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Monday, May 16, 2011

जनता ख़ुद ग़लत है और ग़लत लोगों को ही वह चुनती है Self Improovement

@ सुरेंद्र जी !
@ भूषण जी !
एक रूख़ से यह बात सही है कि जनता भेड़ की तरह मूंडी जाती है जहां भी वह जाती है लेकिन दूसरा रूख़ यह है कि जो लोग जनता को मूंडते हैं उन्हें जनता ने ख़ुद चुना होता है। अगर वे लोग ग़लत हैं तो उन्हें चुनने वालों की ग़लती है कि जनता हमेशा से ग़लत लोगों को ही क्यों चुनती आ रही है ?
देखिए यह लेख -        
देश में फैल रहे भ्रष्टाचार की ज़िम्मेदार जनता - Sharif Khan


जनता का कैरेक्टर क्या है ?
जनता की अक्सरियत ख़ुद बदमाश है।
आप स्टेशन पर जनता के अंग किसी एक वेंडर से चाय लीजिए। वह आपको ऐसी चाय पिलाएगा कि उसे पीकर आप तुरंत ही चाय पीने से तौबा कर लेंगे। आप बाहर निकलिएगा तो ऑटो  वाला आपसे नाजायज़ किराया मांगेगा। वह भी जनता का ही अंग है। आप रेस्टोरेंट या ढाबे पर जाएंगे तो वह आपको कितनी भी पुरानी सब्ज़ी परोस सकता है। आप पूजा के लिए केसर ख़रीदिए तो उसमें केसर के बजाय भुट्टे के बाल रंगे हुए निकलेंगे। आप पूजा का नारियल ख़रीदिए तो उसमें गिरी ही नहीं निकलेगी। आप अंदर मंदिर में जाएंगे तो वहां आपको पता चलेगा कि  ‘ये स्थल निःसंदेह देव रहित हैं '‘ (लिंक पर जाएं)
जगह-जगह घूमते हुए साधुओं को देखिएगा और उन्हें जानिएगा तो आपको पता चलेगा कि असली साधु तो कम हैं और नक़ली ज़्यादा हैं और उनमें बहुत से तो ऐसे हैं जो कि वांछित अपराधी हैं और इस रूप में फ़रारी काट रहे हैं।
ऐसे ही कुछ लोगों को तो जनता ईश्वर तक मान बैठती है। उन्हें मौत भी आती है और उनके पास से जनता का लूटा हुआ अकूत धन भी मिलता है लेकिन जनता उन्हें फिर भी ईश्वर ही मानती है।
...तो ऐसी है इस देश की जनता। धोखाधड़ी और झूठ आम है यहां। यही जनता दहेज लेती-देती है, जिससे पता चलता है कि इसमें हवस कूट-कूट कर भरी हुई है और इसे सामाजिक सरोकार से कोई लेना-देना नहीं है। यही जनता कन्या भ्रूण को पेट में मार डालती है। खरबों रूपये की शराब यही जनता पीती है। यही जनता राष्ट्रीय संपत्ति में आग लगाती है। यही जनता भड़काऊ लोगों को अपना नेता बनाती है। यही जनता अच्छे प्रतिनिधियों को मात्र इसलिए हरा देती है क्योंकि वह उनकी जाति, संप्रदाय और कल्चर वाला नहीं होता।

जनता ख़ुद ग़लत है और ग़लत लोगों को ही वह चुनती है। ग़लती का अंजाम सही होता ही नहीं और जनता यही चाहती है कि उसके ग़लत रहते हुए भी उसका कल्याण हो जाए, यह संभव नहीं है।
शुक्र है कि हमारे समाज में नेक लोग आज भी मौजूद हैं। उन्हीं के दम से सही और ग़लत की तमीज़ आज भी बाक़ी है लेकिन वे अल्पसंख्यक हैं।
आपने मेरे लेख पर टिप्पणी की , इसके लिए आपका शुक्रिया !

इस पूरे संवाद की पृष्ठभूमि जानने के लिए आपे देखें मेरा पिछला लेख इसी ब्लॉग पर -
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/05/face-off.html