ऐ अल्लाह! इस बच्ची को हमारी नजात व आसाइश के लिये आगे जाने वाला बना और उसकी जुदाई के सदमे को हमारे लिये बाइसे अज्र और ज़ख़ीरा बना और उसको हमारी ऐसी शिफ़ाअत करने वाला बना जो क़ुबूल कर ली जाये।
-आसान फ़िक्ह, हिस्सा अव्वल, लेखक मुहम्मद यूसुफ़ इस्लाही, मक्तबा ज़िकरा, दिल्ली
दुआ का अरबी उच्चारण यूं है-
अल्लाहुम्मजअल्हा-लना फ़रतंव्व-वज्अल्हा लना अज्रंव-व ज़ुख़रंव-वज्अल्हा लना शाफ़िअंव्व-व मुशफ़्फ़िअः ।
रिश्तेदार और दोस्त आ रहे थे और कुछ आ भी चुके थे। उनके दरम्यान मैं ‘आसान फ़िक्ह‘ खोलकर यह दुआ देख और समझ रहा था। इस दुआ में अनमोल मारिफ़त के ख़ज़ाने और दुखी दिल की तसल्ली का पूरा सामान मौजूद है।
यह दुआ हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पवित्र वचनों में से एक है। इस दुआ को नाबालिग़ बच्ची की मौत के बाद उसकी नमाज़ ए जनाज़ः में पढ़ा जाता है।
मेरी बेटी अनम भी बालिग़ होने से पहले ही चल बसी। वह राम 4 बजे तक ठीक थी, अपनी मां का उसने दूध पिया। रोज़ की तरह आज सुबह भी उसकी मां ने जल्दी जल्दी बच्चों को तैयार किया, उन्हें स्कूल भेजा और उसके बाद उन्होंने अनम को उसके झूले से निकालकर गोद में लिया। गोद में लेते ही उन्होंने देखा कि उसकी आंखे खुली हुई हैं, बदन ठंडा है और गर्दन अकड़ी हुई है। उन्होंने रूआंसा होकर टॉयलेट का दरवाज़ा खटखटाकर मुझे यह इत्तिला दी। मैंने आकर देखा तो नब्ज़, सांस और ताप वहां कुछ भी न था।
मैं अपनी बेटी को लेकर डा. अवतार सिंह गौतम के पास गया। उन्होंने मुआयना करके मेरे फ़ैसले की तस्दीक़ कर दी।
शरीफ साहब , शफ़ीक़ और तनवीर भाई ने क़ब्रिस्तान में उसके लिये छोटी सी क़ब्र खुदवाई, उसके लिये छोटा सा कफ़न लाये।
अनम को नहलाने में शफ़ीक़ भाई और तनवीर भाई ने मेरी मदद की। और लोगों के अलावा मैंने अपने बड़े बेटे अनस को भी कार में अपने साथ ले लिया ताकि वह जीवन के सबसे बड़े सच से रू ब रू हो सके।
पौन बजे उसकी नमाज़ ए जनाज़ा में बक़दर तीन सफ़ आदमी हो गये थे। उसके लिये दुआ की और खुद अपने लिये भी। वापस आया तो हापुड़ से मास्टर अनवार साहब आ गये और अब भी लोगों के आने का सिलसिला लगा हुआ है। जिसे पता चल रहा है वह आ रहा है या फिर उसका फ़ोन आ रहा है। जिन ब्लॉगर्स को अपना क़रीबी समझा उन्हें भी एसएमएस कर दिया। तीन बार की कोशिश में एक बार एसएमएस सैंड हो पाया, सैन्ट करने ही वाला होता था कि किसी न किसी का फ़ोन आ जाता था। फिर कुछ को चाहकर भी न भेज सका।
एक मासूम कली हमारे आंगन में खिली, हमारे घर को महकाया और फिर जन्नत का फूल बन गई। हमारे दिल उसकी यादों के नूर से हमेशा रौशन रहेंगे यहां तक कि हम फिर से उससे जा मिलें।
Thursday, July 22, 2010
Wednesday, July 21, 2010
The right view about God विष्णु अर्थात पालनहार तो सदा से जाग रहा है लेकिन लोगों के ज्ञान चक्षु कब खुलेंगे ? - Anwer Jamal
लोग कह रहे हैं कि विष्णु जी सो गये, अख़बार लिख रहे कि दुनिया को पालने वाला पाताल लोक के राजा के महल के गेट पर जाकर चार माह के लिये सो गया। जबकि मैं देख रहा हूं कि दुनिया ठीक ठाक चल रही है। हवा भी चल रही है और बादल भी बरस रहे हैं। सूरज भी अपना ताप दे रहा है और पौधे भी लहलहा रहे हैं बल्कि पहले से बेहतर लहलहा रहे हैं।
क्या एअर ट्रैफ़िक कंट्रोलर अपनी सीट पर सो जाए तो प्लेन आकाश में उड़ पाएंगे या ज़मीन पर सुरक्षित उतर पाएंगे ?
हम सुरक्षित हैं , बच्चे जन्म ले रहे हैं मांओं की छातियों से अमृत मासूमों के बदन को तृप्त कर रहा है। मौसम युवाओं को हिला मिलाकर उनके दायित्व की तरफ़ खींच रहा है। धरती धुल रही है, प्रकृति निखर रही है, सुहागिनों के चेहरों की ताज़गी बढ़ती जा रही है। अच्छी फ़सल की उम्मीदें जाग रही हैं। सभी काम अपने ढर्रे पर बिल्कुल पहले की तरह चल रहे हैं।
इसका मतलब यह है कि जो मालिक सृष्टि को चला रहा है जैसा वह पहले था वैसा ही आज भी है। उसे थकान ही नहीं होती तो उसे नींद की क्या ज़रूरत और वह भी पाताल लोक में जाकर ?
पाताल लोक को वैदिक विद्वान अमरीका भी कहते हैं।
जिस जाति ने कभी दुनिया को अजन्मे और अविनाशी ईश्वर के बारे में बताया जगाया था वह आज इस दशा को पहुंच गई है कि वह कह रही है कि विष्णु जी सो गये।
विष्णु अर्थात पालनहार तो सदा से जाग रहा है लेकिन लोगों के ज्ञान चक्षु कब खुलेंगे ?
सत्य को कब पहचानेंगे और अंधविश्वास से मुक्त होकर सत्य पर कब विश्वास करेंगे ?
क्या एअर ट्रैफ़िक कंट्रोलर अपनी सीट पर सो जाए तो प्लेन आकाश में उड़ पाएंगे या ज़मीन पर सुरक्षित उतर पाएंगे ?
हम सुरक्षित हैं , बच्चे जन्म ले रहे हैं मांओं की छातियों से अमृत मासूमों के बदन को तृप्त कर रहा है। मौसम युवाओं को हिला मिलाकर उनके दायित्व की तरफ़ खींच रहा है। धरती धुल रही है, प्रकृति निखर रही है, सुहागिनों के चेहरों की ताज़गी बढ़ती जा रही है। अच्छी फ़सल की उम्मीदें जाग रही हैं। सभी काम अपने ढर्रे पर बिल्कुल पहले की तरह चल रहे हैं।
इसका मतलब यह है कि जो मालिक सृष्टि को चला रहा है जैसा वह पहले था वैसा ही आज भी है। उसे थकान ही नहीं होती तो उसे नींद की क्या ज़रूरत और वह भी पाताल लोक में जाकर ?
पाताल लोक को वैदिक विद्वान अमरीका भी कहते हैं।
जिस जाति ने कभी दुनिया को अजन्मे और अविनाशी ईश्वर के बारे में बताया जगाया था वह आज इस दशा को पहुंच गई है कि वह कह रही है कि विष्णु जी सो गये।
विष्णु अर्थात पालनहार तो सदा से जाग रहा है लेकिन लोगों के ज्ञान चक्षु कब खुलेंगे ?
सत्य को कब पहचानेंगे और अंधविश्वास से मुक्त होकर सत्य पर कब विश्वास करेंगे ?
Monday, July 19, 2010
Dua अल्लाह तआला शाहनवाज़ की मग़फ़िरत फ़रमाये और उसे अपने क़ुर्ब में आला मक़ाम अता फ़रमाये। - Anwer Jamal
मौत एक अटल सच्चाई है।
डा. अयाज़ साहब का छोटा भाई महज़ 20 साल की उम्र में ही चल बसा। आज 19 जुलाई 2010 है। आज से एक साल पहले ठीक इसी समय डा. साहब जंगल और पानी में उसे ढूंढ रहे थे। उनके साथ कई दर्जन आदमी भी थे। वे देर रात गये लौट आये और सुबह होते ही उन्होंने अपनी तलाश फिर शुरू कर दी।
19 जुलाई को क्लीनिक से लौटने के बाद शाहनवाज़ के पास थोड़ा सा समय होता था अपने मन का कुछ करने के लिए। उस दिन वह अपने रिश्तेदार लड़कों के साथ साखन नहर पर नहाने के लिए चला गया जो कि देवबंद से मात्र 5 किमी. दूर है। जब वह नहा रहा था ठीक उसी समय डा. अयाज़ साहब उसी नहर के पुल से गुज़र कर सहारनपुर गये थे। वे बस में थे।
शाहनवाज़ कैसे डूबा यह तो आज भी एक राज़ है लेकिन वह डूबा दोपहर में और उसके साथ जाने वालों ने उसके बारे में कोई इत्तिला घर पर नहीं दी। जब वह नहीं लौटा तो उसकी तलाश अयाज़ साहब के दोस्तों ने आरम्भ की जिनमें से हकीम सउद अनवर ख़ान साहब भी थे। अयाज़ साहब लौटे तो रात हो चुकी थी। मैं देवबंद से बाहर था। मुझे मेरे घरवालों ने फ़ोन पर इत्तिला दी। मैं दम ब खुद रह गया।
रात में नाकाम तलाश के बाद जब सुबह को ग़ोताख़ोरों ने नहर में खोज आरम्भ की तो एक जगह से नौजवान शाहनवाज का जिस्म तो मिल गया लेकिन अब उसमें कोई जान बाक़ी न थी।
नौजवान भाई की लाश देखकर अयाज़ साहब तो ढह से गये। हकीम साहब ने उन्हें संभाला। लाश घर आयी तो उनकी मां ने अल्लाह का शुक्र अदा किया।
वे बोलीं-‘अल्लाह का शुक्र है कि अभी हमारे पास एक बेटा तो है।‘
इस बात को मेरी वालिदा ने खुद सुना। उनके इस जुमले ने बता दिया कि एक मोमिन औरत की सोच और अमल क्या होता है ?
यही बात अयाज़ साहब के वालिद साहब ने कही। उन्होंने उन साथ जाने वाले लड़कों के वालिदैन से शिकवा तक भी न किया बल्कि साफ़ दिखने के लिए उनकी मांएं ही लड़ाई पर आमादा थीं। पूरे देवबंद में बेहद सदमा था और उसकी नमाज़ ए जनाज़ा में भी बहुत भीड़ थी।
आज उस वाक़ये को एक साल बीत चुका है लेकिन ऐसा लगता है जैसे कि अभी कल ही की बात हो। आज भी जब मैं डाक्टर साहब के घर जाता हूं तो ऐसा लगता है कि मानों किसी कोने से शाहनवाज निकलकर स्वागत करेगा और कहेगा कि आप बैठिए मैं भाई साहब को अभी बताता हूं।
शाहनवाज़ भाई तो डाक्टर साहब का था लेकिन वह हमारा भी बाज़ू था। बाला सुंदरी के मेले में इस्लामी साहित्य का स्टाल हम उसी के सहारे लगाया करते थे। इस साल वह नहीं था सो स्टाल भी नहीं लगा। वह गोरे रंग का पतला दुबला और बहुत कम बोलने वाला और सदा अपने बड़े भाई और वालिदैन की बात मानने वाला एक नौजवान लड़का था। हमें उसके जाने के बाद उसकी खूबियों का अहसास ज़्यादा हुआ और हो रहा है।
ज़िंदगी मिलती भी है और गुज़र भी जाती है। आज हम ज़िंदा हैं लेकिन क्या वाक़ई हम अपनी ज़िंदगी की क़द्र कर रहे हैं ?
हमारे भाई बहन मां बाप और रिश्तेदार जो ज़िंदा हैं उनके साथ हम कितना समय बिताते हैं ?
काश! हम ज़िंदगी की क़द्र करना सीख जाएं और इसे इस तरह गुज़ारें कि हम मालिक के मुजरिम बनकर उसके पास न पहुंचें।
काश! हम सब्र और शुक्र को अपना लें जिसकी मिसाल शाहनवाज़ के वालिदैन की ज़िंदगी में देखी जा सकती है।
अल्लाह तआला शाहनवाज़ की मग़फ़िरत फ़रमाये और उसे अपने क़ुर्ब में आला मक़ाम अता फ़रमाये। आमीन ।
जो लोग कर सकते हैं वे उसे ईसाले सवाब ज़रूर करें।
डा. अयाज़ साहब का छोटा भाई महज़ 20 साल की उम्र में ही चल बसा। आज 19 जुलाई 2010 है। आज से एक साल पहले ठीक इसी समय डा. साहब जंगल और पानी में उसे ढूंढ रहे थे। उनके साथ कई दर्जन आदमी भी थे। वे देर रात गये लौट आये और सुबह होते ही उन्होंने अपनी तलाश फिर शुरू कर दी।
19 जुलाई को क्लीनिक से लौटने के बाद शाहनवाज़ के पास थोड़ा सा समय होता था अपने मन का कुछ करने के लिए। उस दिन वह अपने रिश्तेदार लड़कों के साथ साखन नहर पर नहाने के लिए चला गया जो कि देवबंद से मात्र 5 किमी. दूर है। जब वह नहा रहा था ठीक उसी समय डा. अयाज़ साहब उसी नहर के पुल से गुज़र कर सहारनपुर गये थे। वे बस में थे।
शाहनवाज़ कैसे डूबा यह तो आज भी एक राज़ है लेकिन वह डूबा दोपहर में और उसके साथ जाने वालों ने उसके बारे में कोई इत्तिला घर पर नहीं दी। जब वह नहीं लौटा तो उसकी तलाश अयाज़ साहब के दोस्तों ने आरम्भ की जिनमें से हकीम सउद अनवर ख़ान साहब भी थे। अयाज़ साहब लौटे तो रात हो चुकी थी। मैं देवबंद से बाहर था। मुझे मेरे घरवालों ने फ़ोन पर इत्तिला दी। मैं दम ब खुद रह गया।
रात में नाकाम तलाश के बाद जब सुबह को ग़ोताख़ोरों ने नहर में खोज आरम्भ की तो एक जगह से नौजवान शाहनवाज का जिस्म तो मिल गया लेकिन अब उसमें कोई जान बाक़ी न थी।
नौजवान भाई की लाश देखकर अयाज़ साहब तो ढह से गये। हकीम साहब ने उन्हें संभाला। लाश घर आयी तो उनकी मां ने अल्लाह का शुक्र अदा किया।
वे बोलीं-‘अल्लाह का शुक्र है कि अभी हमारे पास एक बेटा तो है।‘
इस बात को मेरी वालिदा ने खुद सुना। उनके इस जुमले ने बता दिया कि एक मोमिन औरत की सोच और अमल क्या होता है ?
यही बात अयाज़ साहब के वालिद साहब ने कही। उन्होंने उन साथ जाने वाले लड़कों के वालिदैन से शिकवा तक भी न किया बल्कि साफ़ दिखने के लिए उनकी मांएं ही लड़ाई पर आमादा थीं। पूरे देवबंद में बेहद सदमा था और उसकी नमाज़ ए जनाज़ा में भी बहुत भीड़ थी।
आज उस वाक़ये को एक साल बीत चुका है लेकिन ऐसा लगता है जैसे कि अभी कल ही की बात हो। आज भी जब मैं डाक्टर साहब के घर जाता हूं तो ऐसा लगता है कि मानों किसी कोने से शाहनवाज निकलकर स्वागत करेगा और कहेगा कि आप बैठिए मैं भाई साहब को अभी बताता हूं।
शाहनवाज़ भाई तो डाक्टर साहब का था लेकिन वह हमारा भी बाज़ू था। बाला सुंदरी के मेले में इस्लामी साहित्य का स्टाल हम उसी के सहारे लगाया करते थे। इस साल वह नहीं था सो स्टाल भी नहीं लगा। वह गोरे रंग का पतला दुबला और बहुत कम बोलने वाला और सदा अपने बड़े भाई और वालिदैन की बात मानने वाला एक नौजवान लड़का था। हमें उसके जाने के बाद उसकी खूबियों का अहसास ज़्यादा हुआ और हो रहा है।
ज़िंदगी मिलती भी है और गुज़र भी जाती है। आज हम ज़िंदा हैं लेकिन क्या वाक़ई हम अपनी ज़िंदगी की क़द्र कर रहे हैं ?
हमारे भाई बहन मां बाप और रिश्तेदार जो ज़िंदा हैं उनके साथ हम कितना समय बिताते हैं ?
काश! हम ज़िंदगी की क़द्र करना सीख जाएं और इसे इस तरह गुज़ारें कि हम मालिक के मुजरिम बनकर उसके पास न पहुंचें।
काश! हम सब्र और शुक्र को अपना लें जिसकी मिसाल शाहनवाज़ के वालिदैन की ज़िंदगी में देखी जा सकती है।
अल्लाह तआला शाहनवाज़ की मग़फ़िरत फ़रमाये और उसे अपने क़ुर्ब में आला मक़ाम अता फ़रमाये। आमीन ।
जो लोग कर सकते हैं वे उसे ईसाले सवाब ज़रूर करें।
Sunday, July 18, 2010
Orphans जो कोई किसी अनाथ के सिर पर प्यार से हाथ फेरता है तो अल्लाह उसके आमालनामे ने उसके सिर के बालों के बक़दर ही नेकियां लिखवा देता है।-Anwer Jamal
आज अख़बार देखा तो ‘हिन्दुस्तान‘ के आख़री पेज पर ‘वैशाली में बसते हैं फ़ादर टेरेसा‘ शीर्षक पर नज़रें ठिठक गईं। इसमें बताया गया है कि प्रद्युम्न कुमार 1972 में पटना गये थे तो उन्हें सड़क पर एक अनाथ बच्चा बीमारी में तड़पता हुआ मिला। उसे अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। इस वाक़ये से उन्होंने अनाथ बच्चों की देखभाल करने की ठान ली। घरवाले अब तो उनके साथ हैं लेकिन शुरू में उन्होंने भी उन्हें ताने दिये। प्रद्युम्न कुमार के पास आरम्भ में 11 अनाथ बच्चे थे । अनाथ बच्चों की देखभाल वे बिना किसी सरकारी सहायता के करते हैं। इसके लिये उन्हें रेलगाड़ियों और बस अड्डों में भीख तक मांगी। वे बच्चों को सातवीं कक्षा तक अपने आश्रम , लोक सेवा आश्रम, जनकल्याण समिति केन्द्र में शिक्षा देने के बाद आगे की पढ़ाई के लिये दूसरे स्कूलों में दाखि़ल करवा देते हैं और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करते हैं।
यह ख़बर एक रचनात्मक ख़बर है। इसे पढ़कर दूसरी ख़बरों से उपजा क्षोभ काफ़ी कम हो गया।
जैसे कि फ़्रंट पेज पर ख़बरें थीं कि ‘जवान ने 7 साथियों को गोलियों से भूना‘ और ‘एसडीएम ने की ख़ुदकुशी की कोशिश‘ वग़ैरह वग़ैरह।
जो लोग महत्वाकांक्षी होते हैं और केवल अपने ही लिए जीते हैं वे अपने सपनों को ढेर होते देखकर निराश हो जाते हैं और उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसपर चलने की सलाह वे अपने बच्चों को कभी नहीं दे सकते।
नाश्ता कर ही रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। सामने एक टीन एजर खड़ा था। उसने बताया कि वह नेत्रहीनों के लिए काम करने वाली किसी संस्था की तरफ़ से आया है। मैंने उससे पूछा कि क्या वह अकेला है या उसके साथ कुछ और भी लड़के हैं?
उसने कहा कि उसके साथ दो लड़के और हैं।
मैंने कहा कि क्या आप चाय पीयेंगे ?
उसने निस्संकोच मेरा प्रस्ताव कुबूल कर लिया और अपने साथियों को लेने चला गया। जब तक वह लौट कर आया तब तक चाय और वाय तैयार हो चुकी थी।
मेहमान नवाज़ी भी अदा हो जाए और हिफ़ाज़त के आदाब भी पूरे हो जाएं लिहाज़ा चाय घर से बाहर और बाउंड्री के भीतर ही पिलाई गई। इस दरम्यान मैं उनसे उनके और उनकी संस्था के बारे में बातें करता रहा। उनमें से एक लड़का राजेश पहले भी कई बार मेरे पास आ चुका था। उसके एक पैर में लंगड़ाहट भी है। वह 10 वीं कक्षा में पढ़ रहा है और किसी साहब ने उसकी कम्प्यूटर के कोर्स की फ़ीस देने का वायदा किया है। मैंने उसमें तालीम के लिये लगन पाई।
दूसरे लड़के ने अपना नाम मोहित शर्मा बताया और कहा कि वह टेलरिंग का काम सीख रहा है।
मैंने मोहित से कहा कि जब आपको ही बचपन से अपने मां-बाप का पता नहीं है तो आपको कैसे पता कि आप शर्मा हैं ?
वह बोला कि बस हम तो खुद ही कहते हैं ?
मैंने तालीम का पता किया तो वह बोला कि पढ़ाई तो सातवीं के बाद ही छोड़ दी थी।
मैंने कहा-‘ शर्मा कहते हैं पंडित को और पंडित कहते हैं ज्ञानी को । जब आप खुद को शर्मा कहते हैं तो आपको अपनी पढ़ाई जारी रखनी चाहिये। वक्त बहुत जल्दी बीत जाएगा। आप दिल्ली में रहते हैं, वहां मौक़ों की कमी नहीं है लेकिन मौक़े से फ़ायदा आप तभी उठा पाएंगे जबकि आप तालीमयाफ़्ता होंगे।‘
मैंने देखा कि उसे मेरी बात में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है। दरअस्ल आदमी वही करता है जो उसे आसान लगता है और उसके मन को भाता है। तब मैंने उसे लेडीज़ टेलर बनने की सलाह दी। दरअस्ल औरतों के सामान से जुड़ी हुई किसी भी चीज़ का व्यापार या कारीगरी करने वाले को कभी काम का टोटा नहीं रहता। अपने शौहरों की आमदनी को ये बीवियां ही ठिकाने लगाती हैं। मर्दों की ख़रीदारी भी ये औरतें ही करती हैं।
तीसरे लड़के ने अपना नाम अमित बताया। वह केन्द्र के लिए अपनी सेवाएं दे रहा है। पहले दोनों लड़के ‘नेशनल ब्लाइंड एडल्ट एजुकेशन एंड वोकेशनल ट्रेनिंग सेन्टर‘ में आने से पहले मथुरा और हरिद्वार की संस्थाओं में रह चुके हैं और अमित आरम्भ से ही दिल्ली में रहता है। यह संस्था पिछले डेढ़ साल से काम कर रही है।
इन लड़कों ने मुझे अपनी संस्था का एक कार्ड दिया जिस पर ‘तजराम शर्मा‘ को आर्गेनाइज़र लिखा है। पता है- पूठ कलां, पाकेट 16, निकट मदर डेयरी, सेक्टर 20, रोहिणी, नई दिल्ली-110086, मोबाइल नं.-09350883344, फ़ोन नं.-32625061
मैंने एक हस्बे रिवायत उन्हें एक छोटी सी भेंट दी और उनकी इजाज़त लेकर उनका फ़ोटो खींचा और उन्हें बताया कि मैं उनका ज़िक्र इंटरनेट पर करूंगा। शायद कोई दानदाता उसे पढ़कर उनकी संस्था तक पहुंच जाए।
इस सब वाक़ये से मुझे एक बात कहनी है कि एक अनाथ महज़ आपके चंद रूपयों का ही तलबगार नहीं होता बल्कि उसे आपकी मुहब्बत और आपकी अपनाइय्यत की भी ज़रूरत होती है। अगर आप अपने अमीर दोस्तों के लिए चाय नाश्ते का इंतेज़ाम ज़रूर करते हैं तो ये अनाथ उनसे कहीं ज़्यादा इस बात के मुस्तहिक़ हैं।
याद रखिये कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. भी एक अनाथ ही थे। उनका कथन (मफ़हूमन) है कि जो कोई किसी अनाथ के सिर पर प्यार से हाथ फेरता है तो अल्लाह उसके आमालनामे ने उसके सिर के बालों के बक़दर ही नेकियां लिखवा देता है।
अल्लाह की राह में देने से माल घटता नहीं बल्कि बढ़ता है, यह सच है, पवित्र कुरआन में यह बात अल्लाह ने खुद बताई है। जो अनाथ को धक्के देता है उसका न कोई दीन है और न कोई ईमान है।
और भय्या गिरी जी यह लीजिये आप अपना फ़ोटो जनाब मौलाना वहीदुददीन ख़ान साहब के साथ। आज मौक़ा मिल पाया, सो आज मैंने अपना वादा पूरा किया।
यह ख़बर एक रचनात्मक ख़बर है। इसे पढ़कर दूसरी ख़बरों से उपजा क्षोभ काफ़ी कम हो गया।
जैसे कि फ़्रंट पेज पर ख़बरें थीं कि ‘जवान ने 7 साथियों को गोलियों से भूना‘ और ‘एसडीएम ने की ख़ुदकुशी की कोशिश‘ वग़ैरह वग़ैरह।
जो लोग महत्वाकांक्षी होते हैं और केवल अपने ही लिए जीते हैं वे अपने सपनों को ढेर होते देखकर निराश हो जाते हैं और उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसपर चलने की सलाह वे अपने बच्चों को कभी नहीं दे सकते।
नाश्ता कर ही रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। सामने एक टीन एजर खड़ा था। उसने बताया कि वह नेत्रहीनों के लिए काम करने वाली किसी संस्था की तरफ़ से आया है। मैंने उससे पूछा कि क्या वह अकेला है या उसके साथ कुछ और भी लड़के हैं?
उसने कहा कि उसके साथ दो लड़के और हैं।
मैंने कहा कि क्या आप चाय पीयेंगे ?
उसने निस्संकोच मेरा प्रस्ताव कुबूल कर लिया और अपने साथियों को लेने चला गया। जब तक वह लौट कर आया तब तक चाय और वाय तैयार हो चुकी थी।
मेहमान नवाज़ी भी अदा हो जाए और हिफ़ाज़त के आदाब भी पूरे हो जाएं लिहाज़ा चाय घर से बाहर और बाउंड्री के भीतर ही पिलाई गई। इस दरम्यान मैं उनसे उनके और उनकी संस्था के बारे में बातें करता रहा। उनमें से एक लड़का राजेश पहले भी कई बार मेरे पास आ चुका था। उसके एक पैर में लंगड़ाहट भी है। वह 10 वीं कक्षा में पढ़ रहा है और किसी साहब ने उसकी कम्प्यूटर के कोर्स की फ़ीस देने का वायदा किया है। मैंने उसमें तालीम के लिये लगन पाई।
दूसरे लड़के ने अपना नाम मोहित शर्मा बताया और कहा कि वह टेलरिंग का काम सीख रहा है।
मैंने मोहित से कहा कि जब आपको ही बचपन से अपने मां-बाप का पता नहीं है तो आपको कैसे पता कि आप शर्मा हैं ?
वह बोला कि बस हम तो खुद ही कहते हैं ?
मैंने तालीम का पता किया तो वह बोला कि पढ़ाई तो सातवीं के बाद ही छोड़ दी थी।
मैंने कहा-‘ शर्मा कहते हैं पंडित को और पंडित कहते हैं ज्ञानी को । जब आप खुद को शर्मा कहते हैं तो आपको अपनी पढ़ाई जारी रखनी चाहिये। वक्त बहुत जल्दी बीत जाएगा। आप दिल्ली में रहते हैं, वहां मौक़ों की कमी नहीं है लेकिन मौक़े से फ़ायदा आप तभी उठा पाएंगे जबकि आप तालीमयाफ़्ता होंगे।‘
मैंने देखा कि उसे मेरी बात में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है। दरअस्ल आदमी वही करता है जो उसे आसान लगता है और उसके मन को भाता है। तब मैंने उसे लेडीज़ टेलर बनने की सलाह दी। दरअस्ल औरतों के सामान से जुड़ी हुई किसी भी चीज़ का व्यापार या कारीगरी करने वाले को कभी काम का टोटा नहीं रहता। अपने शौहरों की आमदनी को ये बीवियां ही ठिकाने लगाती हैं। मर्दों की ख़रीदारी भी ये औरतें ही करती हैं।
तीसरे लड़के ने अपना नाम अमित बताया। वह केन्द्र के लिए अपनी सेवाएं दे रहा है। पहले दोनों लड़के ‘नेशनल ब्लाइंड एडल्ट एजुकेशन एंड वोकेशनल ट्रेनिंग सेन्टर‘ में आने से पहले मथुरा और हरिद्वार की संस्थाओं में रह चुके हैं और अमित आरम्भ से ही दिल्ली में रहता है। यह संस्था पिछले डेढ़ साल से काम कर रही है।
इन लड़कों ने मुझे अपनी संस्था का एक कार्ड दिया जिस पर ‘तजराम शर्मा‘ को आर्गेनाइज़र लिखा है। पता है- पूठ कलां, पाकेट 16, निकट मदर डेयरी, सेक्टर 20, रोहिणी, नई दिल्ली-110086, मोबाइल नं.-09350883344, फ़ोन नं.-32625061
मैंने एक हस्बे रिवायत उन्हें एक छोटी सी भेंट दी और उनकी इजाज़त लेकर उनका फ़ोटो खींचा और उन्हें बताया कि मैं उनका ज़िक्र इंटरनेट पर करूंगा। शायद कोई दानदाता उसे पढ़कर उनकी संस्था तक पहुंच जाए।
इस सब वाक़ये से मुझे एक बात कहनी है कि एक अनाथ महज़ आपके चंद रूपयों का ही तलबगार नहीं होता बल्कि उसे आपकी मुहब्बत और आपकी अपनाइय्यत की भी ज़रूरत होती है। अगर आप अपने अमीर दोस्तों के लिए चाय नाश्ते का इंतेज़ाम ज़रूर करते हैं तो ये अनाथ उनसे कहीं ज़्यादा इस बात के मुस्तहिक़ हैं।
याद रखिये कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. भी एक अनाथ ही थे। उनका कथन (मफ़हूमन) है कि जो कोई किसी अनाथ के सिर पर प्यार से हाथ फेरता है तो अल्लाह उसके आमालनामे ने उसके सिर के बालों के बक़दर ही नेकियां लिखवा देता है।
अल्लाह की राह में देने से माल घटता नहीं बल्कि बढ़ता है, यह सच है, पवित्र कुरआन में यह बात अल्लाह ने खुद बताई है। जो अनाथ को धक्के देता है उसका न कोई दीन है और न कोई ईमान है।
और भय्या गिरी जी यह लीजिये आप अपना फ़ोटो जनाब मौलाना वहीदुददीन ख़ान साहब के साथ। आज मौक़ा मिल पाया, सो आज मैंने अपना वादा पूरा किया।
Thursday, July 15, 2010
Butterfly किसी मुफ़्ती के फ़तवे की वजह आज तक नाहक़ इतनी जानें न गई होंगी जितनी कि इस देश में डाक्टरों के क्लिनिक में रोज़ाना ले ली जाती हैं और कहीं चर्चा तक नहीं होता। -Anwer Jamal
श्रीपाल तेवतिया जी आज मेरे घर आये। वे नोएडा के पास एक क़स्बे के रहने वाले हैं। एन. एस. डी. और लखनउ के ड्रामा स्कूल के विद्यार्थी रह चुके हैं। मशहूर सीरियल ‘कबीर‘ बनाते समय निर्माता निर्देशक श्री अनिल चैधरी के चीफ़ असिस्टेंट ही नहीं रहे बल्कि सारा प्रोडक्शन भी उनके ही हाथ में था। वे इसी लाइन में और तरक्क़ी करते लेकिन एक फ़ैसले ने उनकी आगे की सारी ज़िंदगी बदलकर रख दी और वह फ़ैसला था उनका दिल्ली आने का फ़ैसला।
बहरहाल वे मुझसे जनवरी में मिले थे और कांवड़ियों को सामने रखते हुए उन्होंने जो अलबम बनाया था उसे मुझे भेंट करने आये थे। मैंने उसे देखा भी था और अपने विचारों से उन्हें अवगत भी कराया था। आज मैंने इत्तेफ़ाक़न फ़ोन किया और पूछा कि भाई आखि़र आप हो कहां ?
श्रीपाल जी बोले - रास्ते में हूं और थोड़ी ही देर में आपके घर पहुंचने वाला हूं। वे 15 मिनट से भी कम वक्त में आ भी गये। उनके साथ में एक युवा निर्माता विकास जी भी थे।
श्रीपाल जी ने मुझे अपना नया अलबम दिया। अलबम का नाम ‘तितली‘ है और उसपर दोचार तितली टाइप लड़कियों की तस्वीरें भी हैं।
मैंने एक नज़र सी.डी. पर डाली और कहा कि इसका ज़िक्र मैं अपने ब्लॉग पर करूंगा। वे फ़ौरन बोले - भाई इसके खि़लाफ़ ही लिखोगे आप तो ?
मैंने कहा - हां, और आप तो जानते ही हैं कि आपको तो मुख़ालिफ़त से भी लाभ ही होता है। आपका प्रचार तो मुख़ालिफ़तसे ज़्यादा होता है।
वे हंस पड़े। श्रीपाल जी मेरे मिज़ाज को जानते हैं लेकिन फिर भी मुझे मानते हैं क्योंकि मैं उनसे प्यार करता हूं और वे मुझसे। उनकी पत्नी मुझे भाई कहती हैं और उनका बेटा मेरे पैर छूता है।
उनके बेटे वरूण को पहला ब्रेक मैंने ही अपने एक प्रोजेक्ट में दिया था। उसमें उसने गुर्दे बेचने वाले गैंग के चीफ़ के बेटे का रोल किया था। ‘तितली‘ का संपादन और निर्देशन उसी बेटे ने किया है नाम है ‘वरूण चैधरी‘।
श्रीपाल जी ने बताया कि वरूण आजकल साउथ दिल्ली में ‘फ़्रेमबॉक्स‘ में मल्टीमीडिया का कोर्स कर रहा है। उनके प्रेम और उत्साह को ध्यान में रखते हुए मैंने उन्हें मुबारकबाद इन अल्फ़ाज़ में दी -‘‘ इसके जो भी अच्छे पहलू हों, बुरे नहीं, वे आपको मुबारक हों‘‘
वे फिर हंसे और सहमत हुए।
उन्होंने अपनी ख़ैरियत और चल रहे प्रोजेक्ट के बारे में बताने के बाद पूछा कि आप कैसे हैं ?
मैंने पूछा - आपको कैसा लग रहा हूं ?
वे बोले - चेहरे से तो आप एकदम ताज़ा लग रहे हो ?
तब मैंने उन्हें झूले में लेटी हुई अपनी बेटी ‘अनम‘ का चेहरा दिखाया और उसकी बीमारी के बारे में मुख्तसर तौर पर बताया और बताया कि अनम खुदा का इनाम है जब तक भी हमारे पास है खुदा की ही अमानत है और इसी बात ने हमें हरेक ग़म से बचा रखा है।
हमारे दरम्यान लंबी बातें हुईं और हरेक दोस्त से दिल की बातें होती ही हैं। मैं चाहता हूं कि आपके साथ भी उन्हें बांटा जाए । इसीलिए इस ब्लॉग को आज मन्ज़र ए आम पर लाया गया है। आपके ख़यालात मेरी रहनुमाई करते रहे हैं और उम्मीद है कि इस ब्लॉग पर भी करते रहेंगे।
अनम का टेम्प्रेचर अब नियंत्रित है , ज़ख्म लगातार हील हो रहा है। उसकी ड्रेसिंग सुबह सायं मैं खुद ही करता हूं। उसकी भूख और नींद सेहतमंद बच्चों की ही तरह है। अब उसका वज़्न भी कुछ मामूली सा बेहतर हुआ है। मैं चाहता हूं कि वह जिये और जो लोग खुद को वक्त का खुदा मान बैठे हैं उनकी खुदाई को ढहा दे।
किसी मुफ़्ती के फ़तवे की वजह आज तक नाहक़ इतनी जानें न गई होंगी जितनी कि इस देश में डाक्टरों के क्लिनिक में रोज़ाना ले ली जाती हैं और कहीं चर्चा तक नहीं होता। क्या विकृतियों के कारण शिशु को मां के गर्भ में ही मार देना दुरूस्त है ?
मैंने श्रीपाल जी से भी पूछा तो उन्होंने भी मेरे ही विचार से सहमति जताई।
बहरहाल वे मुझसे जनवरी में मिले थे और कांवड़ियों को सामने रखते हुए उन्होंने जो अलबम बनाया था उसे मुझे भेंट करने आये थे। मैंने उसे देखा भी था और अपने विचारों से उन्हें अवगत भी कराया था। आज मैंने इत्तेफ़ाक़न फ़ोन किया और पूछा कि भाई आखि़र आप हो कहां ?
श्रीपाल जी बोले - रास्ते में हूं और थोड़ी ही देर में आपके घर पहुंचने वाला हूं। वे 15 मिनट से भी कम वक्त में आ भी गये। उनके साथ में एक युवा निर्माता विकास जी भी थे।
श्रीपाल जी ने मुझे अपना नया अलबम दिया। अलबम का नाम ‘तितली‘ है और उसपर दोचार तितली टाइप लड़कियों की तस्वीरें भी हैं।
मैंने एक नज़र सी.डी. पर डाली और कहा कि इसका ज़िक्र मैं अपने ब्लॉग पर करूंगा। वे फ़ौरन बोले - भाई इसके खि़लाफ़ ही लिखोगे आप तो ?
मैंने कहा - हां, और आप तो जानते ही हैं कि आपको तो मुख़ालिफ़त से भी लाभ ही होता है। आपका प्रचार तो मुख़ालिफ़तसे ज़्यादा होता है।
वे हंस पड़े। श्रीपाल जी मेरे मिज़ाज को जानते हैं लेकिन फिर भी मुझे मानते हैं क्योंकि मैं उनसे प्यार करता हूं और वे मुझसे। उनकी पत्नी मुझे भाई कहती हैं और उनका बेटा मेरे पैर छूता है।
उनके बेटे वरूण को पहला ब्रेक मैंने ही अपने एक प्रोजेक्ट में दिया था। उसमें उसने गुर्दे बेचने वाले गैंग के चीफ़ के बेटे का रोल किया था। ‘तितली‘ का संपादन और निर्देशन उसी बेटे ने किया है नाम है ‘वरूण चैधरी‘।
श्रीपाल जी ने बताया कि वरूण आजकल साउथ दिल्ली में ‘फ़्रेमबॉक्स‘ में मल्टीमीडिया का कोर्स कर रहा है। उनके प्रेम और उत्साह को ध्यान में रखते हुए मैंने उन्हें मुबारकबाद इन अल्फ़ाज़ में दी -‘‘ इसके जो भी अच्छे पहलू हों, बुरे नहीं, वे आपको मुबारक हों‘‘
वे फिर हंसे और सहमत हुए।
उन्होंने अपनी ख़ैरियत और चल रहे प्रोजेक्ट के बारे में बताने के बाद पूछा कि आप कैसे हैं ?
मैंने पूछा - आपको कैसा लग रहा हूं ?
वे बोले - चेहरे से तो आप एकदम ताज़ा लग रहे हो ?
तब मैंने उन्हें झूले में लेटी हुई अपनी बेटी ‘अनम‘ का चेहरा दिखाया और उसकी बीमारी के बारे में मुख्तसर तौर पर बताया और बताया कि अनम खुदा का इनाम है जब तक भी हमारे पास है खुदा की ही अमानत है और इसी बात ने हमें हरेक ग़म से बचा रखा है।
हमारे दरम्यान लंबी बातें हुईं और हरेक दोस्त से दिल की बातें होती ही हैं। मैं चाहता हूं कि आपके साथ भी उन्हें बांटा जाए । इसीलिए इस ब्लॉग को आज मन्ज़र ए आम पर लाया गया है। आपके ख़यालात मेरी रहनुमाई करते रहे हैं और उम्मीद है कि इस ब्लॉग पर भी करते रहेंगे।
अनम का टेम्प्रेचर अब नियंत्रित है , ज़ख्म लगातार हील हो रहा है। उसकी ड्रेसिंग सुबह सायं मैं खुद ही करता हूं। उसकी भूख और नींद सेहतमंद बच्चों की ही तरह है। अब उसका वज़्न भी कुछ मामूली सा बेहतर हुआ है। मैं चाहता हूं कि वह जिये और जो लोग खुद को वक्त का खुदा मान बैठे हैं उनकी खुदाई को ढहा दे।
किसी मुफ़्ती के फ़तवे की वजह आज तक नाहक़ इतनी जानें न गई होंगी जितनी कि इस देश में डाक्टरों के क्लिनिक में रोज़ाना ले ली जाती हैं और कहीं चर्चा तक नहीं होता। क्या विकृतियों के कारण शिशु को मां के गर्भ में ही मार देना दुरूस्त है ?
मैंने श्रीपाल जी से भी पूछा तो उन्होंने भी मेरे ही विचार से सहमति जताई।
Monday, May 3, 2010
पालनहार प्रभु ने मनुष्य की रचना दुख भोगने के लिए नहीं की है।
मनुष्य का मार्ग और धर्म
पालनहार प्रभु ने मनुष्य की रचना दुख भोगने के लिए नहीं की है। दुख तो मनुष्य तब भोगता है जब वह ‘मार्ग’ से विचलित हो जाता है। मार्ग पर चलना ही मनुष्य का कत्र्तव्य और धर्म है। मार्ग से हटना अज्ञान और अधर्म है जो सारे दूखों का मूल है। पालनहार प्रभु ने अपनी दया से मनुष्य की रचना की उसे ‘मार्ग’ दिखाया ताकि वह निरन्तर ज्ञान के द्वारा विकास और आनन्द के सोपान तय करता हुआ उस पद को प्राप्त कर ले जहाँ रोग,शोक, भय और मृत्यु की परछाइयाँ तक उसे न छू सकें। मार्ग सरल है, धर्म स्वाभाविक है। इसके लिए अप्राकृतिक और कष्टदायक साधनाओं को करने की नहीं बल्कि उन्हें छोड़ने की ज़रूरत है।ईश्वर प्राप्ति सरल है ईश्वर सबको सर्वत्र उपलब्ध है। केवल उसके बोध और स्मृति की ज़रूरत है। पवित्र कुरआन इनसान की हर ज़रूरत को पूरा करता है। इसकी शिक्षाएं स्पष्ट,सरल हैं और वर्तमान काल में आसानी से उनका पालन हो सकता है। पवित्र कुरआन की रचना किसी मनुष्य के द्वारा किया जाना संभव नहीं है। इसके विषयों की व्यापकता और प्रामाणिकता देखकर कोई भी व्यक्ति आसानी से यह जान सकता है कि इसका एक-एक शब्द सत्य है। आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के बाद भी पवित्र कुरआन में वर्णित कोई भी तथ्य गलत नहीं पाया गया बल्कि उनकी सत्यता ही प्रमाणित हुई है। कुरआन की शब्द योजना में छिपी गणितीय योजना भी उसकी सत्यता का एक ऐसा अकाट्य प्रमाण है जिसे कोई भी व्यक्ति जाँच परख सकता है।प्राचीन धर्म का सीधा मार्ग ईश्वर का नाम लेने मात्र से ही कोई व्यक्ति दुखों से मुक्ति नहीं पा सकता जब तक कि वह ईश्वर के निश्चित किये हुए मार्ग पर न चले। पवित्र कुरआन किसी नये ईश्वर,नये धर्म और नये मार्ग की शिक्षा नहीं देता। बल्कि प्राचीन ऋषियों के लुप्त हो गए मार्ग की ही शिक्षा देता है और उसी मार्ग पर चलने हेतु प्रार्थना करना सिखाता है।
‘हमें सीधे मार्ग पर चला, उन लोगों का मार्ग जिन पर तूने कृपा की।’ (पवित्र कुरआन 1ः5-6)
ईश्वर की उपासना की सही रीति
मनुष्य दुखों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन यह इस पर निर्भर है कि वह ईश्वर को अपना मार्गदर्शक स्वीकार करना कब सीखेगा? वह पवित्र कुरआन की सत्यता को कब मानेगा? और सामाजिक कुरीतियों और धर्मिक पाखण्डों का व्यवहारतः उन्मूलन करने वाले अन्तिम सन्देष्टा हज़रत मुहम्मद (स.) को अपना आदर्श मानकर जीवन गुज़ारना कब सीखेगा?सर्मपण से होता है दुखों का अन्त ईश्वर सर्वशक्तिमान है वह आपके दुखों का अन्त करने की शक्ति रखता है। अपने जीवन की बागडोर उसे सौंपकर तो देखिये। पूर्वाग्रह,द्वेष और संकीर्णता के कारण सत्य का इनकार करके कष्ट भोगना उचित नहीं है। उठिये,जागिये और ईश्वर का वरदान पाने के लिए उसकी सुरक्षित वाणी पवित्र कुरआन का स्वागत कीजिए। भारत को शान्त समृद्ध और विश्व गुरू बनाने का उपाय भी यही है।क्या कोई भी आदमी दुःख, पाप और निराशा से मुक्ति के लिये इससे ज़्यादा बेहतर, सरल और ईश्वर की ओर से अवतरित किसी मार्ग या ग्रन्थ के बारे में मानवता को बता सकता है?
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भारत में दुनिया के कुल अंधों की एक तिहाई आबादी रहती है जो कि लगभग 120 लाख है। ब्वसवनत इसपदक लोग भी होते हैं जो चीज़ों के कुछ रंगों में भेद नहीं कर पाते। अंधों की एक क़िस्म और होती है जो आँख के नहीं बल्कि अक़्ल के अंधे होते हंै। इन्हें ज्तनजी इसपदक भी कहा जा सकता है। तमाम पढ़ाई लिखाई के बावजूद इनकी अक़्ल उस कुदरती सच्चाई को नहीं देख पाती जिसे हरेक देश का अनपढ़ आदमी भी जानता है बल्कि जिसे मछलियांं, जानवर, परिन्दे और पेड़-पौधे तक जानते हैं। अक़्ल के अंधों की बहुत सी जमातें हंै जो अलग-अलग रास्तांे पर ठोकरें खाती फिर रही हैं। समलैंगिकता के राहियों और उनके हामियोंे का शुमार इन्हीं लोगों में होता है। अगर इनके माँ बाप भी इनके जैसी ही सोच वाले होते तो आज इनका वजूद ही इस ज़मीन पर न होता। जिस व्यवस्था से आदमी फ़ायदा उठाता है उसे बनाये रखने की ज़िम्मेदारी भी उस आदमी पर खुद-ब-खुद आयद हो जाती है और जो आदमी अपनी ख़ुदग़र्ज़ी या बीमार मानसिकता के चलते उस व्यवस्था की जड़ काटने पर तुल जाये और समझाने से भी न समझे तो फिर उसे मुनासिब सज़ा दिया जाना ज़रूरी है। यह ख़ुशी की बात है कि इस गन्दी सोच के खि़लाफ मुस्लिम, ईसाई, हिन्दू और दीगर धर्मगुरूआंे ने एक स्वर में आवाज़ बुलन्द की है लेकिन काम सिर्फ विरोध करने से ही बनने वाला नहीं है। यह सोचना भी ज़रूरी है कि किन कारणों से भारतीय युवा वर्ग विकृतियों का शिकार हो रहा है और किस तरीके़ से उन्हें तबाही की दलदल से निकाला जा सकता है? हकी़क़त यह है कि इनसान को अगर ज़िन्दगी का अस्ल मक़सद ही पता न चले तो फिर वह भटक कर किसी भी रास्ते पर निकल सकता है। इनसान अनाथ नहीं है न ही उसकी ज़िन्दगी बेमक़सद है। इनसान के जीवन का एक पाक मक़सद है जिसे नेकी के रास्ते से ही पाया जा सकता है। इनसान के लिए ईश्वर की योजना क्या है? उसकी नाकामी किस चीज़ में है और उसकी कामयाबी किस बात में है? इसलाम हर बात को खोलकर समझाता है। इसलाम के मानने वालों ने दुनिया को इसलाम का पवित्र संदेश दिया लेकिन पिछले कुछ अर्से से इस सिलसिले में सुस्ती और ग़फ़लत देखी जा रही है। खेत में अगर फ़सल को खरपतवार दबा दे तो इसकी ज़िम्मेदारी किसान की होती है। इसी तरह अगर दुनिया में बुराई फैलती है तो इसकी ज़िम्मेदारी मुसलमानों पर आयद होती है क्योंकि उस पैदा करने वाले ने मुसलमानों की दीनीे ज़िम्मेदारी ही लोगों की खै़रख़्वाही, खि़दमत और उन्हेंं नेकी और कामयाबी के रास्ते की तरफ रहनुमाई करना मुक़र्रर की है। पश्चिमी सभ्यता को जिस घुन ने चाट कर खोखला कर दिया है, वही घुन अब भारतीय समाज को खाये जा रहा है। भारतीय समाज को तबाही से बचाना मुसलमानों की दीेनीें ज़िम्मेदारी है। भारतीय समाज को न सिर्फ बचाना है बल्कि इसे नेकी और सच्चरित्रता की उस बुलंदी पर पहुंचाना है, जहां पहुंचकर यह स्वाभाविक रूप से विश्व समाज का मार्गदर्शन कर सके। एक अजन्मे अविनाशी ईश्वर की वन्दना से ही शुभ गुणों की प्राप्ति संभव है इसलिये लोगों को ईश वन्दना के स्वरूप, उसके तक़ाज़ों और उसके नतीजों के प्रति शिक्षित करके अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए सभी वर्गों को मिलकर प्रयास करना ज़रूरी है। आज़ादी के लिए बलिदान देने वालों ने स्वर्णिम भारत का जो सपना देखा था उसे साकार करने का उपाय भी यही है। मानवधर्म : पैग़म्बर की वाणी
1. हजरत अबू हुरैरह रज़ि0 से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने कहा कि अल्लाह तआला क़ियामत के दिन (किसी बन्दे से) कहेगाः ”हे आदम के बेटे! मैं बीमार हुआ तूने मेरी बीमारपुर्सी नहीं की।“ वह बन्दा कहेगा कि हे रब! मैं तेरी बीमारपुर्सी कैसे करता तू तो सारे जगत का रब है? वह कहेगाः ”क्या तू नहीं जानता था कि मेरा अमुक बन्दा बीमार है तूने उसकी बीमारपुर्सी नहीं की? क्या तू नहीं जानता था कि अगर तू उसकी बीमारपुर्सी करता, तो अवश्य ही तू मुझे उसके पास पाता। हे आदम के बेटे! मैंने तुझसे खाना मांगा लेकिन तूने मुझे खाना नहीं खिलाया।” बन्दा कहेगा-हे रब! मैं तुझे खाना कैसे खिलाता तू तो जगत का रब है। वह कहेगाः ”क्या तुझे नहीं मालूम कि मेरे अमुक बन्दे ने तुझसे खाना मांगा लेकिन तूने उसे खाना नहीं खिलाया। क्या तूने बात न जानी कि अगर तूने उसे खिलाया होता, तो उस (के सवाब) को मेरे पास पाता। हे आदम के बेटे! मैंने तुझसे पानी मांगा लेकिन तूने मुझे पानी न पिलाया।“ बन्दा कहेगा- हे रब, मैं तुझे कैसे पानी पिलाता तू तो सारे जगत का रब है। वह कहेगाः ‘‘मेरे अमुक बन्दे ने तुझसे पानी मांगा लेकिन तूने उसे न पिलाया अगर तू उसे पानी पिलाता तो उस (के सवाब) को मेरे पास पाता।“ - मुस्लिम 2. हज़रत अबू हुरैरह रज़ि0 से रिवायत है कि नबी सल्ल0 ने कहा कि जब कोई मुसलमान अपने किसी बीमार भाई की बीमारपुर्सी करता है या उससे मुलाक़ात करता है तो अल्लाह तआला कहता हैः ‘‘तुझे मुबारक हो और तेरा यह चलना मुबारक है। तूने अपना घर जन्नत में बना लिया।“ -तिरमिज़ी
रब का मिज़ाज रहमत वाला है। उसका सच्चा बन्दा भी वही है जिसका मिज़ाज रहमत वाला है।
इनसान अपने रब की कुदरत का भी निशान है और उसकी रहमत और मुहब्बत का भी। उसने इनसान से ऐसी और इतनी मुहब्बत की है जिसे इनसान पूरे तौर पर कभी समझ नहीं पायेगा। खुदा इनसानों से भी यही चाहता है कि वो भी आपस में प्यार-मुहब्बत का बर्ताव करें। उसने ज़मीनो-आसमान की हर चीज़ को इनसान को नफ़ा पहुंचाने में लगा दिया है। बहुत सी चीज़ों के भण्डार उसने खुद इनसानों के ही हवाले कर दिये हैं जिन्हें बरतने के लिए बांटने की ज़िम्मेदारी भी उसने इनसानों पर ही डाल दी है। ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी बुनियादी चीज़ों के ग़लत बंटवारे की वजह से कुछ लोगों पर तो बहुत कुछ हो जाता है जबकि बहुत से लोगों के पास कुछ भी नहीं होता। कभी-कभी अपनी ग़लत आदतों या ग़लत फैसलों के नतीजे में भी इनसान बदहाली का शिकार हो जाता है। और कभी यही बदहाली हालात के उतार-चढ़ाव के नतीजे में इनसान को घेर लेती है। वजह कुछ भी हो लेकिन बुरे हाल से गुज़रने वाला शख़्स अगर आपसे मदद मांगता है तो हैसियत के मुताबिक़ उसकी मदद करना अपकी ज़िम्मेदारी है चाहे उसका मत, प्रदेश, जाति और भाषा कुछ भी क्यों न हो? जैसे नज़र आने वाले शख़्स के पीछे आंख से नज़र न आने वाला मालिक मौजूद है ऐसे ही इस नज़र आने वाली दुनिया के पीछे आंख से दिखाई न देने वाली आखि़रत (परलोक) भी पोशीदा है। जो कुछ आप आज कर रहे हैं, वह कल आपके ही काम आने वाला है। कल जब क़ियामत के रोज़ आप अपने रब के दरबार में पेश किये जाएंगे तो वहाँ तिलावते-कुरआन, नमाज़, रोजा, हज और ज़िक्र व तस्बीह को भी जांचा परखा और तौला जाएगा और यह भी देखा जाएगा कि सच्चे मालिक का इतना नाम लेने वाले ने अपने मालिक के मिज़ाज और उसकी मन्शा को कितना पहचाना है और वह मालिक के रंग में खुद को कितना रंग पाया है? रब का मिज़ाज रहमत वाला है। उसका सच्चा बन्दा भी वही है जिसका मिज़ाज रहमत वाला है। जहां लोगों केे मिज़ाज में रहमत और हमदर्दी होगी वहां ज़ुल्म-ज़्यादती, ग़रीबी, दुख और जुर्म बाकी नहीं रह सकते। दुखी लोगों के दरम्यान रहते हुए भी उनके दुख की तरफ़ से आँखे बंद करके ध्यान में लीन रहने वाला भक्त अपने पालनहार के स्वभाव से अपरिचित है, चाहे उसके कितने ही चक्र जाग्रत हों और कितने ही लोग उसे गुरू क्यों न मानते हों? न तो आज वो अपने लिए कुछ भेज रहा है और न ही कल उसे कुछ मिलने वाला है।
देश में हर साल स्वतन्त्रता दिवस मनाया जाता है और प्रधानमंत्री ऐतिहासिक लालक़िले से तिरंगा फहराकर देशवासियों को सम्बोधित करते हैंं अक्सर इस संबोधन में देश की समस्याओं की चर्चा होती है और कभी कुछ राहत घोषणाएँ भी की जाती हैं। यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि पिछले कई वर्षो से यह कार्यक्रम रस्मी सा हो गया है। इसकी कोई अहमियत नहीं रहती कि क्या घोषणाएँ की हुईं अथवा क्या आश्वासन दिये गये,क्योंकि कथनी और करनी में आयी दरार से जनता को राहत नहीं मिल पाती। वास्तव मंें यह कार्यक्रम देशवासियों में स्वतन्त्रता का भाव संचारित करने के लिए आयोजित किया जाता है और देश की आज़ादी के सम्बन्ध में इस बहाने से कुछ बातें आ जाती हैं। उल्लेखनीय है कि 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की परतंत्रता से मुक्त हुआ था। इस मौक़े पर यह संकल्प लिया गया था कि अब हम अपने सपनों का भारत बनायेंगे। अशिक्षा, असुरक्षा, दासता, निर्धनता आदि समस्याओं के हल के लिए ज़ोरदार प्रयास करेंगे और ऐसे समाज का निर्माण करेंगे, जहाँ देश के सभी नागरिकों को अपनी उन्नति व तरक़्क़ी करने का समुचित अवसर प्राप्त रहेगा। लोगों को उनके मूलभूत अधिकार प्रदान किये जायेंगे और किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जायेगा और सभी लोग क़ानून के सामने बराबर के भागीदार होंगे। नागरिकों के धर्म,उनकी भाषा और संस्कृति आदि की रक्षा की जायेगी, किसी पर बलात् कोई सोच नहीं थोपी जायेगी। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भारतीय संविधान में भी ये चीज़ें सम्मिलित की गयीं और यह आभास दिलाया गया कि आज़ाद भारत में नागरिकों की उन्नति में बाधक बने तत्वों व कारकों को हटा दिया जायेगा। इस प्रकार हर नागरिक आज़ादी की खुली हवा मेें साँस ले सकेगा। सवाल यह है कि क्या हम सचमुच आज़ाद हो गये हैं और हमारी उन्नति में बाधक सभी तत्वों व कारकों को हटा दिया गया है ?उसका नन्हा मुन्ना वजूद जब दुनिया में आयाउसने देखीं माँ की ख़ाली-ख़ाली नज़रेंउसने देखीं वालिद के माथे की बढ़ती लकीरेंऔर सुनीं रिश्तेदारों की ठण्डी-ठण्डी आहेंवक़्त का तूफान आगे बढ़ावो इक नन्हीं सी जानसबको एक बड़ा बोझ लगती थीक्योंकि उसके वजूद केसाथ जुड़ी थीदहेज की एक भारी बेड़ीउसने सब कुछ देखासुना और महसूस कियाऔर धीरे-धीरेअपना वजूद उसको खुद बोझ लगने लगाऔर उसने अपने वजूद को समेटकरएक ख़ोल में क़ैद कर लियाऔर वक़्त यूँ ही गुज़रता गयामाँ बाप की फिक्रें बढ़ती गईंऔर अभी वो नन्हा पौधापूरी तरह परवान भी न चढ़ा थाकि एक नया सिलसिला शुरू हो गयाकुछ अजनबी लोग घर आते रहेउसको हर तरफ से परखा गयाकुछ लोगों ने जवाब कल पर टालाऔर कुछ ने पैसे परकिसी ने स्कूटर की माँग कीकिसी ने मोटरसाईकिल कीकिसी ने ज़ेवर की माँग कीकिसी ने कैश कीवक़्त निकलता जा रहा थामाँ बाप कुछ नहीं कर पा रहे थेआखि़रकार एक सौदा मंज़ूर हुआकुछ सामान आजऔर कुछ कल देने का वादा कियावो लाल गठरी बनीएक घर से दूसरे घर आ गईऔर फिर शुरू हो गईं माँगेंजो शादी के वक़्त पूरी न हो सकी थींमाँ बाप परेशान न हों, यह सोचकरसारे दुख अकेले झेलेऔर झेली फिर वो आग जिसमेंउसके वजूद को बड़ी बेहरमी से जला दिया गया लेकिन अभी कहानी खत्म नहीं हुईअब दूसरी की बारी हैवो लालची किसी और को देखने जायेंगेअपनी लम्बी लिस्ट के साथउन चीज़ों की लिस्टजिनको ख़रीदने के बारे मेंवो ख़ुद कभी सोच भी नहीं सकतेमाँ बाप कल फिर देने का वादा करेंगेऔर यह कहानी जारी रहेगीन जाने कब तकक्या वह दिन कभी आयेगाजब माँ बाप उस नन्हे वजूद कोदुनिया में आने पर ख़ुश आमदीद कहेंगेजब उसको बोझ नहीं समझा जायेगाजब उसके वजूद पर उतना ही ध्यान दिया जायेगाजितना कि उसके भाईयों परकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकेजब उसको अपनी ज़िन्दगी का रास्ता ख़ुद चुनने दिया जायेगाजब उसको बताया जायेगा कि शादी ही ज़िन्दगी का इकलौता मक़सद नहीं हैजब तक रिश्तों की यह सौदेबाज़ी ख़त्म न होगीजब माँ बाप लालची भेड़ियों के आगे घुटने न टेकेंगेमगर यह सब तब होगाजब लड़कियां ख़ुद को पहचानेंगीजब वो दूसरों के जुल्मो-सितम तक़दीर समझकर सहेंगी नहींबल्कि वो उसके खि़लाफ़ आवाज़ उठायेंगीजब तक वो अपने पैरों पर खड़ी न होंगीजब वो माँ बाप का बोझ नहीं बल्कि सहारा बनेंगीजब माँ बाप लड़कियों को बोझ समझकरअपना बोझ उतारने के लिएलड़कियों के सिर पर मनों बोझ नहीं रखेंगेबोझ बेइज़्ज़ती और नाक़द्री काबोझ एक खाना बनाने वाली औरबच्चे पैदा करने वाली मशीन बनकर रह जाने काकाफ़ी दहेज न लाने का बोझऔर फिर उस आग का बोझजिसमें उनको जला दिया जाता है ज़िन्दा
पालनहार प्रभु ने मनुष्य की रचना दुख भोगने के लिए नहीं की है। दुख तो मनुष्य तब भोगता है जब वह ‘मार्ग’ से विचलित हो जाता है। मार्ग पर चलना ही मनुष्य का कत्र्तव्य और धर्म है। मार्ग से हटना अज्ञान और अधर्म है जो सारे दूखों का मूल है। पालनहार प्रभु ने अपनी दया से मनुष्य की रचना की उसे ‘मार्ग’ दिखाया ताकि वह निरन्तर ज्ञान के द्वारा विकास और आनन्द के सोपान तय करता हुआ उस पद को प्राप्त कर ले जहाँ रोग,शोक, भय और मृत्यु की परछाइयाँ तक उसे न छू सकें। मार्ग सरल है, धर्म स्वाभाविक है। इसके लिए अप्राकृतिक और कष्टदायक साधनाओं को करने की नहीं बल्कि उन्हें छोड़ने की ज़रूरत है।ईश्वर प्राप्ति सरल है ईश्वर सबको सर्वत्र उपलब्ध है। केवल उसके बोध और स्मृति की ज़रूरत है। पवित्र कुरआन इनसान की हर ज़रूरत को पूरा करता है। इसकी शिक्षाएं स्पष्ट,सरल हैं और वर्तमान काल में आसानी से उनका पालन हो सकता है। पवित्र कुरआन की रचना किसी मनुष्य के द्वारा किया जाना संभव नहीं है। इसके विषयों की व्यापकता और प्रामाणिकता देखकर कोई भी व्यक्ति आसानी से यह जान सकता है कि इसका एक-एक शब्द सत्य है। आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के बाद भी पवित्र कुरआन में वर्णित कोई भी तथ्य गलत नहीं पाया गया बल्कि उनकी सत्यता ही प्रमाणित हुई है। कुरआन की शब्द योजना में छिपी गणितीय योजना भी उसकी सत्यता का एक ऐसा अकाट्य प्रमाण है जिसे कोई भी व्यक्ति जाँच परख सकता है।प्राचीन धर्म का सीधा मार्ग ईश्वर का नाम लेने मात्र से ही कोई व्यक्ति दुखों से मुक्ति नहीं पा सकता जब तक कि वह ईश्वर के निश्चित किये हुए मार्ग पर न चले। पवित्र कुरआन किसी नये ईश्वर,नये धर्म और नये मार्ग की शिक्षा नहीं देता। बल्कि प्राचीन ऋषियों के लुप्त हो गए मार्ग की ही शिक्षा देता है और उसी मार्ग पर चलने हेतु प्रार्थना करना सिखाता है।
‘हमें सीधे मार्ग पर चला, उन लोगों का मार्ग जिन पर तूने कृपा की।’ (पवित्र कुरआन 1ः5-6)
ईश्वर की उपासना की सही रीति
मनुष्य दुखों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन यह इस पर निर्भर है कि वह ईश्वर को अपना मार्गदर्शक स्वीकार करना कब सीखेगा? वह पवित्र कुरआन की सत्यता को कब मानेगा? और सामाजिक कुरीतियों और धर्मिक पाखण्डों का व्यवहारतः उन्मूलन करने वाले अन्तिम सन्देष्टा हज़रत मुहम्मद (स.) को अपना आदर्श मानकर जीवन गुज़ारना कब सीखेगा?सर्मपण से होता है दुखों का अन्त ईश्वर सर्वशक्तिमान है वह आपके दुखों का अन्त करने की शक्ति रखता है। अपने जीवन की बागडोर उसे सौंपकर तो देखिये। पूर्वाग्रह,द्वेष और संकीर्णता के कारण सत्य का इनकार करके कष्ट भोगना उचित नहीं है। उठिये,जागिये और ईश्वर का वरदान पाने के लिए उसकी सुरक्षित वाणी पवित्र कुरआन का स्वागत कीजिए। भारत को शान्त समृद्ध और विश्व गुरू बनाने का उपाय भी यही है।क्या कोई भी आदमी दुःख, पाप और निराशा से मुक्ति के लिये इससे ज़्यादा बेहतर, सरल और ईश्वर की ओर से अवतरित किसी मार्ग या ग्रन्थ के बारे में मानवता को बता सकता है?
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भारत में दुनिया के कुल अंधों की एक तिहाई आबादी रहती है जो कि लगभग 120 लाख है। ब्वसवनत इसपदक लोग भी होते हैं जो चीज़ों के कुछ रंगों में भेद नहीं कर पाते। अंधों की एक क़िस्म और होती है जो आँख के नहीं बल्कि अक़्ल के अंधे होते हंै। इन्हें ज्तनजी इसपदक भी कहा जा सकता है। तमाम पढ़ाई लिखाई के बावजूद इनकी अक़्ल उस कुदरती सच्चाई को नहीं देख पाती जिसे हरेक देश का अनपढ़ आदमी भी जानता है बल्कि जिसे मछलियांं, जानवर, परिन्दे और पेड़-पौधे तक जानते हैं। अक़्ल के अंधों की बहुत सी जमातें हंै जो अलग-अलग रास्तांे पर ठोकरें खाती फिर रही हैं। समलैंगिकता के राहियों और उनके हामियोंे का शुमार इन्हीं लोगों में होता है। अगर इनके माँ बाप भी इनके जैसी ही सोच वाले होते तो आज इनका वजूद ही इस ज़मीन पर न होता। जिस व्यवस्था से आदमी फ़ायदा उठाता है उसे बनाये रखने की ज़िम्मेदारी भी उस आदमी पर खुद-ब-खुद आयद हो जाती है और जो आदमी अपनी ख़ुदग़र्ज़ी या बीमार मानसिकता के चलते उस व्यवस्था की जड़ काटने पर तुल जाये और समझाने से भी न समझे तो फिर उसे मुनासिब सज़ा दिया जाना ज़रूरी है। यह ख़ुशी की बात है कि इस गन्दी सोच के खि़लाफ मुस्लिम, ईसाई, हिन्दू और दीगर धर्मगुरूआंे ने एक स्वर में आवाज़ बुलन्द की है लेकिन काम सिर्फ विरोध करने से ही बनने वाला नहीं है। यह सोचना भी ज़रूरी है कि किन कारणों से भारतीय युवा वर्ग विकृतियों का शिकार हो रहा है और किस तरीके़ से उन्हें तबाही की दलदल से निकाला जा सकता है? हकी़क़त यह है कि इनसान को अगर ज़िन्दगी का अस्ल मक़सद ही पता न चले तो फिर वह भटक कर किसी भी रास्ते पर निकल सकता है। इनसान अनाथ नहीं है न ही उसकी ज़िन्दगी बेमक़सद है। इनसान के जीवन का एक पाक मक़सद है जिसे नेकी के रास्ते से ही पाया जा सकता है। इनसान के लिए ईश्वर की योजना क्या है? उसकी नाकामी किस चीज़ में है और उसकी कामयाबी किस बात में है? इसलाम हर बात को खोलकर समझाता है। इसलाम के मानने वालों ने दुनिया को इसलाम का पवित्र संदेश दिया लेकिन पिछले कुछ अर्से से इस सिलसिले में सुस्ती और ग़फ़लत देखी जा रही है। खेत में अगर फ़सल को खरपतवार दबा दे तो इसकी ज़िम्मेदारी किसान की होती है। इसी तरह अगर दुनिया में बुराई फैलती है तो इसकी ज़िम्मेदारी मुसलमानों पर आयद होती है क्योंकि उस पैदा करने वाले ने मुसलमानों की दीनीे ज़िम्मेदारी ही लोगों की खै़रख़्वाही, खि़दमत और उन्हेंं नेकी और कामयाबी के रास्ते की तरफ रहनुमाई करना मुक़र्रर की है। पश्चिमी सभ्यता को जिस घुन ने चाट कर खोखला कर दिया है, वही घुन अब भारतीय समाज को खाये जा रहा है। भारतीय समाज को तबाही से बचाना मुसलमानों की दीेनीें ज़िम्मेदारी है। भारतीय समाज को न सिर्फ बचाना है बल्कि इसे नेकी और सच्चरित्रता की उस बुलंदी पर पहुंचाना है, जहां पहुंचकर यह स्वाभाविक रूप से विश्व समाज का मार्गदर्शन कर सके। एक अजन्मे अविनाशी ईश्वर की वन्दना से ही शुभ गुणों की प्राप्ति संभव है इसलिये लोगों को ईश वन्दना के स्वरूप, उसके तक़ाज़ों और उसके नतीजों के प्रति शिक्षित करके अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए सभी वर्गों को मिलकर प्रयास करना ज़रूरी है। आज़ादी के लिए बलिदान देने वालों ने स्वर्णिम भारत का जो सपना देखा था उसे साकार करने का उपाय भी यही है। मानवधर्म : पैग़म्बर की वाणी
1. हजरत अबू हुरैरह रज़ि0 से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने कहा कि अल्लाह तआला क़ियामत के दिन (किसी बन्दे से) कहेगाः ”हे आदम के बेटे! मैं बीमार हुआ तूने मेरी बीमारपुर्सी नहीं की।“ वह बन्दा कहेगा कि हे रब! मैं तेरी बीमारपुर्सी कैसे करता तू तो सारे जगत का रब है? वह कहेगाः ”क्या तू नहीं जानता था कि मेरा अमुक बन्दा बीमार है तूने उसकी बीमारपुर्सी नहीं की? क्या तू नहीं जानता था कि अगर तू उसकी बीमारपुर्सी करता, तो अवश्य ही तू मुझे उसके पास पाता। हे आदम के बेटे! मैंने तुझसे खाना मांगा लेकिन तूने मुझे खाना नहीं खिलाया।” बन्दा कहेगा-हे रब! मैं तुझे खाना कैसे खिलाता तू तो जगत का रब है। वह कहेगाः ”क्या तुझे नहीं मालूम कि मेरे अमुक बन्दे ने तुझसे खाना मांगा लेकिन तूने उसे खाना नहीं खिलाया। क्या तूने बात न जानी कि अगर तूने उसे खिलाया होता, तो उस (के सवाब) को मेरे पास पाता। हे आदम के बेटे! मैंने तुझसे पानी मांगा लेकिन तूने मुझे पानी न पिलाया।“ बन्दा कहेगा- हे रब, मैं तुझे कैसे पानी पिलाता तू तो सारे जगत का रब है। वह कहेगाः ‘‘मेरे अमुक बन्दे ने तुझसे पानी मांगा लेकिन तूने उसे न पिलाया अगर तू उसे पानी पिलाता तो उस (के सवाब) को मेरे पास पाता।“ - मुस्लिम 2. हज़रत अबू हुरैरह रज़ि0 से रिवायत है कि नबी सल्ल0 ने कहा कि जब कोई मुसलमान अपने किसी बीमार भाई की बीमारपुर्सी करता है या उससे मुलाक़ात करता है तो अल्लाह तआला कहता हैः ‘‘तुझे मुबारक हो और तेरा यह चलना मुबारक है। तूने अपना घर जन्नत में बना लिया।“ -तिरमिज़ी
रब का मिज़ाज रहमत वाला है। उसका सच्चा बन्दा भी वही है जिसका मिज़ाज रहमत वाला है।
इनसान अपने रब की कुदरत का भी निशान है और उसकी रहमत और मुहब्बत का भी। उसने इनसान से ऐसी और इतनी मुहब्बत की है जिसे इनसान पूरे तौर पर कभी समझ नहीं पायेगा। खुदा इनसानों से भी यही चाहता है कि वो भी आपस में प्यार-मुहब्बत का बर्ताव करें। उसने ज़मीनो-आसमान की हर चीज़ को इनसान को नफ़ा पहुंचाने में लगा दिया है। बहुत सी चीज़ों के भण्डार उसने खुद इनसानों के ही हवाले कर दिये हैं जिन्हें बरतने के लिए बांटने की ज़िम्मेदारी भी उसने इनसानों पर ही डाल दी है। ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी बुनियादी चीज़ों के ग़लत बंटवारे की वजह से कुछ लोगों पर तो बहुत कुछ हो जाता है जबकि बहुत से लोगों के पास कुछ भी नहीं होता। कभी-कभी अपनी ग़लत आदतों या ग़लत फैसलों के नतीजे में भी इनसान बदहाली का शिकार हो जाता है। और कभी यही बदहाली हालात के उतार-चढ़ाव के नतीजे में इनसान को घेर लेती है। वजह कुछ भी हो लेकिन बुरे हाल से गुज़रने वाला शख़्स अगर आपसे मदद मांगता है तो हैसियत के मुताबिक़ उसकी मदद करना अपकी ज़िम्मेदारी है चाहे उसका मत, प्रदेश, जाति और भाषा कुछ भी क्यों न हो? जैसे नज़र आने वाले शख़्स के पीछे आंख से नज़र न आने वाला मालिक मौजूद है ऐसे ही इस नज़र आने वाली दुनिया के पीछे आंख से दिखाई न देने वाली आखि़रत (परलोक) भी पोशीदा है। जो कुछ आप आज कर रहे हैं, वह कल आपके ही काम आने वाला है। कल जब क़ियामत के रोज़ आप अपने रब के दरबार में पेश किये जाएंगे तो वहाँ तिलावते-कुरआन, नमाज़, रोजा, हज और ज़िक्र व तस्बीह को भी जांचा परखा और तौला जाएगा और यह भी देखा जाएगा कि सच्चे मालिक का इतना नाम लेने वाले ने अपने मालिक के मिज़ाज और उसकी मन्शा को कितना पहचाना है और वह मालिक के रंग में खुद को कितना रंग पाया है? रब का मिज़ाज रहमत वाला है। उसका सच्चा बन्दा भी वही है जिसका मिज़ाज रहमत वाला है। जहां लोगों केे मिज़ाज में रहमत और हमदर्दी होगी वहां ज़ुल्म-ज़्यादती, ग़रीबी, दुख और जुर्म बाकी नहीं रह सकते। दुखी लोगों के दरम्यान रहते हुए भी उनके दुख की तरफ़ से आँखे बंद करके ध्यान में लीन रहने वाला भक्त अपने पालनहार के स्वभाव से अपरिचित है, चाहे उसके कितने ही चक्र जाग्रत हों और कितने ही लोग उसे गुरू क्यों न मानते हों? न तो आज वो अपने लिए कुछ भेज रहा है और न ही कल उसे कुछ मिलने वाला है।
देश में हर साल स्वतन्त्रता दिवस मनाया जाता है और प्रधानमंत्री ऐतिहासिक लालक़िले से तिरंगा फहराकर देशवासियों को सम्बोधित करते हैंं अक्सर इस संबोधन में देश की समस्याओं की चर्चा होती है और कभी कुछ राहत घोषणाएँ भी की जाती हैं। यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि पिछले कई वर्षो से यह कार्यक्रम रस्मी सा हो गया है। इसकी कोई अहमियत नहीं रहती कि क्या घोषणाएँ की हुईं अथवा क्या आश्वासन दिये गये,क्योंकि कथनी और करनी में आयी दरार से जनता को राहत नहीं मिल पाती। वास्तव मंें यह कार्यक्रम देशवासियों में स्वतन्त्रता का भाव संचारित करने के लिए आयोजित किया जाता है और देश की आज़ादी के सम्बन्ध में इस बहाने से कुछ बातें आ जाती हैं। उल्लेखनीय है कि 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की परतंत्रता से मुक्त हुआ था। इस मौक़े पर यह संकल्प लिया गया था कि अब हम अपने सपनों का भारत बनायेंगे। अशिक्षा, असुरक्षा, दासता, निर्धनता आदि समस्याओं के हल के लिए ज़ोरदार प्रयास करेंगे और ऐसे समाज का निर्माण करेंगे, जहाँ देश के सभी नागरिकों को अपनी उन्नति व तरक़्क़ी करने का समुचित अवसर प्राप्त रहेगा। लोगों को उनके मूलभूत अधिकार प्रदान किये जायेंगे और किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जायेगा और सभी लोग क़ानून के सामने बराबर के भागीदार होंगे। नागरिकों के धर्म,उनकी भाषा और संस्कृति आदि की रक्षा की जायेगी, किसी पर बलात् कोई सोच नहीं थोपी जायेगी। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए भारतीय संविधान में भी ये चीज़ें सम्मिलित की गयीं और यह आभास दिलाया गया कि आज़ाद भारत में नागरिकों की उन्नति में बाधक बने तत्वों व कारकों को हटा दिया जायेगा। इस प्रकार हर नागरिक आज़ादी की खुली हवा मेें साँस ले सकेगा। सवाल यह है कि क्या हम सचमुच आज़ाद हो गये हैं और हमारी उन्नति में बाधक सभी तत्वों व कारकों को हटा दिया गया है ?उसका नन्हा मुन्ना वजूद जब दुनिया में आयाउसने देखीं माँ की ख़ाली-ख़ाली नज़रेंउसने देखीं वालिद के माथे की बढ़ती लकीरेंऔर सुनीं रिश्तेदारों की ठण्डी-ठण्डी आहेंवक़्त का तूफान आगे बढ़ावो इक नन्हीं सी जानसबको एक बड़ा बोझ लगती थीक्योंकि उसके वजूद केसाथ जुड़ी थीदहेज की एक भारी बेड़ीउसने सब कुछ देखासुना और महसूस कियाऔर धीरे-धीरेअपना वजूद उसको खुद बोझ लगने लगाऔर उसने अपने वजूद को समेटकरएक ख़ोल में क़ैद कर लियाऔर वक़्त यूँ ही गुज़रता गयामाँ बाप की फिक्रें बढ़ती गईंऔर अभी वो नन्हा पौधापूरी तरह परवान भी न चढ़ा थाकि एक नया सिलसिला शुरू हो गयाकुछ अजनबी लोग घर आते रहेउसको हर तरफ से परखा गयाकुछ लोगों ने जवाब कल पर टालाऔर कुछ ने पैसे परकिसी ने स्कूटर की माँग कीकिसी ने मोटरसाईकिल कीकिसी ने ज़ेवर की माँग कीकिसी ने कैश कीवक़्त निकलता जा रहा थामाँ बाप कुछ नहीं कर पा रहे थेआखि़रकार एक सौदा मंज़ूर हुआकुछ सामान आजऔर कुछ कल देने का वादा कियावो लाल गठरी बनीएक घर से दूसरे घर आ गईऔर फिर शुरू हो गईं माँगेंजो शादी के वक़्त पूरी न हो सकी थींमाँ बाप परेशान न हों, यह सोचकरसारे दुख अकेले झेलेऔर झेली फिर वो आग जिसमेंउसके वजूद को बड़ी बेहरमी से जला दिया गया लेकिन अभी कहानी खत्म नहीं हुईअब दूसरी की बारी हैवो लालची किसी और को देखने जायेंगेअपनी लम्बी लिस्ट के साथउन चीज़ों की लिस्टजिनको ख़रीदने के बारे मेंवो ख़ुद कभी सोच भी नहीं सकतेमाँ बाप कल फिर देने का वादा करेंगेऔर यह कहानी जारी रहेगीन जाने कब तकक्या वह दिन कभी आयेगाजब माँ बाप उस नन्हे वजूद कोदुनिया में आने पर ख़ुश आमदीद कहेंगेजब उसको बोझ नहीं समझा जायेगाजब उसके वजूद पर उतना ही ध्यान दिया जायेगाजितना कि उसके भाईयों परकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकेजब उसको अपनी ज़िन्दगी का रास्ता ख़ुद चुनने दिया जायेगाजब उसको बताया जायेगा कि शादी ही ज़िन्दगी का इकलौता मक़सद नहीं हैजब तक रिश्तों की यह सौदेबाज़ी ख़त्म न होगीजब माँ बाप लालची भेड़ियों के आगे घुटने न टेकेंगेमगर यह सब तब होगाजब लड़कियां ख़ुद को पहचानेंगीजब वो दूसरों के जुल्मो-सितम तक़दीर समझकर सहेंगी नहींबल्कि वो उसके खि़लाफ़ आवाज़ उठायेंगीजब तक वो अपने पैरों पर खड़ी न होंगीजब वो माँ बाप का बोझ नहीं बल्कि सहारा बनेंगीजब माँ बाप लड़कियों को बोझ समझकरअपना बोझ उतारने के लिएलड़कियों के सिर पर मनों बोझ नहीं रखेंगेबोझ बेइज़्ज़ती और नाक़द्री काबोझ एक खाना बनाने वाली औरबच्चे पैदा करने वाली मशीन बनकर रह जाने काकाफ़ी दहेज न लाने का बोझऔर फिर उस आग का बोझजिसमें उनको जला दिया जाता है ज़िन्दा
Saturday, April 10, 2010
गाय काटने वाले मुसलमानों की प्रार्थना ऊपर वाला कैसे सुन सकता है जी ? - भोले भाले गिरी जी ने पुराण मर्मज्ञ महर जी को टोका । question ?
पार्ट 1 यहां देखें और पार्ट 2 यहां देखें
पार्ट 3
समावेश जी ने आते ही , जबड़ा सहलाते अवध्य बाबू से पूछा - क्यों भाई , क्या हुआ ?दर्द से बेहाल अवध्य बाबू बोले - नीचे से तो पहले ही दुख रहा था और गिरी जी के कारण अब ऊपर से भी दुखने लगा । हाय रे मेरी क़िस्मत ।इस बार वकील साहब ने सिम्पैथी जताई । पूछा - क्यों भाई , नीचे से क्यों दुख रहा है , और वह भी बुढ़ापे में ?मानों वकील साहब ने साँप की दुम पर पैर रख दिया था ।अवध्य बाबू फुंकारे - अरे ! यह नामुराद क़ब्ज़ तो होता ही बुढ़ापे में है ।महर जी भला कब कम थे । बोले - लेकिन मैंने तो सुना है कि क़ब्ज़ होने के लिए पेट में रोटी आदि कुछ होना ज़रूरी है ?ठाकरे का हज्जाम आश्चर्यचकित था । बोला - तो क्या इनके बेटे बहू इन्हें रोटी नहीं देते ?बेगाने बाबू भी दुमछल्ला स्टाइल में बोले - क्या इतने बड़े नगर में कोई गुरूद्वारा आदि भी नहीं है क्या ?अवध्य बाबू कराहते हुए बोले - अरे भाई ! यहां गुरूद्वारा भी है और मज़ारों का लंगर भी है । सब कुछ है यहां पर । अगर ये सब न होते तो भला मैं कैसे ज़िन्दा रह पाता ?परवीन जी ने अपनी एरिस्टोक्रेट मुस्कुराहट के साथ पूछा - तो इसका मतलब तो यह हुआ कि आप रोज़ खाते हैं ?अवध्य बाबू ने कहा - हां भई हां । मैं भले ही लंगर का खाता हूं लेकिन खाता रोज़ हूं ।गिरी जी ने भी अपनी झेंप मिटाने की ख़ातिर पूछा - जब आप रोज़ खाते है तो आपको क़ब्ज़ भी तो रोज़ ही लगता होगा ?अवध्य बाबू बोले - नहीं जी , लंगर के खाने का तो पेट आदी हो गया है । हुआ यूं कि हमारे मुहल्ले में कई बूढ़ी गाय घूमती रहती हैं । वे भी रिटायर्ड लोगों की तरह बड़ा दुख भरा जीवन जीती हैं । सड़क पर पड़ी पॉलिथीन की पन्नियां खा खाकर कष्ट भोगकर मरती रहती हैं । इतना कष्ट तो उन्हें अज्जू कसाई की छुरी से भी न होता होगा । बहरहाल अपने भगवा दल वाले और हम जैसे तो इस इन्तेज़ार में रहते हैं कि यह आखि़र मरेगी कब ?परवीन जी बोले - क्यों , क्या आपको उसकी खाल उतारनी है या उसका क्रियाकर्म करना है । अवध्य बाबू बोले - राम राम राम ! खाल हम क्यों उतारने लगे ?तो फिर क्यों करते हैं आप गय्या के मरने का इन्तेज़ार ?अवध्य बाबू बोले - पुण्य की ख़ातिर भाई ।समावेश जी भी चकरा गये । पूछा - गऊ के मरने में आपको कैसे पुण्य मिलता है और उसका आपके क़ब्ज़ से क्या सम्बन्ध है ?अवध्य बाबू ने समझाना आरम्भ किया । बोले - देखिये । गाय हमारी मां है कि नहीं ?परवीन जी के अलावा सभी ने हामी भरी ।तो बस । जब वह हमारी मां है तो उसका क्रियाकर्म भी करना ज़रूरी है और क्योंकि मां तो वह सब हिन्दुओं की है सो सभी से सहयोग लेना भी ज़रूरी है । भगवा दल सबसे चन्दा बटोर लेता है ।परवीन जी ने कहा - चन्दा कोई बटोरे और क़ब्ज़ आपको हो ?बात कुछ समझ में नहीं आई । अरे भाई मय्यत की तेरहवीं की रस्म भी तो होती है और उसमें कुछ खाना खिलाना भी तो होता है कि नहीं ?‘ओह आई सी ।‘ परवीन बाबू ने कहा और फ़ौरन अपने लैपटॉप पर कुछ सर्च करने बैठ गए । अब रोज़ रोज़ तो गय्या मरती नहीं सो राम जाने अगली गय्या कब मरे ? यही सोचकर हमने खू़ब सारा माल ठूंस लिया ।गिरी जी ने नतीजा भी घोषित कर दिया - फिर तो आपको क़ब्ज़ तो होना ही था । लेकिन वैसे यह दावत थी कब ?मैंने ढुंढवाया था आपको , लेकिन आप रामदेव बाबा जी से आशीर्वाद लेने हरिद्वार गए हुए थे।ओह तो यह 2 अप्रैल 2010 की बात है । फिर आपने क्या किया ?करना क्या था ? गऊ का मूत हरेक तरह का क़ब्ज़ तोड़ने में रामबाण है । इसमें तेज़ाब की भारी मात्रा पाई जाती है । मैं तुरन्त दो चार गायों के पिछवाड़े सहलाकर औषधि ले आया और बेपेन्दी का पूरा लोटा चढ़ा गया । लेकिन फिर भी कुछ नहीं हुआ ।तो आपको किसी ढंग के डॉक्टर को दिखाना चाहिये था । - वकील साहब ने सलाह दी।अजी देख लिया ढंग के डॉक्टर को भी । गया था मैं डॉक्टर जमाल के पास इलाज कराने । वे तो बैठे थे अन्दर , बाहर खड़ा अपना प्रकाश झा का लग्गू पत्रकार किसी एसीपी के ड्राइवर से बतिया रहा था । मेरी समस्या सुनकर बोला कि इतनी मामूली सी समस्या के लिए डॉक्टर साहब से क्या मिलना ? इसका इलाज तो उनका कम्पाउण्डर ही कर देगा । मुझे भी यही प्रॉब्लम थी । उसने गणेश क्रिया कर दी । बस समस्या ख़त्म ।भय्या मैंने उनकी बात मान ली । पहले उसने कमरा बन्द करके मेरे साथ गणेश क्रिया कर दी और जब उसने बात बनती न देखी और गऊ मूत पर मेरा अगाध विश्वास देखा तो वह टॉयलेट में जाकर एक जार भर लाया और मुझे पिला दिया । उसके पीते ही मुझे खुलकर दस्त हो गया । मैंने उससे पूछा कि भई गऊ मूत तो मैं खुद भी पीकर आया था लेकिन इत्ता तेज़ असर तो मैंने उसका कभी देखा नहीं । यह आखि़र था क्या ?वह बोला - बाबू जी था तो यह भी मूत ही लेकिन इसकी पॉवर थोड़ा ज़्यादा थी ।क्या मतलब ? क्या इसमें भी पॉवर कम ज़्यादा होती है ?देखिये ! हरेक औषधि की पॉवर कम ज़्यादा होती है तो भला फिर मूत की क्यों न होगी ?मैंने कहा - अब ज़्यादा सस्पेंस क्रिएट किये बिना पॉवर बढ़ाने का तरीक़ा जल्दी से बता दो ।वह बोला - सीधी सी बात है । देखिये ! गाय लाख माता सही लेकिन है तो जानवर ही ।क्यों ?बिल्कुल है ।मनुष्य की योनि सर्वश्रेष्ठ योनि मानी जाती है कि नहीं ?बिल्कुल ।बस । जब आप पर गऊ का मूत बेअसर हो गया तो मैं समझ गया कि अब औषधि की पॉवर बढ़ाने का समय आ गया है और मैंने तुरन्त आपकी भलाई की ख़ातिर अपना ....क्या ऽऽऽ ? - मैं चिल्लाया और उसे मारने को उठ ही रहा था कि अचानक मेरे पेट में फिर मरोड़ सा उठा और मैं टॉयलेट की तरफ़ को भागा लेकिन वह कम्पाउण्डर नाराज़ हो गया था । उसने मुझे धकिया कर दरवाज़ा लगा लिया । वह अपनी फ़ीस मारे जाने से भी दुखी था और मेरी बदतमीज़ी से भी ।फिर आपका हुआ क्या ? - गेंदालाल जी ने अपना नक़ली रे बैन का काला चश्मा उतारकर उत्सुकतावश पूछ ही लिया ।होना क्या था ? , जिसके लिए इनसान अपना टॉयलेट बन्द कर देता है । उसके लिए वह मालिक अपना विशाल टॉयलेट तो सदा खुला ही रखता है ।अयं क्या मतलब ? - हस्बे आदत गिरी जी कुछ भी न समझे ।अरे भाई ! मैं खोलकर वहीं सड़क के किनारे नाले पर बैठ गया , मजबूरी थी । क्या करता ?फिर तो आपका पेट ख़ूब साफ़ हुआ होगा और सुलभ शौचालय वाले की मज़्दूरी भी न देनी पड़ी होगी ?अजी ऐसे नसीब हमारे कहां ? अभी मैं बैठा ही था कि मुहल्ले के कई कुत्ते वहां आ गये । वे समझे कि मैं उनके ठिए पर क़ब्ज़ा करने के वहां बैठ गया हूं । सो वे मुझ पर भौंकने लगे । उस समय उनके साथ एक कुतिया भी थी । उसे इम्प्रैस करने की ख़ातिर एक काला कुत्ता तो मेरा गला पकड़ने के लिए आगे बढ़ने लगा ।फिर क्या हुआ ? - गिरी बाबू ने उनसे ऐसे पूछा मानो वे फ़िल्म नटवरलाल के अमिताभ बच्चन से स्टोरी सुन रहे हों ।होना क्या था ? आगे तो भागने के लिए जगह थी नहीं और जगह भी होती तो खड़े होने तक की ताक़त भी घुटनों में न बची थी । सो एक बार फिर कुदरत काम आई ?वह कैसे ? - इस बार बैंगनी शर्ट वाले बेगाने बाबू से न रहा गया ।वैरी सिम्पल , विदेशियों के हमले के समय हमारी सेनाओं के हाथी क्या करते थे ?- अवध्य बाबू बोले - बताओ , बताओ ?सब चुप हो गये । सबने आशा भरी नज़रों से ठाकरे के हज्जाम की तरफ़ देखा । उनमें एक वही था जो अज्जू क़साई से चारजन्य जैसे अख़बार की रद्दी पढ़ पढ़ कर विद्वान सा बन गया था । ठाकरे के हज्जाम का सीना उनकी नज़रों का केन्द्र बनते ही फूलने के लिए मचलने लगा । उसकी जीभ इतिहास की जुगाली करने के कुलबुलाने लगी । लेकिन फिर भी उसने थोड़ी सी मिन्नत करवाना ज़रूरी समझा ताकि कोई उसे आदर का भूखा न समझ ले । दुमछल्ले बेगाने बाबू के आग्रह पर उसने बताया - हमारे हाथी दुश्मनों पर टूट पड़ने के बजाए उनके तीर खाकर पीछे की तरफ़ दौड़ा करते थे और अपने ही सैनिकों को कुचलकर वे विदेशियों को विजय श्री थाली में परोस दिया करते थे ।तो क्या विदेशी हमलावरों की विजय के श्रीगणेश में देसी हाथियों की भी भूमिका रही है ? - गेंदालाल जी चैंके ।वकील साहब बोले - बात हाथी की नहीं कुत्ते की चल रही थी । हां तो अवध्य जी आप अपना बयान जारी रखें ।बस फिर क्या था मैं भी अपने पूर्वजों की तरह जान बचाने के लिए पीछे को लुढ़क गया । - अवध्य बाबू बोले ।नाले में गिरकर भी आप नहीं डूबे ? - समावेश जी को भी ताज्जुब हुआ ।अरे भाई ! आप जैसे पौराणिकों को तो कम से कम ताज्जुब न होना चाहिये ।क्यों भाई ?आप तो चमत्कार को मानते हैं न ?हां । जब जल में डूबती धरती को बचाने के लिए विष्णु जी स्वयं सुअर बनकर आ सकते हैं तो क्या मुझ जैसे धरती के लाल को बचाने के लिए एकाध सुअर भी नहीं भेज सकते ?क्या मतलब ? - गिरी बाबू ने तो मानो अक्ल पर बिल्कुल ही ज़ोर न डालने की क़सम खा रखी थी ।अरे भाई ! हरेक मुश्किल के साथ वह प्रभु कोई न कोई आसानी भी ज़रूर देता है । मैं ऊपर से सीधा नाले में खड़ी एक सुअरिया की पीठ पर पेट के बल गिरा । उस समय उसका पति अपना शक्ति परीक्षण कर रहा था लेकिन उस बेचारे ने अपनी पत्नी के ऊपर मेरे गिरने का बिल्कुल भी बुरा न माना । वैसे भी वह अनाड़ी और नौसिखिया सा ही लग रहा था ।वह कैसे ? वकील साहब पूछ बैठे ।अजी सुअरिया और आदमी में कुछ तो अन्तर होता ही है लेकिन उसे तो अन्त तक भी ज़रा अहसास न हुआ ।क्या मतलब ? सबने समवेत स्वर में पूछा और फिर खु़द ही समझ भी गये । फिर भी उन्होंने पूछा - और आपने प्रतिरोध भी नहीं किया ?प्रतिरोध के लिए तो छोड़ो , हिलने तक की तो ताक़त मुझमें थी नहीं । खै़र , प्रभु जो भी करते हैं भले के लिए करते हैं और इससे मेरा रहा सहा क़ब्ज़ भी दूर हो गया ।वाक़ई साहब , आपको तो पेटा का अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष होना चाहिये । आपने तो बिल्कुल पश्चिमी लोगों की तरह जीवों के जज़्बात का ख़याल रखा है । कोई क्या जानेगा आपके इतने बड़े उपकार को ?अवध्य बाबू बोले - जल्दी ही लोग मेरे इस उपकार को जानेंगे क्योंकि अपने मुरीद सहसपुरिया की डिमांड पर डा. जमाल मेरी आपबीती लिख रहा है । फिर क्या हुआ ? गिरी जी फिर बोले ।अबे क्या सारी स्टोरी एक ही सांस में सुनेगा ? चल तू एकाध लोटा पानी ला ।क्या पीने के लिए ?नहीं रे ! बस ज़रा पेट में मरोड़ सा उठ रहा है ।इतना सुनना था कि वकील साहब की सलाह पर गिरी जी , समावेश जी , महर जी और ठाकरे के हज्जाम ने , चारों ने उन्हें किसी बग़ैर कफ़न की अर्थी की तरह हाथ पैर से पकड़ कर उठा लिया और उन्हें टॉयलेट की तरफ़ ले भागे और परवीन बाबू अपना पेट पकड़कर ज़मीन पर लोट पोट होकर देर तक क़हक़हे लगाते रहे ।गेंदालाल जी ने अपने सर पर कुछ गीलापन महसूस किया तो सर पर हाथ फिराकर देखा और यह समझने का प्रयास करते रहे कि उनके सर पर यह सड़ी हुई कढ़ी आई कहां से ?लेकिन परवीन की उनपर नज़र पड़ी तो वे तुरन्त समझ गये कि वे चारों अवध्य बाबू को गेंदालाल के सर से क्रॉस करके ले गये हैं और यह उनमें से ही टपक कर गेंदालाल जी पर गिर गया है । यह देखकर तो परवीन जी का हंस हंस कर हाल और भी ज़्यादा बुरा हो गया और वकील साहब भी मुंह घुमाकर ज़ेरे लब मुस्कुराने लगे । ( ....जारी )
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पार्ट 4
जिस हाल में वे चारों अवध्य बाबू को लेकर गये थे , ठीक उसी तरह वे उन्हें बिना कफ़न की अर्थी की तरह उठाये हुए ले आये । फ़र्क़ था तो बस इतना कि पहले उनके बदन पर नीचे लुंगी थी और अब वहां सिर्फ़ एक लंगोट सा था और उनका निचवाड़ा टॉयलेट में पानी से धुलने के बाद ऐसे चमक रहा था जैसे खाल उतरने के बाद अज्जू क़साई की दुकान पर टंगा हुआ मुर्ग़ा चमकता है । उन चारों ने यानि कि गिरी जी , महर जी , बेगाने बाबू और ठाकरे के हज्जाम ने अवध्य बाबू को उनकी पुरानी जगह पर वापस पटख़ दिया । ज़मीन में कूल्हे ठुकते ही अवध्य बाबू के मुंह से बेइख्ितयार निकला - हाय राम , मरा ।
तुम मरने वालों में से नहीं हो , वह डॉक्टर सही कहता है कि तुम अवध्य हो । - चिढ़कर गिरी जी बोले ।
प्राचीन भारतीय संस्कृति में तो तुम जैसे लोगों को 50 वर्ष का होते ही वन में भेज दिया करते थे । कम से कम पीछा तो छूट जाता था बीमार बुड्ढों से - महर जी ने अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति की महिमा गाये जाने का एक अदना सा मौक़ा गंवाना भी मुनासिब न समझा ।
गिरी जी हवन्नक़ों की तरह महर जी को तकते हुए पूछ बैठे - महर जी ! आप भारतीय संस्कृति की बुराई कर रहे हैं या बड़ाई ?
ठाकरे के हज्जाम ने उन्हें दुत्कारते हुए कहा - अरे अक्ल के कोल्हू ! भारतीय संस्कृति की बुराई तो मुसलमान , ईसाई और कम्यनिस्ट करते हैं , हम तो राष्ट्रवादी हैं , हम तो बड़ाई करते हैं ।
फिर ठीक है - गिरी जी भी निश्चिंत हो गये ।
हां तो अवध्य बाबू ! आप अपना बयान फिर से आरम्भ करें । - वकील साहब ने कहा ।
हां जी ! जब आपने उस सुअर को मूर्ख बनाया तो फिर क्या हुआ ?
अरे होना क्या था ? एक सुअर हटा तो दूसरा जुट गया और दूसरा हटा तो तीसरा जुट गया । पांच तक तो मुझे याद है फिर ..... ।
फिर ... ? - गेंदालाल जी को अपना बचपन याद आ रहा था ।
फिर कुछ होश न रहा । मैं उस सुअरिया की पीठ पर पेट के बल लेटा लेटा ही बेहोश हो गया ।
सुअरिया एक और सुअर पांच ? ये सुअरिया है या कोई वेस्टर्न सिटीज़न ? - परवीन जी ने भी पूछा लेकिन महर जी इतना बड़ा सेहरा किसी विदेशी के सर पर भला कैसे बंधने दे सकते थे। तुरन्त बोले - नहीं , एक पांच की परम्परा सबसे पहले हमारी संस्कृति में पायी जाती है । गिरी जी ने फिर पूछा - आप भारतीय संस्कृति की बुराई कर रहे हैं या तारीफ़ ?
महर जी ने समझाया - देखो , हम कौन हैं ?
मैं तो गिरी हूं और आपका पता नहीं ? - गिरी जी ने जवाब दिया ।
देखो , कर दी न गिरी हुई बात ? यही सवाल आप किसी मुसलमान से पूछिये तो हरेक मुसलमान एक ही जवाब देगा , कहेगा कि मुसलमान हैं । हिन्दू से पूछो तो वह अपनी जाति बताएगा । - महर जी ने ऐतराज़ जताया ।
तो क्या करें ? क्या हम भी खुद को मुसलमान बताया करें ? - बेगाने बाबू बोले ।
अरे नहीं , लेकिन कम से कम हम खुद को हिन्दू तो कह सकते हैं , क्यों ? - महर जी ने समझाया ।
लेकिन हमें तो बचपन से ही यही आदत पड़ जाती है कि जब भी पूछा जाए कि आप कौन लोग हो तो हमें तो अपनी जाति ही बतानी पड़ती है । नामकरण से लेकर अंतिम संस्कार तक , कहीं भी हिन्दू कहने से काम नहीं चलता बल्कि हरेक मौक़े पर हमें अपनी जाति ही नहीं बल्कि कुल और गोत्र तक बताने पड़ते हैं । हमारे तो नामों तक के साथ जातिसूचक शब्द जुड़े होते हैं । मुसलमानों का क्या है ? न तो उस डॉक्टर के नाम के साथ उसका गोत्र लिखा है और न ही उस आफ़त को यहां ब्लॉगबानी का रास्ता दिखाने वाले उमर की ही जाति का कुछ पता चलता है । - गिरी जी बोले ।
प्लीज़ कम टू द प्वाइंट । हां तो अवध्य बाबू , फिर क्या हुआ ? - वकील साहब ने बहस को बहकने से बचाते हुए कहा ।
अजी होना क्या था ? बस बेहोश होने से पहले मैं यही सोच रहा था कि ‘देसी वूमेन हैज़ अराइव्ड‘ की अर्चना जी तो चार शौहरों की डिमांड मन में पाले पाले ही बुढ़ा गयीं और एक यह सुअरिया है कि पांच पांच यार लिए खड़ी है । हो सकता है ईश्वर उनके मन की मुराद पूरी करने के लिए उन्हें अगली योनि सुअरिया की ही दे दे । - अवध्य बाबू बोले ।
हें हें हें...। गेंदालाल जी ने भी अपनी खीसें निपोरीं - एक बात कहूं कि अगर अर्चना जी अगले जनम में सुअरिया बनायी गईं तो उन पांच में से एक सुअर तो मै बनना चाहूंगा ।
वो क्यों भाई ? - वकील साहब ने क्वेश्चन पुट अप किया ।
देखिये , मैं मानता हूं कि अर्चना जी भी एक अट्रैक्शन हैं लेकिन दरअस्ल मैं मुसलमानों से बहुत नफ़रत करता हूं और उनसे सदा दूर रहना चाहता हूं और मुसलमान सुअर को सदा दूर ही रखते हैं इसलिए ...। - गेंदालाल जी ने समझाया ।
उत्तम विचार - महर जी ने गेंदालाल जी की तस्दीक़ की और कहा - देखिये भाइयो ! मुसलमान अपनी दुआओं में जन्नत यानि स्वर्ग मांगते हैं अगर उनकी मांग ऊपर वाले ने पूरी कर दी तो ... ।
गाय काटने वाले मुसलमानों की प्रार्थना ऊपर वाला कैसे सुन सकता है जी ? - भोले भाले गिरी जी ने पुराण मर्मज्ञ महर जी को टोका ।
देखो बन्धुओं ! मैंने अजामिल की कथा पढ़ी है । उसने हरेक पाप किया था लेकिन मरते समय उसने अपने नौकर नारायण को पुकारा और उसके सारे पाप क्षमा हो गये और वह स्वर्ग को गया । मुसलमान भी जीवन भर चाहे कुछ करे लेकिन मरते समय कलिमा ज़रूर पढ़ लेता है । सो उसके माफ़ होने के पूरे चांस हैं । महर जी ने अपनी आशंका जताई ।
हां , यह बात तो है , हालत कैसी भी टाइट हो मुसलमान मरते टाइम कलिमा ज़रूर पढ़ता है। यह तो मैंने भी देखा है । - गिरी जी ने गवाही दी ।
गेंदालाल जी दाऊद स्टाइल में गिरी जी पर तर्राये - क्यों बे ! तूने कहां देख लिया मुसलमान को मरते हुए ?
मैंने फ़िल्म कुली में इक़बाल को मरते हुए देखा है । - गिरी जी बोले और गेंदालाल जी हो हो करके हंसने लगे ।
परवीन जी ने गिरी जी को समझाया - भई ! वह तो अमिताभ बच्चन था । कोई सचमुच का मुसलमान थोड़े ही था ?
लेकिन वह उस समय ऐक्टिंग तो यही कर रहा था कि एक मुसलमान सचमुच मरता कैसे है ? - गिरी जी ने उत्तर दिया तो सब लाजवाब हो गए ।
ख़ैर , मेरा कहना यह है कि मुसलमान अपने लिए ईश्वर उर्फ़ अल्लाह से जन्नत उर्फ़ स्वर्ग की दुआ मांगता है जोकि संभव है कि परलोक उर्फ़ आखि़रत में पूरी हो जाये जबकि हम तो ऐसी कोई प्रार्थना करते नहीं । हम तो केवल सांसारिक सुख ही मांगते हैं तो क्यों न हम अपने लिए अपनी पसन्द की कोई योनि आज से ही मांगना शुरू कर दें । क्यों भाइयों , क्या विचार है ? - महर जी ने पूछा ।
देखिये ! मुझे किसी भी योनि में जन्म मिल जाये चलेगा लेकिन मैं अगले जन्म में मनुष्य तो हरगिज़ न बनूंगा । - दुखी अवध्य बाबू ने घोषणा कर दी ।
हम आपकी पीड़ा समझ सकते हैं । आपको पांच पांच सुअर झेलने पड़े और वह भी इस बुढ़ापे में । मनुष्य योनि का आपका अनुभव अच्छा नहीं रहा । - ठाकरे का हज्जाम बोला ।
परवीन जी बोले - यू मिस्गाइडेड पीपुल ! कहीं कोई ईश्वर ही नहीं है तो फिर स्वर्ग नर्क कहां से होगा ?
महर जी भन्ना गये । बोले - परवीन जी ! आप यह बताइये कि आपके मुंह में कुल कितने दांत हैं ?
परवीन जी चकरा गये - क्या मतलब ?
आपको मतलब मैं बाद में बताऊँगा , पहले आप यह बताइये कि आपके मंुह में दांत कितने हैं ?
परवीन जी ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा - मुझे नहीं पता ।
जो चीज़ आपके प्रयोग में प्रतिदिन आ रही है और जिसे आप जब चाहे जान सकते हैं और आपकी नज़र के सामने भी है । जब आप उसे ही नहीं जानते तो फिर आप नज़र की पकड़ से बाहर चीज़ों के बारे में कुछ भी विश्वासपूर्वक कैसे कह सकते हैं ? - महर जी ने सवाल किया ।
परवीन जी घिर गये तो अपना तुरूप का पत्ता फेंका - मैं तो एगनॉस्टिक हूं ।
अभी तो आप नास्तिक थे । अब आप एगनॉस्टिक बन गये ।
यह एगनॉस्टिक क्या होता है ? - गिरी जी ने अपना जी. के. बढ़ाने की ख़ातिर पूछा ।
एगनॉस्टिक मीन्स संशयवादी । यानि कि ईश्वर हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता । - उन्होंने जवाब दिया ।
यह क्या बात हुई ?या तो नर बनो या फिर मादा । - बेगाने बाबू ने कहा तो ठाकरे के हज्जाम ने भी चुटकी ली - जैसे कुछ लोग जिस्म के ऐतबार से बीचरासे होते हैं ऐसे ही यह महाशय वैचारिक लेवल पर बीच के हैं - और यह कहकर वह हिजड़ों की तरह तालियां पीट पीट कर ठुमकने लगा और पान के देश मे मौजूद सभी लोग क़हक़हे लगाकर हंसने लगे। ( ...जारी )
पार्ट 3
समावेश जी ने आते ही , जबड़ा सहलाते अवध्य बाबू से पूछा - क्यों भाई , क्या हुआ ?दर्द से बेहाल अवध्य बाबू बोले - नीचे से तो पहले ही दुख रहा था और गिरी जी के कारण अब ऊपर से भी दुखने लगा । हाय रे मेरी क़िस्मत ।इस बार वकील साहब ने सिम्पैथी जताई । पूछा - क्यों भाई , नीचे से क्यों दुख रहा है , और वह भी बुढ़ापे में ?मानों वकील साहब ने साँप की दुम पर पैर रख दिया था ।अवध्य बाबू फुंकारे - अरे ! यह नामुराद क़ब्ज़ तो होता ही बुढ़ापे में है ।महर जी भला कब कम थे । बोले - लेकिन मैंने तो सुना है कि क़ब्ज़ होने के लिए पेट में रोटी आदि कुछ होना ज़रूरी है ?ठाकरे का हज्जाम आश्चर्यचकित था । बोला - तो क्या इनके बेटे बहू इन्हें रोटी नहीं देते ?बेगाने बाबू भी दुमछल्ला स्टाइल में बोले - क्या इतने बड़े नगर में कोई गुरूद्वारा आदि भी नहीं है क्या ?अवध्य बाबू कराहते हुए बोले - अरे भाई ! यहां गुरूद्वारा भी है और मज़ारों का लंगर भी है । सब कुछ है यहां पर । अगर ये सब न होते तो भला मैं कैसे ज़िन्दा रह पाता ?परवीन जी ने अपनी एरिस्टोक्रेट मुस्कुराहट के साथ पूछा - तो इसका मतलब तो यह हुआ कि आप रोज़ खाते हैं ?अवध्य बाबू ने कहा - हां भई हां । मैं भले ही लंगर का खाता हूं लेकिन खाता रोज़ हूं ।गिरी जी ने भी अपनी झेंप मिटाने की ख़ातिर पूछा - जब आप रोज़ खाते है तो आपको क़ब्ज़ भी तो रोज़ ही लगता होगा ?अवध्य बाबू बोले - नहीं जी , लंगर के खाने का तो पेट आदी हो गया है । हुआ यूं कि हमारे मुहल्ले में कई बूढ़ी गाय घूमती रहती हैं । वे भी रिटायर्ड लोगों की तरह बड़ा दुख भरा जीवन जीती हैं । सड़क पर पड़ी पॉलिथीन की पन्नियां खा खाकर कष्ट भोगकर मरती रहती हैं । इतना कष्ट तो उन्हें अज्जू कसाई की छुरी से भी न होता होगा । बहरहाल अपने भगवा दल वाले और हम जैसे तो इस इन्तेज़ार में रहते हैं कि यह आखि़र मरेगी कब ?परवीन जी बोले - क्यों , क्या आपको उसकी खाल उतारनी है या उसका क्रियाकर्म करना है । अवध्य बाबू बोले - राम राम राम ! खाल हम क्यों उतारने लगे ?तो फिर क्यों करते हैं आप गय्या के मरने का इन्तेज़ार ?अवध्य बाबू बोले - पुण्य की ख़ातिर भाई ।समावेश जी भी चकरा गये । पूछा - गऊ के मरने में आपको कैसे पुण्य मिलता है और उसका आपके क़ब्ज़ से क्या सम्बन्ध है ?अवध्य बाबू ने समझाना आरम्भ किया । बोले - देखिये । गाय हमारी मां है कि नहीं ?परवीन जी के अलावा सभी ने हामी भरी ।तो बस । जब वह हमारी मां है तो उसका क्रियाकर्म भी करना ज़रूरी है और क्योंकि मां तो वह सब हिन्दुओं की है सो सभी से सहयोग लेना भी ज़रूरी है । भगवा दल सबसे चन्दा बटोर लेता है ।परवीन जी ने कहा - चन्दा कोई बटोरे और क़ब्ज़ आपको हो ?बात कुछ समझ में नहीं आई । अरे भाई मय्यत की तेरहवीं की रस्म भी तो होती है और उसमें कुछ खाना खिलाना भी तो होता है कि नहीं ?‘ओह आई सी ।‘ परवीन बाबू ने कहा और फ़ौरन अपने लैपटॉप पर कुछ सर्च करने बैठ गए । अब रोज़ रोज़ तो गय्या मरती नहीं सो राम जाने अगली गय्या कब मरे ? यही सोचकर हमने खू़ब सारा माल ठूंस लिया ।गिरी जी ने नतीजा भी घोषित कर दिया - फिर तो आपको क़ब्ज़ तो होना ही था । लेकिन वैसे यह दावत थी कब ?मैंने ढुंढवाया था आपको , लेकिन आप रामदेव बाबा जी से आशीर्वाद लेने हरिद्वार गए हुए थे।ओह तो यह 2 अप्रैल 2010 की बात है । फिर आपने क्या किया ?करना क्या था ? गऊ का मूत हरेक तरह का क़ब्ज़ तोड़ने में रामबाण है । इसमें तेज़ाब की भारी मात्रा पाई जाती है । मैं तुरन्त दो चार गायों के पिछवाड़े सहलाकर औषधि ले आया और बेपेन्दी का पूरा लोटा चढ़ा गया । लेकिन फिर भी कुछ नहीं हुआ ।तो आपको किसी ढंग के डॉक्टर को दिखाना चाहिये था । - वकील साहब ने सलाह दी।अजी देख लिया ढंग के डॉक्टर को भी । गया था मैं डॉक्टर जमाल के पास इलाज कराने । वे तो बैठे थे अन्दर , बाहर खड़ा अपना प्रकाश झा का लग्गू पत्रकार किसी एसीपी के ड्राइवर से बतिया रहा था । मेरी समस्या सुनकर बोला कि इतनी मामूली सी समस्या के लिए डॉक्टर साहब से क्या मिलना ? इसका इलाज तो उनका कम्पाउण्डर ही कर देगा । मुझे भी यही प्रॉब्लम थी । उसने गणेश क्रिया कर दी । बस समस्या ख़त्म ।भय्या मैंने उनकी बात मान ली । पहले उसने कमरा बन्द करके मेरे साथ गणेश क्रिया कर दी और जब उसने बात बनती न देखी और गऊ मूत पर मेरा अगाध विश्वास देखा तो वह टॉयलेट में जाकर एक जार भर लाया और मुझे पिला दिया । उसके पीते ही मुझे खुलकर दस्त हो गया । मैंने उससे पूछा कि भई गऊ मूत तो मैं खुद भी पीकर आया था लेकिन इत्ता तेज़ असर तो मैंने उसका कभी देखा नहीं । यह आखि़र था क्या ?वह बोला - बाबू जी था तो यह भी मूत ही लेकिन इसकी पॉवर थोड़ा ज़्यादा थी ।क्या मतलब ? क्या इसमें भी पॉवर कम ज़्यादा होती है ?देखिये ! हरेक औषधि की पॉवर कम ज़्यादा होती है तो भला फिर मूत की क्यों न होगी ?मैंने कहा - अब ज़्यादा सस्पेंस क्रिएट किये बिना पॉवर बढ़ाने का तरीक़ा जल्दी से बता दो ।वह बोला - सीधी सी बात है । देखिये ! गाय लाख माता सही लेकिन है तो जानवर ही ।क्यों ?बिल्कुल है ।मनुष्य की योनि सर्वश्रेष्ठ योनि मानी जाती है कि नहीं ?बिल्कुल ।बस । जब आप पर गऊ का मूत बेअसर हो गया तो मैं समझ गया कि अब औषधि की पॉवर बढ़ाने का समय आ गया है और मैंने तुरन्त आपकी भलाई की ख़ातिर अपना ....क्या ऽऽऽ ? - मैं चिल्लाया और उसे मारने को उठ ही रहा था कि अचानक मेरे पेट में फिर मरोड़ सा उठा और मैं टॉयलेट की तरफ़ को भागा लेकिन वह कम्पाउण्डर नाराज़ हो गया था । उसने मुझे धकिया कर दरवाज़ा लगा लिया । वह अपनी फ़ीस मारे जाने से भी दुखी था और मेरी बदतमीज़ी से भी ।फिर आपका हुआ क्या ? - गेंदालाल जी ने अपना नक़ली रे बैन का काला चश्मा उतारकर उत्सुकतावश पूछ ही लिया ।होना क्या था ? , जिसके लिए इनसान अपना टॉयलेट बन्द कर देता है । उसके लिए वह मालिक अपना विशाल टॉयलेट तो सदा खुला ही रखता है ।अयं क्या मतलब ? - हस्बे आदत गिरी जी कुछ भी न समझे ।अरे भाई ! मैं खोलकर वहीं सड़क के किनारे नाले पर बैठ गया , मजबूरी थी । क्या करता ?फिर तो आपका पेट ख़ूब साफ़ हुआ होगा और सुलभ शौचालय वाले की मज़्दूरी भी न देनी पड़ी होगी ?अजी ऐसे नसीब हमारे कहां ? अभी मैं बैठा ही था कि मुहल्ले के कई कुत्ते वहां आ गये । वे समझे कि मैं उनके ठिए पर क़ब्ज़ा करने के वहां बैठ गया हूं । सो वे मुझ पर भौंकने लगे । उस समय उनके साथ एक कुतिया भी थी । उसे इम्प्रैस करने की ख़ातिर एक काला कुत्ता तो मेरा गला पकड़ने के लिए आगे बढ़ने लगा ।फिर क्या हुआ ? - गिरी बाबू ने उनसे ऐसे पूछा मानो वे फ़िल्म नटवरलाल के अमिताभ बच्चन से स्टोरी सुन रहे हों ।होना क्या था ? आगे तो भागने के लिए जगह थी नहीं और जगह भी होती तो खड़े होने तक की ताक़त भी घुटनों में न बची थी । सो एक बार फिर कुदरत काम आई ?वह कैसे ? - इस बार बैंगनी शर्ट वाले बेगाने बाबू से न रहा गया ।वैरी सिम्पल , विदेशियों के हमले के समय हमारी सेनाओं के हाथी क्या करते थे ?- अवध्य बाबू बोले - बताओ , बताओ ?सब चुप हो गये । सबने आशा भरी नज़रों से ठाकरे के हज्जाम की तरफ़ देखा । उनमें एक वही था जो अज्जू क़साई से चारजन्य जैसे अख़बार की रद्दी पढ़ पढ़ कर विद्वान सा बन गया था । ठाकरे के हज्जाम का सीना उनकी नज़रों का केन्द्र बनते ही फूलने के लिए मचलने लगा । उसकी जीभ इतिहास की जुगाली करने के कुलबुलाने लगी । लेकिन फिर भी उसने थोड़ी सी मिन्नत करवाना ज़रूरी समझा ताकि कोई उसे आदर का भूखा न समझ ले । दुमछल्ले बेगाने बाबू के आग्रह पर उसने बताया - हमारे हाथी दुश्मनों पर टूट पड़ने के बजाए उनके तीर खाकर पीछे की तरफ़ दौड़ा करते थे और अपने ही सैनिकों को कुचलकर वे विदेशियों को विजय श्री थाली में परोस दिया करते थे ।तो क्या विदेशी हमलावरों की विजय के श्रीगणेश में देसी हाथियों की भी भूमिका रही है ? - गेंदालाल जी चैंके ।वकील साहब बोले - बात हाथी की नहीं कुत्ते की चल रही थी । हां तो अवध्य जी आप अपना बयान जारी रखें ।बस फिर क्या था मैं भी अपने पूर्वजों की तरह जान बचाने के लिए पीछे को लुढ़क गया । - अवध्य बाबू बोले ।नाले में गिरकर भी आप नहीं डूबे ? - समावेश जी को भी ताज्जुब हुआ ।अरे भाई ! आप जैसे पौराणिकों को तो कम से कम ताज्जुब न होना चाहिये ।क्यों भाई ?आप तो चमत्कार को मानते हैं न ?हां । जब जल में डूबती धरती को बचाने के लिए विष्णु जी स्वयं सुअर बनकर आ सकते हैं तो क्या मुझ जैसे धरती के लाल को बचाने के लिए एकाध सुअर भी नहीं भेज सकते ?क्या मतलब ? - गिरी बाबू ने तो मानो अक्ल पर बिल्कुल ही ज़ोर न डालने की क़सम खा रखी थी ।अरे भाई ! हरेक मुश्किल के साथ वह प्रभु कोई न कोई आसानी भी ज़रूर देता है । मैं ऊपर से सीधा नाले में खड़ी एक सुअरिया की पीठ पर पेट के बल गिरा । उस समय उसका पति अपना शक्ति परीक्षण कर रहा था लेकिन उस बेचारे ने अपनी पत्नी के ऊपर मेरे गिरने का बिल्कुल भी बुरा न माना । वैसे भी वह अनाड़ी और नौसिखिया सा ही लग रहा था ।वह कैसे ? वकील साहब पूछ बैठे ।अजी सुअरिया और आदमी में कुछ तो अन्तर होता ही है लेकिन उसे तो अन्त तक भी ज़रा अहसास न हुआ ।क्या मतलब ? सबने समवेत स्वर में पूछा और फिर खु़द ही समझ भी गये । फिर भी उन्होंने पूछा - और आपने प्रतिरोध भी नहीं किया ?प्रतिरोध के लिए तो छोड़ो , हिलने तक की तो ताक़त मुझमें थी नहीं । खै़र , प्रभु जो भी करते हैं भले के लिए करते हैं और इससे मेरा रहा सहा क़ब्ज़ भी दूर हो गया ।वाक़ई साहब , आपको तो पेटा का अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष होना चाहिये । आपने तो बिल्कुल पश्चिमी लोगों की तरह जीवों के जज़्बात का ख़याल रखा है । कोई क्या जानेगा आपके इतने बड़े उपकार को ?अवध्य बाबू बोले - जल्दी ही लोग मेरे इस उपकार को जानेंगे क्योंकि अपने मुरीद सहसपुरिया की डिमांड पर डा. जमाल मेरी आपबीती लिख रहा है । फिर क्या हुआ ? गिरी जी फिर बोले ।अबे क्या सारी स्टोरी एक ही सांस में सुनेगा ? चल तू एकाध लोटा पानी ला ।क्या पीने के लिए ?नहीं रे ! बस ज़रा पेट में मरोड़ सा उठ रहा है ।इतना सुनना था कि वकील साहब की सलाह पर गिरी जी , समावेश जी , महर जी और ठाकरे के हज्जाम ने , चारों ने उन्हें किसी बग़ैर कफ़न की अर्थी की तरह हाथ पैर से पकड़ कर उठा लिया और उन्हें टॉयलेट की तरफ़ ले भागे और परवीन बाबू अपना पेट पकड़कर ज़मीन पर लोट पोट होकर देर तक क़हक़हे लगाते रहे ।गेंदालाल जी ने अपने सर पर कुछ गीलापन महसूस किया तो सर पर हाथ फिराकर देखा और यह समझने का प्रयास करते रहे कि उनके सर पर यह सड़ी हुई कढ़ी आई कहां से ?लेकिन परवीन की उनपर नज़र पड़ी तो वे तुरन्त समझ गये कि वे चारों अवध्य बाबू को गेंदालाल के सर से क्रॉस करके ले गये हैं और यह उनमें से ही टपक कर गेंदालाल जी पर गिर गया है । यह देखकर तो परवीन जी का हंस हंस कर हाल और भी ज़्यादा बुरा हो गया और वकील साहब भी मुंह घुमाकर ज़ेरे लब मुस्कुराने लगे । ( ....जारी )
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पार्ट 4
जिस हाल में वे चारों अवध्य बाबू को लेकर गये थे , ठीक उसी तरह वे उन्हें बिना कफ़न की अर्थी की तरह उठाये हुए ले आये । फ़र्क़ था तो बस इतना कि पहले उनके बदन पर नीचे लुंगी थी और अब वहां सिर्फ़ एक लंगोट सा था और उनका निचवाड़ा टॉयलेट में पानी से धुलने के बाद ऐसे चमक रहा था जैसे खाल उतरने के बाद अज्जू क़साई की दुकान पर टंगा हुआ मुर्ग़ा चमकता है । उन चारों ने यानि कि गिरी जी , महर जी , बेगाने बाबू और ठाकरे के हज्जाम ने अवध्य बाबू को उनकी पुरानी जगह पर वापस पटख़ दिया । ज़मीन में कूल्हे ठुकते ही अवध्य बाबू के मुंह से बेइख्ितयार निकला - हाय राम , मरा ।
तुम मरने वालों में से नहीं हो , वह डॉक्टर सही कहता है कि तुम अवध्य हो । - चिढ़कर गिरी जी बोले ।
प्राचीन भारतीय संस्कृति में तो तुम जैसे लोगों को 50 वर्ष का होते ही वन में भेज दिया करते थे । कम से कम पीछा तो छूट जाता था बीमार बुड्ढों से - महर जी ने अपनी प्राचीन भारतीय संस्कृति की महिमा गाये जाने का एक अदना सा मौक़ा गंवाना भी मुनासिब न समझा ।
गिरी जी हवन्नक़ों की तरह महर जी को तकते हुए पूछ बैठे - महर जी ! आप भारतीय संस्कृति की बुराई कर रहे हैं या बड़ाई ?
ठाकरे के हज्जाम ने उन्हें दुत्कारते हुए कहा - अरे अक्ल के कोल्हू ! भारतीय संस्कृति की बुराई तो मुसलमान , ईसाई और कम्यनिस्ट करते हैं , हम तो राष्ट्रवादी हैं , हम तो बड़ाई करते हैं ।
फिर ठीक है - गिरी जी भी निश्चिंत हो गये ।
हां तो अवध्य बाबू ! आप अपना बयान फिर से आरम्भ करें । - वकील साहब ने कहा ।
हां जी ! जब आपने उस सुअर को मूर्ख बनाया तो फिर क्या हुआ ?
अरे होना क्या था ? एक सुअर हटा तो दूसरा जुट गया और दूसरा हटा तो तीसरा जुट गया । पांच तक तो मुझे याद है फिर ..... ।
फिर ... ? - गेंदालाल जी को अपना बचपन याद आ रहा था ।
फिर कुछ होश न रहा । मैं उस सुअरिया की पीठ पर पेट के बल लेटा लेटा ही बेहोश हो गया ।
सुअरिया एक और सुअर पांच ? ये सुअरिया है या कोई वेस्टर्न सिटीज़न ? - परवीन जी ने भी पूछा लेकिन महर जी इतना बड़ा सेहरा किसी विदेशी के सर पर भला कैसे बंधने दे सकते थे। तुरन्त बोले - नहीं , एक पांच की परम्परा सबसे पहले हमारी संस्कृति में पायी जाती है । गिरी जी ने फिर पूछा - आप भारतीय संस्कृति की बुराई कर रहे हैं या तारीफ़ ?
महर जी ने समझाया - देखो , हम कौन हैं ?
मैं तो गिरी हूं और आपका पता नहीं ? - गिरी जी ने जवाब दिया ।
देखो , कर दी न गिरी हुई बात ? यही सवाल आप किसी मुसलमान से पूछिये तो हरेक मुसलमान एक ही जवाब देगा , कहेगा कि मुसलमान हैं । हिन्दू से पूछो तो वह अपनी जाति बताएगा । - महर जी ने ऐतराज़ जताया ।
तो क्या करें ? क्या हम भी खुद को मुसलमान बताया करें ? - बेगाने बाबू बोले ।
अरे नहीं , लेकिन कम से कम हम खुद को हिन्दू तो कह सकते हैं , क्यों ? - महर जी ने समझाया ।
लेकिन हमें तो बचपन से ही यही आदत पड़ जाती है कि जब भी पूछा जाए कि आप कौन लोग हो तो हमें तो अपनी जाति ही बतानी पड़ती है । नामकरण से लेकर अंतिम संस्कार तक , कहीं भी हिन्दू कहने से काम नहीं चलता बल्कि हरेक मौक़े पर हमें अपनी जाति ही नहीं बल्कि कुल और गोत्र तक बताने पड़ते हैं । हमारे तो नामों तक के साथ जातिसूचक शब्द जुड़े होते हैं । मुसलमानों का क्या है ? न तो उस डॉक्टर के नाम के साथ उसका गोत्र लिखा है और न ही उस आफ़त को यहां ब्लॉगबानी का रास्ता दिखाने वाले उमर की ही जाति का कुछ पता चलता है । - गिरी जी बोले ।
प्लीज़ कम टू द प्वाइंट । हां तो अवध्य बाबू , फिर क्या हुआ ? - वकील साहब ने बहस को बहकने से बचाते हुए कहा ।
अजी होना क्या था ? बस बेहोश होने से पहले मैं यही सोच रहा था कि ‘देसी वूमेन हैज़ अराइव्ड‘ की अर्चना जी तो चार शौहरों की डिमांड मन में पाले पाले ही बुढ़ा गयीं और एक यह सुअरिया है कि पांच पांच यार लिए खड़ी है । हो सकता है ईश्वर उनके मन की मुराद पूरी करने के लिए उन्हें अगली योनि सुअरिया की ही दे दे । - अवध्य बाबू बोले ।
हें हें हें...। गेंदालाल जी ने भी अपनी खीसें निपोरीं - एक बात कहूं कि अगर अर्चना जी अगले जनम में सुअरिया बनायी गईं तो उन पांच में से एक सुअर तो मै बनना चाहूंगा ।
वो क्यों भाई ? - वकील साहब ने क्वेश्चन पुट अप किया ।
देखिये , मैं मानता हूं कि अर्चना जी भी एक अट्रैक्शन हैं लेकिन दरअस्ल मैं मुसलमानों से बहुत नफ़रत करता हूं और उनसे सदा दूर रहना चाहता हूं और मुसलमान सुअर को सदा दूर ही रखते हैं इसलिए ...। - गेंदालाल जी ने समझाया ।
उत्तम विचार - महर जी ने गेंदालाल जी की तस्दीक़ की और कहा - देखिये भाइयो ! मुसलमान अपनी दुआओं में जन्नत यानि स्वर्ग मांगते हैं अगर उनकी मांग ऊपर वाले ने पूरी कर दी तो ... ।
गाय काटने वाले मुसलमानों की प्रार्थना ऊपर वाला कैसे सुन सकता है जी ? - भोले भाले गिरी जी ने पुराण मर्मज्ञ महर जी को टोका ।
देखो बन्धुओं ! मैंने अजामिल की कथा पढ़ी है । उसने हरेक पाप किया था लेकिन मरते समय उसने अपने नौकर नारायण को पुकारा और उसके सारे पाप क्षमा हो गये और वह स्वर्ग को गया । मुसलमान भी जीवन भर चाहे कुछ करे लेकिन मरते समय कलिमा ज़रूर पढ़ लेता है । सो उसके माफ़ होने के पूरे चांस हैं । महर जी ने अपनी आशंका जताई ।
हां , यह बात तो है , हालत कैसी भी टाइट हो मुसलमान मरते टाइम कलिमा ज़रूर पढ़ता है। यह तो मैंने भी देखा है । - गिरी जी ने गवाही दी ।
गेंदालाल जी दाऊद स्टाइल में गिरी जी पर तर्राये - क्यों बे ! तूने कहां देख लिया मुसलमान को मरते हुए ?
मैंने फ़िल्म कुली में इक़बाल को मरते हुए देखा है । - गिरी जी बोले और गेंदालाल जी हो हो करके हंसने लगे ।
परवीन जी ने गिरी जी को समझाया - भई ! वह तो अमिताभ बच्चन था । कोई सचमुच का मुसलमान थोड़े ही था ?
लेकिन वह उस समय ऐक्टिंग तो यही कर रहा था कि एक मुसलमान सचमुच मरता कैसे है ? - गिरी जी ने उत्तर दिया तो सब लाजवाब हो गए ।
ख़ैर , मेरा कहना यह है कि मुसलमान अपने लिए ईश्वर उर्फ़ अल्लाह से जन्नत उर्फ़ स्वर्ग की दुआ मांगता है जोकि संभव है कि परलोक उर्फ़ आखि़रत में पूरी हो जाये जबकि हम तो ऐसी कोई प्रार्थना करते नहीं । हम तो केवल सांसारिक सुख ही मांगते हैं तो क्यों न हम अपने लिए अपनी पसन्द की कोई योनि आज से ही मांगना शुरू कर दें । क्यों भाइयों , क्या विचार है ? - महर जी ने पूछा ।
देखिये ! मुझे किसी भी योनि में जन्म मिल जाये चलेगा लेकिन मैं अगले जन्म में मनुष्य तो हरगिज़ न बनूंगा । - दुखी अवध्य बाबू ने घोषणा कर दी ।
हम आपकी पीड़ा समझ सकते हैं । आपको पांच पांच सुअर झेलने पड़े और वह भी इस बुढ़ापे में । मनुष्य योनि का आपका अनुभव अच्छा नहीं रहा । - ठाकरे का हज्जाम बोला ।
परवीन जी बोले - यू मिस्गाइडेड पीपुल ! कहीं कोई ईश्वर ही नहीं है तो फिर स्वर्ग नर्क कहां से होगा ?
महर जी भन्ना गये । बोले - परवीन जी ! आप यह बताइये कि आपके मुंह में कुल कितने दांत हैं ?
परवीन जी चकरा गये - क्या मतलब ?
आपको मतलब मैं बाद में बताऊँगा , पहले आप यह बताइये कि आपके मंुह में दांत कितने हैं ?
परवीन जी ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा - मुझे नहीं पता ।
जो चीज़ आपके प्रयोग में प्रतिदिन आ रही है और जिसे आप जब चाहे जान सकते हैं और आपकी नज़र के सामने भी है । जब आप उसे ही नहीं जानते तो फिर आप नज़र की पकड़ से बाहर चीज़ों के बारे में कुछ भी विश्वासपूर्वक कैसे कह सकते हैं ? - महर जी ने सवाल किया ।
परवीन जी घिर गये तो अपना तुरूप का पत्ता फेंका - मैं तो एगनॉस्टिक हूं ।
अभी तो आप नास्तिक थे । अब आप एगनॉस्टिक बन गये ।
यह एगनॉस्टिक क्या होता है ? - गिरी जी ने अपना जी. के. बढ़ाने की ख़ातिर पूछा ।
एगनॉस्टिक मीन्स संशयवादी । यानि कि ईश्वर हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता । - उन्होंने जवाब दिया ।
यह क्या बात हुई ?या तो नर बनो या फिर मादा । - बेगाने बाबू ने कहा तो ठाकरे के हज्जाम ने भी चुटकी ली - जैसे कुछ लोग जिस्म के ऐतबार से बीचरासे होते हैं ऐसे ही यह महाशय वैचारिक लेवल पर बीच के हैं - और यह कहकर वह हिजड़ों की तरह तालियां पीट पीट कर ठुमकने लगा और पान के देश मे मौजूद सभी लोग क़हक़हे लगाकर हंसने लगे। ( ...जारी )
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