लोगों ने ऐश की ख़ातिर अपना आराम खो दिया है। सुनने में यह बात अटपटी सी लगती है मगर है बिल्कुल सच !
लोगों ने अपना लाइफ़ स्टैंडर्ड बढ़ा लिया तो केवल मर्द की आमदनी से ख़र्चा चलना मुमकिन न रहा और तब औरत को भी पैसा कमाने के लिए बाहर बुला लिया गया लेकिन इससे उसके शरीर और मन पर दो गुने से भी ज़्यादा बोझ लद गया।
औरत आज घर के काम तो करती ही है लेकिन उसे पैसे कमाने के लिए बाहर की दुनिया में काम भी करना पड़ता है। औरत का दिल अपने घर और अपने बच्चों में पड़ा रहता है। बहुत से बच्चे माँ के बाहर रहने के कारण असुरक्षित होते हैं और अप्रिय हादसों के शिकार बन जाते हैं। छोटे छोटे बच्चों का यौन शोषण करने वाले क़रीबी रिश्तेदार और घरेलू नौकर ही होते हैं। जो बच्चे इन सब हादसों से बच भी जाते हैं, वे भी माँ के आँचल से तो महरूम रहते ही हैं और एक मासूम बच्चे के लिए इससे बड़ा हादसा और कुछ भी नहीं होता । माँ रात को लौटती है थकी हुई और उसे सुबह को फिर काम पर जाना है । ऐसे में वह चाह कर भी अपने बच्चों को कुछ ज्यादा दे ही नहीं पाती।
इतिहास के साथ आज के हालात भी गवाह हैं कि जिस सभ्यता में भी औरत को उसके बच्चों से दूर कर दिया गया । उस सभ्यता के नागरिकों का चरित्र कमज़ोर हो गया और जिस सभ्यता के नागरिकों में अच्छे गुणों का अभाव हो जाता है वह बर्बाद हो जाती है ।
औरत का शोषण बंद होना चाहिए ताकि हमारी नस्लें अपनी माँ की मुनासिब देखभाल पा सकें।
जहाँ मजबूरियों के चलते परिवार की सारी ज़िम्मेदारी औरत के कंधों पर आ पड़ी है, वे इस लेख का विषय नहीं हैं । भोग विलास के साधन घर में जमा करने के लिए अपने मासूम बच्चों के अरमानों की बलि देना कैसे उचित है?
यह नई सभ्यता का असर ही तो है कि कहीं तो माँएं अपनी कोख में बच्चों की बलि दे रही है और अगर उन्हें अपना वंश चलाने के पैदा कर भी दिया जाता है तो उनके अरमानों की बलि रोज़ाना चढ़ाई जाती है ।
आधुनिक शिक्षा ने आज माँ को आधुनिक डायन बनाकर रख दिया है।
जो लोग डायन के वुजूद को नकारते हैं, वे चाहें तो अपने आस पास बेशुमार डायनें देख सकते हैं ।
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Saturday, June 25, 2011
Monday, June 20, 2011
ज्ञान के मोती
हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया है कि
1. जो शख्स जल्दबाज़ी के साथ हरेक बात का जवाब देता है, वह ठीक जवाब बयान नहीं कर सकता।
2. जो शख्स हक़ (सत्य) की मुख़ालिफ़त करता है, हक़ तआला (परमेश्वर) ख़ुद उसका मुक़ाबला करता है।
3. जो शख्स अपने हरेक काम को पसंद करता है, उसकी अक्ल में नक्स (विकार) आ जाता है।
4. बुरे काम पर राज़ी होने वाला मानो उस का करने वाला है।
5. ऐसा बहुत कम होता है कि जल्दबाज़ नुक्सान न उठाए और सब्र करने वाला कामयाब न हो।
6. जिस शख्स के दिल में जितना ज़्यादा (नाजायज़) लालच होता है, उसको अल्लाह तआला पर उतना ही कम यक़ीन होता है।
स्रोत : राष्ट्रीय सहारा उर्दू, पृ. 7 दिनांक 20 जून २०११
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Sunday, June 19, 2011
पाताल लोक में कैसे पहुंचेगी हिंदी ब्लॉगिंग ? - Dr. Anwer Jamal
जागरण जंक्शन में सबसे ज़्यादा देखे जाने वाली एक पोस्ट यह भी है। इसमें लेखक ने एक विशेष पहलू उजागर किया है।
महिलायें कहीं खुद सेक्स सिंबल के सहारे तो जमीनी लड़ाई लडऩे के मूड में नहीं है। कारण, महिलायें भी खुद देह का इस्तेमाल औजार, हथियार के तौर पर करते हुये अब इसे खुले बाजार में वाद का हिस्सा बना दिया है। मर्डर-2 के पांच पोस्टर सबके सब अश्लील, बाजार में उतारे गये हैं। लोगों से अपील की गयी है कि मादक पोस्टर को चुनने में निर्माता-निदेशक को मदद करें। ये फिल्में बच्चों के लिये नहीं हैं। इसकी हीरोइन श्रीलंका से आयात की गयी हैं। क्योंकि भारतीय हीराइनें तो कपड़ा उतारने से रहीं सो श्रीलंकाई सुंदरी जैकलीन फर्नांडीज को सेक्स बम के रूप में परोसा गया है जो भारत के इमरान हाशमी सेलिपटेंगी और यहां के मर्द उसकी मादकता को झेलकर किसी अनजान, सड़कों पर गुजर-बसर करने वाली लड़की को हवस का शिकार बनायेंगे। आज समय ने जरूर सोच को बदल दिया है। लड़कियां हर क्षेत्र में अगुआ बन रही हैं लेकिन भोग्या के रूप में उसके चरित्र में कहीं कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा। वह आज भी दैहिक सुख की एक सुखद परिभाषा भर ही है। जमाना बदला है। सोच बदलने के बाद भी लड़कियां कहीं मर्डर-2 में कपड़े उतारती दिखती है तो कहीं ब्रिटनी सर्वश्रेष्ठ समलैगिंक आइकान चुनी जाती हैं। कारोबार चलाने की अचूक हथियार साबित हो रही हैं ऐसी लड़कियां। पान की दुकान पर बैठी महिला की एक मुस्कान को तरसते लोगों को देखकर तो यही लगता है। एक गांव है। वहां के पुल के बगल में एक पानवाली आजकल, इन दिनों, कुछ दिनों से दुकान चला रही हैं। उस दुकान में सिर्फ और सिर्फ कुछ है तो सिर्फ पान और वह पानवाली। कटघरे में वह दुकान एक जीर्ण मंदिर के कोख में है। वहां पहले रूकना क्या, कोई झांकना भी उचित नहीं समझता था। आज हर किसी की न सिर्फ वहां बैठकी होती है बल्कि जो गुजरता है पानवाली की एक झलक देखे बिना आगे नहीं बढ़ता। अगल-बगल के पानदुकानदारों के सामने एक खिल्ली भी बेचना मुश्किल। पता नहीं उस पानवाली की पान में क्या टेस्ट है कि हर शौकीन वहीं जुट रहे हैं, घंटों राजनीति की बाते वहीं उसी पानवाली की दुकान पर। घंटों बतियाते लोग कई बार पान खाते। बार-बार पानवाली को आंखों से टटोलते। देह विमर्श को निहारते और भारी मन से वहां से विदा होते हैं। शहरी संस्कृति में नित नये प्रयोग हो ही रहे हैं।
http://manoranjanthakur.jagranjunction.com/2011/06/12/%E0%A4%88%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A1%E0%A5%8B%E0%A4%B2-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%87/
जो बात लेखक ने पान वाली के बारे में अनुभव की है। उसी बात को बहुत से लोग कुछ विशेष महिला लेखिकाओं के बारे में कह चुके हैं। बेचारा पुरूष ब्लॉगर अच्छी और सार्थक पोस्ट को बैठा हुआ ख़ुद ही पढ़ता रहेगा और बार बार स्टैट्स चेक करके देखता रहेगा कि मेरे अलावा कितनों ने और पढ़ी है मेरी पोस्ट ?
जबकि दूसरी तरफ़ वैसे ही बस चुहल करने के लिए भी कोई लिख देगी तो उसे पढ़ने के लिए पुरूष ब्लॉगर्स की भीड़ लग जाएगी बिल्कुल ऐसे ही जैसे कि पान वाली की दुकान पर लग जाती है।
जब भी कोई आवाज़ हिंदी ब्लॉग जगत में लगाई गई कि सार्थक लिखो, मार्ग पर चलो और मार्ग दिखाओ तो यह आवाज़ सबसे ज़्यादा नागवार ब्लॉग जगत की इन पान वालियों को और इनके टिप्पणीकारों को ही लगी।
ऐसा क्यों है ?
इस पर विचार किया जाना आवश्यक है।
कहीं ऐसा न हो कि अब स्वर्ग में ब्लॉगिंग तो एक कल्पना ही रहे और हिंदी ब्लॉगिंग को ही ये लोग पाताल में उतार डालें।
न्याय और सुरक्षा केवल इस्लाम में ही निहित है
![]() |
| http://www.nnilive.com/2010-10-12-09-44-21/5350-nni-natinol-news.html |
इन जगहों पर दौलत का ढेर लगा है और सरकार इनके खि़लाफ़ कोई क़दम नहीं उठाती है। इसके पीछे कारण यह है कि राजनीति करने वालों का इनसे पैक्ट है कि आप तो जनता का ध्यान हमारी तरफ़ मत आने देना और आपके ख़ज़ानों की तरफ़ हम ध्यान नहीं देंगे। पूंजीपतियों ने भी यही संधि राजनेताओं से कर रखी है। इस संधि को नौकरशाह और मीडिया, दोनों ख़ूब जानते हैं लेकिन फिर भी चुप रहते हैं। इसके एवज़ में उनकी ज़िंदगी ऐश से बसर होती है। अपनी ऐश के लिए इन लोगों ने पूरे देश को भूख, ग़रीबी और जुर्म की दलदल में धंसा दिया है। जो भी पत्रकार इनके खि़लाफ़ बोलता है उसे मार दिया जाता है। जो भी साधु इनके खि़लाफ़ बोलता है उसे भी मार दिया जाता है। मिड डे अख़बार के पत्रकार जे डे को मुंबई में और स्वामी निगमानंद को हरिद्वार-देहरादून में मार दिया गया। सब जानते हैं कि इनकी मौत इनके सच बोलने के कारण हुई है। इस तरह ये लोग अंडरवल्र्ड के क़ातिलों को भी अपने मक़सद के लिए इस्तेमाल करते हैं और बदले में उन्हें देश में अपने अवैध धंधे करने की छूट देते हैं। इस समय हमारे समाज की संरचना यह है।
जो भी आदमी अपना जो भी कारोबार कर रहा है या नेता बन रहा है, वह इसी संरचना के अंदर कर रहा है। इस संरचना को तोड़ सके, ऐसा जीवट फ़िलहाल किसी में नज़र नहीं आता और न ही किसी के पास इस संरचना को ध्वस्त करने का कोई तरीक़ा है और न ही एक आदर्श समाज की व्यवहारिक संरचना का कोई ख़ाका उन लोगों के पास है जो भ्रष्टाचार आदि के खि़लाफ़ आंदोलन चला रहे हैं।
यह सब कुछ इस्लाम के अलावा कहीं और है ही नहीं और इस्लाम को ये मानते नहीं। अस्ल समस्या यह है कि समस्याओं के समाधान का जो स्रोत वास्तव में है, उसे लोग मानते ही नहीं। जब लोग सीधे रास्ते पर आगे न बढ़ें तो किसी न किसी दलदल में तो वे गिरेंगे ही। उसके बाद जब ये लोग दलदल में धंस जाते हैं और तरह तरह के कष्ट भोगते हैं तो अपने विचार और अपने कर्म को दोष देने के बजाय दोष ईश्वर को देने लगते हैं। कहते हैं कि ‘क्या ईश्वर ने हमें दुख भोगने के लिए पैदा किया है ?‘
‘नहीं, उसने तो तुम्हें अपना हुक्म मानने के लिए पैदा किया है और दुख से रक्षा का उपाय मात्र यही है तुम्हारे लिए।‘
जो भी बच्चा मेले में अपने बाप की उंगली छोड़ देता है, वह भटक जाता है और जो भटक जाता है वह तब तक कष्ट भोगता है जब तक कि वह दोबारा से अपने बाप की उंगली नहीं थाम लेता।
सुख की सामूहिक उपलब्धि के लिए हमें ईश्वर के बताए ‘सीधे मार्ग‘ पर सामूहिक रूप से ही चलना पड़ेगा वर्ना तब तक जे डे और निगमानंद मरते ही रहेंगे और इनके क़ातिलों के साथ साथ इनका ख़ून उन लोगों की गर्दन पर भी होगा जो कि इस्लाम को नहीं मानते।
न्याय और सुरक्षा केवल इस्लाम में ही निहित है।
जो क़त्ल करेगा, उसका सिर उसके कंधों पर सलामत नहीं छोड़ती है जो व्यवस्था, उसे अपनाने में आनाकानी क्यों ?
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Saturday, June 18, 2011
क्या नास्तिक बंधु इस नई साइंसी खोज को स्वीकार करेंगे ? - Dr. Anwer Jamal
नास्तिक भाई एक ओर तो यह दावा करते हैं कि वे प्रकृति को मानते हैं और यह भी कि वे विज्ञान को मानते हैं लेकिन हक़ीक़त यह है कि उनके मन में नास्तिकता के जो विचार जड़ जमा चुके हैं उनके सामने वे न तो विज्ञान को मानते हैं और न ही प्राकृतिक नियमों को।
पिछले दिनों आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी ने हमारी एक पोस्ट पर टिप्पणी की और अपने नास्तिक मत का तज़्करा करते हुए हमसे सवाल किया था। जिसका हमने उचित जवाब दे दिया था। जिसे आप यहां देख सकते हैं
सवाल हल हो चुकने के बावजूद आज उन्होंने फिर वही सवाल दोहरा दिया। अंतर केवल इतना है कि पहले सवाल उन्होंने अपने शब्दों में किया था और इस बार उन्होंने भगत सिंह को उद्धृत किया है
http://islam.amankapaigham.com/2011/06/blog-post_17.html?showComment=1308385296345#c5253925682720558514भगत सिंह के दिमाग़ में अगर नास्तिकता भरे सवाल उठे तो उसके पीछे एक बड़ी वजह तो यह रही कि उस समय तक लोगों का ख़याल था कि ईश्वर, आत्मा और धर्म में विश्वास माहौल की देन है लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक रिसर्च के बाद यह हक़ीक़त सामने आई है कि यह इंसान की प्रकृति का अभिन्न अंग है। जो चीज़ इंसान की प्रकृति का अभिन्न अंग है, नास्तिक लोग उससे पलायन कैसे कर सकते हैं और करना ही क्यों चाहते हैं ?
फिर प्रकृति को मानने के दावे का क्या होगा ?
ईश्वर और धर्म के नाम पर पुरोहित वर्ग ने कमज़ोर वर्गों का शोषण किया, इसलिए लोगों को ईश्वर और धर्म से विरक्ति हो गई। अगर इस बात को सही मान लिया जाए तो फिर ईश्वर और आत्मा को न मानने वाले दार्शनिकों के विहारों में भी जमकर अनाचार हुआ और नास्तिक राजाओं ने भी जमकर अत्याचार किया। इससे ज़ाहिर है कि नास्तिकता लोगों के दुखों का हल नहीं है बल्कि यह उनके दुखों को और भी ज़्यादा बढ़ा देती है। अगर ऐसा नहीं है तो किसी एक नास्तिक शासक के राज्य का उदाहरण दीजिए, जहां लोगों की बुनियादी ज़रूरतें किसी धर्म आधारित राज्य से ज़्यादा बेहतर तरीक़े से पूरी हो रही हों ?
हक़ और बातिल की इसी पोस्ट पर प्रिय प्रवीण जी भी अपने हलशुदा सवालों को दोहरा रहे हैं। उन्हें लगता है कि ईश्वर की प्रशंसा करना उसकी ईगो को सहलाने जैसा है। वह कहते हैं :
धर्म अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह देता है कि 'फैसले' के खौफ से ज्यादातर इन्सान नियंत्रण में रहते हैं क्योंकि वो नर्क की आग से डरते हैं और स्वर्ग के सुख भोगना चाहते हैं... इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि अधिकाँश Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी अपने मूल स्वभाव को छुपाकर, अपनी अंदरूनी नीचता को काबू कर, नियत तरीके से 'उस' का नियमित Ego Massage करके स्वर्ग में प्रवेश पाने में कामयाब रहेंगे...
और एक बार स्वर्ग पहुंच कर मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) अपने असली रूप में आ जायेगी... क्योंकि इनकी Free Will (स्वतंत्र इच्छा) पर 'उस' का कोई जोर तो चलता नहीं!
हक़ीक़त यह है कि स्वर्ग-नर्क का कॉन्सेप्ट ख़ुद हिंदू संप्रदायों में भिन्न-भिन्न मिलता है। यह नज़रिया यहूदी मत, ईसाई मत और इस्लाम धर्म में भी एक समान नहीं पाया जाता। इसलिए प्रिय प्रवीण जी के सवाल से यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने स्वर्ग-नर्क के विषय में किस मत या किस धर्म की धारणा को बुनियाद बनाकर सवाल किया है ?
प्रत्येक कर्म का एक परिणाम अनिवार्य है। नेक काम का अंजाम अच्छा हो और बुरे काम का परिणाम कष्ट हो, ऐसा मानव की प्रकृति चाहती है। अगर दुनिया में सामूहिक चेतना परिष्कृत हो जाय तो दुनिया में ऐसा ही होगा लेकिन दुनिया में ऐसा नहीं होता। इसलिए दुनिया के बाद ही सही लेकिन इंसान की प्रकृति की मांग पूरी होनी ही चाहिए।
दुनिया में न्याय होता नहीं है। यह एक सत्य बात है। अब अगर लोगों को यह आशा है कि मरने के बाद उन्हें न्याय मिल जाएगा तो नास्तिक बंधु लोगों को न्याय से पूरी तरह निराश क्यों कर देना चाहते हैं ?
ऐसा करके वे समाज को कौन सी सकारात्मक दिशा देना चाहते हैं ?
क्या नास्तिक बंधु इस नई साइंसी खोज को स्वीकार करेंगे ?
Sunday, June 12, 2011
'बाबा का माददा कैसे बढ़े ?' अब असल मुददा यह होना चाहिए
'करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान' के तहत बाबा रामदेव जी के पास अनुभव भी आ ही जाएगा । अस्ल बात मुददे और माददे की है।
मुददा उनका ठीक है और माददा भी उचित खान पान के ज़रिए उनमें बढ़ ही जाएगा।
अब जब कि बाबा ने खाना पीना शुरू कर ही दिया है और एक क्षत्रिय की तरह उन्होंने अंतिम साँस तक लड़ने का ऐलान भी कर दिया है तो हालात का तक़ाज़ा है कि या तो वे पी. टी. ऊषा को अपना कोच बना लें या फिर प्राचीन आर्य क्षत्रियों की तरह वीरोचित भोजन ग्रहण करना शुरू कर दें । इसके लिए उन्हें अपने आहार में विशेष सुधार करना पड़ेगा।
इस संबंध में देखिए मेरा एक लेख आर्य भोजन पर :
http://aryabhojan.blogspot.com
क्या आदमी को बुज़दिल बना देता है लौकी का जूस ?
मुददा उनका ठीक है और माददा भी उचित खान पान के ज़रिए उनमें बढ़ ही जाएगा।
अब जब कि बाबा ने खाना पीना शुरू कर ही दिया है और एक क्षत्रिय की तरह उन्होंने अंतिम साँस तक लड़ने का ऐलान भी कर दिया है तो हालात का तक़ाज़ा है कि या तो वे पी. टी. ऊषा को अपना कोच बना लें या फिर प्राचीन आर्य क्षत्रियों की तरह वीरोचित भोजन ग्रहण करना शुरू कर दें । इसके लिए उन्हें अपने आहार में विशेष सुधार करना पड़ेगा।
इस संबंध में देखिए मेरा एक लेख आर्य भोजन पर :
http://aryabhojan.blogspot.com
क्या आदमी को बुज़दिल बना देता है लौकी का जूस ?
Thursday, April 28, 2011
'तारीफ़ और खुशामद में फ़र्क़' Praise
डाक्टर श्याम कुमार गुप्ता जी हमारे अर्द्धमित्रों में से एक हैं . उनसे हमारी चुहल चलती ही रहती है. उन्हें हमारे बिना चैन नहीं पड़ती और हमें उनके बिना . आज वह हमसे बहस कर रहे हैं 'खुशामद' पर. हमने शालिनी जी की थोड़ी सी तारीफ़ क्या कर दी कि उन्होंने हमें आड़े हाथों ले लिया . हमने उन्हें समझाया कि भाई साहब यह खुशामद नहीं है बल्कि तारीफ़ है, लेकिन वह श्याम गुप्ता जी हैं कोई साधारें आदमी नहीं जो सही बात तुरंत मान जाएँ . लिहाज़ा हम 'तारीफ़ और खुशामद में फ़र्क़' बताने के लिए यह आर्टिकल 'भास्कर. कॉम' से साभार पेश कर रहे हैं . आप भी समझिये और डाक्टर साहब को भी समझिए:
![]() |
| गोपालकृष्ण गांधी |
सिक्के की तरह सराहना के भी दो पहलू होते हैं। एक वह जो सराहता है। दूसरा वह जिसे सराहा जाता है। पहले सराहना करने वाले के बारे में विचार करते हैं। आभार, प्रशंसा, अनुमोदन या सराहना का प्रारंभिक और सबसे विशुद्ध स्वरूप वह होता है, जिसमें शब्दों या संकेतों की कोई भूमिका नहीं होती।- लेखक पूर्व प्रशासक, राजनयिक व राज्यपाल हैं।
यह मूक आभार किसी नवजात शिशु द्वारा उन हाथों के प्रति प्रदर्शित किया जाता है, जो उसे अपने कलेजे से सटाकर रखते हैं। अक्सर ये हाथ मां के होते हैं। आभार का इससे सच्चा स्वरूप कोई दूसरा नहीं है। सराहना के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया जाता है : शाबाश। इसमें प्रशंसा के साथ ही प्रोत्साहन का भी भाव होता है।
जब हम अभिनव बिंद्रा या विजेंदर सिंह, सचिन तेंदुलकर या साइना नेहवाल को शाबाशी देते हैं तो हम उनके खेल की सराहना करने के साथ ही उनकी हौसला अफजाई भी करते हैं। जब यही सराहना बड़े-बुजुर्गो द्वारा की जाती है तो उसे आशीष या मंगल कामना कहा जाता है।
बुजुर्गो की सराहना में प्रशंसा के साथ ही प्रार्थना का भी भाव होता है। प्रार्थना यह कि हम इसी तरह यश प्राप्त करते रहें। सराहना का एक और रूप वह है, जिसमें अनुमोदन होता है। जैसे : ‘बहुत खूब, लगे रहो’। इसमें श्रेय देने का भाव होता है। इस सराहना में हमारी उपलब्धियों के लिए हमारी पीठ थपथपाई जाती है। लेकिन कुछ लोग इस तरह सराहना करते हैं, जैसे उसके एवज में उन्हें भी कुछ चाहिए।
इशारों की दुनिया में शब्दों की कोई जरूरत नहीं होती, जैसे तालियां बजाना। आम तौर पर किसी व्यक्ति को सराहने के लिए तालियां बजाई जाती हैं। लेकिन तालियों में कुछ-कुछ ‘आरोहण’ जैसी बात होती है। जैसे कोई चीज हमें ऊपर उठा रही हो। यह ऐसा ही है, जैसे सराहना के ‘सा’ को मंद्रसप्तक से तारसप्तक में पहुंचा दिया गया हो।
विनम्रतापूर्वक आभार जताने के लिए हम धीमे-से तालियां बजाते हैं। सराहना में तालियों का स्वर थोड़ा ऊपर उठ जाता है। जबकि प्रशंसा में बजाई गई जोरदार तालियां वे होती हैं, जिनसे सभागार गूंजने लगता है। लेकिन शायद तालियों के माध्यम से सराहना की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति वह होती है, जब तालियां दिमाग से नहीं, दिल से बजाई जाती हैं।
सराहना में जब भावना शामिल हो जाती है, तब तालियां थमना नहीं चाहतीं। वे खुशी के मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहतीं। तालियां देर तक बजती हैं और अपने उल्लास को दूर तक पहुंचा देती हैं। प्रशंसा के इस स्वरूप में थोड़ा निस्वार्थ भाव भी है।
यह ऐसी प्रशंसा है, जो फुहारों की तरह पूरे हृदय से अपने अनुग्रह को व्यक्त करती है। इस प्रशंसा का कारण कुछ भी हो सकता है : कोई ऐसा गीत, जो दिल को छू गया हो। किसी बल्लेबाज द्वारा खेली गई कोई महान पारी या किसी एथलीट द्वारा किया गया शानदार प्रदर्शन। या नेक इरादों के साथ किया गया कोई काम, जिसके प्रति हमारे मन में सराहना फूट पड़ी हो।
मैंने करतल ध्वनि के साथ की गई इस तरह की सराहना देखी है। जब बांग्लादेश के पितृपुरुष शेख मुजीबुर्रहमान कैद से छूटकर दिल्ली पहुंचे और जब नेल्सन मंडेला बेड़ियों से मुक्त हुए, तब उनका स्वागत इसी तरह किया गया था। मैं कल्पना कर सकता हूं, नजरबंदी से मुक्त होने के बाद स्वतंत्रतापूर्वक अपने देश की यात्रा कर रहीं आंग सान सूची का भी इसी तरह स्वागत किया जाता होगा, क्योंकि म्यांमार के लोग उन्हें प्यार करते हैं।
इन सभी में सराहना करने वाले और सराहे जाने वाले समान हैं। दोनों एक-दूसरे के परिपूरक हैं। लेकिन सराहना का एक स्याह पहलू भी है। मैं इसे मनुष्य के स्वभाव की चालाकी ही कह सकता हूं, जिसके कारण सराहना अभिव्यक्ति के स्थान पर एक उपकरण बनकर रह गई है।
सही अनुपात में की जाने वाली सराहना वह है, जो किसी व्यक्ति की उपलब्धियों के अनुरूप होती है। लेकिन जब गुणगान के गणित के तहत अतिशयोक्ति के साथ सराहना की जाती है तो उसका स्वरूप विकृत हो जाता है। खुशामद के मकसद से की जाने वाली सराहना एक रोग की तरह होती है। यह संक्रामक रोग है। अतिशयोक्तियां बढ़ती जाती हैं, अंकगणित की गति से नहीं, बल्कि बीजगणित की चाल से।
लेकिन यह कोई नई बात नहीं। खुशामद या चाटुकारिता के मकसद से की जाने वाली सराहना उतनी ही पुरानी है, जितना कि हमारा महाकाव्यात्मक साहित्य। सराहना है ‘प्रशंसा’। खुशामद है ‘प्रशस्ति’। हमें आजकल के उन लोगों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए, जिन्होंने सराहना की स्वाभाविक कला को खुशामद के विज्ञान का रूप दे दिया है।
वास्तव में वे एक लंबी और स्थापित परंपरा का अनुसरण कर रहे हैं। फर्क केवल इतना है कि उसमें उन्होंने कुछ और नई चीजें जोड़ दी हैं। लेकिन उन्हें दोषी नहीं ठहराने का यह मतलब नहीं कि हमें उनका अनुसरण करना चाहिए। खुशामद के भी दो पहलू होते हैं।
एक वह जो खुशामद करता है, दूसरा वह जिसकी खुशामद की जाती है। संस्कृत में खुशामद के लिए एक शब्द है : मुखस्तुति। यह एक शब्द ही सारी कहानी बयां कर देता है। किसी व्यक्ति के सामने उसकी प्रशंसा करने का अर्थ है मुखस्तुति। यह किसी व्यक्ति के पीछे उसकी निंदा करने जितना ही बुरा है। सराहना की ही तरह खुशामद के भी कई प्रकार होते हैं।
वार्षिक कार्यक्रम उत्सव का अवसर होते हैं, लेकिन वे खुशामद का मंच बनकर रह गए हैं। इतना ही नहीं, इस तरह के आयोजनों में खुशामद की होड़ भी लग जाती है। यदि कोई कहता है कि यह एक महान व्यक्ति की जयंती है, तो दूसरा कहता है यह महानतम व्यक्ति का जन्म दिवस है।
हम फैलाव और स्फीति के युग में जी रहे हैं। गद्य फैलकर लफ्फाजी बन जाता है। कविता फैलकर महाकाव्य बन जाती है। नाटक फैलकर अतिनाटक बन जाता है। जब मुखस्तुति का क्रम साल-दर-साल जारी रहता है तो जिनकी स्तुति की जा रही है, वे भी अंतत: यह महसूस करने लगते हैं कि वे वास्तव में विशिष्ट हैं।
लेकिन जो व्यक्ति प्रबुद्ध हैं, वे खुशामद करने वालों को टोक देते हैं। वे कहते हैं : ‘ठहरो, मुझे या अपने आपको भुलावे में न रखो। यदि मैं अच्छा काम कर रहा हूं, तो मुझे प्रोत्साहित करो, लेकिन मेरी खुशामद मत करो।’ लेकिन खुशामद की आदत बदस्तूर जारी रहती है।
जिन लोगों की खुशामद की जाती है, उनसे मैं एक बात कहना चाहूंगा। शायद उन्हें इस पर विश्वास न हो, लेकिन खुशामद वास्तव में घृणा का एक स्वरूप है। आपकी खुशामद करने वाला व्यक्ति वह है, जो आपसे डरता है या आपसे ईष्र्या करता है।
शायद वह आपसे इतना पीछे है कि वह खुशामद की हवा पर सवार होकर आप तक पहुंचना चाहता है। लेकिन खुशामद के खतरों के प्रति सजग होने के बावजूद हमें वास्तविक सराहना जारी रखनी चाहिए। ईमानदारी से की गई सराहना तोहफों की तरह होती है। तोहफों को सहेजकर नहीं रखा जाता।
न ही उन्हें व्यर्थ जाने दिया जाता है। उन्हें सही अवसर पर सहजता और ईमानदारी के साथ उपयुक्त व्यक्ति को दिया जाता है। तोहफे कभी भी पात्रता से कम या ज्यादा नहीं होते।
Thursday, April 7, 2011
दो ब्लॉग पर एक ही पोस्ट , अजय जी के साहस को हमारा सलाम मय 11 तोप के गोलों के साथ इसलिए कि शायद सोने वाले जाग जाएं भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ Corruption
अजय कुमार झा जी एक रूतबे वाले पत्रकार हैं और हमारी वाणी के मार्गदर्शक मंडल के प्रमुख से लेकर सामान्य तक हरेक सदस्य से उनकी जान पहचान भी अच्छी है । जो भी हो ग़लत आख़िर ग़लत है ।
अजय जी ने एक ही पोस्ट दो ब्लॉग पर डाल दी है और शीर्षक भी ज्यादा नहीं बदला ।
जगह जगह मौक़ा बेमौक़ा नियमावली बाँचने वाले द्विवेदी जी की पोस्ट भी उनके ऊपर नज़र आ रही है लेकिन ऐसे मौक़ों पर ये लोग धृतराष्ट्र का रोल प्ले करने लगते हैं ।
देखते हैं कि हमारी वाणी धर्म और अजय जी का रूतबा दरकिनार करके उनके दोनों ब्लॉग्स को आज निलंबित करती है या कल ?
अजय जी ने एक ही पोस्ट दो ब्लॉग पर डाल दी है और शीर्षक भी ज्यादा नहीं बदला ।
जगह जगह मौक़ा बेमौक़ा नियमावली बाँचने वाले द्विवेदी जी की पोस्ट भी उनके ऊपर नज़र आ रही है लेकिन ऐसे मौक़ों पर ये लोग धृतराष्ट्र का रोल प्ले करने लगते हैं ।
देखते हैं कि हमारी वाणी धर्म और अजय जी का रूतबा दरकिनार करके उनके दोनों ब्लॉग्स को आज निलंबित करती है या कल ?
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