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Sunday, June 19, 2011

न्याय और सुरक्षा केवल इस्लाम में ही निहित है

http://www.nnilive.com/2010-10-12-09-44-21/5350-nni-natinol-news.html
मंदिरों और मज़ारों पर लोग चढ़ावे चढ़ाते हैं और वहां दौलत के ढेर लग जाते हैं। साधुओं और क़लंदरों को दौलत की ज़रूरत कभी नहीं रही। उनके रूप बनाकर आजकल नक़ली लोग आस्था का व्यापार कर रहे हैं। अगर इन लोगों के पास केवल ज़रूरतें पूरी होने जितना धन छोड़कर बाक़ी को उसी संप्रदाय के ग़रीब लोगों के कल्याण में ख़र्च कर दिया जाए तो दान दाता का मक़सद पूरा हो जाएगा। जो साधू और जो क़लंदर सरकार के इस क़दम का विरोध करे तो समझ लीजिए कि यह दौलत का पुजारी है ईश्वर का पुजारी नहीं है।
इन जगहों पर दौलत का ढेर लगा है और सरकार इनके खि़लाफ़ कोई क़दम नहीं उठाती है। इसके पीछे कारण यह है कि राजनीति करने वालों का इनसे पैक्ट है कि आप तो जनता का ध्यान हमारी तरफ़ मत आने देना और आपके ख़ज़ानों की तरफ़ हम ध्यान नहीं देंगे। पूंजीपतियों ने भी यही संधि राजनेताओं से कर रखी है। इस संधि को नौकरशाह और मीडिया, दोनों ख़ूब जानते हैं लेकिन फिर भी चुप रहते हैं। इसके एवज़ में उनकी ज़िंदगी ऐश से बसर होती है। अपनी ऐश के लिए इन लोगों ने पूरे देश को भूख, ग़रीबी और जुर्म की दलदल में धंसा दिया है। जो भी पत्रकार इनके खि़लाफ़ बोलता है उसे मार दिया जाता है। जो भी साधु इनके खि़लाफ़ बोलता है उसे भी मार दिया जाता है। मिड डे अख़बार के पत्रकार जे डे को मुंबई में और स्वामी निगमानंद को हरिद्वार-देहरादून में मार दिया गया। सब जानते हैं कि इनकी मौत इनके सच बोलने के कारण हुई है। इस तरह ये लोग अंडरवल्र्ड के क़ातिलों को भी अपने मक़सद के लिए इस्तेमाल करते हैं और बदले में उन्हें देश में अपने अवैध धंधे करने की छूट देते हैं। इस समय हमारे समाज की संरचना यह है। 
जो भी आदमी अपना जो भी कारोबार कर रहा है या नेता बन रहा है, वह इसी संरचना के अंदर कर रहा है। इस संरचना को तोड़ सके, ऐसा जीवट फ़िलहाल किसी में नज़र नहीं आता और न ही किसी के पास इस संरचना को ध्वस्त करने का कोई तरीक़ा है और न ही एक आदर्श समाज की व्यवहारिक संरचना का कोई ख़ाका उन लोगों के पास है जो भ्रष्टाचार आदि के खि़लाफ़ आंदोलन चला रहे हैं। 
यह सब कुछ इस्लाम के अलावा कहीं और है ही नहीं और इस्लाम को ये मानते नहीं। अस्ल समस्या यह है कि समस्याओं के समाधान का जो स्रोत वास्तव में है, उसे लोग मानते ही नहीं। जब लोग सीधे रास्ते पर आगे न बढ़ें तो किसी न किसी दलदल में तो वे गिरेंगे ही। उसके बाद जब ये लोग दलदल में धंस जाते हैं और तरह तरह के कष्ट भोगते हैं तो अपने विचार और अपने कर्म को दोष देने के बजाय दोष ईश्वर को देने लगते हैं। कहते हैं कि ‘क्या ईश्वर ने हमें दुख भोगने के लिए पैदा किया है ?‘
‘नहीं, उसने तो तुम्हें अपना हुक्म मानने के लिए पैदा किया है और दुख से रक्षा का उपाय मात्र यही है तुम्हारे लिए।‘
जो भी बच्चा मेले में अपने बाप की उंगली छोड़ देता है, वह भटक जाता है और जो भटक जाता है वह तब तक कष्ट भोगता है जब तक कि वह दोबारा से अपने बाप की उंगली नहीं थाम लेता।
सुख की सामूहिक उपलब्धि के लिए हमें ईश्वर के बताए ‘सीधे मार्ग‘ पर सामूहिक रूप से ही चलना पड़ेगा वर्ना तब तक जे डे और निगमानंद मरते ही रहेंगे और इनके क़ातिलों के साथ साथ इनका ख़ून उन लोगों की गर्दन पर भी होगा जो कि इस्लाम को नहीं मानते। 
न्याय और सुरक्षा केवल इस्लाम में ही निहित है।
जो क़त्ल करेगा, उसका सिर उसके कंधों पर सलामत नहीं छोड़ती है जो व्यवस्था, उसे अपनाने में आनाकानी क्यों ? 

Thursday, April 21, 2011

21 वीं सदी के अंत तक यूरोप का इस्लामीकरण : एक संभावना - Harikrishan Nigam


पश्चिम में यदि द्रुतगति से फैलने वाली आज की यदि कोई आस्था है तो वह है इस्लाम और इसीलिए उन्होंने इस चौंकाने वाली संभावना को रेखांकित किया है कि इस सदी के अंत तक यूरोप इस्लामी रंग को अपना सकता है, चाहे संगठित चर्च संप्रदायों के साथ-साथ उग्रवाद के संबंध में कितनी ही वैचारिक उठापठक की जाए। जनगणनाओं के विश्लेषणों, या जनसांख्यिकी दबाव भी यही सिद्ध करते हैं कि जिन पर तर्कों के जाल में यदि चाहें तो हम लोगों को भ्रमित करते रह सकते हैं। सहसा विश्वास नहीं होता है कि चर्च की यूरोप जैसी अभेद्य हृदयस्थली को, इस्लाम के विरूद्ध प्रचार के बावजूद, बर्नार्ड लिविस जैसे विश्वप्रसिद्ध विचारक भी मानते हैं, इस सदी के अंत तक, मुस्लिम आस्था नियंत्रित कर सकेगी। कभी-कभी ऐसा लगता है कि बर्नार्ड लिविस का यह प्रश्न उठाना आज के विकास क्रम के लिए श्रेयस्कर है क्योंकि इसके द्वारा विश्व राजनीति का मानचित्र फिर बदला सकता है। हाल में फ्रांसीसी समाचार एजेन्सी एएफपी और एसोसिएटेड प्रेस द्वारा प्रसारित ‘द फोरम आन रिलिजन एंड पब्लिक लाइफ’ के एक तीन वर्षीय अध्ययन से यह तथ्य उजागर हुआ है कि आज विश्वभर में हर चार में से एक व्यक्ति इस्लामी आस्था को मानता है। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम जनसंख्या वाले 90 देशों में भारत का स्थान आज तीसरा है। हमारे देश के ऊपर मात्र इण्डोनेशिया और पाकिस्तान ही हैं। चाहे बांग्लादेश हो या मिस्र, ईरान, तुर्की और अल्जीरिया या मोरक्को हो वहां मुसलमानों की संख्या भारत से कम है। हमारे देश में उनकी संख्या 16 करोड़ है। इसी अध्ययन में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि जर्मनी में लेबनान से अधिक मुस्लिम नागरिक हैं, चीन में इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले सीरिया से अधिक हैं और रूस, जार्डन और लीबिया की कुल मिलाकर मुस्लिम जनसंसख्या अधिक है। आज यह अवधारणा कि इसलाम धर्मावलंबी अरब मूल में है ध्वस्त हो चुकी है और यह पूरी तरह से एक वैश्विक समुदाय है।  - हरिकृष्ण निगम
इस लेख को पूरा पढ़ना बहुत से राज़ सामने ले आता है . लिंक यह है :