Saturday, June 18, 2011

क्या नास्तिक बंधु इस नई साइंसी खोज को स्वीकार करेंगे ? - Dr. Anwer Jamal


नास्तिक भाई एक ओर तो यह दावा करते हैं कि वे प्रकृति को मानते हैं और यह भी कि वे विज्ञान को मानते हैं लेकिन हक़ीक़त यह है कि उनके मन में नास्तिकता के जो विचार जड़ जमा चुके हैं उनके सामने वे न तो विज्ञान को मानते हैं और न ही प्राकृतिक नियमों को। 
पिछले दिनों आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी ने हमारी एक पोस्ट पर टिप्पणी की और अपने नास्तिक मत का तज़्करा करते हुए हमसे सवाल किया था। जिसका हमने उचित जवाब दे दिया था। जिसे आप यहां देख सकते हैं

सवाल हल हो चुकने के बावजूद आज उन्होंने फिर वही सवाल दोहरा दिया। अंतर केवल इतना है कि पहले सवाल उन्होंने अपने शब्दों में किया था और इस बार उन्होंने भगत सिंह को उद्धृत किया है
http://islam.amankapaigham.com/2011/06/blog-post_17.html?showComment=1308385296345#c5253925682720558514

भगत सिंह के दिमाग़ में अगर नास्तिकता भरे  सवाल उठे तो उसके पीछे एक बड़ी वजह तो यह रही कि उस समय तक लोगों का ख़याल था कि ईश्वर, आत्मा और धर्म में विश्वास माहौल की देन है लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक रिसर्च के बाद यह हक़ीक़त सामने आई है कि यह इंसान की प्रकृति का अभिन्न अंग है। जो चीज़ इंसान की प्रकृति का अभिन्न अंग है, नास्तिक लोग उससे पलायन कैसे कर सकते हैं और करना ही क्यों चाहते हैं ?
फिर प्रकृति को मानने के दावे का क्या होगा ?
ईश्वर और धर्म के नाम पर पुरोहित वर्ग ने कमज़ोर वर्गों का शोषण किया, इसलिए लोगों को ईश्वर और धर्म से विरक्ति हो गई। अगर इस बात को सही मान लिया जाए तो फिर ईश्वर और आत्मा को न मानने वाले दार्शनिकों के विहारों में भी जमकर अनाचार हुआ और नास्तिक राजाओं ने भी जमकर अत्याचार किया। इससे ज़ाहिर है कि नास्तिकता लोगों के दुखों का हल नहीं है बल्कि यह उनके दुखों को और भी ज़्यादा बढ़ा देती है। अगर ऐसा नहीं है तो किसी एक नास्तिक शासक के राज्य का उदाहरण दीजिए, जहां लोगों की बुनियादी ज़रूरतें किसी धर्म आधारित राज्य से ज़्यादा बेहतर तरीक़े से पूरी हो रही हों ?

हक़ और बातिल की इसी पोस्ट पर प्रिय प्रवीण जी भी अपने हलशुदा सवालों को दोहरा रहे हैं। उन्हें लगता है कि ईश्वर की प्रशंसा करना उसकी ईगो को सहलाने जैसा है। वह कहते हैं :
धर्म अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह देता है कि 'फैसले' के खौफ से ज्यादातर इन्सान नियंत्रण में रहते हैं क्योंकि वो नर्क की आग से डरते हैं और स्वर्ग के सुख भोगना चाहते हैं... इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि अधिकाँश Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी अपने मूल स्वभाव को छुपाकर, अपनी अंदरूनी नीचता को काबू कर, नियत तरीके से 'उस' का नियमित Ego Massage करके स्वर्ग में प्रवेश पाने में कामयाब रहेंगे...
और एक बार स्वर्ग पहुंच कर मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) अपने असली रूप में आ जायेगी... क्योंकि इनकी Free Will (स्वतंत्र इच्छा) पर 'उस' का कोई जोर तो चलता नहीं!
हक़ीक़त यह है कि स्वर्ग-नर्क का कॉन्सेप्ट ख़ुद हिंदू संप्रदायों में भिन्न-भिन्न मिलता है। यह नज़रिया यहूदी मत, ईसाई मत और इस्लाम धर्म में भी एक समान नहीं पाया जाता। इसलिए प्रिय प्रवीण जी के सवाल से यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने स्वर्ग-नर्क के विषय में किस मत या किस धर्म की धारणा को बुनियाद बनाकर सवाल किया है ?
प्रत्येक कर्म का एक परिणाम अनिवार्य है। नेक काम का अंजाम अच्छा हो और बुरे काम का परिणाम कष्ट हो, ऐसा मानव की प्रकृति चाहती है। अगर दुनिया में सामूहिक चेतना परिष्कृत हो जाय तो दुनिया में ऐसा ही होगा लेकिन दुनिया में ऐसा नहीं होता। इसलिए दुनिया के बाद ही सही लेकिन इंसान की प्रकृति की मांग पूरी होनी ही चाहिए। 
दुनिया में न्याय होता नहीं है। यह एक सत्य बात है। अब अगर लोगों को यह आशा है कि मरने के बाद उन्हें न्याय मिल जाएगा तो नास्तिक बंधु लोगों को न्याय से पूरी तरह निराश क्यों कर देना चाहते हैं ?
ऐसा करके वे समाज को कौन सी सकारात्मक दिशा देना चाहते हैं ?
क्या नास्तिक बंधु इस नई साइंसी खोज को स्वीकार करेंगे ?

Friday, June 17, 2011

इंसान की मौत ही बताती है कि इस दुनिया में एक व्यवस्था काम कर रही है - Dr. Anwer Jamal

आज ज़ाकिर अली ‘रजनीश‘ के ब्लॉग पर एक पोस्ट देखी जिसमें वह नास्तिकों के किसी ब्लॉग ‘संवाद घर‘ की तारीफ़ कर रहे थे। संवाद घर के मालिक हैं संजय ग्रोवर। वह कहते हैं कि नास्तिकों के साथ ईश्वर में आस्था रखने वाले भी मर जाते हैं। इससे पता चलता है कि ईश्वर है ही नहीं।
बड़ी अजीब बात है कि जो चीज़ इंसान को ईश्वर की पहचान कराती है उसे ही ईश्वर के इन्कार का सामान बना लिया।
इंसान की मौत ही बताती है कि इस दुनिया में एक व्यवस्था काम कर रही है। मौत हरेक इंसान को आती है। इसी तरह इंसान की पैदाइश एक व्यवस्था का पता देती है। उसी व्यवस्था को जानने के बाद आज वैज्ञानिक कृत्रिम प्रजनन आदि में सफल हो पाए हैं। यह भी एक सर्वविदित तथ्य है कि व्यवस्था ख़ुद से कभी नहीं होती बल्कि उसे स्थापित करने वाला और उसे बनाए रखने वाला कोई होता ज़रूर है। प्रकृति की व्यवस्था को देखकर हम आसानी से जान सकते हैं कि यह सुव्यवस्थित सृष्टि किसी सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हस्ती का काम है, इसी को ईश्वर, अल्लाह और गॉड कहते हैं। जो इसे मानता है और उसके विधान का पालन करता है उसे आस्तिक कहते हैं और जो इस सत्य का इन्कार करता है उसे नास्तिक कहते हैं। सत्य का इन्कार करने वाला कभी अपनी असल मंज़िल को पा नहीं सकता। 
यह बात सभी नास्तिकों को जान लेनी चाहिए। 

Wednesday, June 15, 2011

हमारी वाणी के दो मालिकों से चार बातें


किसी भी संस्था को चलाने के लिए ज़रूरी है कि उसके मालिक उसके प्रति ज़िम्मेदारी महसूस करते हों और जो कुछ ज़रूरतें हों उन्हें वे समय रहते पूरी भी करते हों। इसी के साथ संस्था की कामयाबी इस बात पर भी निर्भर करती है कि संस्था के कर्मचारी संस्था के प्रति कितने ईमानदार हैं ?, वे उसके प्रति कितने वफ़ादार हैं ?
कर्मचारियों की वफ़ादारी का पता उनके इस अमल से चलेगा कि वे संस्था के राज़ को कितना राज़ रख पाते हैं ?
हमारी वाणी भी एक संस्था है और उसकी कामयाबी भी मालिकों की ज़िम्मेदारी और कर्मचारियों की वफ़ादारी पर ही टिकी हुई है।
हमें हमारी वाणी के मालिकों से कोई शिकायत नहीं है। हम देख रहे हैं कि हमारी वाणी को जितना रूपया और जो कुछ साधन आवश्यक था, वह सब उन्होंने उपलब्ध कराया और हिंदी ब्लॉगर्स को निःशुल्क सेवा प्रदान की। उनकी सेवा क़ाबिले तारीफ़ है। हम मालिक से उनकी कामयाबी की दुआ करते हैं।
इसके बावजूद भी हमें जब-तब हमारी वाणी के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने पर मजबूर होना पड़ा।
ऐसा क्यों हुआ ?
यह समझना ज़रूरी है।
हमारा वाणी का एक इतिहास है और उसका यह सारा इतिहास हमारी नज़र के सामने है। इसीलिए हम जानते हैं कि कौन इसके मालिक कौन लोग हैं ?
ज़ाहिर है कि मालिक हर समय वेबसाइट पर बैठा नहीं रहेगा और यह भी पक्का है कि एक एग्रीगेटर को चलाने के लिए कम से कम एक टेक्नीशियन ज़रूर चाहिए।
हमारी वाणी के लिए यह काम शाहनवाज़ भाई कर रहे हैं।
शाहनवाज़ भाई की हमसे शुरू से ही बहुत पटती थी। ब्लॉग वाणी के दिनों में तो वह मेरे फ़ैन थे। उन दिनों उन्होंने मेरे लिए बहुत कुछ किया।
क्या किया ?, यह भी किसी दिन बताऊंगा लेकिन आज चर्चा है हमारी वाणी की। सो जब उन्होंने हमारी वाणी को अपनी सेवाएं देनी शुरू कीं और यह ख़ुशदीप भाई वग़ैरह के हमारी वाणी से जुड़ने के बाद की बात है, तब वह हमें हमारी वाणी की हरेक राज़ की बात बता दिया करते थे। हमें इंटरनेट के तकनीकी पक्ष की जानकारी आज जो कुछ है उसमें एक योगदान शाहनवाज़ भाई का भी है। इन्हीं जानकारियों में एक दिन उन्होंने बताया कि आप लोग जब चाहो अपनी पोस्ट हमारी वाणी की हॉट लिस्ट में ला सकते हो।
हमें यह जानकारी बिल्कुल अद्भुत लगी। फिर हमने इस ‘ज्ञान‘ को चेक किया तो वह सोलह आने काम कर रहा था। तब हॉट लिस्ट में वह पोस्ट भी आ जाया करती थी जिसे मात्र 3 आदमी ही देखा करते थे। 3 से ज़्यादा तो हमारे विरोधी ही थे। इससे ज़्यादा हिट तो हमारी पोस्ट को देने के लिए हमारे विरोधी ही काफ़ी थे। सो हमें यह तकनीक इस्तेमाल करने की ज़रूरत कभी आई ही नहीं। आज भी नहीं आती। आज भी चार-पांच समर्थक और दो-चार विरोधी हमारी पोस्ट पर क्लिक कर ही देते हैं और हमारी पोस्ट हॉट में चढ़ जाती है। ब्लॉगवाणी की तरह यहां वोट की ज़रूरत ही नहीं है। हालांकि ब्लॉगवाणी में अपने वोट फ़र्ज़ी तरीक़े से कैसे बढ़ाए जाते हैं ?, यह बात भी बहुत पहले हमें शाहनवाज़ भाई ने ही बताई थी। हमने कभी फ़र्ज़ी वोट नहीं डाला। उसकी दो वजहें थीं। एक तो हमारे उस्ताद जनाब उमर कैरानवी साहब ने ऐसा करने से मना कर दिया था और दूसरा कारण यह था कि ज़रूरत ही नहीं थी।
ज़रूरत क्यों नहीं थी। यह भी एक राज़ की बात है जिसे आइंदा कभी बताया जाएगा। यहां हमारी वाणी की चर्चा चल रही है और यह ज़िक्र इसलिए करना पड़ रहा है कि हम जानते हैं कि अपनी पोस्ट पर एक ही सिस्टम से क्लिक करके अपनी पोस्ट को ऊपर चढ़ाया जा सकता है और यह भी सही है कि हम ऐसा करते नहीं और यह भी सही है कि शाहनवाज़ भाई के अलावा हमारी वाणी का यह राज़ किसी और को पता नहीं है।
अब इन सब बातों को सामने रखकर देखिए और सोचिए कि आजकल जैसे ही हम अपनी पोस्ट पब्लिश करते हैं तो तुरंत ही हमारी पोस्ट पर दस मिनट के अंदर ही 100 हिट पड़ जाते हैं।
इस समय भी हमारी वाणी के टॉप पर हमारी दो पोस्ट नज़र आ रही हैं
1- एक ग़ददार की विदाई पर क्या उद्गार मन में आया करते हैं ? (129)
2- आओ जीवन की ओर (123)
पहली पोस्ट पर 129 हिट्स हैं और दूसरी पर 123 हिट्स हैं।
सवाल यह है कि जब दूसरी पोस्ट हमने अभी दो घंटे पहले डाली है तो इस पर इतने हिट्स कहां से आ गए ?
ज़ाहिर है कि ये हिट्स फ़र्ज़ी हैं। जब हमने ये फ़र्ज़ी हिट्स नहीं लगाए तो फिर किसने लगाए ?
हमारी वाणी का यह राज़ तो सिर्फ़ शाहनवाज़ भाई ही जानते हैं।
यह फ़र्ज़ी हिट्स केवल हमारी पोस्ट पर ही लगाई जाती हैं ताकि यह दिखाया जाए कि देखिए अनवर जमाल फ़र्ज़ीवाड़ा कर रहा है।
ब्लॉग जगत में अनवर जमाल की छवि एक सच्चे और ईमानदार आदमी की है, उस छवि को धूमिल करने की कोशिश के तहत यह सब हो रहा है।
हम यह भी मान लेते कि यह सब शाहनवाज़ भाई के इशारे पर नहीं हो रहा है लेकिन हम यह भी देख रहे हैं कि जब भी हमने हिंदी ब्लॉगिंग को पतन के रास्ते पर धकेलने वाले लोगों के खि़लाफ़ कोई पोस्ट लिखी तो उसे तुरंत ही या कुछ देर बाद हटा दिया गया। इस क्रम में हमारी ऐसी पोस्ट को बलि चढ़ा दिया गया जिसमें उन लोगों की तरफ़ मात्र इशारा ही किया गया था।
‘बड़ा ब्लॉगर कैसे बनें ?‘ पर हमने यह पोस्ट पब्लिश की थी। यह पोस्ट ब्लॉग फ़िक्सिंग करके ईनाम घोटाला करने वालों के विरूद्ध थी। इसे भी हटा दिया गया।
http://tobeabigblogger.blogspot.com/2011/04/self-realization-in-toilet.html

इसे एग्रीगेटर की नीति नहीं कहा जा सकता। यह ख़ालिस पक्षपात की बात है। फिर ऐसा एक बार नहीं बल्कि बार-बार किया गया। यहां तक कि एक व्यक्ति विशेष के खि़लाफ़ लिखने के जुर्म में मेरे तीन ब्लॉग ही उड़ा दिए गए। हमारे ब्लॉग और हमारी पोस्ट ही नही उड़ाई गईं बल्कि जो निजी बातें हमने हमने शाहनवाज़ भाई को अपना समझकर बताई थीं। वे बातें विरोधी ख़ेमे वाले भी जान गए क्योंकि उनके ब्लॉग की सजावट आदि का काम भी यही साहब देख रहे हैं। उस जानने की चिंता हमें नहीं है बल्कि ख़ुशी है कि हमें पता चल गया कि हमारी पोस्ट इसी ख़ास वर्ग को ख़ुश करने के लिए हटाई जाती हैं।
हमें इसकी भी कोई शिकायत नहीं है। हम तो बस यह चाहते हैं कि हमारी पोस्ट हटाना और फिर लगा देना या हमारी पोस्ट पर किसी से कहकर 100 हिट लगाकर शाहनवाज़ भाई हमारी छवि ख़राब नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी छवि ख़राब कर रहे हैं। आज हमें मजबूर होकर बताना पड़ा कि हमारी वाणी का टेक्नीशियन हमारे खि़लाफ़ टुच्चे स्तर की साज़िशें कर रहा है।
इससे वह क्या लाभ उठाना चाहता है ?, यह तो वही जाने लेकिन उसके ऐसा करने से हमें परेशानी होती है और हमारी वाणी की साख भी ख़राब होती है।
शाहनवाज़ भाई ने हमारी वाणी के राज़ हमें बताए हैं तो दूसरे लोगों को भी ज़रूर बताए होंगे।
जिस आदमी पर हमारी वाणी ने भरोसा किया, वही आदमी हमारी वाणी के राज़ दुनिया भर में बताता फिर रहा है। ऐसे आदमी को अगर दुनिया ग़द्दार का नाम न दे तो आखि़र भला क्या नाम दे ?
अगर मालिकों में से किसी को शक हो तो हम अगली पोस्ट में वह तरीक़ा भी लिख देंगे जिसके ज़रिए हमारी पोस्ट के साथ रोज़ाना ही यह खिलवाड़ किया जा रहा है।
अगर हमारे रहने से कोई दिक्क़त है तो हम कह चुके हैं कि हमारा अकाउंट निकाल दिया जाए और 13 जून 2011 को टीम हमारी वाणी की आई डी से शाहनवाज़ कह चुके हैं कि आपकी इच्छानुसार आपके सारे ब्लाग हटा दिए जाएंगे लेकिन अब उन्हें हटाया नहीं गया है और मेरी पोस्ट्स के साथ खिलवाड़ बदस्तूर जारी है।
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/06/dr-anwer-jamal_13.html?showComment=1308024921091#c7879847851555100552

मैंने अपनी शिकायत हमारी वाणी द्वारा सुझाए गए लिंक पर की और उसका जवाब भी मुझे मिला लेकिन खुशदीप भाई और मासूम साहब की टिप्पणियों से पता चला कि मेरी शिकायत को मार्गदर्शक मंडल के सामने न तो रखा गया और न ही उनसे कोई सलाह मशविरा किया गया। जबकि कहा यह जाता है कि शिकायत को मार्गदर्शक मंडल के सामने रखा जाता है।
हमारी वाणी की ईमेल शाहनवाज़ ही चेक करते हैं। यह भी उन्होंने ही मुझे बताया था। उन्होंने मेरी शिकायत किसी के भी सामने नहीं रखी और अपने अकेले के दम पर ही टीम हमारी वाणी बनकर मेरी पोस्ट पर भी टिप्पणी कर दी और वही ईमेल से भी मुझे भेज दिया।
इस तरह अकेले शाहनवाज़ ने न सिर्फ़ पूरे मार्गदर्शक मंडल को मेरी शिकायत के बारे में अन्जान रखा है बल्कि हिंदी ब्लॉग जगत के विश्वास को भी ठेस पहुंचाई है। सबसे कहा गया कि फ़ैसले कोई एक व्यक्ति नहीं लेता बल्कि ज़िम्मेदार हिंदी ब्लॉगर्स का एक मंडल लेता है लेकिन हक़ीक़त यह है अक्सर फ़ैसले शाहनवाज़ भाई अकेले ही ले रहे हैं।
हमारी वाणी के मालिको ! आप अपने काम में मसरूफ़ हैं। आप से मुझे कोई शिकायत नहीं है लेकिन मैं आपको यह बता देना चाहता हूं कि हमारी वाणी के टेक्नीशियन पद पर एक ग़द्दार आदमी बैठा है। यह मैं जान गया हूं। अतः आपको सूचित करना मैं अपना फ़र्ज़ मानता हूं ताकि हमारी वाणी को समय रहते बचाया जा सके हालांकि आप अति आत्मविश्वास और मोह के कारण मेरी बात नहीं सुनेंगे। यह भी मैं जानता हूं लेकिन समय आएगा जब आप याद करेंगे।
आप चाहें तो अपनी आस्तीन में सांप पाले रखिए लेकिन मुझे हमारी वाणी पर बने रहने में अब कोई दिलचस्पी नहीं है और आपसे विनती करता हूं कि मेरा अकाउंट अपने सम्मानित एग्रीगेटर से तुरंत हटाया जाए ताकि इस ग़द्दार की चालबाज़ियों के कारण मेरी छवि धूमिल न हो।
धन्यवाद !

आओ जीवन की ओर Hadith


ईश्वर अपने भक्तों का कल्याण करता है और अपने भक्तों के कल्याण के लिए ही वह ‘ज्ञान‘ का अवतरण करता है। यह ज्ञान की ज्योति वह एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में देता है जो सच्चा और अमानतदार होता है। पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब स. एक ऐसे ही मार्गदर्शक थे। ईश्वर की वाणी को क़ुरआन के नाम से जाना जाता है। ईश्वरीय प्रेरणा से जो वचन हज़रत मुहम्मद साहब स. ने कहे, उन्हें हदीस कहा जाता है। बु़ख़ारी, मुस्लिम, मौत्ता इमाम मालिक और तिरमिज़ी वग़ैरह हदीस ग्रंथ हैं। इन कथनों की ख़ासियत यह है कि ये सभी नैतिकता की उच्च कोटि और उच्च चोटी तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं। इनकी दूसरी ख़ासियत यह है कि यह केवल आदर्श वाक्य मात्र नहीं हैं बल्कि पैग़ंबर साहब स. ने इनके अनुसार व्यवहार करके भी दिखाया और आज हमारे पास जितने भी आदर्श कहे जाने वाले लोगों के चरित्र सुरक्षित हैं उनमें से किसी एक में भी ये दोनों ख़ासियतें दुनिया के किसी भी आदर्श में देखने में नहीं आतीं। आज पूरे मुल्क की हुकूमत और सारे नेता और महात्मा मिलकर भी कन्या भ्रूण हत्या नहीं रोक पा रहे हैं लेकिन अकेले पैग़ंबर साहब ने न जाने कितनी ही कुप्रथाओं को समाप्त कर डाला। लड़कियों को ज़िंदा दफ़न करना तब आम था। पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब स. के हुक्म के बाद अरबों ने यह कुप्रथा छोड़ दी। उन्हीं के कहने पर शराब, जुआ, सूद और ख़ून-ख़राबा आदि हरेक ज़ुल्म-ज़्यादती से लोगों ने तौबा कर ली। मानवता के पास आज एकमात्र उपाय यही है कि वह उनके आदर्श का अनुसरण करे। उनकी कुछ शिक्षाओं को आज यहां पेश किया जाता है। इनके पालन में मानव और मानव जाति का कल्याण निहित है। यह बात आप तुरंत जान लेंगे। यही इन शिक्षाओं की सच्चाई का सुबूत है।
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अच्छा मनुष्य, अच्छा ख़ानदान, अच्छा समाज और अच्छी व्यवस्था-यह ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें हमेशा से, हर इन्सान पसन्द करता आया है क्योंकि अच्छाई को पसन्द करना मानव-प्रकृति की शाश्वत विशेषता है।

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने इन्सान, ख़ानदान, समाज और व्यवस्था को अच्छा और उत्तम बनाने के लिए जीवन भर घोर यत्न भी किए और इस काम में बाधा डालने वाले कारकों व तत्वों से संघर्ष भी। इस यत्न में उन शिक्षाओं का बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका और स्थान है जो आपने अपने समय के इन्सानों को, अपने साथियों व अनुयायियों को तथा उनके माध्यम से भविष्य के इन्सानों को दीं। ये शिक्षाएं जीवन के हर पहलू, हर क्षेत्र, अर अंग से संबंधित हैं। ये हज़ारों की संख्या में हैं जिन्हें बहुत ही तवज्जोह, निपुणता, और सत्यनिष्ठा के साथ एकत्रित, संकलित व संग्रहित करके ‘हदीसशास्त्र’ के रूप में मानवजाति के उपलब्ध करा दिया गया है। इनमें से कुछ शिक्षाएं (सार/भावार्थ) यहां प्रस्तुत की जा रही हैं:  

● जो व्यक्ति अपने छोटे-छोटे बच्चों के भरण-पोषण के लिए जायज़ कमाई के लिए दौड़-धूप करता है वह ‘अल्लाह की राह में’ दौड़-धूप करने वाला माना जाएगा।
● घूस लेने और देने वाले पर लानत है...कोई क़ौम ऐसी नहीं जिसमें घूस का प्रचलन हो और उसे भय व आशंकाए घेर न लें।
● सबसे बुरा भोज (बुरी दअ़वत) वह है जिसमें धनवानों को बुलाया जाए और निर्धनों को छोड़ दिया जाए।
● सबसे बुरा व्यक्ति वह है जो अपनी पत्नी के साथ किए गए गुप्त व्यवहारों (यौन क्रियाओं) को लोगों से कहता, राज़ में रखी जाने वाली बातों को खोलता है।
● यदि तुमने मां-बाप की सेवा की, उन्हें ख़ुश रखा, उनका आज्ञापालन किया तो स्वर्ग (जन्नत) में जाओगे। उन्हें दुख पहुंचाया, उनका दिल दुखाया, उन्हें छोड़ दिया तो नरक (जहन्नम) के पात्र बनोगे।
● ईश्वर की नाफ़रमानी (अवज्ञा) की बातों में किसी भी व्यक्ति (चाहे माता-पिता ही हों) का आज्ञापालन निषेध, हराम, वर्जित है।
● बाप जन्नत का दरवाज़ा है और मां के पैरों तले जन्नत है (अर्थात् मां की सेवा जन्नत-प्राप्ति का साधन बनेगी)।
● तुम लोग अपनी सन्तान के साथ दया व प्रेम और सद्व्यवहार से पेश आओ और उन्हें अच्छी (नैतिक) शिक्षा-दीक्षा दो।
● सन्तान के लिए माता-पिता का श्रेष्ठतम उपहार (तोहफ़ा, Gift) है उन्हें अच्छी शिक्षा-दीक्षा देना, उच्च शिष्टाचार सिखाना।
● तुममें सबसे अच्छा इन्सान वह है जो अपनी औरतों के साथ अच्छे से अच्छा व्यवहार करे।
● पत्नी के साथ दया व करुणा से पेश आओ तो अच्छा जीवन बीतेगा।
● अल्लाह की अवज्ञा (Disobedience) से बचो। रोज़ी कमाने का ग़लत तरीक़ा, ग़लत साधन, ग़लत रास्ता न अपनाओ, क्योंकि कोई व्यक्ति उस वक्त तक मर नहीं सकता जब तक (उसके भाग्य में लिखी) पूरी रोज़ी उसको मिल न जाए। हां, उसके मिलने में कुछ देरी या कठिनाई हो सकती है। (तब धैर्य रखो, बुरे तरीके़ मत अपनाओ) अल्लाह से डरते हुए, उसकी नाफ़रमानी से बचते हुए सही, जायज़, हलाल तरीके़ इख़्तियार करना और हराम रोज़ी के क़रीब भी मत जाना।
● वस्त्रहीन (नंगे) होकर मत नहाओ। अल्लाह हया वाला है और अल्लाह के (अदृश्य) फ़रिश्ते भी (जो हर समय तुम्हारे आसपास रहते हैं) हया करते हैं।
● पति-पत्नी, यौन-संभोग के समय पशुओं के समान नंगे न हो जाएं।
● अत्याचारी, क्रूर और ज़ालिम शासक के सामने हक़ (सच्ची, खरी, न्यायनिष्ठ) बात कहना (सच्चाई की आवाज़ उठाना) सबसे बड़ा जिहाद है।
● धन हो तो ज़रूरतमन्दों को क़र्ज़ दो। वापसी के लिए इतनी मोहलत (समय) दो कि कर्ज़दार व्यक्ति उसे आसानी से लौटा सके। किसी वास्तविक व अवश्यंभावी मजबूरी से, समय पर न लौटा सके तो उस पर सख़्ती तथा उसका अपमान मत करो, उसे और समय दो।
● क़र्ज़ (ऋण) पर ब्याज न लो (ब्याज इस्लाम में हराम है)।
● सामर्थ्य हो जाए, आर्थिक स्थिति अनुकूल हो जाए फिर भी क़र्ज़ वापस लौटाया न जाए तो यह महापाप है (जिसका दंड परलोक में नरक की यातना व प्रकोप के रूप में भुगतना पड़ेगा)।
● ईश्वर चाहे तो इन्सान के गुनाह माफ़ कर दे। लेकिन उस व्यक्ति को माफ़ नहीं करेगा, चाहे वह शहीद (ईश मार्ग में जान भी दे देने वाला) ही क्यों न हो जो क़र्ज़ वापस लौटाने का सामर्थ्य होते हुए भी क़र्ज़दार होकर मरा।
● जो व्यक्ति क़र्ज़ वापस किए बिना (इस कारण कि वह इसका सामर्थ्य नहीं रखता था) मर गया तो उसकी अदायगी की ज़िम्मेदारी इस्लामी कल्याणकारी राज्य (उसके शासक) पर है।
● क़र्ज़ देकर एक व्यक्ति किसी ज़रूरतमंद आदमी को चोरी, ब्याज और भीख मांगने से बचा लेता है।
● मांगने के लिए हाथ मत फैलाओ, यह चेहरे को यशहीन कर देता (और आत्म-सम्मान के लिए घातक होता) है। मेहनत-मशक्क़त करो और परिश्रम से रोज़ी कमाओ। नीचे वाला (भीख लेने वाला) हाथ, ऊपर वाले (भीख देने वाले) हाथ से तुच्छ, हीन होता है।
 मज़दूर की मज़दूरी उसके शरीर का पसीना सूखने से पहले दे दो (अर्थात् टाल-मटोल, बहाना आदि करके, उसे उसका परिश्रमिक देने में अनुचित देरी मत करो)।
● सरकारी कर्मचारियों को भेंट-उपहार देना घूस (रिश्वत) है।
● मज़दूर की मज़दूरी तय किए बिना उससे काम न लो।
● अल्लाह कहता है कि परलोक में मैं तीन आदमियों का दुश्मन हूंगा। एक: जिसने मेरा नाम लेकर (जैसे-‘अल्लाह की क़सम’ खाकर)  किसी से कोई वादा किया, फिर उससे मुकर गया, दो: जिसने किसी आज़ाद आदमी को बेचकर उसकी क़ीमत खाई; तीन: जिसने मज़दूर से पूरी मेहनत ली और फिर उसे पूरी मज़दूरी न दी।
● पत्नी के मुंह में हलाल कमाई का कौर (लुक़मा) डालना इबादत है।
● रास्ते में पड़ी कष्टदायक चीज़ें (कांटा, पत्थर, केले का छिलका आदि) हटा देना (ताकि राहगीरों को तकलीफ़ से बचाया जाए) इबादत है।
● कोई व्यक्ति (मृत्यु-पश्चात) माल छोड़ जाए तो वह माल उसके घर वालों के लिए है। और किसी (कम उम्र सन्तान, पत्नी, आश्रित माता-पिता आदि) को बेसहारा छोड़ (कर मर) जाए तो उसकी ज़िम्मेदारी मुझ (इस्लामी सरकार) पर है।
● जिसका भरण-पोषण करने वाला कोई नहीं उस (असहाय, Destitute) के भरण-पोषण का ज़िम्मेदार राज्य है।
● जिस व्यक्ति ने बाज़ार में कृत्रिम अभाव (Artificial Scarecity) पैदा करने की नीयत से चालीस दिन अनाज को भाव चढ़ाने के लिए रोके रखा (जमाख़ोरी Hoarding की) तो ईश्वर का उससे कोई संबंध नहीं, फिर अगर वह उस अनाज को ख़ैरात (दान) भी कर दे तो ईश्वर उसे क्षमा नहीं करेगा। उसकी चालीस वर्ष की नमाज़ें भी ईश्वर के निकट अस्वीकार्य (Unacceptable) हो जाएंगी।
● मुसलमानों में मुफ़लिस (दरिद्र) वास्तव में वह है जो दुनिया से जाने के बाद (मरणोपरांत) इस अवस्था में, परलोक में ईश्वर की अदालत में पहुंचा कि उसके पास नमाज़, रोज़ा, हज आदि उपासनाओं के सवाब (पुण्य) का ढेर था। लेकिन साथ ही वह सांसारिक जीवन में किसी पर लांछन लगाकर, किसी का माल अवैध रूप से खाकर किसी को अनुचित मारपीट कर, किसी का चरित्रहनन करके, किसी की हत्या करके आया था। फिर अल्लाह उसकी एक-एक नेकी (पुण्य कार्य का सवाब) प्रभावित लोगों में बांटता जाएगा, यहां तक उसके पास कुछ सवाब बचा न रह गया, और इन्साफ़ अभी भी पूरा न हुआ तो प्रभावित लोगों के गुनाह उस पर डाले जाएंगे। यहां तक कि बिल्कुल ख़ाली-हाथ (दरिद्र) होकर नरक (जहन्नम) में डाल दिया जाएगा।
● अल्लाह फ़रमाता है कि बीमार की सेवा करो, भूखे को खाना खिलाओ, वस्त्रहीन को वस्त्र दो, प्यासे को पानी पिलाओ। ऐसा नहीं करोगे तो मानो मेरा हाल न पूछा, जबकि मानों मैं स्वयं बीमार था; मानो मुझे कपड़ा नहीं पहनाया, मानो मैं वस्त्रहीन था, मानो मुझे खाना-पानी नहीं दिया जैसे कि स्वयं मैं भूखा-प्यासा था।
● किसी परायी स्त्री को (व्यर्थ, अनावश्यक रूप से) मत देखो, सिवाय इसके कि अनचाहे नज़र पड़ जाए। नज़र हटा लो। पहली निगाह तो तुम्हारी अपनी थी; इसके बाद की हर निगाह शैतान की निगाह होगी। (अर्थात् शैतान उन बाद वाली निगाहों के ज़रिए बड़े-बड़े नैतिक व चारित्रिक दोष, बड़ी-बड़ी बुराइयां उत्पन्न कर देगा।)
● वह औरत (स्वर्ग में जाना तो दूर रहा) स्वर्ग की ख़ुशबू भी नहीं पा सकती जो लिबास पहनकर भी नंगी रहती है (अर्थात् बहुत चुस्त, पारदर्शी, तंग या कम व अपर्याप्त (Scanty) लिबास पहनकर, देह प्रदर्शन करती और समाज में नैतिक मूल्यों के हनन, ह्रास, विघटन तथा अनाचार का साधन व माध्यम बनती है)।
● दो पराए (ना-महरम) स्त्री-पुरुष जब एकांत में होते हैं तो सिर्फ़ वही दो नहीं होते बल्कि उनके बीच एक तीसरा भी अवश्य होता है और वह है ‘‘शैतान’’। (अर्थात् शैतान के द्वारा दोनों के बीच अनैतिक संबंध स्थापित होने की शंका व संभावना बहुत होती है।)
● तुम (ईमान वालों, अर्थात् मुस्लिमों) में सबसे अच्छा व्यक्ति वह है जिसके स्वभाव (अख़लाक़) सबसे अच्छे हैं।
● वह व्यक्ति (यथार्थ रूप में) मोमिन (अर्थात् ईमान वाला, मुस्लिम) नहीं है जिसका (कोई ग़रीब पड़ोसी भूखा सो जाए, और इस व्यक्ति को उसकी कोई चिंता न हो और यह पेट भर खाना खाकर सोए।
● वह व्यक्ति (सच्चा, पूरा, पक्का) मोमिन मुस्लिम नहीं है जिसके उत्पात और जिसकी शरारतों से उसका पड़ोसी सुरक्षित न हो।
● फल खाकर छिलके मकान के बाहर न डाला करो। हो सकता है आसपास (पड़ोसियों) के ग़रीब घरों के बच्चे उसे देखकर महरूमी, ग्लानि और अपनी ग़रीबी के एहसास से दुखी हो उठें।
● अपने अधीनों (मातहतों, Subordinates) से, उनको क्षमता, शक्ति से अधिक काम न लो।
● पानी में मलमूत्र मत करो (जल-प्रदूषण उत्पन्न न करो) ज़मीन पर किसी बिल (सूराख़) में मूत्र मत करो। (इससे कोई हानिकारक कीड़ा, सांप-बिच्छू आदि, निकल कर तुम्हें हानि पहुंचा सकता है और इससे पर्यावर्णीय संतुलन भी प्रभावित होगा।)
● अगर तुम कोई पौधा लगा रहे हो और प्रलय (इस संसार की और धर्ती की समाप्ति का समय) आ जाए तब भी पौधे को लगा दो। (इस शिक्षा में प्रतीकात्मक रूप से वातावर्णीय हित के लिए वृक्षारोपण का महत्व बताया गया है।)
● पानी का इस्तेमाल एहतियात से करो चाहे जलाशय से ही पानी क्यों न लिया हो और उसके किनारे बैठे पानी इस्तेमाल कर रहे हो। ज़रूरत से ज़्यादा पानी व्यय (प्राकृतिक संसाधन का अपव्यय) मत करो (इस शिक्षा में प्रतीकात्मक रूप से जल-संसाधन अनुरक्षण (Water resource conservation) के महत्व का भाव निहित है)।
● भोजन के बर्तन में कुछ भी छोड़ो मत। एक-एक दाने में बरकत है। बर्तन को पूरी तरह साफ़ कर लिया करो। खाद्यान्न/खाद्यपदार्थ का अपव्यय मत करो। (इस शिक्षा में प्रतीकात्मक रूप से खाद्य-संसाधन-अनुरक्षण (Food resource conservation) का भाव निहित है।
● किसी पक्षी को (पिजड़े आदि में) क़ैद करके न रखो। (इस शिक्षा में प्रतीकात्मक रूप से हर जीवधारी के ‘स्वतंत्र रहने’ के मौलिक अधिकार का महत्व निहित है।)
● किसी पालतू जानवर-विशेषतः जिससे तुम अपना काम लेते हो, जैसे बैल, ऊंट, गधा, घोड़ा आदि–को भूखा-प्यासा मत रखो, उससे उसकी ताक़त से ज़्यादा काम मत लो; उसको निर्दयता के साथ मारो मत। याद रखो, आज जितनी शक्ति तुम्हें उस पर हासिल है, परलोक में (ईश्वरीय अदालत लगने के समय) ईश्वर को तुम पर उससे अधिक शक्ति होगी।
● दान दो (विशेषतः किसी व्यक्ति को) तो इस तरह दो कि तुम्हारा दायां हाथ दे तो बाएं हाथ को मालूम न हो। (अर्थात् दान देने में, दिखावा मत करो कि लोगों में दानी-परोपकारी व्यक्ति के तौर पर अपनी शोहरत के अभिलाशी रहो। दान मात्र ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए, परलोक में अल्लाह ही से पारितोषिक पाने के लिए दो।)
● जिसे दान दो उस पर एहसान, उपकार मत जताओ, उसे मानसिक दुःख मत पहुंचाओ।
● जिसने किसी ज़िम्मी (इस्लामी शासन में ग़ैर-मुस्लिम बाशिन्दे) की हत्या की उसके ख़िलाफ़ अल्लाह की अदालत में (परलोक में) ख़ुद मैं मुक़दमा दायर करूंगा। (विदित हो कि ‘ज़िम्मी’ का अर्थ है वह ग़ैर-मुस्लिम व्यक्ति जिसके जान-माल की हिफ़ाज़त का ज़िम्मा, उस के मुस्लिम राज्य में रहते हुए, शासन व इस्लामी शासक पर होता है, ज़िम्मी की हत्या करने वाला मुसलमान, सज़ा के तौर पर क़त्ल किया जाएगा और अगर, गवाह-सबूत न होने या किसी और कारण से वह क़त्ल होने से बच भी गया तो हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) परलोक में स्वयं उसके ख़िलाफ़ ईश्वरीय अदालत में दंड के और ज़िम्मी के हक़ में इन्साफ़ के याचक होंगे।)
● पराई स्त्रियों को दुर्भावना-दृष्टि से मत देखो। आंखों का भी व्यभिचार होता है और ऐसी दुर्भावनापूर्ण दृष्टि डालनी, आंखों का व्यभिचार (ज़िना) है। (और यही दृष्टि शारीरिक व्यभिचार/बलात्कार का आरंभ बिन्दु है)।
● जो तुम पर एहसान करे तो उसका एहसान हमेशा याद रखो। किसी पर एहसान करो तो इसे भूल जाओ (अर्थात उस पर एहसान न जताओ)।
● कोई व्यक्ति कोई सौदा कर रहा हो तो उसके ऊपर तुम सौदा करने मत लग जाओ (अगर उस व्यक्ति का सौदा तय नहीं हुआ तब तुम सौदा करो)।
● नमूना (बानगी, Sample) कुछ दिखाकर, माल किसी और क्वालिटी का मत बेचो।
● ऐसी किसी भी चीज़ को किसी के हाथ बेचने का सौदा मत करो जिसे ख़रीदकर तुम अपनी मिल्कियत में न ले चुके हो।
● रुपये से रुपया मत कमाओ। (यह अवैध है क्योंकि ब्याज है।) रुपये से तिजारत, कारोबार (Business, Trading) करके रुपया कमाओ। यह ‘मुनाफ़ा’ (Profit, लाभ) है, और वैध व पसन्दीदा है।
● सूद लेना इतना घोर पाप है जैसे कोई अपनी मां के साथ व्यभिचार करे।
● कोई व्यक्ति पाप करता है तो उसके दिल में एक काला धब्बा पड़ जाता है। यदि वह पछताकर, पश्चाताप करते हुए तौबा कर लेता और अल्लाह से माफ़ी मांग लेता है और संकल्प कर लेता है कि अब उस पाप कर्म को नहीं करेगा, तो वह धब्बा मिट जाता है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह बार-बार पाप करेगा और हर बार दिल के अन्दर का धब्बा फैल कर बड़ा होता जाएगा। अंततः उसका पूरा हृदय सियाह (काला) हो जाएगा (और पापाचार उसके जीवन का अभाज्य अंग बन जाएगा)।
● झूठी गवाही देना उतना ही बड़ा पाप है जितना शिर्क (अर्थात् ईश्वर के साथ किसी और को भी शरीक-साझी बना लेने का महा-महापाप)।
पहलवान वह नहीं है जो कुश्ती में किसी को पछाड़ दे, बल्कि अस्ल पहलवान वह है जो गु़स्सा आ जाने पर, अपने क्रोध को पछाड़ दे (अर्थात् उस पर क़ाबू पा ले)।
● सच्चा मुजाहिद (ईश मार्ग का सेनानी) वह है जो (ईशाज्ञापालन में अवरोध डालने वाली) अपने मन (की प्रेरणाओं व उकसाहटों) से लड़ता है।
● तुम छः बातों की ज़मानत दो तो मैं तुम्हें ईशप्रदत्त स्वर्ग की ज़मानत देता हूं। (1) बोलो तो सच बोलो, (2) वादा करो तो पूरा करो, (3) अमानत में पूरे उतरो, (4) व्यभिचार से बचो, (5) बुरी नज़र मत डालो, (6) जु़ल्म करने से हाथ रोके रखो।
● जिस व्यक्ति ने कोई त्रुटिपूर्ण (Defective) चीज़ इस तरह बेच दी कि ग्राहक को उस त्रुटि से बाख़बर न किया उस पर अल्लाह क्रुद्ध होता है और अल्लाह के फ़रिश्ते उस पर लानत (धिक्कार) करते हैं।
● अपने अधीनस्थ लोगों से कठोरता का व्यवहार करने वाला व्यक्ति स्वर्ग में नहीं जा सकेगा।
● नमाज़, रोज़ा, दानपुण्य से भी बढ़कर यह काम है कि दो व्यक्तियों या गिराहों में बिगाड़ व वैमनस्य पैदा हो जाए तो उनके बीच सुलह करा दी जाए।
● लोगों में बिगाड़, विद्वेष, वैमनस्य, शत्रुता पैदा करना वह काम है जो ऐसा करने वाले व्यक्ति की सारी नेकियों, अच्छाइयों, सद्गुणों पर पानी फेर देता है।
● लोगों के व्यक्तिगत जीवन और निजी, दाम्पत्य व पारिवारिक मामलों की टोह में मत रहा करो।
● दूसरों के घर में बिना इजाज़त न दाख़िल हो, न ताक-झांक करो, न उनकी गोपनीयता (Privacy) को भंग करो।
● किसी से बदला लो तो बस उसी मात्रा में जितना तुम पर उसने अत्याचार किया है और क्षमा कर दो तो यह उत्तम है।
● दूसरों के प्रति अपने व्यवहार वैसे ही रखो, जैसे व्यवहार तुम अपने प्रति उनसे चाहते हो।
● तुम्हारे अपने व्यक्तित्व और शरीर का तुम पर हक़ है अतः अत्यधिक उपासना करके अपने शरीर को बहुत अधिक कष्ट में मत डालो। (अर्थात् जीवन के आध्यात्मिक तथा भौतिक पहलुओं में संतुलन रखो।)
● वह औरत बहुत अच्छी और गुणवान है जो अपने पति की ओर देखे तो पति प्रसन्न चित्त हो जाए। (इससे, दूसरी स्त्रियों की ओर पति के आकर्षित होने तथा दाम्पत्य जीवन व परिवार में खिन्नता व बुराई आने का रास्ता रुकता है।)

साभार: इस्लाम धर्म

एक ग़ददार की विदाई पर क्या उद्गार मन में आया करते हैं ?

झूठ के पाँव नहीं होते अर्थात झूठ चल नहीं पाता । एक झूठ ही क्या कोई भी ग़लत बात नहीं चल पाती।
गुटबाज़ी और पक्षपात भी एक ग़लत बात है । यह भी ज़्यादा दिन चल नहीं पाती और एक दिन ज़लील भी होना पड़ता है और पीठ दिखाकर मैदान से भी भागना पड़ता है । कोई इस पलायन को ज़मीनी स्तर पर काम करना कहता है और कोई ब्लॉग जगत से रिटायरमेंट । इन नशेड़ियों को ब्लॉगिंग का चस्का इतना ज़्यादा लग चुका होता है कि फिर ये दूसरी आईडी से ब्लॉगिंग करते रहते हैं लेकिन शोहरत के इन भुक्खों को लगता है कि अब तो हमें न कोई रेडियो बुलाएगा और न ही टी. वी. चैनल बल्कि कहीं ईनाम की रेवड़ियाँ किसी अंधे ने बाँटीं तो फिर वह भी नहीं मिलेगी । सो वह फिर से ब्लॉग लिखना शुरू कर देता है और सारा विराम रखा रह जाता है ।
जिसके साथ उसने छल कपट किया होता है या कोई ग़ददारी की होती है । वह उसे कभी नहीं भूलता ।
ऐसे आदमी के साथ ग़ददारी करने का मतलब अपना कैरियर ख़त्म कर लेना होता है । उसकी बात चलती है क्योंकि वह सच लिखता है और सच के अपने पाँव होते हैं ।
अब वह चला जाए या फिर से आ जाए या कोई और मक्कारी और ग़ददारी करे लेकिन उसकी छवि सदा के ख़त्म हो जाती है ।
जो आपकी छवि ख़राब करे , आप उसकी हक़ीक़त दुनिया को बता दीजिए कि सज्जन नज़र आने वाला यह आदमी कितना बड़ा ग़ददार है ?
एक ग़ददार की विदाई पर ये उद्गार मन में आया करते हैं ।
क्या आप सहमत हैं ।
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Tuesday, June 14, 2011

एक विडंबना : बाबा रामदेव हैल्दी होकर लौटे भी तो निगमानंद की मौत के मौक़े पर



स्वामी निगमानंद जी ने अनशन किया और मर गए। लोग कह रहे हैं कि निगमानंद शहीद हो गए हैं।
ये वे लोग हैं जिन्हें यह भी नहीं पता है कि शहीद का अर्थ होता क्या है ?
किसी को पता हो तो बताए कि ‘शहीद‘ किस भाषा का शब्द है और इसका अर्थ क्या है और यह किन लोगों के लिए बोला जाता है ?
पता कुछ है नहीं और मुंह उठाकर किसी के बारे में भी बोल देंगे कि यह तो शहीद हो गया।
बाबा का मुददा अच्छा था, उनकी भावना अच्छी थी लेकिन जैसे कि उन्हें गृहस्थ नहीं कहा जा सकता ऐसे ही उन्हें शहीद भी नहीं कहा जा सकता।

उधर, बाबा रामदेव जी अस्पताल से स्वस्थ होकर अपने आश्रम लौट आए हैं।
‘लौट के बुद्धू घर को आए‘ भी इस घटना पर नहीं कहा जा सकता क्योंकि एक तो अपने रास्ते से हटने वाला बुद्धू होता है और दूसरी बात यह है कि वह लौटकर अपने घर आता है आश्रम में नहीं। बाबा बुद्धू होते तो अपने घर लौटते लेकिन वह तो अपने आश्रम में आए हैं लिहाज़ा साबित हो गया कि वह बुद्धू नहीं हैं।
घर से बुद्धू को कोई आमदनी नहीं होती है जबकि आश्रम से अरबों रूपये की आमदनी होती है। दरअस्ल यह उनकी दुकान है। उन्होंने फ़्री में मिलने वाले योग को अब पैसे में बिकने वाली चीज़ बना डाला। यही बाबा की सबसे बड़ी सेवा है। उनके भाई वग़ैरह की भी पांचों उंगलियां इतनी ज़्यादा तर हैं कि इतना माल तो कोई गृहस्थ भी अपने भाई को न दे पाए।
अब स्वस्थ होकर बाबा फिर आ गए हैं अमीर लोगों को योग बेचने के लिए। दिग्गी बाबू कह रहे हैं कि बाबा रामदेव जी ठग हैं। यह ठीक बात नहीं है। उन्होंने योग को बेचा और सन्यासी होकर बेचा तो इसे एक सन्यासी का भ्रष्टाचार तो कहा जा सकता है लेकिन ठगी नहीं। वह भले ही आगे की पंक्ति वालों से 50,000 रूपये लेते हैं लेकिन बदले में वह उन्हें एक्सरसाईज़ तो कराते हैं।
कोई ठग कभी किसी को कोई सेवा देता है क्या ?
निगमानंद को कुछ बेचना नहीं था, सो वह मर गए। वह शहीद हों या न हों लेकिन एक परोपकारी सन्यासी ज़रूर थे। जैसी भावना उनकी थी उस तक पहुंचना आसान नहीं है और बाबा रामदेव के लिए तो बिल्कुल भी आसान नहीं है।
स्वामी निगमानंद की मौत के अवसर पर बाबा रामदेव का स्वस्थ होकर घर सॉरी अपने आश्रम लौटना एक बड़ी विडंबना है। दोनों के चरित्र को देश की जनता एक साथ देख रही है। दोनों की तुलना करके स्वामी निगमानंद जी को अपेक्षाकृत महान कहने के लिए आज हरेक बुद्धिजीवी मजबूर है।

ब्लॉगजगत में गंदी राजनीति करने वाले फ़नकारों की हरकतों का भी नोटिस ले लीजिए

इसे राजनीति का विद्रूप ही कहा जाएगा कि जिस बीजेपी ने बाबा रामदेव के समर्थन के लिए नौ दिन में ही दिन-रात एक कर दिया था...राजघाट पर ठुमके भी लग गए थे...उसी बीजेपी को स्वामी निगमानंद की व्यथा 115 दिन तक नज़र नहीं आ सकी...उत्तराखंड सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल निशंक बाबा रामदेव के 4 जून की कार्रवाई के बाद पतंजलि योग पीठ पहुंचते ही चरणवंदना करने पहुंच गए थे...लेकिन स्वामी निगमानंद के लिए उनसे पर्याप्त वक्त नहीं निकल सका...आरोप तो ये भी हैं कि गंगा किनारे स्टोन क्रशर के धंधे पर राज्य के ही किसी मंत्री का वरदहस्त था...उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव दूर नहीं है...इसलिए कांग्रेस भी स्वामी निगमानंद के मुद्दे को चुनाव तक जिलाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी...बीजेपी ने स्वामी निगमानंद की सुध नहीं ली तो कांग्रेस ने भी उनके जीते-जी क्या किया...क्यों नहीं उनके समर्थन में बड़ा आंदोलन खड़ा किया...खैर राजनीति तो है ही उस चिड़िया का नाम जिसकी कोई नीति न हो....
कुछ अंश साभार : http://www.deshnama.com/2011/06/blog-post_14.html
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देशनामा पर स्वामी निगमानंद जी की आत्महत्या के बारे में पढ़ा तो बड़ा दुख हुआ। यह सही है कि उन्होंने मुददा सही उठाया था लेकिन अनशन का तरीक़ा सही नहीं कहा जा सकता। इसके नतीजे में मौत आ जाए , जैसे कि आ ही गई तो यह आत्महत्या ही कही जाएगी। जो आदमी संत हो उसे सही मुददे को सही तरीक़े से ही उठाना चाहिए। रही राजनीति के धंधेबाज़ों की बात तो यह भी साफ़ हो गया कि ये लोग साधुओं को केवल अपने नापाक मक़सद के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन उनकी परवाह बिल्कुल भी नहीं करते। सभी लोग अपने लाभ हानि का गणित देखकर ही कुछ करते हैं।
भाई ख़ुशदीप जी ! ब्लॉगजगत में भी यही सब गंदगी भरी पड़ी है। कोई भी आदमी अकेले इसे साफ़ नहीं कर सकता। स्वामी निगमानंद जी को श्रृद्धांजलि देने के बाद  आप हमारी वाणी की आड़ में गंदी राजनीति करने वाले फ़नकारों की हरकतों का भी नोटिस ले लीजिए। गंगा की तरह हमारी वाणी को भी बहुत गंदा किया जा चुका है।
आइये इस गंदगी को मिलकर साफ़ करें।
हमारी वाणी का मार्गदर्शक मंडल महज़ एक दिखावटी मुखौटा है। ख़ुशदीप भाई और आपकी टिप्पणियों से यह बात पूरी तरह सिद्ध हो चुकी है और यही भ्रष्टाचार है।