्ग है जो उन्हें उनकी असल मंज़िल तक पहुंचा सकता है ?


आपकी असल मंज़िल आपके सामने है, अपने क़दम बढ़ाइये
पैग़म्बरे इस्लाम की ज़िंदगी और उनकी शिक्षा इंसान को उसके हर सवाल का जवाब देती है। मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम हरेक इंसान इस तथ्य को जब चाहे देख सकता है, उसका कल्याण इसी में है। किसी भी कारण की वजह से आदमी को सच्चाई को स्वीकारने में और खुद को सुधारने में देर नहीं करनी चाहिए। इंसान होने का अर्थ तो यही है। जो इस गुण से ख़ाली है, वह इंसान होने का दावेदार तो हो सकता है लेकिन इंसान नहीं हो सकता।

Friday, January 28, 2011

ऋषियों को नाहक़ इल्ज़ाम न दो The truth about great rishies ? part second

आप नहीं जानते कि परमेश्वर और परमात्मा में क्या भेद है ?
अगर आप इन ऋषियों का सच्चा चरित्र सामने ला सकते हैं तो लाईये मैं आपकी मदद करूंगा और अगर आप उनके महान और पवित्र चरित्र को वापस नहीं ला सकते तो मुझे लाने दीजिए और आप मेरी मदद कीजिए। आपके द्वारा मेरे काम में रूकावट डालने की कोई भी ऐसी वजह आपके पास नहीं है जिसे पेश करके आप अपनी आत्मा को संतुष्ट कर सकें और जब आपकी आत्मा ही संतुष्ट न होगी तो फिर परमात्मा कैसे संतुष्ट होगी ?
और परमेश्वर को आप कैसे संतुष्ट कर पाएंगे जिसे कि आप जानते तक नहीं हैं। आप तो परमात्मा को ही परमेश्वर मानकर चल रहे हैं। आपको तो आज पता ही नहीं है कि परमेश्वर वह है जो कि परमात्मा का भी स्वामी और आराध्य है। लेकिन आप परमात्मा को ही कब जानते हैं ?
आपको क्या पता कि परमात्मा कौन है ?
आपको तो अपने ज्ञान का घमंड है। आप तो यह समझते हैं कि वास्तव में ज्ञान केवल आपके पास है और दुनिया भर की जातियां केवल मूढ़ हैं और इनमें मुसलमान सबसे बढ़कर हैं। जबकि हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट है।

ज्ञान पाने के लिए ज्ञानी का अनुसरण अनिवार्य है
परमेश्वर और परमात्मा के स्वरूप का भेद और उनकी प्राप्ति का मार्ग हमारे पूर्वज ऋषियों ने बताया है लेकिन उनकी प्राप्ति केवल बातों से, केवल ध्यान-मौन और समाधि से संभव नहीं है। उनकी प्राप्ति के लिए ऋषियों का अनुकरण करना अनिवार्य है और ऋषियों के अनुकरण के लिए उनके पवित्र चरित्र का सच्चा ज्ञान ज़रूरी है। यह ज्ञान आज मुसलमानों को घटिया समझने वाले एक भी हिन्दू के पास उपलब्ध ही नहीं है। अगर किसी के पास हो तो वह सामने आए ताकि मैं उसका अनुकरण कर सकूं वर्ना तो मैं कहता हूं कि यह ‘ज्ञान‘ मेरे पास है, आप सब मेरा अनुकरण करें।
जो कम जानता है वह अपने से ज़्यादा जानने वाले का अनुकरण करता ही है। इसमें झगड़े की क्या बात है ?
इसके बावजूद भी आपको मेरा प्रस्ताव मंजूर नहीं है तो कोई बात नहीं है, जाने दीजिए। मौत बहुत जल्द आपको आपके मालिक के सामने हाज़िर करने वाली है तब आप अपने अपराध का जवाब देते रहिएगा कि आपने किस आधार पर ऋषियों के पाक चरित्र पर लांछन लगाए ?

आपने किस आधार पर अपने धर्म से खिलवाड़ किया ?
आपने किस आधार पर ऋषियों की परंपरा को छोड़कर अंग्रेज़ों की परंपरा का अनुसरण किया ?
आज अंग्रेज़ अपनी परंपराओं से खुद परेशान हैं। वे खुद आपकी परंपराओं को और विश्व की दूसरी परंपराओं को आज़माकर देख रहे हैं। उन्होंने भी आपकी ही तरह अपने ऋषियों का चरित्र विकृत कर डाला। आप बाइबिल उठाकर देख लीजिए। हज़रत नूह अ. से लेकर हज़रत लूत तक जाने कितने ही नबियों के चरित्र पर कालिख पातने की कोशिश की और उन्होंने भी मुसलमानों को खुद से घटिया समझा।
बाइबिल में पवित्र नबियों पर घिनौने आरोप के दो प्रमाण
1. ‘और नूह किसानी करने लगा, और उसने दाख की बारी लगाई। और वह दाखमधु पीकर मतवाला हुआ; और अपने तम्बू के भीतर नंगा हो गया। तब कनान के पिता हाम ने, अपने पिता को नंगा देखा, और बाहर आकर अपने दोनों भाइयों को बतला दिया।‘ (उत्पत्ति, 9, 20-22)
2. ‘इस प्रकार से लूत की दोनों बेटियां अपने पिता से गर्भवती हुईं।‘(उत्पत्ति, 19, 36)
मैं इस बयान को पढ़कर सच ही मान लेता और तब मैं अपने पूर्वजों पर, इन दो महान सत्पुरूषों के प्रति अन्जाने ही एक भयंकर अपराध कर बैठता जैसे कि करोड़ों लोग आज भी इन दोनों झूठी कहानियों को सच मानकर कर रहे हैं। मुझे इस महापाप से बचाया पवित्र कुरआन ने। पवित्र कुरआन हज़रत नूह अ.
के बारे में कहता है कि-
‘कहा गया कि ऐ नूह ! उतरो, हमारी तरफ़ से सलामती के साथ और बरकतों के साथ, तुम पर और उन समुदायों पर जो तुम्हारे साथ हैं।‘ (हूद, 48)
http://www.artbulla.com/zion/Noah.html
हज़रत नूह अ. को हिन्दू राष्ट्र जल प्रलय वाले मनु महाराज के नाम से जानता है और उनके नाम से जोड़कर इंसान के लिए संस्कृत में मनुज और मनुष्य बोला जाता है। गोया कि वह न होते तो आज हम भी न होते। उनके ऊपर ईश्वर अपनी कृपा होना बताता है और उन लोगों पर भी जो कि उनके साथ हों अर्थात उन्हें आदर्श मानकर उनके सिद्धांतों का पालन करते हों।
परमेश्वर पवित्र कुरआन के माध्यम से हज़रत लूत अ. के बारे में बताता है कि-
‘और लूत को हमने हिकमत (तत्वदर्शिता) और इल्म अता किया और उसे उस बस्ती से छुटकारा दिया जो गंदे काम करती थी। निस्संदेह वह बहुत बुरे, फ़ासिक़ लोग थे। और हमने उसे अपनी रहमत में दाखि़ल किया। बेशक वह नेक लोगों में से था। (अलअंबिया, 75)
कुरआन केवल इन दो ऋषियों-नबियों को ही आदर्श और सत्य घोषित नहीं करता बल्कि वह तमाम ऋषियों-नबियोंकहता है कि-
‘उनमें से हरेक नेक था।‘ (अलअनआम, 86)
और फिर वह केवल इतना ही नहीं कहता बल्कि वह लोगों से कहता है कि तुम सब उन सभी ऋषियों-नबियों पर आस्था व्यक्त करो और कहो कि-
‘हम उस (ईश्वर) के रसूलों (ऋषियों) में से किसी के साथ भेदभाव नहीं करते।‘ (अलबक़राः, 284)
पवित्र कुरआन के अलावा सभी ऋषियों की सच्चाई और पवित्रता का ऐसा उद्घोष आज किसी भी ग्रंथ में मुझे नहीं मिलता। अगर किसी और भाई को नज़र आए तो वह मुझे बताए।
हमारे पूर्वज ऋषियों के ऊपर लगने वाले तमाम आरोपों को बेबुनियाद क़रार देने वाले पवित्र कुरआन को भी जो लोग सत्य नहीं मानते, वे दरअस्ल नफ़रत में अंधे हो चुके हैं। अहंकार में आदमी अंधा हो जाता है। ज्ञान का द्वार उसके सामने होता है लेकिन वह उसमें प्रवेश नहीं कर पाता। हिन्दुओं और अंगेज़ों की प्रॉब्लम सेम है और उसका समाधान भी समान ही है।
हिन्दुओं और अंग्रेजों की ही नहीं बल्कि खुद मुसलमानों की भी सारी समस्याओं की जड़ ऋषियों के आदर्श का अनुकरण न करना है। बस दूसरी क़ौमों और मुसलमानों में जो बुनियादी अंतर है वह यह है कि दूसरी क़ौमों के पास वह ईशवाणी आज सुरक्षित नहीं है जो उनके ऋषियों के अंतःकरण पर अवतरित हुई थी लेकिन मुसलमानों के पास वह सुरक्षित है, न केवल उनके लिए वरन् सारी मानव जाति के लिए। इसी ईशवाणी पवित्र कुरआन में हिन्दुओं के ऋषियों का सच्चा चरित्र आज भी पूरी पवित्रता के साथ जगमगा रहा है। इसी पवित्र कुरआन में अंग्रेज़ों के पास पैग़ाम लाने वाले नबियों का बयान भी मौजूद है। जो चाहे देख ले, जो चाहे मान ले, किसी को कोई रोक-टोक नहीं है कि यह नहीं देख सकता, वह उसे नहीं छू सकता।

सब पढ़ें, सब बढ़ें
मौजूद तो आज वेद और बाइबिल भी हैं लेकिन उनके स्कॉलर्स मानते हैं कि वे प्रक्षिप्त हैं। वेदों में आस्था रखने वाले सनातनियों की संख्या ज़्यादा है। वे मानते हैं कि ब्राह्मण ग्रंथ वेदों का हिस्सा हैं जबकि आर्य समाजी विद्वान इसे नकारते हैं। यही तय नहीं है कि कितना हिस्सा वेद हैं और कितना हिस्सा उसमें वेद के अतिरिक्त है ?
सनातनी पब्लिक को डील करने वाले शंकराचार्यों की ओर से आज भी औरत और शूद्र को धर्मतः वेद पढ़ने व सुनने की अनुमति नहीं है। यूं लोग अपनी मुठमर्दी से उसे पढ़ने लगें तो आज लोकतंत्र में वे कुछ कर नहीं पाते लेकिन पूर्वकाल में इस जुर्म की भयानक सज़ाएं वे हमेशा से देते आए हैं।
बाइबिल की मूल प्रति के नए नियम की पुस्तकें हज़रत ईसा अ. के सामने नहीं लिखी गईं और न ही उनकी भाषा ही में उन्हें लिखा गया है। वे वेटिकन सिटी में रखी हुई हैं। हरेक आदमी तो छोड़िए, हरेक ईसाई भी उन्हें नहीं देख सकता।

ऋषि पवित्र हैं
यही ढकना-छिपाना हमेशा ऋषियों के चरित्र और इतिहास को भूलने का कारण बना है। बहरहाल आज हिन्दू साहित्य में उनके बारे में चाहे कैसे भी क़िस्से-कहानियां मशहूर हों, वे वास्तव में पवित्र थे, यह उनकी उपाधि ‘ऋषि‘ शब्द से ही बिल्कुल साफ़ ज़ाहिर है।
आपको ऋषियों को पवित्र मानना होगा और उनका अनुकरण करना होगा। उनसे जुड़ना होगा। आज दुनिया का कोई भी आदमी बिना कुरआन की मदद के अपने ऋषि से जुड़ ही नहीं सकता। अगर कोई जुड़ सकता है, अगर वाक़ई वह बिना कुरआन की मदद के अपने ऋषि की परंपरा का पालन कर सकता है तो वह करके दिखा दे।

मुझ पर बेवजह ऐतराज़ क्यों ?
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यह संवाद डा. श्याम गुप्ता जी के लिए क्रिएट किया गया है। उन्होंने मुझसे पूछा था कि -
‘...सब कुछ ठीक कहते हुए भी निम्न उद्धृत वाक्य की क्या आवश्यकता थी। यह प्रोवोकेटिव ... होता है और प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। इससे बचना चाहिये।
‘‘...हिंदू साहित्य में ऋषियों के चरित्र आज वैसे शेष नहीं हैं जैसे कि वास्तव में वे पवित्र थे। कल्पना और अतिरंजना का पहलू भी उनमें पाया जाता है।‘‘
यह है जानबूझकर नादान बनने की एक्टिंग करना। जब आप खुद कह रहे हैं कि भागवत की रचना करने वाले ने चतुराई से काम लिया है और अनीश्वरवादी बुद्ध तक को विष्णु का अवतार घोषित कर दिया है तो आप खुद यह स्वीकार कर रहे हैं कि हिन्दू साहित्य में समय-समय पर मिलावटें होती रही हैं। वही बात मैं कह रहा हूं तो आप मानने के बजाय ऐतराज़ क्यों कर रहे हैं ?
देखिए आपने खुद क्या लिखा है कि हिन्दू साहित्य में परिवर्तन हुआ है .
हिन्दू साहित्य ऋषियों को पवित्र मानने में मेरी कोई सहायता नहीं करता क्योंकि उनमें कल्पना और अतिरंजना का पहलू मुझे भी मिला है और मुझसे पहले के हिन्दू स्कॉलर्स को भी। उन्हें पवित्र मानने का आदेश मुझे हदीसों में मिलता है।
अब बताईये कि आपको मेरी किस बात पर ऐतराज़ है ?
मेरे द्वारा ऋषियों को हदीस के मुताबिक़ पवित्र घोषित करने में ?
या हिन्दू साहित्य में परिवर्तन हुआ बताने में, जो कि आप खुद भी मानते हैं ?

Wednesday, January 26, 2011

ऋषियों को नाहक़ इल्ज़ाम न दो Do you know the truth about great rishies ? part first

ऋषियों का अहसान मानव जाति पर
ईश्वर सर्वव्यापी है और उसका नाम भी। दुनिया की हरेक ज़बान में ऐसे शब्द हैं जिनसे इस दुनिया के बनाने वाले और पालने वाले के गुणों को बोध होता है। ऐसे ही दुनिया की तमाम क़ौमों में ऐसे शब्द भी पाए जाते हैं जिनसे ऐसे ज्ञानी पुरूषों का बोध होता है जिन्होंने ईश्वरीय वाणी को अपने अंतःकरण में धारण में धारण किया, उसके अनुसार आचरण किया और लोगों को अपने आदर्श का अनुसरण की प्रेरणा दी। ऐसे सत्पुरूष की संख्या दस-बीस नहीं है बल्कि हज़ारों में है। एक हदीस के मुताबिक़ इनकी कुल संख्या लगभग एक लाख चैबीस हज़ार है। अगर दुनिया में आज माता-पिता, भाई-बहन का रिश्ता पवित्र माना जाता है तो यह इन्हीं सत्पुरूषों की पवित्र शिक्षा का नतीजा है वर्ना दुनिया के सारे वैज्ञानिक और दार्शनिक मिलकर भी रिश्तों की पवित्रता क़ायम नहीं कर सकते और न ही इसके लिए कोई वैज्ञानिक कारण बता सकते हैं।
पवित्रता विज्ञान की समझ से परे का विषय है। रिश्तों की पवित्रता ही एक इंसान को जानवर से अलग करती है। जानवर के लेवल से ऊपर उठाने वाले, मानव जाति को उसकी पवित्रता और उसकी असल मंज़िल का ज्ञान कराने वाले यही सत्पुरूष थे जो इस धरती के हरेक हिस्से में अलग-अलग दौर में आए। उनकी भाषाएं तो बेशक जुदा थीं लेकिन उन सबका संदेश एक ही था, उन सबका आचरण पवित्र था। सभी ने अपने फ़र्ज़ को अदा करने के लिए, हमें इंसान बनाने के लिए भीषण अत्याचार सहे, अपना अपमान सहा और अपनी जानें भी दीं। उन्होंने तो हमें सब कुछ दिया लेकिन हमने उन्हें क्या दिया ?
हमने उन्हें बदनामी दी, हमने उनके नामों का मज़ाक़ उड़ाया, हमने उनकी शिक्षा को भुलाया, उनके आदर्श इतिहास को भुलाया और अपने मन की बेहूदा कल्पनाओं को उनकी कथा कहकर समाज में फैलाया। उनकी कुर्बानियों का उन्हें हमने यह सिला दिया।
क्या अच्छा सिला दिया हमने अपने साथ भलाई करने वालों को ?
इन सत्पुरूषों को अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग उपाधियों से पुकारा जाता है। अरबी-हिब्रू में इन्हें नबी और रसूल कहा जाता है, फ़ारसी में इन्हें पैग़म्बर कहा जाता है और संस्कृत में इन्हें ‘ऋषि‘ कहा गया है।

ऋषि का अर्थ क्या है ?
‘साक्षात्कृंतधर्माण ऋषयो बभूवुः‘। (नि. 1 , 20)
अर्थ- धर्म को साक्षात करने वाले मनुष्य ऋषि कहलाते हैं।
जो धर्म को साक्षात करने वाले मनुष्य हैं, वे कभी अधर्म नहीं कर सकते यह स्वयंसिद्ध है। इसके बावजूद हिन्दू साहित्य में ऋषियों के बारे में ऐसी कहानियां मिलती हैं जो कि अधर्म के सिवा कुछ भी नहीं हैं। रामायण में भी ऐसी कहानियों की भरमार है। संकेत मात्र के लिए एक श्लोक का अनुवाद पेश है-
‘अयोध्या कांड (सर्ग 91, 52) में लिखा है कि भरत के साथ आए अयोध्यावासियों का सत्कार करते हुए ऋषि भरद्वाज ने शराबियों के लिए शराब और मांस खाने वालों के लिए अच्छे अच्छे मांस जुटाए।‘

(क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्दू धर्म ?, पृष्ठ 63)
क्या यह कहानी एक ऋषि के आचरण से मेल खाती है ?
इन कहानी लिखने वालों ने सिर्फ़ इतना ही नहीं किया कि ऋषियों के बारे में झूठी कहानियां लिखकर लोगों को उनसे नफ़रत दिलाई बल्कि उनके आचरण को इतना कलंकित दिखाया कि लोग उन्हें आदर्श मानना तो दूर उनके नाम से भी नफ़रत करने लगें। ऋषि भरद्वाज के साथ भी ही जुल्म किया गया। उनके पैदा होने के पीछे एक ऐसी गंदी कहानी जोड़ दी गई जो कि कभी सच नहीं हो सकती। देखिए-
श्रीमद्भागवतपुराण में आता है कि अपने बड़े भाई उतथ्य की गर्भवती पत्नी ममता के साथ बृहस्पति ने बलात्कारपूर्वक संभोग किया और उसके वीर्य से भरद्वाज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ.
अंतर्वत्न्यां भ्रातृपत्न्यां मैथुनायां मैथुनाय बृहस्पतिः,
प्रवृत्ते वारितो गर्भ शप्त्वा वीर्यमवासृजत .
तं त्यक्तुकामां ममतां भर्तृत्यागविशंकिताम्,
नामनिर्वचनं तस्य श्लोकमेकं सुरा जगुः .
मूढ़े भर द्वाजमिमं भर द्वाजं बृहस्पतेः
यातौ तदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् .
चोद्यामाना सुरैरेवं मत्वा वितथमात्मजम्, व्यसृजत् .
-श्रीमद्भागवतपुराण, 9,20,36-39
अर्थात, बृहस्पति गर्भवती भावज से संभोग में प्रवृत्त हुआ. उसे रोका. वह गर्भ को शाप दे कर संभोगरत हुआ और उसका वीर्य स्खलित हुआ. उस वीर्य को भावज फेंकना चाहती थी ताकि उस का पति उससे नाराज हो कर उसे त्याग न दे. तब देवताओं ने कहा- हे मूर्ख औरत, इस द्वाज (वीर्य) को भर (धारण किए रह). उसने उसे धारण किया और जिस पुत्र को उसने जन्म दिया वह ‘भरद्वाज‘ कहलाया.

दोने से द्रोणाचार्य
यही भरद्वाज एक बार गंगास्नान करने गया. वहां उसने स्नान कर के कपड़े बदल रही घृताची नामक अप्सरा को देखा. उसके शरीर के एक भाग से उसका कपड़ा सरक गया. उसे देख भरद्वाज का वीर्य स्खलित हो गया. उससे एक बालक उत्पन्न हुआ, जो द्रोण से उपजने के कारण ‘द्रोण‘ कहलाया.
गंगाद्वारं प्रति महान् बभूव भगवानृषिः ,
भरद्वाज इति ख्यातः .
ददर्शाप्सरसं साक्षाद् घृताचीमाप्लुतामृषिः ,
रूपयौवनसम्पन्नां मद्दृप्त्तां मदालसाम् .
तस्या पुनर्नदीतीरे वसनं पर्यवर्तत ,
व्यपकृष्टांबरां दृष्ट्वां तामृषिश्चकमे ततः .
तत्र संसक्तमनसो भरद्वाजस्य धीमतः ,
ततोऽस्य रेतश्चस्कंद तदृषिद्र्रोण आदधे .
ततः समभवद् द्रोणः कलशे तस्य धीमतः .
-महाभारत आदिपर्व, 129,33-38
(क्या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्दू धर्म ?, पृष्ठ 327, 328)
एक मुसलमान का विश्वास आजकल इस मुल्क में ज़रा कम किया जाता है, इसलिए ये दोनों उद्धरण एक ख्याति प्राप्त ब्राह्मण विद्वान श्री सुरेन्द्र कुमार शर्मा ‘अज्ञात‘ जी की पुस्तक से लिए गए हैं। यह पुस्तक ‘विश्वबुक्स, दिल्ली‘ द्वारा प्रकाशित है.
http://www.vishvbook.com/
आपकी आत्मा क्या कहती है ?

क्या यह कहानी सच हो सकती है ?
नहीं न ?
मैं भी ऐसी बातों को सच नहीं मानता। दरअस्ल ये कहानियां धर्म की गद्दी पर विराजमान हिन्दू कवियों ने अपने मन से खुद ही लिख ली हैं ताकि वे किसी की भी औरत और दौलत से मनमानी कर सकें और जब कोई टोके तो ऋषियों की कहानी सुनाकर उन्हें संतुष्ट कर सकें कि वे पाप नहीं कर रहे हैं बल्कि उनका कल्याण कर रहे हैं।
आज अनवर जमाल भरद्वाज ऋषि के बारे में गालियों से भी गंदी कहानी को धो-मांझ रहा है जो खुद को उनकी औलाद बताते हैं वे भारद्वाज गोत्र वाले मज़े से कोट पैंट पहनकर भागवत की कथाएं सुन रहे हैं। जहां उनके बाप पर गंदे आरोप लगाए जाते हैं, वहां वे मज़े से जाते हैं और जो इस्लाम उनके बाप भरद्वाज को ही नहीं बल्कि हरेक ऋषि को पवित्र घोषित करता है, उससे उन्हें घिन आती है। जो सत्य को अपने अहंकार के कारण तुच्छ जानकर उसका तिरस्कार करता है, वह जहां भी जाएगा, ज़िल्लत ही पाएगा। यही उनका दंड है, चाहे उन्हें उसका पता चले या न चले।
आज हिन्दू साहित्य में हरेक ऋषि के चरित्र को भरद्वाज जी की तरह ही दूषित दिखाया जाता है और उनके वंशज मज़े से उस साहित्य का प्रचार कर रहे हैं।
है न ताज्जुब की बात ?

भारत का उद्धार होगा ऋषियों के अनुकरण से
जब धर्म को भुला दिया जाए और उसे धंधा बना लिया जाए तब इंसान की ग़ैरत ऐसे ही मर जाती है।
ऋषियों के सच्चे चरित्र का लोप होने के कारण ही आज भारत दुर्दशा का शिकार है और जब तक ऋषियों का सच्चा चरित्र लोगों के सामने नहीं आएगा और लोग उनका अनुकरण नहीं करेंगे तब तक भारत का उद्धार हरगिज़ हरगिज़ होने वाला नहीं है। यह मेरा दृढ़ मत है।
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यह संवाद डा. श्याम गुप्ता जी के लिए क्रिएट किया गया है। उन्होंने मुझसे पूछा था कि -

‘...सब कुछ ठीक कहते हुए भी निम्न उद्धृत वाक्य की क्या आवश्यकता थी। यह प्रोवोकेटिव ... होता है और प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। इससे बचना चाहिये।
‘‘...हिंदू साहित्य में ऋषियों के चरित्र आज वैसे शेष नहीं हैं जैसे कि वास्तव में वे पवित्र थे। कल्पना और अतिरंजना का पहलू भी उनमें पाया जाता है।‘‘

http://forum.thiazi.net/showthread.php?p=1703163

Saturday, January 22, 2011

The absolute peace 'शांति के लिए वेद कुरआन' पर धारावाहिक बनकर कैसा लगेगा ?

श्रीपाल चौधरी नासिर खान के गेट अप men

वरूण चैधरी 
वरूण चैधरी मेरा भतीजा है क्योंकि वह श्रीपाल चैधरी का बेटा है। श्रीपाल चैधरी मेरे दोस्त हैं और मुझे भाई की तरह मानते हैं। डी. डी. कश्मीर के लिए बनाए जा रहे सीरियल ‘द कारपेट मेकर‘ के सैट पर वरूण चैधरी डायरेक्टर रंजन शाह को असिस्ट कर रहे थे। वरूण चैधरी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित इंस्टीच्यूट से एडिटिंग का कोर्स कर रहे हैं। उन्हें एक प्रोजैक्ट तैयार करना है अपने कोर्स के लिए। श्रीपाल चैधरी जी ने मुझ से कहा कि मैं अपने वेद-कुरआन की थीम को आधार बनाकर उनके लिए एक सिंगल लाइन स्टोरी तैयार कर दूं। उसे वे अपने इंस्टीच्यूट में जमा करा देंगे और उसका स्क्रीन प्ले वग़ैरह  अप्रूवल के बाद लिखा जाएगा।एक तरफ़ तो मैं शूटिंग में व्यस्त था और दूसरी तरफ़ ब्लागिंग में। दूसरी कई ज़िम्मेदारियां भी साथ में लगी हुई थीं। इसी दरम्यान मुझे तीन घंटे का वक्त मिल गया बिल्कुल आखि़री दिन। मैंने उसी एक सिटिंग में वरूण के लिए एक स्टोरी तैयार कर दी और उसकी सॉफ़्ट कॉपी के साथ उसकी हार्ड कॉपी भी उन्हें सौंप दी।
श्रीपाल चौधरी एक Don के गेट अप में
श्रीपाल जी (दाढ़ी में)  इस पर एक धारावाहिक भी बनाना चाहते हैं। इस स्टोरी पर धारावाहिक बनकर कैसा लगेगा ?
आप ज़रा इसे पढ़कर बताएं। इस प्रोजैक्ट का लिंक यह है-

Friday, January 21, 2011

आपकी-हमारी गाढ़ी कमाई पर डाका कौन डाल रहा है ? The organised crime against India

कौन देगा मेरे सिर्फ़ एक सवाल का जवाब ?
हरीश भाई ! आपकी ही तरह स्वामी श्री लक्ष्मीशंकराचार्य जी को भी उस साहित्य ने गुमराह कर दिया था जो कि इंसानियत के दुश्मन हमारे देश में लंबे अर्से से फैलाते आ रहे हैं। आप उनकी लिखी किताब ‘इस्लाम : आतंक ? या आदर्श‘ पढ़िये, इस्लाम और कुरआन के बारे में आप जो ग़लतफ़हमियां जबरन पाले बैठे हैं, सब दूर हो जाएंगी। गीता पूरी तरह से एक युद्ध का उपदेश है। उसके बारे में तो आपको कभी ऐतराज़ नहीं हुआ बल्कि आप तो उसे पढ़ने की सलाह भी देते हैं। मैंने आपकी बात पर कोई ऐतराज़ भी नहीं किया कि इसमें तो राज्य के लालच में अपने रिश्तेदारों और गुरूजनों को मारने की प्रेरणा उन भाईयों को दी जा रही है, जो सब के सब एक पत्नी के तो थे लेकिन एक बाप के न थे।
आपने एक और लेख लिख डाला और 15-20 सवाल और कर डाले। आपके हरेक सवाल का जवाब दिया जाएगा ताकि आपके दिल के हरेक कोने से तमाम ग़लतफ़हमियों के जाले निकल जाएं और आपका मन निर्मल हो जाए लेकिन उससे पहले आपको मेरे केवल एक सवाल का जवाब देना होगा जो कि मैंने आपसे पूछा है कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः‘ आपके किस ग्रंथ में है ?
अगर यह किसी हिंदू धर्म ग्रंथ में है ही नहीं तो फिर आप क्यों कह रहे हैं कि यह हमारे धर्म की मान्यता है ?
जो सिद्धांत किसी भी हिंदू धर्म ग्रंथ में नहीं है वह हिंदू धर्म की मान्यता हो कैसे गया ?
अनवर जमाल कभी हिन्दू धर्म का या हिन्दू भाईयों का विरोध नहीं करता बल्कि वह अफ़वाह फैलाने का विरोध करता है जैसे कि हिन्दू धर्म और इस्लाम के बारे में आप अफ़वाह फैला रहे हैं।
जिस सूचना या बात का कोई आधार और स्रोत ज्ञात न हो और वह बात भी बेबुनियाद हो, उसे अफ़वाह कहा जाता है।
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः‘ आपसे ठीक से लिखा तक नहीं गया है। यह आपका ज्ञान है। चलिए अब आप ब्लाग जगत के सारे विद्वानों को बुला लीजिए अपनी मदद के लिए और बाहरी दुनिया कि ज्ञानियों से भी जाकर पूछ आईये और मेरे सिर्फ़ एक सवाल का जवाब दीजिए।
इस संवाद से आपको पता चल जाएगा कि आपको दूसरों के ही बारे में नहीं बल्कि खुद अपने बारे में भी कितनी बड़ी ग़लतफ़हमियां हैं ?
धर्म में इसी तरह लोगों ने पहले भी हिंदू धर्म में अपनी तरफ़ से बातें मिलाई हैं और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर चला आ रहा है। इसी मिलावट के कारण के हिंदू धर्म का स्वरूप विकृत हो चुका है। जब उस स्वरूप विकृत हो गया तो आप जैसे लोगों ने अपना भेष-भाषा और संस्कार सभी कुछ बदल डाले यहां तक कि धर्म का नाम भी आपके पास शेष न बचा। धर्म के लिए हिंदू शब्द किसी भी हिंदू धर्म ग्रंथ में नहीं आया है। आपसे न तो इसकी परंपराएं सुरक्षित रखी गईं और न ही आप इसके संस्कारों का ही पालन आज कर रहे हैं। तब भी आप अपना अहंकार और हठ छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, ऐसा क्यों ?
आपका दावा है कि अधिकतर मुसलमान बुरे होते हैं जबकि हिन्दू अच्छे होते हैं।
मैं भी यही मानता हूं कि
मुसलमानों का चरम परम पतन हो चुका है
और
इस विषय में आप नीचे दिए गए दो लिंक्स पर जाकर मेरे विचार देख सकते हैं। मैं कभी पक्षपात नहीं करता। जो हालात मैं देखता हूं उसके आधार पर जो निष्कर्ष निकलता है, मैं वही कहता हूं। हरेक ब्लागर वही कहता है।
हिन्दू भाईयों के बारे में इतने अच्छे विचार रखने के बाद भी मुझे आप जैसे लोगों ने कभी थैंक्स नहीं कहा, ऐसा क्यों ?
अभी भाई खुशदीप जी ने अपनी पोस्ट में यह जानकारी दी है-

आपकी-हमारी गाढ़ी कमाई पर डाका (किस्त-1) 

चुनाव आयोग का कहना है कि देश में 1200 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैंण्ण्ण्इनमें से सिर्फ 16 फ़ीसदी ही यानि 200 पार्टियां ही राजनीतिक गतिविधियों में लगी हैंण्ण्ण्बाकी ज्यादातर पार्टियां राजनीतिक चंदे के नाम पर काली कमाई को धो कर व्हाईट करने में लगी हैं...

..अब आप बताईये कि ये 1200 राजनीतिक पार्टियां और इसके समर्थक मुसलमान हैं या हिंदू ?
देश की बर्बादी का सारा इल्ज़ाम आप मुसलमानों पर डाल रहे हैं तो आप इन्हें क्या कहेंगे और कब कहेंगे ?
इसकी मैं इंतज़ार नहीं करूंगा क्योंकि पहले मुझे उस सवाल का जवाब चाहिए जो मैंने आप से ऊपर पूछा है।
आपको मैं अब भी कोई इल्ज़ाम नहीं दूंगा और आपको भी मैं अच्छा आदमी ही मानता हूं। ग़लतफ़हमियां अच्छे-अच्छों को भ्रम में डाल देती हैं। मेरी कोशिश होगी कि आपकी ग़लतफ़हमियां दूर कर दी जाएं।
आपने सवाल करके मेरी ज़िम्मेदारी को और भी बढ़ा दिया है।

Thursday, January 20, 2011

क्या प्राकृत और संस्कृत से पहले से पंजाबी भाषा मौजूद थी ? Isn't Sanskrit the oldest one ?


बाबा फरीद अपने मुरीदों के दरमियान
पंजाबी भाषी लोगों में सिख मुश्किल से 25 फीसद ही होंगे, जबकि 75 फीसद जुबान बोलने वाले हिंदू और मुसलमान हैं। विश्व के 13 करोड़ लोग यह भाषा बोलते हैं। इसमें सिखों की संख्या ज्यादा से ज्यादा तीन करोड़ होगी। इसके साथ ही नई खोजों से यह भी साबित हुआ है कि पंजाबी बोलने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इनसे यह भी पता चला है कि आम धारणा के विपरीत पंजाबी संस्कृत भाषा की उपज नहीं, बल्कि पहले से ही विकसित थी। इसका द्रविण भाषा के साथ भी गहरा संबंध है। भाषा के बारे में नई खोजों से यह भी साफ हो गया है कि मातृ भाषा के जानकार लोग ही दूसरी भाषा में माहिर हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें व्याकरण की जानकारी होती है। ऐसी धारणा गलत साबित हो गई है कि मातृभाषा सीखने वाला बच्चा अंग्रेजी में कमजोर हो जाएगा।
भारतीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष डाक्टर सतिंदर सिंह नूर ने इस मौके पर अकादमी की ओर से 24 भाषाओं को मान्यता प्रदान की गई है। पंजाबी का इससे अहम स्थान है। यह भारतीय भाषाओं की रीढ़ है। विश्व के 160 देशों में पंजाबी भाषा बोली जाती है। यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में 13 करोड़ लोगों की भाषा पंजाबी है। सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा चीनी (150 करोड़), अंग्रेजी बोलने वाले 53 करोड़ हैं। तीसरे स्थान पर हिंदी बोलने वालों की संख्या 48 करोड़ है।
उन्होंने कहा कि पंजाबी हिंदुस्तान की सबसे पुरानी भाषाओं में शामिल है। विश्व की पांच प्रमुख सांस्कृतिक केद्रों में पंजाब शामिल रहा है। ताजा अनुसंधान से पता चला है कि प्राकृत और संस्कृत से पहले से पंजाबी भाषा मौजूद थी, हालांकि तब उसका नाम कुछ और हो सकता है। इसका पता इससे चलता है कि सबसे प्राचीन द्रविण भाषाओं से पंजाबी का गहरा संबंध है। तामिल में ही पंजाबी के एक हजार से ज्यादा शब्दों का पता चला है। हड़प्पा-मोहेनजोदड़ो सभ्यता के नष्ट होने से पहले ही पंजाबी भाषा मौजूद थी। सभ्यता नष्ट होने पर यहां के लोग विस्थापित होकर पूर्वी प्रदेश में फैले। संथाल भी पुराने पंजाबी हैं। उनका लोकगीत पंजाबी से भरा हुआ है। यहां से लोग तक्षशिला, श्रीनगर, नालंदा विश्वविद्यालय के रास्ते येरूशलम तक गए। इसलिए चीन, कंबोडिया तक सभी भाषाओं में पंजाबी शामिल है। इस बारे में अध्य्यन जारी है। मुल्तान से दूसरा रास्ता हड़प्पा-मोहेनजोदड़ों से होकर दिल्ली, अजमेर, गुजरात, आंध्र प्रदेश , चेन्नई तक गया, इसलिए पंजाबी दक्षिण भारतीय भाषाओं की भी रीढ़ बनी। ऋगवेद, गीता, बाल्मिकी रामायण, ज्यादातर उपनिषद की रचना का केंद्र भी पंजाब ही रहा है। पंजाबी बोलने वालों में नानक पंथी, उदासी साधु, सन्यासी, सिकलीगर (बंजारे) शामिल हैं। खासकर महाराष्ट्र में ही तीन करोड़ सिकलीगर हैं।
उन्होंने कहा कि पंजाबी पंजाबियों की पहली भाषा है और अंग्रेजी उनकी दूसरी भाषा है। हिंदी संवाद की भाषा है। 1950 में पंजाबी में तीन लाख शब्द थे, जबकि अब बढ़कर 13 लाख हो गए हैं। दूसरी ओर अंग्रेजी में महज 16 लाख शब्द हैं।
   इस मौके पर पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला के उपकुलपति डाक्टर जसपाल सिंह ने कहा कि पाकिस्तान के ज्यादातर हिस्सों में पंजाबी भाषा बोली जाती है। ब्रिटेन के कई इलाकों में पंजाबी को दूसरी भाषा का दर्जा मिला है। कनाडा, सिंगापुर समेत 160 देशों में पंजाबी बोली जाती है। इसलिए पंजाबी भाषा का निरंतर विकास जारी है। भले ही भाषा पर कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं, लेकिन इसके खत्म होने की कोई आशंका नहीं है, क्योंकि सदियों तक कायम श्री गुरू ग्रंथ साहिब की रचना भी इसी लिपि में हुई है।

इस बारे में पूरी पोस्ट पढने के लिए क्लिक करें-
http://hamaravatan.blogspot.com/2011/01/blog-post_19.html


गुरु नानक साहब का कलाम उर्दू में -
http://urdubooks.biz/urdubooks/index.php?cPath=25&osCsid=8144970f7d67bbaf269ff4516f568fe7

Wednesday, January 19, 2011

गुस्से की ऊर्जा से काम लेना सीखिए ? The energy of anger

गुस्सा मेरे वालिद साहब की एक नुमायां पहचान है। उनका गुस्सा बचपन से ही मुझे डराता आया है। मैंने तय किया था कि मैं कभी गुस्सा नहीं करूंगा क्योंकि गुस्से से होने वाले नुक्सान को मैं जानता हूं। मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि खुद अपनी तरफ़ से किसी को कोई दुख न दिया जाए, किसी की आलोचना न की जाए, किसी को कोई चुभती हुई बात न कही जाए ताकि सुनने वाले को बुरा न लगे और उसे गुस्सा न आए और पलटकर वह भी मुझे ऐसी कोई बात न कहे कि मुझे भी उसकी बात पर गुस्सा आ जाए। यही वजह है कि मेरे आसपास के लोग बहुत से ऐसे काम करते हैं जिन्हें मैं सही नहीं समझता लेकिन तब भी मैं उन्हें नज़रअंदाज़ कर देता हूं। समाज में सबके साथ रहना है तो दूसरों की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ भी करना पड़ता है और कभी कभी उन्हें ढकना भी पड़ता है। हरेक परिवार अपने सभी सदस्यों को इसी रीति से जोड़ता है। क़स्बे और कॉलोनी के लोग भी इसी उसूल के तहत एक दूसरे से जुड़े रह पाते हैं। ब्लाग जगत भी एक परिवार है और यहां भी इसी उसूल को अपनाया जाना चाहिए।
इस कोशिश के बावजूद कभी कभी मुझे गुस्सा आ जाता है और तब मैं यह सोचता हूं कि आखि़र मुझे गुस्सा आया क्यों ?
हमारे ऋषियों ने जिन पांच महाविकारों को इंसान के लिए सबसे ज़्यादा घातक माना है उनमें से क्रोध भी एक है। हज़रत मुहम्मद साहब स. ने भी उस शख्स को पहलवान बताया है जो कि गुस्से पर क़ाबू पा ले।
इसके बावजूद हम देखते हैं कि कुछ हालात में ऋषियों को भी क्रोध आया है, खुद अंतिम ऋषि हज़रत मुहम्मद साहब स. को भी क्रोधित होते हुए देखा गया है।
हिंदू साहित्य में ऋषियों के चरित्र आज में वैसे शेष नहीं हैं जैसे कि वास्तव में वे पवित्र थे। कल्पना और अतिरंजना का पहलू भी उनमें पाया जाता है लेकिन हदीसों में जहां पैग़म्बर साहब स. के क्रोधित होने का ज़िक्र आया है तो वे तमाम ऐसी घटनाएं हैं जबकि किसी कमज़ोर पर ज़ुल्म किया गया और उसका हक़ अदा करने के बारे में मालिक के हुक्म को भुला दिया गया। उन्होंने अपने लिए कभी क्रोध नहीं किया, खुद पर जुल्म करने वाले दुश्मनों को हमेशा माफ़ किया। अपनी प्यारी बेटी की मौत के ज़िम्मेदारों को भी माफ़ कर दिया। अपने प्यारे चाचा हमज़ा के क़ातिल ‘वहशी‘ को भी माफ़ कर दिया और उनका कलेजा चबाने वाली ‘हिन्दा‘ को भी माफ़ कर और मक्का के उन सभी सरदारों को भी माफ़ कर दिया जिन्होंने उन्हें लगभग ढाई साल के लिए पूरे क़बीले के साथ ‘इब्ने अबी तालिब की घाटी‘ में क़ैद कर दिया था और मक्का के सभी व्यापारियों को उन्हें कपड़ा, भोजन और दवा बेचने पर भी पाबंदी लगा दी थी। ऐसे तमाम जुल्म सहकर भी उन्होंने उनके लिए अपने रब से दुआ की और उन्हें माफ़ कर दिया। इसका मक़सद साफ़ है कि अस्ल उद्देश्य अपना और अपने आस-पास के लोगों का सुधार है। अगर यह मक़सद माफ़ी से हासिल हो तो उन्हें माफ़ किया जाए और अगर उनके जुर्म के प्रति अपना गुस्सा ज़ाहिर करके सुधार की उम्मीद हो तो फिर गुस्सा किया जाए।
जो भी किया जाए उसका अंजाम देख लिया जाए, अपनी नीयत देख ली जाए, संभावित परिस्थितियों का आकलन और पूर्वानुमान कर लिया जाए।
वे आदर्श हैं। उनका अमल एक मिसाल है। उनके अमल को सामने रखकर हम अपने अमल को जांच-परख सकते हैं, उसे सुधार सकते हैं।
मुझे गुस्सा कम आता है लेकिन आता है।
आखि़र आदमी को गुस्सा आता क्यों है ?
हार्वर्ड डिसीज़न लैबोरेट्री की जेनिफ़र लर्नर और उनकी टीम ने गुस्से पर रिसर्च की है। उसके मुताबिक़ हमारे भीतर का गुस्सा कहीं हमें भरोसा दिलाता है कि हम अपने हालात बदल सकते हैं। अपने आने वाले कल को तय सकते हैं। जेनिफ़र का यक़ीन है कि अगर हम अपने गुस्से को सही रास्ता दिखा दें तो ज़िंदगी बदल सकते हैं।
हम अपने गुस्से को लेकर परेशान रहते हैं। अक्सर सोचते हैं कि काश हमें गुस्सा नहीं आता। लेकिन गुस्सा है कि क़ाबू में ही नहीं रहता। गुस्सा आना कोई अनहोनी नहीं है। हमें गुस्सा आता ही तब है, जब ज़िंदगी हमारे मुताबिक़ नहीं चल रही होती। कहीं कोई अधूरापन है, जो हमें भीतर से गुस्सैल बनाता है। दरअस्ल, इसी अधूरेपन को ठीक से समझने की ज़रूरत होती है। अगर हम इसे क़ायदे से समझ लें, तो बात बन जाती है।
जब हमें अधूरेपन का एहसास होता है, तो हम उसे भरने की कोशिश करते हैं। और यही भरने की कोशिश हमें कहीं से कहीं ले जाती है। हम पूरे होकर कहीं नहीं पहुंचते। हम अधूरे होते हैं, तभी कहीं पहुंचने की कसमसाहट होती है। यही कसमसाहट हमें भीतर से गुस्से में भर देती है। उस गुस्से में हम कुछ कर गुज़रने को तैयार हो जाते हैं। हम जमकर अपने पर काम करते हैं। उसे होमवर्क भी कह सकते हैं और धीरे धीरे हम अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते चले जाते हैं।
असल में यह गुस्सा एक टॉनिक का काम करता है। हमें भीतर से कुछ करने को झकझोरता है। अगर हमारा गुस्सा हमें कुछ करने को मजबूर करता है, तो वह तो अच्छा है न।
                   (हिन्दुस्तान, 6 जनवरी 2011, पृष्ठ 10)
मैंने बहन रेखा श्रीवास्तव जी की एक पोस्ट देखी, जिसमें वे गुस्सा कर रही थीं।
उसे पढ़कर मुझे भी उस आदमी पर गुस्सा आ गया था जिस पर कि उन्हें गुस्सा आया था और तब मैंने उनसे कहा था कि मैं गुस्से पर कुछ लिखूंगा।
इससे पहले मैं बहन अंजना जी से भी कह चुका था कि गुस्से पर आपका आर्टिकल तो मैंने पढ़ लिया लेकिन इसके एक दूसरे पर मैं लिखूंगा। क्या मैं उस लेख की भूमिका में ईमेल से मिली आपके पत्र को इस्तेमाल कर सकता हूं। उन्होंने बखुशी इजाज़त दे दी।
दरअस्ल उन्होंने कहा था कि आप अच्छा लिखते हैं। मुझे आपके लेख पसंद आते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे आप बहुत तफ़्तीश के बाद ही कोई लेख लिखते हैं।
इसके बाद मैंने उनसे दरयाफ़्त किया था कि आपको मेरा कौन सा लेख सबसे ज़्यादा पसंद है और कौन सा लेख नापसंद है ताकि मैं अपने आप को सुधार सकूं ?
तब उन्होंने लिखा कि

आदरणीय अनवर भाई,
उर्दू पापा और दादी से सीखी, यानी की बचपन से बोलती हूँ. सिर्फ बोल पाती हूँ, लिखना सीखने की कोशिश कर रही हूँ. दिल्ली में स्कूल में उर्दू अब नहीं सिखाते, इस वजह से सीख नहीं पाई. दिल की बात उर्दू में कहना आसान लगता है, बड़ी मीठी ज़बान है. 

रही बात, आपके लिखाई के बारे में. आपके हर लेख में आपकी जानकारी, आपका इल्म साफ़ नज़र आता है. पता चलता है की यूँ ही नहीं लिख रहें बल्कि आप जो भी लिखते हैं काफी तफ्तीश के बाद लिखते हैं. यह बात मुझे अच्छी लगती है. दूसरी बात जो मुझे अच्छी लगती है वो ये है आप अक्सर लोंगों को और मजहबों को मिलाने की कोशिश करते हैं. आपका मिर्ज़ा ग़ालिब पे लिखा लेख मुझे बहोत अच्छा लगा. 

 आपके ब्लॉग पे मुझे गुस्सा अच्छा नहीं लगता, चाहे वो आपका हो या किसी और का. गुस्से से डर लगता है मुझे, ऐसा लगता है की गुस्सा अमन का दुश्मन है. गुस्से पे कुछ लिखा था कुछ दिन पहले, शायद आपको पसंद आये. गुस्सा तो हम सबको आता है, पर गुस्से से जब रिश्ते बिगड़ने लगते हैं तो लगता है की गुस्सा हम पर ग़ालिब हो रहा है. 

प्यारी माँ पर टिपण्णी नहीं दिखाई दी. फिलहाल वहीँ लिखने के लिये कुछ सोच रही हूँ. 
अगर मैंने कुछ गलत लिख दिया हो तो माफ़ कर दीजियेगा. 
आपकी बहन,
अंजना 
Anjana Dayal de Prewitt, MS
Humanitarian Psychologist
Functional Expert - Psychosocial Support
Phones: Home- 001-787-738-6632
Email: anjdayal@gmail.com
Blogs: http://anjana-prewitt.blogspot.com/
          http://losojosindios.blogspot.com/
          http://vrinittogether.blogspot.com/
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@ बहन अंजना जी ! इस प्यारे ब्लाग पर आपकी पहली रचना का हार्दिक स्वागत
है । आपकी रचना दिल से निकली है इसीलिए पढ़ने वाले के दिल पर असर करती है
। आपने इसमें रिश्तों की हक़ीक़त को ही नहीं बल्कि मौजूदा समाज की स्वार्थी
सोच को भी सामने ला खड़ा किया है।
हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने एक शख़्स से कहा था कि तेरी जन्नत तेरी मां के
क़दमों तले है ।
इसमें मां के प्रति विनय और सेवा दोनों का उपदेश है । मां भी अपनी औलाद
को हमेशा नेकी का रास्ता बताती है ।
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया है कि जब तक तुम बच्चों की मानिंद न हो
जाओ स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते ।
बच्चे मासूम होते हैं , ख़ुद को अपनी मां पर निर्भर मानते हैं । उसका कहना
मानते हैं लेकिन आज माँ बाप औलाद को बेईमानी के रास्ते पर खुद धकेल रहे
हैं।
वे अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा दौलतमंद देखना चाहते हैं । जिसके लिए
वे खुद भी बेईमानी करते हैं और उनके बच्चे भी उनसे यही सीखते हैं और अपनी
मासूमियत खो बैठते हैं जो कि बच्चे की विशेषता थी । मां ने भी सही
गाइडेंस देने का अपना गुण खो दिया और बच्चे की मासूमियत भी नष्ट कर दी और
तब इस धरती पर नर्क उतर आया हर ओर ।...
पूरी टिप्पणी आप ब्लाग पर पढ़ लीजिएगा ।
मैं सिर्फ़ 7 दिन में उर्दू लिखना पढ़ना और बोलना सिखा देता हूं हिंदी
जानने वाले को । इसके लिए मैंने एक ख़ास मैथड डिज़ायन किया है । आप भी
जल्दी ही सीख जाएंगी । अगर आपके पास उर्दू के ट्यूटर का इंतज़ाम न हो तो
मैं अपने किसी सत्यसेवी मित्र से बात करके देख सकता हूं , यदि आप चाहें
तो ?
ग़ुस्से से मुझे भी डर लगता है लेकिन यह फिर भी आता है । आपको भी आता होगा
। ग़ुस्सा आता क्यों है ?
और इसके क्या लाभ हैं जल्द ही मैं इस विषय में एक लेख लिखूंगा आपके लिए।
अगर आप इजाज़त दें तो मैं इस लेख की भूमिका में प्रेरक बने आपके इस पत्र
को भी रखना चाहता हूं ताकि लोगों को आपके विचार और आपके लेख का लिंक भी
उपलब्ध कराया जा सके।
आप मनोविज्ञान से संबंधित काउंसिलिंग भी इस ब्लाग पर दिया करें।
जैसे कि माँ अक्सर अपने बच्चों की ज़िद से परेशान रहती है । आप इसका हल बताएं ।
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बहरहाल मैंने कोशिश की है कि गुस्से के रचनात्मक पहलू को भी सामने लाया जाए ताकि हम अपने हालात को बदलने के लिए गुस्से की ऊर्जा से काम ले सकें और उसके नकारात्मक असर से खुद को बचा सकें। कुछ और भी बातें इस संबंध में हैं जिन्हें आगे फिर कभी कहा जाएगा।

Note : 
1- कैसे कैसे समर्थक ?- रेखा श्रीवास्तव जी
http://kriwija.blogspot.com/2011/01/blog-post_12.html?showComment=1294890581788#c1635763654543560095
2- Free Anger Management 83
http://hubpages.com/hub/Free-Anger-Management