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| http://www.nnilive.com/2010-10-12-09-44-21/5350-nni-natinol-news.html |
इन जगहों पर दौलत का ढेर लगा है और सरकार इनके खि़लाफ़ कोई क़दम नहीं उठाती है। इसके पीछे कारण यह है कि राजनीति करने वालों का इनसे पैक्ट है कि आप तो जनता का ध्यान हमारी तरफ़ मत आने देना और आपके ख़ज़ानों की तरफ़ हम ध्यान नहीं देंगे। पूंजीपतियों ने भी यही संधि राजनेताओं से कर रखी है। इस संधि को नौकरशाह और मीडिया, दोनों ख़ूब जानते हैं लेकिन फिर भी चुप रहते हैं। इसके एवज़ में उनकी ज़िंदगी ऐश से बसर होती है। अपनी ऐश के लिए इन लोगों ने पूरे देश को भूख, ग़रीबी और जुर्म की दलदल में धंसा दिया है। जो भी पत्रकार इनके खि़लाफ़ बोलता है उसे मार दिया जाता है। जो भी साधु इनके खि़लाफ़ बोलता है उसे भी मार दिया जाता है। मिड डे अख़बार के पत्रकार जे डे को मुंबई में और स्वामी निगमानंद को हरिद्वार-देहरादून में मार दिया गया। सब जानते हैं कि इनकी मौत इनके सच बोलने के कारण हुई है। इस तरह ये लोग अंडरवल्र्ड के क़ातिलों को भी अपने मक़सद के लिए इस्तेमाल करते हैं और बदले में उन्हें देश में अपने अवैध धंधे करने की छूट देते हैं। इस समय हमारे समाज की संरचना यह है।
जो भी आदमी अपना जो भी कारोबार कर रहा है या नेता बन रहा है, वह इसी संरचना के अंदर कर रहा है। इस संरचना को तोड़ सके, ऐसा जीवट फ़िलहाल किसी में नज़र नहीं आता और न ही किसी के पास इस संरचना को ध्वस्त करने का कोई तरीक़ा है और न ही एक आदर्श समाज की व्यवहारिक संरचना का कोई ख़ाका उन लोगों के पास है जो भ्रष्टाचार आदि के खि़लाफ़ आंदोलन चला रहे हैं।
यह सब कुछ इस्लाम के अलावा कहीं और है ही नहीं और इस्लाम को ये मानते नहीं। अस्ल समस्या यह है कि समस्याओं के समाधान का जो स्रोत वास्तव में है, उसे लोग मानते ही नहीं। जब लोग सीधे रास्ते पर आगे न बढ़ें तो किसी न किसी दलदल में तो वे गिरेंगे ही। उसके बाद जब ये लोग दलदल में धंस जाते हैं और तरह तरह के कष्ट भोगते हैं तो अपने विचार और अपने कर्म को दोष देने के बजाय दोष ईश्वर को देने लगते हैं। कहते हैं कि ‘क्या ईश्वर ने हमें दुख भोगने के लिए पैदा किया है ?‘
‘नहीं, उसने तो तुम्हें अपना हुक्म मानने के लिए पैदा किया है और दुख से रक्षा का उपाय मात्र यही है तुम्हारे लिए।‘
जो भी बच्चा मेले में अपने बाप की उंगली छोड़ देता है, वह भटक जाता है और जो भटक जाता है वह तब तक कष्ट भोगता है जब तक कि वह दोबारा से अपने बाप की उंगली नहीं थाम लेता।
सुख की सामूहिक उपलब्धि के लिए हमें ईश्वर के बताए ‘सीधे मार्ग‘ पर सामूहिक रूप से ही चलना पड़ेगा वर्ना तब तक जे डे और निगमानंद मरते ही रहेंगे और इनके क़ातिलों के साथ साथ इनका ख़ून उन लोगों की गर्दन पर भी होगा जो कि इस्लाम को नहीं मानते।
न्याय और सुरक्षा केवल इस्लाम में ही निहित है।
जो क़त्ल करेगा, उसका सिर उसके कंधों पर सलामत नहीं छोड़ती है जो व्यवस्था, उसे अपनाने में आनाकानी क्यों ?

