Showing posts with label 'शंतिकरण'. Show all posts
Showing posts with label 'शंतिकरण'. Show all posts

Thursday, April 28, 2011

'तारीफ़ और खुशामद में फ़र्क़' Praise

डाक्टर श्याम कुमार गुप्ता जी हमारे अर्द्धमित्रों  में से एक हैं . उनसे हमारी चुहल चलती ही रहती है. उन्हें हमारे बिना चैन नहीं पड़ती और हमें उनके बिना . आज वह हमसे बहस कर रहे हैं 'खुशामद' पर. हमने शालिनी जी की थोड़ी सी तारीफ़ क्या कर दी कि उन्होंने हमें आड़े हाथों ले लिया . हमने उन्हें समझाया कि भाई साहब यह खुशामद नहीं है बल्कि तारीफ़ है, लेकिन वह श्याम गुप्ता जी हैं कोई साधारें आदमी नहीं जो सही बात तुरंत मान जाएँ . लिहाज़ा हम 'तारीफ़ और खुशामद में  फ़र्क़' बताने  के लिए यह आर्टिकल 'भास्कर. कॉम' से साभार पेश कर रहे हैं . आप भी समझिये और डाक्टर साहब को भी समझिए:
    
गोपालकृष्ण गांधी
सिक्के की तरह सराहना के भी दो पहलू होते हैं। एक वह जो सराहता है। दूसरा वह जिसे सराहा जाता है। पहले सराहना करने वाले के बारे में विचार करते हैं। आभार, प्रशंसा, अनुमोदन या सराहना का प्रारंभिक और सबसे विशुद्ध स्वरूप वह होता है, जिसमें शब्दों या संकेतों की कोई भूमिका नहीं होती। 
यह मूक आभार किसी नवजात शिशु द्वारा उन हाथों के प्रति प्रदर्शित किया जाता है, जो उसे अपने कलेजे से सटाकर रखते हैं। अक्सर ये हाथ मां के होते हैं। आभार का इससे सच्चा स्वरूप कोई दूसरा नहीं है। सराहना के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया जाता है : शाबाश। इसमें प्रशंसा के साथ ही प्रोत्साहन का भी भाव होता है। 
जब हम अभिनव बिंद्रा या विजेंदर सिंह, सचिन तेंदुलकर या साइना नेहवाल को शाबाशी देते हैं तो हम उनके खेल की सराहना करने के साथ ही उनकी हौसला अफजाई भी करते हैं। जब यही सराहना बड़े-बुजुर्गो द्वारा की जाती है तो उसे आशीष या मंगल कामना कहा जाता है। 
बुजुर्गो की सराहना में प्रशंसा के साथ ही प्रार्थना का भी भाव होता है। प्रार्थना यह कि हम इसी तरह यश प्राप्त करते रहें। सराहना का एक और रूप वह है, जिसमें अनुमोदन होता है। जैसे : ‘बहुत खूब, लगे रहो’। इसमें श्रेय देने का भाव होता है। इस सराहना में हमारी उपलब्धियों के लिए हमारी पीठ थपथपाई जाती है। लेकिन कुछ लोग इस तरह सराहना करते हैं, जैसे उसके एवज में उन्हें भी कुछ चाहिए।
इशारों की दुनिया में शब्दों की कोई जरूरत नहीं होती, जैसे तालियां बजाना। आम तौर पर किसी व्यक्ति को सराहने के लिए तालियां बजाई जाती हैं। लेकिन तालियों में कुछ-कुछ ‘आरोहण’ जैसी बात होती है। जैसे कोई चीज हमें ऊपर उठा रही हो। यह ऐसा ही है, जैसे सराहना के ‘सा’ को मंद्रसप्तक से तारसप्तक में पहुंचा दिया गया हो। 
विनम्रतापूर्वक आभार जताने के लिए हम धीमे-से तालियां बजाते हैं। सराहना में तालियों का स्वर थोड़ा ऊपर उठ जाता है। जबकि प्रशंसा में बजाई गई जोरदार तालियां वे होती हैं, जिनसे सभागार गूंजने लगता है। लेकिन शायद तालियों के माध्यम से सराहना की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति वह होती है, जब तालियां दिमाग से नहीं, दिल से बजाई जाती हैं। 
सराहना में जब भावना शामिल हो जाती है, तब तालियां थमना नहीं चाहतीं। वे खुशी के मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहतीं। तालियां देर तक बजती हैं और अपने उल्लास को दूर तक पहुंचा देती हैं। प्रशंसा के इस स्वरूप में थोड़ा निस्वार्थ भाव भी है। 
यह ऐसी प्रशंसा है, जो फुहारों की तरह पूरे हृदय से अपने अनुग्रह को व्यक्त करती है। इस प्रशंसा का कारण कुछ भी हो सकता है : कोई ऐसा गीत, जो दिल को छू गया हो। किसी बल्लेबाज द्वारा खेली गई कोई महान पारी या किसी एथलीट द्वारा किया गया शानदार प्रदर्शन। या नेक इरादों के साथ किया गया कोई काम, जिसके प्रति हमारे मन में सराहना फूट पड़ी हो। 
मैंने करतल ध्वनि के साथ की गई इस तरह की सराहना देखी है। जब बांग्लादेश के पितृपुरुष शेख मुजीबुर्रहमान कैद से छूटकर दिल्ली पहुंचे और जब नेल्सन मंडेला बेड़ियों से मुक्त हुए, तब उनका स्वागत इसी तरह किया गया था। मैं कल्पना कर सकता हूं, नजरबंदी से मुक्त होने के बाद स्वतंत्रतापूर्वक अपने देश की यात्रा कर रहीं आंग सान सूची का भी इसी तरह स्वागत किया जाता होगा, क्योंकि म्यांमार के लोग उन्हें प्यार करते हैं।
इन सभी में सराहना करने वाले और सराहे जाने वाले समान हैं। दोनों एक-दूसरे के परिपूरक हैं। लेकिन सराहना का एक स्याह पहलू भी है। मैं इसे मनुष्य के स्वभाव की चालाकी ही कह सकता हूं, जिसके कारण सराहना अभिव्यक्ति के स्थान पर एक उपकरण बनकर रह गई है। 
सही अनुपात में की जाने वाली सराहना वह है, जो किसी व्यक्ति की उपलब्धियों के अनुरूप होती है। लेकिन जब गुणगान के गणित के तहत अतिशयोक्ति के साथ सराहना की जाती है तो उसका स्वरूप विकृत हो जाता है। खुशामद के मकसद से की जाने वाली सराहना एक रोग की तरह होती है। यह संक्रामक रोग है। अतिशयोक्तियां बढ़ती जाती हैं, अंकगणित की गति से नहीं, बल्कि बीजगणित की चाल से।
लेकिन यह कोई नई बात नहीं। खुशामद या चाटुकारिता के मकसद से की जाने वाली सराहना उतनी ही पुरानी है, जितना कि हमारा महाकाव्यात्मक साहित्य। सराहना है ‘प्रशंसा’। खुशामद है ‘प्रशस्ति’। हमें आजकल के उन लोगों को दोषी नहीं ठहराना चाहिए, जिन्होंने सराहना की स्वाभाविक कला को खुशामद के विज्ञान का रूप दे दिया है। 
वास्तव में वे एक लंबी और स्थापित परंपरा का अनुसरण कर रहे हैं। फर्क केवल इतना है कि उसमें उन्होंने कुछ और नई चीजें जोड़ दी हैं। लेकिन उन्हें दोषी नहीं ठहराने का यह मतलब नहीं कि हमें उनका अनुसरण करना चाहिए। खुशामद के भी दो पहलू होते हैं। 
एक वह जो खुशामद करता है, दूसरा वह जिसकी खुशामद की जाती है। संस्कृत में खुशामद के लिए एक शब्द है : मुखस्तुति। यह एक शब्द ही सारी कहानी बयां कर देता है। किसी व्यक्ति के सामने उसकी प्रशंसा करने का अर्थ है मुखस्तुति। यह किसी व्यक्ति के पीछे उसकी निंदा करने जितना ही बुरा है। सराहना की ही तरह खुशामद के भी कई प्रकार होते हैं। 
वार्षिक कार्यक्रम उत्सव का अवसर होते हैं, लेकिन वे खुशामद का मंच बनकर रह गए हैं। इतना ही नहीं, इस तरह के आयोजनों में खुशामद की होड़ भी लग जाती है। यदि कोई कहता है कि यह एक महान व्यक्ति की जयंती है, तो दूसरा कहता है यह महानतम व्यक्ति का जन्म दिवस है। 
हम फैलाव और स्फीति के युग में जी रहे हैं। गद्य फैलकर लफ्फाजी बन जाता है। कविता फैलकर महाकाव्य बन जाती है। नाटक फैलकर अतिनाटक बन जाता है। जब मुखस्तुति का क्रम साल-दर-साल जारी रहता है तो जिनकी स्तुति की जा रही है, वे भी अंतत: यह महसूस करने लगते हैं कि वे वास्तव में विशिष्ट हैं। 
लेकिन जो व्यक्ति प्रबुद्ध हैं, वे खुशामद करने वालों को टोक देते हैं। वे कहते हैं : ‘ठहरो, मुझे या अपने आपको भुलावे में न रखो। यदि मैं अच्छा काम कर रहा हूं, तो मुझे प्रोत्साहित करो, लेकिन मेरी खुशामद मत करो।’ लेकिन खुशामद की आदत बदस्तूर जारी रहती है। 
जिन लोगों की खुशामद की जाती है, उनसे मैं एक बात कहना चाहूंगा। शायद उन्हें इस पर विश्वास न हो, लेकिन खुशामद वास्तव में घृणा का एक स्वरूप है। आपकी खुशामद करने वाला व्यक्ति वह है, जो आपसे डरता है या आपसे ईष्र्या करता है। 
शायद वह आपसे इतना पीछे है कि वह खुशामद की हवा पर सवार होकर आप तक पहुंचना चाहता है। लेकिन खुशामद के खतरों के प्रति सजग होने के बावजूद हमें वास्तविक सराहना जारी रखनी चाहिए। ईमानदारी से की गई सराहना तोहफों की तरह होती है। तोहफों को सहेजकर नहीं रखा जाता। 
न ही उन्हें व्यर्थ जाने दिया जाता है। उन्हें सही अवसर पर सहजता और ईमानदारी के साथ उपयुक्त व्यक्ति को दिया जाता है। तोहफे कभी भी पात्रता से कम या ज्यादा नहीं होते।
                                                - लेखक पूर्व प्रशासक, राजनयिक व राज्यपाल हैं।