अजय कुमार झा जी एक रूतबे वाले पत्रकार हैं और हमारी वाणी के मार्गदर्शक मंडल के प्रमुख से लेकर सामान्य तक हरेक सदस्य से उनकी जान पहचान भी अच्छी है । जो भी हो ग़लत आख़िर ग़लत है ।
अजय जी ने एक ही पोस्ट दो ब्लॉग पर डाल दी है और शीर्षक भी ज्यादा नहीं बदला ।
जगह जगह मौक़ा बेमौक़ा नियमावली बाँचने वाले द्विवेदी जी की पोस्ट भी उनके ऊपर नज़र आ रही है लेकिन ऐसे मौक़ों पर ये लोग धृतराष्ट्र का रोल प्ले करने लगते हैं ।
देखते हैं कि हमारी वाणी धर्म और अजय जी का रूतबा दरकिनार करके उनके दोनों ब्लॉग्स को आज निलंबित करती है या कल ?
Thursday, April 7, 2011
Sunday, April 3, 2011
क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है World Cup 2011
क्रिकेट से खुन्नस रखने के पीछे मेरे निजी अनुभव हैं जो कि अच्छे नहीं हैं। जब मैं बच्चा था तो मुहल्ले भर के चाचा और तमाम तरह के दूर नज़्दीक के रिश्तेदार घर में क्रिकेट मैच देखने के लिए जमा हो जाया करते थे क्योंकि तब तक कम घरों में टी. वी. था। उनके घरों में पैसे की तंगी की वजह से टी. वी. नहीं था, ऐसी बात नहीं है। सभी लोग काफ़ी रिच हैं लेकिन तब तक घरों पर उन बड़े बूढ़ों का होल्ड था जो घर में टी. वी. आने की इजाज़त नहीं देते थे।
घर में जमावड़े से हमारे लिए कई तरह की दिक्क़तें खड़ी हो जाती थीं और घर का सारा दूध चाय बनाने में ही ख़र्च हो जाता था। हम सबको चाय सप्लाई करते रहते थे और बाज़ार से दूध और नाश्ते का सामान ही लाते रहते थे। ज़मींदार लोग थे, किसी को कोई काम अपने हाथ से करना नहीं था। नौकर खेतों पर काम करते रहते थे।
सबकी ऐश आ जाती थी और हमारी आफ़त। सबसे ज़्यादा दुख हमें अपनी वालिदा साहिबा को ढेर के ढेर कप धोते हुए देखकर होती थी। वालिद साहब के सामने कोई चूं भी नहीं कर सकता था। जिसने उन्हें न देखा हो वह सनम बेवफ़ा के डैनी या प्राण को देख ले। शलवार कमीज़ , सर पर पगड़ी और एक पठानी खंजर भी। अल्लाह का शुक्र है कि उस पर किसी का खून नहीं लगा। जिसका हमारे वालिद को आज तक मलाल है। कभी कभी सोचता हूं कि अगर सूरज इंसानी शक्ल में हमारे सामने आए तो उसे हमारे वालिद साहब का रूप रंग पूरी तरह मैच करेगा। चेहरा सुर्ख़ और आँखें अंगार, हर समय।
आम दिनों में जब वालिद साहब घर में होते थे तो हम इधर उधर टल जाया करते थे। क्रिकेट के दिनों में वालिद साहब की मौजूदगी का वक्त भी बढ़ जाता था और हम उनकी नज़र के सामने से हट भी नहीं सकते थे। चाय और पान की खि़दमत हमारे सुपुर्द जो हो जाया करती थी। इन सब बातों की वजह से हमें बचपन से ही क्रिकेट से नफ़रत हो गई थी। थोड़ा बड़े हुए तो पता चला कि कई बार इस क्रिकेट की वजह से देश में दंगे हो गए और बेवजह ही लोग मारे गए। इस खेल से हमारी नफ़रत में और ज़्यादा इज़ाफ़ा हो गया।
एम. ए. में पहुंचे तो हमें सोशियोलॉजी में बताया गया कि अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए शासक लोग जनता को खेल और मनोरंजन में लगा देते हैं। इससे उनका ध्यान जीवन के अहम मुद्दों से हट जाता है। यूनानी शासक यही करते थे।
हमने पाया कि जैसे-जैसे देश और दुनिया में समस्याओं का अंबार लगता जा रहा है, वैसे वैसे खेल और मनोरंजन के साधन भी जनता को ज़्यादा से ज़्यादा उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मीडिया ने बताया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन खेलों में प्रतिवर्ष खरबों रूपया ख़र्च करती हैं और उससे कई गुना ज़्यादा कमाती भी हैं। देश का पैसा खिंचकर विदेश में जाता है। पहले से ही कंगाल जनता कुछ और बदहाल हो जाती है और फिर यह भी सामने आ गया कि सट्टा किंग पहले से ही यह तक तय कर देते हैं कि जीतना किसे है ?
बहुत बड़ा गोरखधंधा है यह कप और विश्व कप। जो इसे समझता है, वह न किसी की हार से दुखी होता है और न ही किसी की जीत से खुश। जो नादान हैं वे समझते हैं कि हाय ! हम हार गए या हुर्रे ! हम जीत गए।
अफ़सोस होता है यह देखकर कि देश के 22 नौजवान 8 मई 2010 से सोमालियाई लुटेरों की क़ैद में हैं। जाने उनमें से कौन अब ज़िंदा होगा ?
हम एक एटमी पॉवर हैं और हमसे डरते नहीं हैं समुद्री लुटेरे भी। हमारे आदमी उन्होंने पकड़ लिए। इस बात पर अफ़सोस करने के लिए जो देश एक न हो सका, जो ब्लॉग जगत एक न हो सका और कोई सशक्त आंदोलन न चला सका। वह हिप हिप हुर्रे हुर्रे करके कह रहा है अहा, हम जीत गए।
क्या सचमुच हम जीत गए ?
यह सच है कि हमारी क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीत लिया है । तमाम बातों के बावजूद इसे एक उपलब्धि भी माना जा सकता है लेकिन हरेक चीज़ अपनी उपयोगिता के कारण ही सार्थक या निरर्थक मानी जाती है। आखि़र देश की जनता के लिए इस कप का उपयोग क्या किया जा सकता है ?
जिन देशों की सिरे से ही कोई क्रिकेट टीम नहीं है, क्या वे बेकार देश हैं ?
जिस देश में आज भी लोग मलेरिया के हाथों लाखों की तादाद में मर जाते हैं। जहां करोड़ों माएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं। जहां नशे के कारोबार को सरकारी आश्रय प्राप्त है और नशे की वजह से कितने ही रोड एक्सीडेंट रोज़ होते हैं या फिर कलह के कारण करोड़ों परिवारों का सुख चैन बर्बाद है सदा के लिए।
जहां गुरबत है और ऐसी गुरबत है कि मात्र एक रूपये में इस देश की औरत अपनी आबरू बेच रही है। मैं ऐसे फ़ौजियों से मिला हूं जिन्होंने यह सब खुद देखा है और उस इलाक़े का नाम मुझे बताया है। कश्मीर में भी मुझे यही पता चला। देश का कोई इलाक़ा शायद ऐसा न हो जहां ज़रूरतें इंसान की शर्म और ग़ैरत को न चाट रही हों। जहां ज़रूरतें और मजबूरियां नहीं हैं वहां भी यही सब हो रहा है। वहां वजह बन रही है दौलत की हवस। पति-पत्नी का रिश्ता एक पवित्र संबंध है लेकिन दौलत की हवस यहां भी पैर पसारे आपको मिल जाएगी और दहेज की इसी हवस में कहीं बहुएं जलाई जा रही हैं और कहीं लड़कियां या तो बेमेल ब्याही जा रही हैं या फिर कुंवारी ही बूढ़ी हो रही हैं या फिर गर्भ में ही मारी जा रही हैं। माएं आज बेसहारा हैं और विधवाएं तो हमेशा से हैं ही। जिन समस्याओं को हमें हल करना था, उन्हें हम हल नहीं कर पाए।
ग़रीबी और कुपोषण की वजह से बच्चे बचपन में ही या तो मर जाते हैं या फिर मज़दूरी करते हैं। किसान मज़दूर सूदख़ोर महाजन के ब्याज के फंदे में झूलकर आए दिन आत्महत्या करते हैं। कुछ बाबा और महात्मा ग़रीबों की सेवा पहले भी करते थे और आज भी करते हैं लेकिन इन्हीं का रूप बनाकर पहले भी ठग जनता को ठगते थे और आज भी ठग रहे हैं बल्कि मंत्री और मुख्यमंत्री तक बन चुके हैं। आशीर्वाद और योग को ये लोग कारोबार बना चुके हैं। भारत एक धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है और आस्था इसकी पहचान है लेकिन आज देश की जनता के सामने केवल अधिक से अधिक सुविधा और ऐश बटोरना ही एक मात्र मक़सद है। कभी जनता हड़ताल करती है तो कभी वकील और कभी डाक्टर।
देश का क़ानून टूटता हो तो टूटे , कोई मरता हो तो मरे, इनकी बला से इनके अधिकार कम न हों, इनकी सैलरी बढ़ा दी जाए। ये बुद्धिहीन लोग बुद्धिजीवी कहलाते हैं, यह देश की त्रासदी है। बस केवल सांसद ही कभी हड़ताल नहीं करते। उन्हें जो कुछ सुविधाएं लेनी होती हैं, अपने लिए खुद ही मंजूर कर लेते हैं।
इस आंतरिक मज़बूत एकता के बावजूद ये नेता बाहर से खुद को बंटा हुआ दिखाते हैं ताकि जनता यह समझे कि यह वामपंथी है और वह दक्षिणपंथी, यह समाजवादी है और वह निर्दलीय। यह अमीरों का पिठ्ठू है और वह ग़रीबों का मसीहा है। ये गुट बनाकर आमने सामने डटे रहते हैं और जब भी कोई पार्टी जीतती है तो पब्लिक समझती है कि ‘अहा ! हम जीत गए।‘
लेकिन जब वह पार्टी काम काज संभालती है तो वह भी पुराने ढर्रे पर ही आगे बढ़ती है जिससे जनता की केवल मुसीबतें बढ़ती हैं और उनसे ध्यान बंटाने के लिए उसके लिए खेल और मनोरंजन के साधन बढ़ा दिए जाते हैं।
आज चैराहों पर ढोल बज रहे हैं, पटाख़े छोड़े जा रहे हैं, मिठाईयां बांटी जा रही हैं। हर तरफ़ एक जुनून है, एक खुशी की लहर छाई हुई है। राष्ट्रवादी लोग भी मगन हैं। जो सारा माजरा समझते हैं वे चुप हैं। वे जानते हैं कि दीवानेपन और जुनून की कैफ़ियत में उनकी सही बात सुनेगा ही कौन ?
लेकिन ऐसा नहीं है।
सुनने वाले लोग भी इन्हीं के दरम्यान हैं। सोचने-समझने वाले लोग भी इन्हीं के बीच मौजूद हैं। आप कहेंगे तो बात उन तक ज़रूर पहुँचेगी जिन्हें मार्ग और मंज़िल की तलाश है।
जिन खेलों से सीधे तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होता है या फिर हमारे पूंजीपतियों और निकम्मे हाकिमों को, उनका प्रभाव लाज़िमन हमारे राष्ट्र को कमज़ोर ही करता है।
समस्याओं से त्रस्त लोगों के बीच खड़े होकर कहना कि ‘हम जीत गए।‘
जो देख सकते हैं, वे हालात को सही एंगल से देखने का कष्ट करें मुल्क की भलाई की ख़ातिर, ऐसी हमारी विनती है।
बचपन में तो हम अपने वालिद साहब के सामने कह नहीं सकते थे लेकिन आप लोगों से तो हम कह ही सकते हैं कि क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है।
हरेक सोचे कि इस धरती पर उसके जन्म का उद्देश्य क्या है ?
घर में जमावड़े से हमारे लिए कई तरह की दिक्क़तें खड़ी हो जाती थीं और घर का सारा दूध चाय बनाने में ही ख़र्च हो जाता था। हम सबको चाय सप्लाई करते रहते थे और बाज़ार से दूध और नाश्ते का सामान ही लाते रहते थे। ज़मींदार लोग थे, किसी को कोई काम अपने हाथ से करना नहीं था। नौकर खेतों पर काम करते रहते थे।
सबकी ऐश आ जाती थी और हमारी आफ़त। सबसे ज़्यादा दुख हमें अपनी वालिदा साहिबा को ढेर के ढेर कप धोते हुए देखकर होती थी। वालिद साहब के सामने कोई चूं भी नहीं कर सकता था। जिसने उन्हें न देखा हो वह सनम बेवफ़ा के डैनी या प्राण को देख ले। शलवार कमीज़ , सर पर पगड़ी और एक पठानी खंजर भी। अल्लाह का शुक्र है कि उस पर किसी का खून नहीं लगा। जिसका हमारे वालिद को आज तक मलाल है। कभी कभी सोचता हूं कि अगर सूरज इंसानी शक्ल में हमारे सामने आए तो उसे हमारे वालिद साहब का रूप रंग पूरी तरह मैच करेगा। चेहरा सुर्ख़ और आँखें अंगार, हर समय।
आम दिनों में जब वालिद साहब घर में होते थे तो हम इधर उधर टल जाया करते थे। क्रिकेट के दिनों में वालिद साहब की मौजूदगी का वक्त भी बढ़ जाता था और हम उनकी नज़र के सामने से हट भी नहीं सकते थे। चाय और पान की खि़दमत हमारे सुपुर्द जो हो जाया करती थी। इन सब बातों की वजह से हमें बचपन से ही क्रिकेट से नफ़रत हो गई थी। थोड़ा बड़े हुए तो पता चला कि कई बार इस क्रिकेट की वजह से देश में दंगे हो गए और बेवजह ही लोग मारे गए। इस खेल से हमारी नफ़रत में और ज़्यादा इज़ाफ़ा हो गया।
एम. ए. में पहुंचे तो हमें सोशियोलॉजी में बताया गया कि अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए शासक लोग जनता को खेल और मनोरंजन में लगा देते हैं। इससे उनका ध्यान जीवन के अहम मुद्दों से हट जाता है। यूनानी शासक यही करते थे।
हमने पाया कि जैसे-जैसे देश और दुनिया में समस्याओं का अंबार लगता जा रहा है, वैसे वैसे खेल और मनोरंजन के साधन भी जनता को ज़्यादा से ज़्यादा उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मीडिया ने बताया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन खेलों में प्रतिवर्ष खरबों रूपया ख़र्च करती हैं और उससे कई गुना ज़्यादा कमाती भी हैं। देश का पैसा खिंचकर विदेश में जाता है। पहले से ही कंगाल जनता कुछ और बदहाल हो जाती है और फिर यह भी सामने आ गया कि सट्टा किंग पहले से ही यह तक तय कर देते हैं कि जीतना किसे है ?
बहुत बड़ा गोरखधंधा है यह कप और विश्व कप। जो इसे समझता है, वह न किसी की हार से दुखी होता है और न ही किसी की जीत से खुश। जो नादान हैं वे समझते हैं कि हाय ! हम हार गए या हुर्रे ! हम जीत गए।
अफ़सोस होता है यह देखकर कि देश के 22 नौजवान 8 मई 2010 से सोमालियाई लुटेरों की क़ैद में हैं। जाने उनमें से कौन अब ज़िंदा होगा ?
हम एक एटमी पॉवर हैं और हमसे डरते नहीं हैं समुद्री लुटेरे भी। हमारे आदमी उन्होंने पकड़ लिए। इस बात पर अफ़सोस करने के लिए जो देश एक न हो सका, जो ब्लॉग जगत एक न हो सका और कोई सशक्त आंदोलन न चला सका। वह हिप हिप हुर्रे हुर्रे करके कह रहा है अहा, हम जीत गए।
क्या सचमुच हम जीत गए ?
यह सच है कि हमारी क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीत लिया है । तमाम बातों के बावजूद इसे एक उपलब्धि भी माना जा सकता है लेकिन हरेक चीज़ अपनी उपयोगिता के कारण ही सार्थक या निरर्थक मानी जाती है। आखि़र देश की जनता के लिए इस कप का उपयोग क्या किया जा सकता है ?
जिन देशों की सिरे से ही कोई क्रिकेट टीम नहीं है, क्या वे बेकार देश हैं ?
जिस देश में आज भी लोग मलेरिया के हाथों लाखों की तादाद में मर जाते हैं। जहां करोड़ों माएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं। जहां नशे के कारोबार को सरकारी आश्रय प्राप्त है और नशे की वजह से कितने ही रोड एक्सीडेंट रोज़ होते हैं या फिर कलह के कारण करोड़ों परिवारों का सुख चैन बर्बाद है सदा के लिए।
जहां गुरबत है और ऐसी गुरबत है कि मात्र एक रूपये में इस देश की औरत अपनी आबरू बेच रही है। मैं ऐसे फ़ौजियों से मिला हूं जिन्होंने यह सब खुद देखा है और उस इलाक़े का नाम मुझे बताया है। कश्मीर में भी मुझे यही पता चला। देश का कोई इलाक़ा शायद ऐसा न हो जहां ज़रूरतें इंसान की शर्म और ग़ैरत को न चाट रही हों। जहां ज़रूरतें और मजबूरियां नहीं हैं वहां भी यही सब हो रहा है। वहां वजह बन रही है दौलत की हवस। पति-पत्नी का रिश्ता एक पवित्र संबंध है लेकिन दौलत की हवस यहां भी पैर पसारे आपको मिल जाएगी और दहेज की इसी हवस में कहीं बहुएं जलाई जा रही हैं और कहीं लड़कियां या तो बेमेल ब्याही जा रही हैं या फिर कुंवारी ही बूढ़ी हो रही हैं या फिर गर्भ में ही मारी जा रही हैं। माएं आज बेसहारा हैं और विधवाएं तो हमेशा से हैं ही। जिन समस्याओं को हमें हल करना था, उन्हें हम हल नहीं कर पाए।
ग़रीबी और कुपोषण की वजह से बच्चे बचपन में ही या तो मर जाते हैं या फिर मज़दूरी करते हैं। किसान मज़दूर सूदख़ोर महाजन के ब्याज के फंदे में झूलकर आए दिन आत्महत्या करते हैं। कुछ बाबा और महात्मा ग़रीबों की सेवा पहले भी करते थे और आज भी करते हैं लेकिन इन्हीं का रूप बनाकर पहले भी ठग जनता को ठगते थे और आज भी ठग रहे हैं बल्कि मंत्री और मुख्यमंत्री तक बन चुके हैं। आशीर्वाद और योग को ये लोग कारोबार बना चुके हैं। भारत एक धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है और आस्था इसकी पहचान है लेकिन आज देश की जनता के सामने केवल अधिक से अधिक सुविधा और ऐश बटोरना ही एक मात्र मक़सद है। कभी जनता हड़ताल करती है तो कभी वकील और कभी डाक्टर।
देश का क़ानून टूटता हो तो टूटे , कोई मरता हो तो मरे, इनकी बला से इनके अधिकार कम न हों, इनकी सैलरी बढ़ा दी जाए। ये बुद्धिहीन लोग बुद्धिजीवी कहलाते हैं, यह देश की त्रासदी है। बस केवल सांसद ही कभी हड़ताल नहीं करते। उन्हें जो कुछ सुविधाएं लेनी होती हैं, अपने लिए खुद ही मंजूर कर लेते हैं।
इस आंतरिक मज़बूत एकता के बावजूद ये नेता बाहर से खुद को बंटा हुआ दिखाते हैं ताकि जनता यह समझे कि यह वामपंथी है और वह दक्षिणपंथी, यह समाजवादी है और वह निर्दलीय। यह अमीरों का पिठ्ठू है और वह ग़रीबों का मसीहा है। ये गुट बनाकर आमने सामने डटे रहते हैं और जब भी कोई पार्टी जीतती है तो पब्लिक समझती है कि ‘अहा ! हम जीत गए।‘
लेकिन जब वह पार्टी काम काज संभालती है तो वह भी पुराने ढर्रे पर ही आगे बढ़ती है जिससे जनता की केवल मुसीबतें बढ़ती हैं और उनसे ध्यान बंटाने के लिए उसके लिए खेल और मनोरंजन के साधन बढ़ा दिए जाते हैं।
आज चैराहों पर ढोल बज रहे हैं, पटाख़े छोड़े जा रहे हैं, मिठाईयां बांटी जा रही हैं। हर तरफ़ एक जुनून है, एक खुशी की लहर छाई हुई है। राष्ट्रवादी लोग भी मगन हैं। जो सारा माजरा समझते हैं वे चुप हैं। वे जानते हैं कि दीवानेपन और जुनून की कैफ़ियत में उनकी सही बात सुनेगा ही कौन ?
लेकिन ऐसा नहीं है।
सुनने वाले लोग भी इन्हीं के दरम्यान हैं। सोचने-समझने वाले लोग भी इन्हीं के बीच मौजूद हैं। आप कहेंगे तो बात उन तक ज़रूर पहुँचेगी जिन्हें मार्ग और मंज़िल की तलाश है।
जिन खेलों से सीधे तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होता है या फिर हमारे पूंजीपतियों और निकम्मे हाकिमों को, उनका प्रभाव लाज़िमन हमारे राष्ट्र को कमज़ोर ही करता है।
समस्याओं से त्रस्त लोगों के बीच खड़े होकर कहना कि ‘हम जीत गए।‘
सिर्फ़ यह बताता है कि उन्हें देशवासियों की समस्याओं से वास्तव में कुछ लेना-देना ही नहीं है। उनके लिए तो बस मनोरंजन ही प्रधान है। हमारे हाकिम भी यही चाहते हैं कि हमें होश न रहे। हरेक गली-नुक्कड़ पर नित नए खुलते हुए शराब के ठेके इसी बात की पुष्टि करते हैं। जिस देश में कभी गंगा शुद्ध बहती थी। उसी देश में आज शराब की नदियां बहाई जाएंगी और यह सब होगा राष्ट्रवाद के नाम पर। जो चीज़ राष्ट्र को खोखला करती है उसका इस्तेमाल राष्ट्रवादियों में आम क्यों है ?
महंगाई, मिलावट और नक्सलवाद से लेकर हरेक समस्या ले लीजिए, हम हर मोर्चे पर हार रहे हैं, ऐसे हालात में क्रिकेट के जुनून में दीवाना हो जाना मर्ज़ को और बढ़ा रहा है।जो देख सकते हैं, वे हालात को सही एंगल से देखने का कष्ट करें मुल्क की भलाई की ख़ातिर, ऐसी हमारी विनती है।
बचपन में तो हम अपने वालिद साहब के सामने कह नहीं सकते थे लेकिन आप लोगों से तो हम कह ही सकते हैं कि क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है।
हरेक सोचे कि इस धरती पर उसके जन्म का उद्देश्य क्या है ?
इसके लिए वह अपने गुरूओं और ग्रंथों की सहायता ले और फिर देखे कि क्रिकेट के ज़रिए वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है या कि उससे दूर होता जा रहा है ?
Tuesday, March 29, 2011
किस किस हाल से गुज़र रही है आज एक औरत अपने जीवन में ? Family Life
अभी तक ज्यादातर वर्किंग वुमन ही डिप्रेशन की शिकार होती थीं, और इसका कारण घर-दफ्तर का तनाव होता था। मगर अब गृहिणियां भी इसकी जद में आ रही हैं।
मैं अपने साथ काम करने वाली एक ऐसी महिला को जानती थी, जिसे मैंने अक्सर अवसाद से घिरा पाया। कार्यालय में उसका मन कम ही लगता था। घर की, बच्चों की, चिंता में वह ज्यादा रहा करती थी। मेरे यह कहने पर कि वह नौकरी करती ही क्यूं है, तो उसका कहना था घर कैसे चलेगा? पति के बारे में पूछने पर अक्सर वह टालमटोल कर जाती।
अपने दूसरे साथियों से जानकारी लेने पर पता चला कि उसका पति शराबी है और उसे कोई नौकरी नहीं देता। साथ ही यह भी पता चला कि वह कई बार आत्महत्या की कोशिश कर चुकी है। उसके बाद तो कई बार मेरे और उसके बीच घर-परिवार की चर्चा चलती रही, उसके मन की गुत्थियां मुझे खुलती नजर आने लगीं। वह काम में भी मन लगा रही थी और खुश भी दिखती थी। कुछ दिन बाद मैंने नौकरी छोड़ दी। उससे भी नाता टूट गया। हाल ही में मुझे अखबार के जरिए उसकी मौत की खबर मिली। उसने ऊँचाई से कूद कर आत्महत्या कर ली थीं। इतने सालों बाद भी आत्महत्या का जुनून उसे सवार था, जबकि मुझे मिली जानकारी के अनुसार घर की स्थिति पहले से बहुत बेहतर थी। यह सचमुच काफी तकलीफदेह बात है कि हाउसवाइव्स में डिप्रेशन के कारण आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। उपेक्षा, प्रताड़ना, अर्न्तद्वंद, पारिवारिक कलह या फिर अवसाद से घिरी स्त्री, मुक्ति का उपाय खोजते-खोजते मृत्यु को अधिक आत्मीय समझने की भूल कर रही है। पहले घर और फिर सामाजिक तौर पर एक अहम भूमिका निभाने वाली महिला का इस तरह का अंत दुखद बात लगती है। नेशनल क्राइम ब्यूरो ने रिपोर्ट में बताया है कि हर दिन 123 महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं, जिनमें 69 गृहणियां हैं। मनोविज्ञानी बताते हैं कि गृहस्थी का बोझ उठाने वाली महिलाओं को अक्सर कलह से भी गुजरना पड़ता है। कभी आर्थिक तंगी कलह का विषय होती है, तो कभी बच्चों की परवरिश और कभी पत्नी का सोशल न हो पाना भी कलह का एक अहम कारण बन जाता है।
कलह से कुढ़न और कुढ़न से अवसाद हावी होने लगता है और अवसाद से निकलने में अगर मदद न की जा सकी तो वह आत्महत्या का कारण जाती है। इसमें वे महिलाएं और भी घातक स्थिति में मिलती है जो विवाह उपरान्त घर-परिवार की ख्वाहिश लेकर आती हैं और पति की लापरवाही या आर्थिक परेशानी की वजह से नौकरी करने को मजबूर हो जाती हैं। उनकी काबिलियत जहां घर के दायरे तक की ही थी, उसके लिए उसे घर के बाहर जूझना पड़ता है। यहीं से उसके मन के भीतरी हिस्सों पर कुठाराघात शुरू हो जाता है।
डिप्रेशन की वजह
1. सामाजिक तौर-तरीके का अभाव
2. पति का र्दुव्यवहार
3. सास-ससुर के लांछन
4. मानसिक या शारीरिक परेशानी
5. प्यार में धोखा
6. पति की बेवफाई
7. दहेज प्रताड़ना
8. अकेलापन
9.बच्चों की तकलीफ
10. सामाजिक लांछन
11. दुराचार की शिकार
मैं अपने साथ काम करने वाली एक ऐसी महिला को जानती थी, जिसे मैंने अक्सर अवसाद से घिरा पाया। कार्यालय में उसका मन कम ही लगता था। घर की, बच्चों की, चिंता में वह ज्यादा रहा करती थी। मेरे यह कहने पर कि वह नौकरी करती ही क्यूं है, तो उसका कहना था घर कैसे चलेगा? पति के बारे में पूछने पर अक्सर वह टालमटोल कर जाती।
अपने दूसरे साथियों से जानकारी लेने पर पता चला कि उसका पति शराबी है और उसे कोई नौकरी नहीं देता। साथ ही यह भी पता चला कि वह कई बार आत्महत्या की कोशिश कर चुकी है। उसके बाद तो कई बार मेरे और उसके बीच घर-परिवार की चर्चा चलती रही, उसके मन की गुत्थियां मुझे खुलती नजर आने लगीं। वह काम में भी मन लगा रही थी और खुश भी दिखती थी। कुछ दिन बाद मैंने नौकरी छोड़ दी। उससे भी नाता टूट गया। हाल ही में मुझे अखबार के जरिए उसकी मौत की खबर मिली। उसने ऊँचाई से कूद कर आत्महत्या कर ली थीं। इतने सालों बाद भी आत्महत्या का जुनून उसे सवार था, जबकि मुझे मिली जानकारी के अनुसार घर की स्थिति पहले से बहुत बेहतर थी। यह सचमुच काफी तकलीफदेह बात है कि हाउसवाइव्स में डिप्रेशन के कारण आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। उपेक्षा, प्रताड़ना, अर्न्तद्वंद, पारिवारिक कलह या फिर अवसाद से घिरी स्त्री, मुक्ति का उपाय खोजते-खोजते मृत्यु को अधिक आत्मीय समझने की भूल कर रही है। पहले घर और फिर सामाजिक तौर पर एक अहम भूमिका निभाने वाली महिला का इस तरह का अंत दुखद बात लगती है। नेशनल क्राइम ब्यूरो ने रिपोर्ट में बताया है कि हर दिन 123 महिलाएं आत्महत्या कर रही हैं, जिनमें 69 गृहणियां हैं। मनोविज्ञानी बताते हैं कि गृहस्थी का बोझ उठाने वाली महिलाओं को अक्सर कलह से भी गुजरना पड़ता है। कभी आर्थिक तंगी कलह का विषय होती है, तो कभी बच्चों की परवरिश और कभी पत्नी का सोशल न हो पाना भी कलह का एक अहम कारण बन जाता है।
कलह से कुढ़न और कुढ़न से अवसाद हावी होने लगता है और अवसाद से निकलने में अगर मदद न की जा सकी तो वह आत्महत्या का कारण जाती है। इसमें वे महिलाएं और भी घातक स्थिति में मिलती है जो विवाह उपरान्त घर-परिवार की ख्वाहिश लेकर आती हैं और पति की लापरवाही या आर्थिक परेशानी की वजह से नौकरी करने को मजबूर हो जाती हैं। उनकी काबिलियत जहां घर के दायरे तक की ही थी, उसके लिए उसे घर के बाहर जूझना पड़ता है। यहीं से उसके मन के भीतरी हिस्सों पर कुठाराघात शुरू हो जाता है।
डिप्रेशन की वजह
1. सामाजिक तौर-तरीके का अभाव
2. पति का र्दुव्यवहार
3. सास-ससुर के लांछन
4. मानसिक या शारीरिक परेशानी
5. प्यार में धोखा
6. पति की बेवफाई
7. दहेज प्रताड़ना
8. अकेलापन
9.बच्चों की तकलीफ
10. सामाजिक लांछन
11. दुराचार की शिकार
साभार हिन्दुस्तान दिनांक ३० मार्च २०११
http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/lifestylenews/article1-Tension-50-50-164019.html
कुछ कारण ऐसे हैं जिनकी चर्चा आम तौर पर की ही नहीं जाती . उनकी जानकारी भी आपको होनी चाहिए ताकि आप सच जान सकें और खुद अपनी और दूसरों की सचमुच मदद कर सकें . सच्चाई यह है कि तमाम कठिनाइयों के बावुजूद जिस तरह मुसलमानों में कन्या भ्रूण की ह्त्या नहीं की जाती , ठीक ऐसे ही आत्महत्या भी नहीं की जाती.
आत्महत्या करने में हिन्दू युवा अव्वल क्यों ? under the shadow of death
आज आप खतरे में जी रहे हैं. आपके बच्चे कभी भी कहीं भी कुछ भी कर सकते हैं और कोई भी गलत क़दम उठा सकते हैं . आप उन्हें सिखाइए एक प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पित होकर जीना , सही फैसले लेना और सही तरीके से जीना इससे पहले कि वे आवेश में आकर या जज़्बात की रु में बहकर खुद को तबाह कर बैठें हमेशा के लिए . फैसला है आपका क्योंकि जीवन भी है आपका .
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'आत्महत्या के तरिके',
'समाचार',
'सेक्स पार्टनर'
फ़ानूस बनके जिसकी हिफ़ाज़त हवा करे / वो शम्मा क्या बुझे जिसे रौशन ख़ुदा करे Rest is rust , Work is worship.
शम्मा ए हक़ नूरे इलाही को बुझा सकता है कौन
जिसका हामी हो ख़ुदा उसको मिटा सकता है कौन
फ़ानूस बनके जिसकी हिफ़ाज़त हवा करे
वो शम्मा क्या बुझे जिसे रौशन ख़ुदा करे
जिसका हामी हो ख़ुदा उसको मिटा सकता है कौन
फ़ानूस बनके जिसकी हिफ़ाज़त हवा करे
वो शम्मा क्या बुझे जिसे रौशन ख़ुदा करे
लीजिए साहिबान ! ताज़ा दम होकर हम एक बार फिर आपके मार्गदर्शन के लिए वापस आ चुके हैं।
आपको जीवन में कोई भी मसला परेशान करे तो आप हमसे बेहिचक पूछ सकते हैं और अगर आप खुद हमसे ही परेशानी महसूस करें तो भी हमें आप बता सकते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं ?
यह अधिकार केवल हमारे समर्थकों को ही नहीं है बल्कि हमारे हरेक प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित ब्लॉगर भाई को है। जो ब्लॉगर हमारे चिर विरोधी हैं, अपनी वापसी से पहले हमने उनसे कहा था कि
आप मेरे नव अवतरण की रूपरेखा बना दें
आपकी पोस्ट को मैंने दोबारा फिर पढ़ा तो मेरी नज़र आपके इस वाक्य पर अटक गई :
आप ऐसे ही करते रहे तो मेरी दुकान बंद हो जाएगी और मैं बहुत सुखी इंसान हो जाऊंगाए क्योंकि मेरा विरोध अनवर जमाल से नही उन बातों से है जिनका विरोध आपने मेरे ब्लॉग पर देखाए मेरी मौत एक सुखद घटना होगी और आपका नव अवतरण उससे भी सुखद।
इसमें कुछ बिन्दु हैं , जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए
1. मेरी दुकान बंद हो जाएगी।
2. मैं सुखी इंसान हो जाऊंगा।
3. मेरा विरोध अनवर जमाल से नहीं है।
4. मेरी मौत एक सुखद घटना होगी।
5. आपका नव अवतरण उससे भी ज़्यादा सुखद होगा।
जब इन तथ्यों पर मैं ईमानदारी से सोचता हूं तो मैं खुद चाहता हूं कि आप एक सुखी इंसान हो जाएं लेकिन मैं यह नहीं चाहता कि आपके ब्लॉग की मौत हो जाए। आप अच्छा लिखते हैं और मैं आपको पढ़ता हूं। आपने मेरी जायज़ बातों का भी विरोध किया, इसलिए मैंने आपकी बात को गंभीरता से नहीं लिया और उसका नतीजा यह हुआ कि जहां आप सही थे, उसे भी मैंने नज़रअंदाज़ कर दिया। यह मेरी ग़लती थी, जिसे कि मैंने आपकी सलाह के मुताबिक़ सुधार लिया है।
आपने मेरे नव अवतरण के प्रति भी अच्छी आशा जताई है और मैं खुद भी यही चाहता हूं कि मेरी वजह से आपमें से किसी को कोई कष्ट न पहुंचे। मेरे नव अवतरण की आउट लाइंस क्या होंगी ?
यह मैं अभी तक तय नहीं कर पा रहा हूं। इसलिए मैं चाहता हूं कि आप ही मेरे नव अवतरण की रूपरेखा तैयार कर दीजिए और मैं उसे फ़ॉलो कर लूं।
मेरे नव अवतरण की भूमिका तैयार करना खुद मेरे लिए जिन कारणों से मुश्किल हो रहा है, वे प्रश्न आपको भी परेशान करेंगे लेकिन मुझे उम्मीद है कि आपकी प्रबुद्ध मंडली उनका कुछ न कुछ हल निकालने में ज़रूर कामयाब होगी।
जो चीज़ मुझे इस वर्चुअल दुनिया में लाई है वह है ईश्वर, धर्म और धार्मिक महापुरूषों का मज़ाक़ बना लेना।
मैं इसे पसंद नहीं करता कि कोई भी व्यक्ति ऐसा करे। इनमें से कुछ लोग रंजिशन ऐसा करते हैं और ज़्यादातर नादानी की वजह से। आज भी श्रीरामचंद्र जी , श्रीकृष्ण जी और शिवजी के बारे में ग़लत बातें लिखी जा रही हैं। मुझे कोई एक भी हिंदू कहलाने वाला भाई ऐसा नज़र नहीं आया जो कि उन्हें इन महापुरूषों की सच्ची शान बता सकता। मैंने जब भी बताया तो मुझसे यह कहा गया कि आप एक मुसलमान हैं, आप हमारे मामलों में दख़ल न दें।
1. आप मुझे बताएं कि अगर हिंदू महापुरूषों और ऋषियों का अपमान कोई हिंदू करता है तो क्या मुझे मूकदर्शक बने रहना चाहिए ?
2. कुछ हिंदू भाई ऐसा लिखते रहते हैं कि कुरआन में अज्ञान की बातें हैं, अल्लाह को गणित नहीं आता, मांस खाना राक्षसों का काम है, औरतों के हक़ में इसलाम एक लानत है। इससे भी बढ़कर पैग़म्बर साहब की शान में ऐसी गुस्ताख़ी करते हैं, जिन्हें मैं लिख भी नहीं सकता। दर्जनों ब्लाग और साइटों पर तो मैं खुद अपील कर चुका हूं और ऐसे अड्डे सैकड़ों से ज़्यादा हैं। जब इस तरह की पोस्ट पर मैं हिंदी ब्लाग जगत के ‘मार्गदर्शकों‘ को वाह वाह करते देखता हूं तो पता चलता है कि अज्ञानता और सांप्रदायिकता किस किस के मन में कितनी गहरी बैठी हुई है ?
ऐसी पोस्ट्स पर मेरी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए ?
3. मैं अपने देशवासियों में अनुशासनहीनता और पाखंड का आम रिवाज देख रहा हूं। एक आदमी खुद को मुसलमान कहता है और शराब का व्यापारी है। जब इसलाम में शराब हराम है तो कोई मुसलमान शराब का व्यापार कर ही कैसे सकता है ?
कैसे कोई मुसलमान सूद ले सकता है ?
कैसे कोई मुसलमान खुद को ऊंची जाति का घोषित कर सकता है जबकि इसलाम में न सूद है और न ही जातिगत ऊंचनीच ?
ऐसा केवल इसलिए है कि इसलाम उनके जीवन में नहीं है बस केवल आस्था में है। चोरी, व्यभिचार, हत्या, बलवा और बहुत से जुर्म आज मुस्लिम समाज में आम हैं जबकि वे सभी इसलाम में हराम हैं।
यही हाल हिंदू समाज का है कि हिंदू दर्शन सबसे ज़्यादा चोट ‘माया मोह‘ पर करता है और मैं देखता हूं कि हिंदू समाज में धार्मिक जुलूसों में रथों की रास पकड़ने से लेकर चंवर डुलाने तक हरेक पद की नीलामी होती है और पैसे के बल पर ‘माया के मालिक‘ इन पदों पर विराजमान होकर अपनी शान ऊंची करते हैं। दहेज भी ये लोग लेते हैं और कन्या भ्रूण हत्या भी केवल दहेज के डर से ही की जा रही है।
जो सन्यासी इन्हें रोक सकते थे, उनके पास भी आज अरबों खरबों रूपये की संपत्ति जमा है। हिंदू बालाएं फ़ैशन और डांस के नाम पर अश्लीलता परोस रही हैं जबकि काम-वासना और अश्लीलता से उन्हें रूकने के लिए खुद उनका धर्म कहता है।
मैं चाहता हूं कि हरेक नर नारी जिस सिद्धांत को अपनी आत्मा की गहराई से सत्य मानता हो, वह उस पर अवश्य चले वर्ना पाखंड रचाकर समाज में धर्म को बदनाम न करे।
हिंदू हो या मुसलमान जब वे नशा करते हैं, दंगों में एक दूसरे का खून बहाते हैं तो उससे धर्म बदनाम होता है। जो लोग कम अक़्ल रखते हैं और धर्म के आधार पर लोगों को नहीं परखते बल्कि लोगों के कामों को ही धर्म समझते हैं वे धर्म का विरोध करने लगते हैं और दूसरों को भी धर्म के खि़लाफ़ बग़ावत के लिए उकसाते हैं जैसा कि पिछले दिनों एक वकील साहब ने किया।
धर्म को बदनाम करने वाले पाखंडियों को धर्म पर चलने के लिए कहना ग़लत है क्या ?
धर्म का विरोध करने वाले नास्तिकों को ईश्वर और धर्म की खिल्ली उड़ाने से कैसे रोका जाए ?
इसी तरह के कुछ सवाल और भी हैं जो इनसे ही उपजते हैं।
मैंने कभी हिंदू धर्म की निंदा नहीं की और हमेशा हिंदू महापुरूषों का आदर किया और उनका आदर करने की ही शिक्षा दी। मेरी सैकड़ों पोस्ट्स इस बात की गवाह हैं। मैं खुद को भी एक हिंदू ही मानता हूं लेकिन डिफ़रेंट और यूनिक टाइप का हिंदू। बहरहाल, अगर आप मुझे हिंदू नहीं मानते तो न मानें। मैं इस पर बहस नहीं करूंगा लेकिन मैं यह ज़रूर चाहूंगा कि आप उपरोक्त सवालों पर ग़ौर करके मेरे नव अवतरण की रूपरेखा बना दें ताकि मेरे शब्द आपके लिए किसी भी तरह कष्ट का कारण न बनें।
मैं आपका आभारी रहूंगा।
शुक्रिया !
http://ahsaskiparten-sameexa.blogspot.com/2011/03/blog-post_19.html?showComment=1300612412366#c5412010183540951113
अपनी वापसी के पहले ही दिन हम विचारवान विरोधियों और समर्थकों से सभी से सलाह आमंत्रित करते हैं।
हम संत टाइप आदमी हैं सो निंदक को नियर रखते हैं। उनकी पहली ख़ासियत तो यह होती है कि वे चापलूस नहीं होते और सौजन्यतावश टिप्पणी नहीं करते और दूसरी बात यह है कि प्रेम करने वालों से तो प्रेम दुनिया करती है। हम उनसे प्रेम करते हैं जो हमसे नफ़रत करते हैं। इंसान नफ़रत के लिए बना ही नहीं है, सो वह देर तक नफ़रत कर भी नहीं सकता। इंसान प्रेम से पैदा होता है। एक नर और एक नारी आपस में प्रेम करते हैं तभी एक और इंसान जन्म लेता है। इसीलिए प्रेम इंसान का स्वभाव है और अपने स्वभाव पर हरेक इंसान हमेशा रह सकता है। प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। इसलाम प्रेम करना ही सिखाता है। दूसरे लोग अपनी किताब खोलकर देखेंगे तो उन्हें भी वहां प्रेम का उपदेश ही लिखा मिलेगा। अब समय आ चुका है कि उपदेश के अनुसार आचरण भी किया जाए।
Monday, March 14, 2011
खुदा हाफिज़ , ॐ शांति Peace be upon all of you
मैंने हिंदी ब्लॉग जगत को अपनी ज़िन्दगी का बेहतरीन एक साल दिया. इसे कुछ नए ब्लॉग ऐसे दिए जो उन विषयों पर पहले नहीं थे . लोगों ने भी मुझे अपना भरपूर प्यार दिया और यह प्यार उन्होंने मुझे उस हाल में दिया जबकि मैंने उनकी मान्यताओं की धज्जियाँ उड़कर रख दीं . यह ठीक है कि मैंने ऐसा इसलिए किया की मैं उन्हें ग़लत मानता हूँ लेकिन ऐसा मेरा मानना है, न कि हरेक का. इस सब के बीच मुझे सभी ब्लॉगर्स ने अपने दिल में बिठाया . जो लोग मुझसे नफरत करते हैं , वास्तव में वे भी मुझे अपने दिल में जगह दिए हुए हैं . मैं उनकी भी क़द्र करता हूँ और उनसे भी प्यार ही करता हूँ . मैं एक जज़्बाती आदमी हूँ . ईश्वर और धर्म मेरे लिए पराये नहीं हैं. मैं धर्ममय हूँ , ईश्वरमय हूँ. जो इन्हें बुरा कहता है , वह मुझे बुरा कहता है . इसीलिये मुझसे बर्दाश्त नहीं होता . मैं अपनी हद तक विरोध करता हूँ .
लगातार बहुत सा वक़्त नेट पर देने की वजह से बच्चे मैथ में कम नंबर लेन लगे जबकि वे ९९ प्रतिशत लाया करते थे . मेरी आँखों में से भी पानी बहने लगा है . मैंने BIGPOND की जो नई डिवाइस ली है नेट के लिए उसकी सेटिंग में भी कुछ मुश्किल आ रही है. इस मुद्दत के दरमियान मेरे रूहानी मुराक़बों (सूफी साधना) में कमी आई है . मेरे पीर साहब का इन्तेक़ाल कुछ साल पहले हो चुका है और मैं अपने एक गुरुभाई की निगरानी में साधना कर रहा था कि नेट कि दुनिया में दाखिल हो गया और मेरी साधना को विराम लग गया . अब मैं कुछ समय जैतून के तेल में अंडे तलकर खाना चाहता हूँ , लेकिन सॉरी ताली हुई चीज़ें मैं खाता नहीं. खैर ताक़त के लिए आंवला और शहद जैसी चीज़ें भी काम देंगी . इस दरमियान मैं अपने आमाल का जायज़ा लूँगा कि कहीं खुदा की नज़र में मैं खुद ही तो मुजरिम नहीं ?
एक दिन वह इसका हिस्साब ज़रूर लेगा , इसका ध्यान रहे . हर समय उस मालिक को आप अपना साक्षी समझें क्योंकि वास्तव में वह हर समय आपके कर्मों को देख रहा है और अंत में वह आपको दंड या पुरस्कार अवश्य देगा . जापान का ज़लज़ला इसकी मिसाल है .
जाते जाते मैंने अपनी एक ताज़ा पोस्ट
http://paricharcha-rashmiprabha.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html
लगातार बहुत सा वक़्त नेट पर देने की वजह से बच्चे मैथ में कम नंबर लेन लगे जबकि वे ९९ प्रतिशत लाया करते थे . मेरी आँखों में से भी पानी बहने लगा है . मैंने BIGPOND की जो नई डिवाइस ली है नेट के लिए उसकी सेटिंग में भी कुछ मुश्किल आ रही है. इस मुद्दत के दरमियान मेरे रूहानी मुराक़बों (सूफी साधना) में कमी आई है . मेरे पीर साहब का इन्तेक़ाल कुछ साल पहले हो चुका है और मैं अपने एक गुरुभाई की निगरानी में साधना कर रहा था कि नेट कि दुनिया में दाखिल हो गया और मेरी साधना को विराम लग गया . अब मैं कुछ समय जैतून के तेल में अंडे तलकर खाना चाहता हूँ , लेकिन सॉरी ताली हुई चीज़ें मैं खाता नहीं. खैर ताक़त के लिए आंवला और शहद जैसी चीज़ें भी काम देंगी . इस दरमियान मैं अपने आमाल का जायज़ा लूँगा कि कहीं खुदा की नज़र में मैं खुद ही तो मुजरिम नहीं ?
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| japan tsunami 2011 |
जो लोग मेरी मौजूदगी की वजह से कुछ परेशान थे उन्हें भी राहत मिलेगी और मिलनी भी चाहिए . चाहता तो मैं यही हूँ कि कुछ दिन नेट से पूरी तरह छुट्टी लेकर मुकम्मल आराम करूं लेकिन जो साझा ब्लॉग मैंने बनाये हैं उनसे जुड़े लोगों की सुविधा की ख़ातिर मैं पूरी तरह से चाहकर भी हट नहीं सकता. लेकिन इसके बावजूद ज़िन्दगी के जिन पहलुओं पर मेरा ध्यान कम हो गया है उन्हें मैं भरपूर तवज्जो देना मेरे लिए निहायत ज़रूरी है . सभी भाईयों और बहनों से मैं माफ़ी की दरख्वास्त करता हूँ और यह विनती भी कि सभी भाई-बहन यह ज़रूर सोचें कि क्या वे वही काम कर रहे हैं जो कि करने के लिए उन्हें मालिक ने इस प्यारी धरती पर पैदा किया है ?
एक दिन वह इसका हिस्साब ज़रूर लेगा , इसका ध्यान रहे . हर समय उस मालिक को आप अपना साक्षी समझें क्योंकि वास्तव में वह हर समय आपके कर्मों को देख रहा है और अंत में वह आपको दंड या पुरस्कार अवश्य देगा . जापान का ज़लज़ला इसकी मिसाल है .
http://paricharcha-rashmiprabha.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html
पर नज़र डाली तो बहन सोनल रस्तौगी जी के कमेन्ट पर नज़र पड़ी जोकि ईमानदारी से भरा हुआ है . नेट जगत में ज़्यादातर बहनें गुटबंदी और नफरत से बहुत दूर हैं . मैं बहनों का शुक्रगुज़ार ख़ास तौर पर हूँ . जब कभी इंसानी शराफत से मेरा यकीन हिला तो उसे बहनों के सच्चे कमेंट्स ने ही बहाल किया है . मैं कुछ काम अधूरे छोड़े जा रहा हूँ जिनमें से एक यह नज़्म भी है :
'माँ' The mother
Tuesday, March 1, 2011
'ऋषियों को नाहक़ इल्ज़ाम न दो' Part 3 ; Shiva : The Innocent Father
शिव जी से मेरा ख़ास ताल्लुक़ है। शिव जी का एक नाम भोले भी है। ज़्यादातर लोग नहीं जानते कि शिव जी ने न कभी भाँग पी और न ही कभी ज़हर पिया। शिव जी सारी मनुष्य जाति के आदि पिता हैं , यह बात भी कम लोग जानते हैं । प्राचीन काल में भारत में शैव , वैष्णव और शाक्त आदि बहुत से मत बने और सभी ने अपने अपने हिसाब से अपने महापुरुषों की महिमा को बढ़ा चढ़ाकर बयान किया और दूसरे मतों के महापुरुषों में दोष सिद्ध करने के लिए काल्पनिक कहानियाँ रचीं । इसके चलते आज हमें अपने पूर्वजों के बारे में बहुत सी ऐसी बातें पढ़ने के लिए मिलती हैं जो कि किसी भी ज्ञानी और सत्पुरूष के चरित्र में होना संभव ही नहीं है ।
आज महाशिव रात्रि है । लोगों में अपने पूर्वजों के प्रति उत्साह और आस्था का एक अद्भुत जोश है जो कि एक बहुत अच्छी बात है लेकिन इस अवसर पर हमें अपने पूर्वजों की भाँति ज्ञान से भी युक्त होना चाहिए और सोचना चाहिए कि जो बातें हम अपने माता-पिता के बारे में नहीं कह सकते उससे भी ज्यादा बुरी बातें हम अपने आदि पिता शिव जी और आदि माता पार्वती जी के बारे में कैसे कह सकते हैं ?
हम कैसे मान सकते हैं कि वे कभी किसी राक्षस भस्मासुर से डर कर भाग सकते हैं ?
न तो श्रीलंका में आज किसी को राक्षस मिले , न ही पाताल लोक अर्थात अमेरिका में कोई वासुक़ि जैसे साइज़ का साँप मिला और न ही पूरी ज़मीन पर कोई दूध का सागर ही मिला । इसलिए न कभी समुद्र मंथन हुआ और न कोई ज़हर ही निकला , जिसे शिव जी को पीकर मौत के डर से उसे अपने गले में रोकना पड़ा हो।
इस तरह की बातें बुद्धिजीवियों को सच्चाई से दूर लगती हैं और फिर वे यह समझने लगते हैं कि जैसे यह कहानी काल्पनिक है ऐसे ही शिव जी भी काल्पनिक होंगे और फिर वे कहते हैं कि ईश्वर मनुष्य के मन की कल्पना मात्र है। इस प्रकार काल्पनिक कथाएँ लोगों को अपने पूर्वजों से भी दूर करती हैं और उन्हें नास्तिक भी बनाती हैं ।
हमें सोचना चाहिए कि अगर आज हम यहाँ हैं तो कभी हमारे पूर्वज भी ज़रूर ही रहे होंगे और जब हम इस गए गुज़री हालत में भी नैतिक नियमों के पालन की कोशिश करते हैं तो निश्चय ही हमारे पूर्वजों ने इनका पालन हमसे बढ़कर किया होगा क्योंकि ये नैतिक नियम हमने नहीं बनाए हैं बल्कि ये हमें पहले से चलते हुए और समाज में स्थापित मिले हैं।
विज्ञान की बड़ी से बड़ी खोज से भी बड़ी खोज है 'नैतिक नियमों की खोज' और यह खोज किसी आधुनिक वैज्ञानिक या समाज शास्त्री ने नहीं की बल्कि इनकी खोज करने वाले थे हमारे पूर्वज । इन्हीं नैतिक नियमों की वजह से जानवर और इंसान में फर्क पैदा होता है । जानवर माँ और पत्नी के दरमियान अंतर नहीं कर सकते लेकिन इंसान कर सकता है । हमारे पूर्वजों ने हमें जानवर से इंसान बनने का मार्ग दिखाया । उन्होंने ही हमें रिश्तों का ज्ञान और उनसे मुहब्बत की दौलत दी है और यह रुपए-पैसों से बड़ी दौलत है । जिन पूर्वजों ने हमें इतना कुछ दिया है , हमने उन्हें क्या दिया ?
क्या हम ढंग से उनकी तारीफ़ भी नहीं कर सकते ?
महाशिव रात्रि के अवसर पर जब मैं डेक पर बजते हुए ऐसे गाने सुनता हूँ जो कि शिव जी की स्तुति नहीं बल्कि निंदा मात्र हैं तो मेरे मन में यह अहसास पैदा होता है क्योंकि शिव जी से मेरा ख़ास ताल्लुक़ है।
आप क्या महसूस करते हैं, ज़रा उपरोक्त तथ्यों की रौशनी में सोचकर बताएँ ?
आज महाशिव रात्रि है । लोगों में अपने पूर्वजों के प्रति उत्साह और आस्था का एक अद्भुत जोश है जो कि एक बहुत अच्छी बात है लेकिन इस अवसर पर हमें अपने पूर्वजों की भाँति ज्ञान से भी युक्त होना चाहिए और सोचना चाहिए कि जो बातें हम अपने माता-पिता के बारे में नहीं कह सकते उससे भी ज्यादा बुरी बातें हम अपने आदि पिता शिव जी और आदि माता पार्वती जी के बारे में कैसे कह सकते हैं ?
हम कैसे मान सकते हैं कि वे कभी किसी राक्षस भस्मासुर से डर कर भाग सकते हैं ?
न तो श्रीलंका में आज किसी को राक्षस मिले , न ही पाताल लोक अर्थात अमेरिका में कोई वासुक़ि जैसे साइज़ का साँप मिला और न ही पूरी ज़मीन पर कोई दूध का सागर ही मिला । इसलिए न कभी समुद्र मंथन हुआ और न कोई ज़हर ही निकला , जिसे शिव जी को पीकर मौत के डर से उसे अपने गले में रोकना पड़ा हो।
इस तरह की बातें बुद्धिजीवियों को सच्चाई से दूर लगती हैं और फिर वे यह समझने लगते हैं कि जैसे यह कहानी काल्पनिक है ऐसे ही शिव जी भी काल्पनिक होंगे और फिर वे कहते हैं कि ईश्वर मनुष्य के मन की कल्पना मात्र है। इस प्रकार काल्पनिक कथाएँ लोगों को अपने पूर्वजों से भी दूर करती हैं और उन्हें नास्तिक भी बनाती हैं ।
हमें सोचना चाहिए कि अगर आज हम यहाँ हैं तो कभी हमारे पूर्वज भी ज़रूर ही रहे होंगे और जब हम इस गए गुज़री हालत में भी नैतिक नियमों के पालन की कोशिश करते हैं तो निश्चय ही हमारे पूर्वजों ने इनका पालन हमसे बढ़कर किया होगा क्योंकि ये नैतिक नियम हमने नहीं बनाए हैं बल्कि ये हमें पहले से चलते हुए और समाज में स्थापित मिले हैं।
विज्ञान की बड़ी से बड़ी खोज से भी बड़ी खोज है 'नैतिक नियमों की खोज' और यह खोज किसी आधुनिक वैज्ञानिक या समाज शास्त्री ने नहीं की बल्कि इनकी खोज करने वाले थे हमारे पूर्वज । इन्हीं नैतिक नियमों की वजह से जानवर और इंसान में फर्क पैदा होता है । जानवर माँ और पत्नी के दरमियान अंतर नहीं कर सकते लेकिन इंसान कर सकता है । हमारे पूर्वजों ने हमें जानवर से इंसान बनने का मार्ग दिखाया । उन्होंने ही हमें रिश्तों का ज्ञान और उनसे मुहब्बत की दौलत दी है और यह रुपए-पैसों से बड़ी दौलत है । जिन पूर्वजों ने हमें इतना कुछ दिया है , हमने उन्हें क्या दिया ?
क्या हम ढंग से उनकी तारीफ़ भी नहीं कर सकते ?
महाशिव रात्रि के अवसर पर जब मैं डेक पर बजते हुए ऐसे गाने सुनता हूँ जो कि शिव जी की स्तुति नहीं बल्कि निंदा मात्र हैं तो मेरे मन में यह अहसास पैदा होता है क्योंकि शिव जी से मेरा ख़ास ताल्लुक़ है।
आप क्या महसूस करते हैं, ज़रा उपरोक्त तथ्यों की रौशनी में सोचकर बताएँ ?
Tuesday, February 15, 2011
हज़रत मुहम्मद साहब स. का आदर्श और विश्व शांति Islam the peace
सच्चे दीन-धर्म का सच्चा बोध
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. इंसानियत पर अहसान करने वालों में सबसे बढ़कर हैं। इंसानियत पर उनके जो अहसान हैं, उन्हें वह कभी भुला नहीं सकती। उन्होंने इंसानियत को भूला हुआ सबक़ याद दिलाया, एक ऐसे वक्त में जबकि दुनिया अपने पालनहार को लगभग भुला चुकी थी या फिर ईश्वर में विश्वास रखने के नाम पर वह तरह तरह के अंधविश्वासों में जकड़ी हुई थी। धर्म का रूप विकृत हो चुका था। धर्म लोगों के जीवन में एक व्यवहार की तरह बाक़ी नहीं बचा था। मात्र कर्मकांड को अंजाम देना, उपासना करना और सभ्य जीवन को छोड़कर एकांतिक साधनाएं करने का नाम धर्म समझा जाने लगा था। ईश्वर के बारे में तरह तरह की कल्पनाएं लोगों के मन में जड़ें जमा चुकी थीं। ईश्वर में भी लोग
खाने-पीने, सोने-जागने, लड़ने-डरने और मौत के डर से मैदान छोड़कर भागने जैसे गुण ही नहीं बल्कि औरतों के साथ मैथुन करने और अपनी संतान के लिए अन्याय करने जैसे गुण भी मानते थे। ईश्वर के बारे में अन्याय और पक्षपात करने जैसी बातें मानने का लाज़िमी नतीजा यही था कि जो पुरोहित खुद को ईश्वर के प्रतिनिधि के तौर पर पेश कर रहे थे और समाज के पेशवा बने बैठे थे, वे खुद अन्याय और पक्षपात कर रहे थे और वास्तव में उन्होंने ईश्वर और उसके संदेशवाहकों के बारे में ऐसी कहानियों को रिवाज ही इसलिए दिया था कि वे समाज के सामने अपने अन्याय और पक्षपात को न्याय और धर्म सिद्ध करके उनका शोषण निर्बाध रूप से कर सकें। ऐसा किसी एक मुल्क में नहीं था बल्कि पूरी दुनिया का हाल यही था जबकि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने उस सच्चे दीन-धर्म को याद दिलाना शुरू किया जिसे हर इलाक़े के इंसानों ने भुला दिया था। ईश्वर, उसकी वाणी, उसका धर्म और उसके संदेशवाहकों के बारे में इंसानियत के पास उस समय शुद्ध ज्ञान का घोर अभाव था। उन्होंने लोगों के अंदर ईश्वर और उसके धर्म का सही बोध जगाने की कोशिश की और मालिक की अपार दया से वे इस कठिन काम में कामयाब भी रहे।
परलोक है इंसान की असल मंज़िल
उन्होंने इंसान की व्यक्तिगत और सामूहिक ज़िंदगी के हरेक पहलू का सुधार किया और उन सभी को ऐसी बुनियादों पर तामीर किया जिससे इंसान दुनिया की ज़िंदगी के साथ परलोक की ज़िंदगी में भी सफल हो सके। परलोक, वह शाश्वत लोक जिसके लिए कि वास्तव में इंसान को रचा गया है और इंसान अपनी उस असल मंज़िल को ही भुला बैठा। सिर्फ़ पैग़म्बरे इस्लाम की मुबारक हस्ती ही थी जिसने अपने समाज को अपनी ज़िंदगी में ही पूरी तरह बदल कर एक ऐसी नस्ल उठाई जिसने पूरी मानव जाति के नज़रिये को ही बदल कर रख दिया। उनके ही प्रभाव की वजह से मानव जाति के ज्ञात इतिहास में पहली बार मानवीय एकत्व, बराबरी और सम्मान जैसे मूल्यों का समाज में रिवाज हो सका। इन मूल्यों पर उन्होंने इतना ज़ोर दिया कि उनके अनुयायियों के ही नहीं बल्कि उनके प्रभाव में आने वाली सारी इंसानियत के चिंतन का यह अटूट हिस्सा बन गया।
उनकी शख्सियत का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों की महज़ ज़बानी तालीम ही नहीं दी बल्कि उसके मुताबिक़ अमल करके भी दुनिया के सामने एक व्यवहारिक आदर्श क़ायम किया। इस वक्त दुनिया में जहां भी मानवीय मूल्य और मानवाधिकार सुरक्षित हैं , वह सब पैग़म्बर स. की तालीम का ही असर है।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब का सबसे बड़ा चमत्कार
चमत्कार को नमस्कार करने वाली दुनिया यह देख सकती है कि यह सब कारनामे उस शख्स ने किये हैं जो बचपन में ही अनाथ हो गया था, बचपन और जवानी की कठिनाईयों से संघर्ष में उन्हें किसी से पढ़ने का अवसर ही न मिला, जीवन का अक्सर हिस्सा ग़रीबों की सोहबत और गुरबत में बीता। वे अनपढ़ थे लेकिन लोगों के चेहरों से झलकने वाली पीड़ा को भी वे पढ़ना जानते थे और उस पीड़ा का अहसास भी वे अपने मन में पढ़ लेते थे जिसे ज़माना अपनी जहालत और गुटबाज़ी की वजह से भोग रहा था। इसका सबसे ज़्यादा शिकार पूरी दुनिया में ग़रीब और कमज़ोर तबक़ा हो रहा था। अरब में भी ग़रीब लोग, गुलाम, औरतें और बच्चे जुल्म की चक्की में पिस रही थीं और उनकी मुक्ति का कोई उपाय किसी अक्ल को सुझाई न देता था। कन्या को पैदा होते ही मार देना वहां आम रिवाज था। व्यक्तिगत सोच की उस क़बीलाई समाज में कोई गुंजाइश ही न थी। एक क़बीला अपने आदमी की हत्या का बदला लेने के लिए दूसरे क़बीले के किसी भी आदमी को मार डालता था और फिर इंतक़ाम का यह सिलसिला कभी बंद नहीं होता था। कई बार तो क़बीले यह तक भूल जाते थे कि यह सिलसिला शुरू किस घटना से हुआ था। उन्हें याद रहता तो बस सिर्फ़ इंतक़ाम। ऐसे ही हालात ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के दिल को तड़पा दिया था और वे घर से अलग होकर मक्का से बाहर एक गुफ़ा ‘हिरा‘ में तन्हाई में बैठे तड़पा करते थे कि इंसानियत का दुख-दर्द दूर कैसे हो ?
उद्धार के लिए ‘अनुपम ज्ञान‘ का अवतरण
तब उनकी तड़प देखकर दयालु पालनहार प्रभु ने उनके अंतःकरण पर अपना ‘ज्ञान‘ अवतरित किया। ऐसा ज्ञान जिसे बनाना किसी अनपढ़ आदमी के तो क्या किसी बड़े से बड़े पढ़े-लिखे आदमी के बस की भी बात नहीं है। सिर्फ़ एक पढ़ा-लिखा आदमी ही नहीं बल्कि विद्वानों की एक पूरी सभा मिलकर भी ‘कुरआन‘ जैसा ज्ञान नहीं बना सकती। पूरी दुनिया के विद्वान मिलकर भी कुरआन जैसी बात कभी न कह सके हैं और न ही आज कह सकते हैं और यह चैलेंज कुरआन के मानने वाले अब नहीं करते बल्कि अपने अवतरण काल से ही यह चैलेंज खुद कुरआन करता है।
आज भी जब किसी देश का संविधान बनाया जाता है तो एक पूरी सभा मिलकर उस संविधान को बनाती है और फिर गुज़रता हुआ वक्त उन्हें उस संविधान के मौलिक सिद्धांतों तक में तब्दीली करने पर मजबूर करता रहता है। बदलते हुए राजनीतिक परिवर्तन भी उन्हें पलटकर रख देते हैं लेकिन इस्लामी क़ानून जिन्हें हज़रत मुहम्मद स. ने अपने मालिक की ओर दुनिया को दिया वह उन प्राकृतिक नियमों ही हिस्सा हैं जो कि खुद इंसानी स्वभाव है, जिसे न कोई दार्शनिक बदल सकता है और न ही कोई राजनीतिक प्रभाव। हरेक दबाव में रहने के बावजूद इंसानियत जैसे ही उन दबावों से मुक्त होकर विचार करेगी तो उसके अंदर से जो मांग उठेगी उसे इस्लामी क़ानून के अलावा किसी अन्य चीज़ से पूरा करना संभव ही नहीं है।
जिन जिन देशों में ऊंचनीच को दार्शनिक पुट देकर सभ्यता का अंग बना दिया गया था और हज़ारों साल तक इंसानियत के अवचेतन तक में उसे बिठा दिया गया, उन देशों में भी जब इंसानियत को सोचने और करने की ज़रा सी आज़ादी मिली तो उन्होंने तुरंत ऊंचनीच के उस सिस्टम पर लात मारकर बराबरी के उसूल को कुबूल कर लिया और फिर बाद में ऊंचनीच के अलम्बरदारों ने भी ऊंचनीच और छूतछात के अमानवीय उसूलों को खुद ही मजबूर होकर कैंसिल कर दिया क्योंकि आज कहीं भी उन उसूलों की पूछ नहीं है बल्कि जो कोई उन उसूलों की तालीम देने की कोशिश करेगा, विश्व भर के सभ्य समाज में ज़लील माना जाएगा। ज़िल्लत के डर से , लोगों द्वारा त्याग दिये जाने और पिछड़ जाने के डर से अपने दर्शन के मौलिक सिद्धांतों को तिलांजलि देकर इस्लाम के उसूलों को अपनाने पर उन्हें मजबूर होना पड़ा। ऐसा क़ायदा-क़ानून एक अनपढ़ व्यक्ति ने दिया है, क्या यह चमत्कार नहीं है ?
क्या यह काफ़ी नहीं है कि आदमी जान ले कि इस्लाम मुहम्मद साहब की देन नहीं है बल्कि दयालु पालनहार की देन है। इस्लाम पालनहार का मानव जाति पर एक महान उपकार है और यह पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के माध्यम से मिला। हज़रत मुहम्मद स. ने इस्लाम के अनुसार व्यवहार करके मानव जाति के हरेक संशय का निराकरण कर दिया है।
पूर्व ज्ञान और पूर्व काल के ऋषियों की पुष्टि कुरआन से
मानव जाति के महान सुधारक और शिक्षक का शिक्षक खुद पालनहार प्रभु है जो सर्वज्ञ है और जिसके सामने हरेक काल की हरेक घटना बिल्कुल स्पष्ट है। उसी ने उनके अंतःकरण पर कुरआन अवतरित किया और कुरआन को भी उसने सदा के लिए सुरक्षित कर दिया है। न तो मुहम्मद साहब स. अपने से पूर्व आने वाले ऋषियों-नबियों का खंडन करते हैं और न ही कुरआन अपने से पूर्व आ चुके ईशवाणी के संस्करणों को ही नकारता है बल्कि इसके विपरीत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. अपने से पूर्व आने वाले तमाम ऋषियों और नबियों की पुष्टि और समर्थन करते हैं और कहते हैं कि उनका आगमन भी उनकी भविष्यवाणी को ही पूरा करता है और वे कोई नया धर्म नहीं सिखा रहे हैं बल्कि वे ‘दीने क़य्यिम‘ अर्थात सनातन धर्म की ही पुनस्र्थापना कर रहे हैं। कुरआन भी जगह-जगह अपने पूर्व अवतरित ईशवाणी के सभी संस्करणों की पुष्टि करता है और कहता है जो ‘ज्ञान‘ ईश्वर की ओर से मानव जाति को पहले मिल चुका है उसके सिद्धांतों को सामने रखकर मुझे परख लीजिए, आपको कोई भी मौलिक अंतर हरगिज़ न मिलेगा।
इस खुली हक़ीक़त के बावजूद कुरआन, इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम पर बेबुनियाद आरोप लगाने में प्रपंची लोग कोई झिझक महसूस नहीं करते। इसका नुक्सान सिर्फ़ मुसलमानों को ही नहीं बल्कि सारी इंसानियत को पहुंचता है क्योंकि पैग़म्बर साहब स. की शिक्षा से हटने के बाद कुछ भी करना सिर्फ़ और सिर्फ़ गुमराही है। इसे जब चाहे और जो चाहे आज़मा सकता है। उनका वुजूद सारी दुनिया के लिए रहमत है क्योंकि उनसे जुड़ने के बाद ही इंसान को सही-ग़लत और जायज़-नाजायज़ का इल्म हासिल हो सकता है जो कि इंसान होने की बुनियादी शर्त है। इंसान को इंसानियत की बुनियाद उपलब्ध कराने वाले आज अगर कोई हैं तो वह केवल पैग़म्बरे इस्लाम स. हैं। यह एक हक़ीक़त भी और दावा और चैलेंज भी। (अलकुरआन, अलअंबिया, 107)
‘ज्ञान‘ का महत्व
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. पर ईश्वरीय प्रकाशना की शुरूआत ‘इक़रा‘ शब्द से हुआ। उन्होंने ज्ञान पाने पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया और सिर्फ़ कुरआन का ही ज्ञान नहीं बल्कि हर वह ज्ञान और कला जो समाज और सभ्यता के लिए नफ़ाबख्श हो। उन्होंने एक बार फ़रमाया-
‘उत्लुबुल इल्मु वलौ काना बिस्सीन‘ (अलहदीस)
‘इल्म हासिल करो चाहे चीन ही क्यों न जाना पड़े।‘
ज़ाहिर है कि चीन में कुरआन और शरीअत का तो इल्म नहीं था लेकिन काग़ज़ आदि बनाने की कई ज़रूरी कलाओं को चीन से सीखा जा सकता था जो कि इल्म को सुरक्षित रखने और उसे फैलाने में अहम रोल अदा कर सकती थीं और उन्होंने अपना अहम रोल अदा किया भी।
इस हदीस से जहां यह पता चलता है कि उन्होंने इल्म हासिल करने पर कितना ज़ोर दिया वहीं यह भी पता चलता है कि उनकी नज़र में हरेक नफ़ाबख्श इल्म हासिल करने के लायक़ था और दीन के मुताबिक़ जायज़ था। उन्होंने इल्म को ‘दीनी इल्म‘ और ‘दुनियावी इल्म‘ के टुकड़ों में तक़सीम नहीं किया था जैसा कि आज के दीनदार कहलाने वाले लोग कर चुके हैं। उनकी नज़र अरब क़ौम को किसी ग़ैर अरब क़ौम पर भी श्रेष्ठता प्राप्त नहीं थी, यह भी इसी हदीस से पता चलता है। अहंकार का पहला नुक्सान यह होता है कि आदमी अपनी क़ौम को सबसे श्रेष्ठ मानकर यह समझने लगता है कि उसकी क़ौम के अलावा दूसरी तमाम क़ौमें घटिया हैं और जो कुछ उनके पास है वह भी घटिया है, हम श्रेष्ठ हैं, हमें किसी घटिया क़ौम से घटिया चीज़ें सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है। इस तरह अहंकार ज्ञान पाने से रोकता है और इंसानियत को नुक्सान पहुंचाता है। इसके विपरीत ज्ञान अहंकार को मिटा डालता है और इंसानियत का कल्याण करता है। दोनों चीज़ें एक साथ एक दिल में जमा नहीं हो सकतीं।
अहंकार बाधक है सत्य अपनाने में
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई को मानने से जो चीज़ रोकती है वह भी केवल अहंकार है वर्ना तो आदमी अगर एक नज़र उनके सुधार कार्यों पर डाल ले तो वह उनकी सच्चाई का क़ायल हो जाता है। उन्होंने लोगों को गुलाम आज़ाद करने की प्रेरणा दी और लोगों ने गुलाम आज़ाद करने शुरू किए और बहुत थोड़े ही अर्से में गुलाम आज़ाद भी हो गए और उनका पुनर्वास भी इस तरह हो गया कि वे बराबरी के दर्जे के साथ उसी समाज का अंग बन गए। उन्होंने नशा छोड़ने का हुक्म दिया और तमाम देहातों और नगरों के लोगों ने अपनी शराब नाली में बहा दी। उन्होंने कन्या की हत्या से रूकने का हुक्म दिया और लोग रूक गए। न सिर्फ़ उनके ज़माने के अनुयायी रूक गए बल्कि उनके बाद के ज़मानों के अनुयायी आज तक इस घिनौने जुर्म से रूके हुए हैं, जिससे आज हुकूमत भी लोगों को रोक पाने में नाकाम है।
पैग़म्बर साहब स. के सुधार कार्य
मुसलमानों की इल्म और अमल की तमाम कमज़ारियों के बावजूद भी मुस्लिम समाज में कन्या भ्रूण हत्या शून्य है तो यह केवल पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षाओं का ही प्रभाव है।
उन्होंने लोगों से कहा कि वे क़र्ज़दारों पर अपना ब्याज माफ़ कर दें, उन्हें बिना ब्याज के क़र्ज़ दें और मालदार लोग सदक़ा-फितरा आदि दान के अलावा ज़रूरतमंदों को अपने बढ़ने वाले माल का 2.5 प्रतिशत हिस्सा उनके कल्याण के लिए दें बिना यह सोचे कि उनसे किसी भी तरह का कोई बदला या फ़ायदा उठाया जाए। लोगों ने ऐसा किया तो समाज के हरेक सदस्य की बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति यक़ीनी हो गई। आज भी अगर लोग ईमानदार हो जाएं और उस समाज की तरह कालाबाज़ारी, जमाख़ोरी और मिलावट छोड़ दें, सूद-ब्याज लेना छोड़ दें और अपने बढ़ने वाले माल का 2.5 प्रतिशत समाज के ज़रूरतमंदों को देने लगें तो समाज से गुरबत और शोषण का सफ़ाया हो जाएगा बिना किसी आंदोलन और बिना किसी क्रांति के। आज दुनिया में अगर ये समस्याएं मौजूद हैं तो केवल इसलिए कि अहंकार और अज्ञान के कारण इंसानियत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षाओं का पालन अपने लिए अनिवार्य नहीं मानती हालांकि वह उन्हें एक महान सुधारक भी मानती है।
उनके आगमन से पहले दुनिया की अक्सर क़ौमें सांप्रदायिकता और धड़ेबंदी की शिकार थी और एक दूसरे का खून बहाना उनके लिए गर्व की बात थी। अरब के क़बीले भी दुनिया की दूसरी क़ौमों की तरह आपस में एक दूसरे का खून बहा रहे थे। उनकी शिक्षा के कारण वह सब खून-ख़राबा बंद हुआ और उसका असर पूरी दुनिया तक पहुंचा।
मानव जाति के उनके उपकारों में से एक यह भी है उन्होंने इस्लाम के आह्वान के बावजूद अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले हरेक मत के लोगों को यह आज़ादी दी कि वे अपने मत पर भी क़ायम रह सकते हैं और अपनी मज़हबी रस्मों को भी अंजाम दे सकते हैं। उनका मत कुछ भी हो लेकिन वे बाहरी हमलावर को एक साझा दुश्मन समझें और सभी लोग एकता के साथ उनका मुक़ाबला करें। इस संधि को ‘मीसाक़े मदीना‘ के नाम से जाना जाता है।
विश्व शांति केवल इस्लाम से
यह सिद्धांत आज भी दुनिया के सामने एक आदर्श है। इसका उद्देश्य भी शांति ही था। इस्लाम केवल शांति है और शांति दुनिया में केवल इस्लाम के उसूलों से ही आ सकती है। इस्लाम केवल व्यक्तिगत शांति की बात नहीं करता बल्कि वह व्यक्तिगत शांति के साथ सामूहिक शांति की बात भी करता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने केवल शांति की बात ही नहीं की बल्कि उन कारणों को भी बताया जिनकी वजह से समाज में ग़रीब और अमीर तबक़ों के दरमियान फ़ासला और नफ़रत दोनों ही बढ़ते हैं। जिनकी वजह से समाज के लड़के और लड़कियों के विवाह देर से होते हैं वे बेचैन और अशांत रहते हैं। ग़र्ज़ यह कि अशांति कि जितने भी रूप और कारण हो सकते थे, उन्होंने उन सबकी निशानदेही भी की और उनका निवारण करके समाज में शांति स्थापित भी की और उन उसूलों पर चलकर आज भी विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है।
आज भी विश्व में जहां भी शांति की कोई भी गंभीर कोशिश चल रही है, आप उसे ग़ौर से देखिए और उसके सिद्धांतों को देखिए, वहां आपको इस्लामी सिद्धांत ही नज़र आएंगे।
पैग़म्बरे इस्लाम स. की विजय की अस्ल ताक़त उनका नज़रिया, उनके उसूल, उनका चरित्र और उनका व्यवहार था। वे इंसान को हर हाल में एक इंसान मानते थे और उसे हर हाल में एक इंसान का सम्मान देते थे चाहे वह इंसान मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम, चाहे ज़िंदा हो या फिर मुर्दा।
पैग़म्बर साहब स. अगर किसी ग़ैर मुस्लिम (यहूदी) का जनाज़ा भी पास से गुज़रते हुए देखते तो खड़े हो जाते थे। इस पर उनके सत्संगी साथी उनसे पूछते थे कि तो आप कहते थे कि ‘क्या यह इंसान नहीं है ?‘ (बुख़ारी)
पैग़म्बरे इस्लाम स. की शिक्षाएं
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षा यह है कि
‘ऐ लोगो ! तुम्हारा रब पालनहार एक है और तुम्हारा बाप भी एक है। तुम सब आदम की औलाद हो और आदम मिट्टी से बने थे। अल्लाह के नज़्दीक तुम में सबसे ज़्यादा प्रतिष्ठित वह है जो तुम में सबसे ज़्यादा जुर्म और पाप से बचने वाला है। किसी अरबी को किसी ग़ैर अरबी पर, किसी गोरे को काले पर बड़ाई हासिल नहीं। बड़ाई सिर्फ़ अल्लाह से डरने के सबब है। यही बड़ाई का पैमाना है, कसौटी है।‘
‘सारी मख्लूक अल्लाह का कुन्बा है, बस तुम में सबसे अच्छा वह है जो अल्लाह के कुन्बे के साथ अच्छा सुलूक करे।‘
‘ख़बरदार, जुल्म न करना, ख़बरदार जुल्म न करना। मेरे बाद मुन्किर न हो जाना कि एक दूसरे की गर्दनें मारने लगो। कोई भी समुदाय सत्य के मार्ग पर रहने के बाद गुमराह हुई है तो उसका सबब यह है कि वे आपस में लड़ बैठे। मुसलमान वह है जिसकी ज़बान और हाथ की तकलीफ़ से लोग महफ़ूज़ रहें। क़ियामत के रोज़ मेरी नज़र में सबसे ज़्यादा प्यारे और मेरे सबसे ज़्यादा क़रीब वह शख्स होगा जिसके अख़लाक़ सबसे अच्छे होंगे। अल्लाह ने मुझे बेहतरीन अख़लाक़ और बेहतरीन आमाल की तकमील के लिए भेजा है। एक मीठा बोल और किसी बात को दरगुज़र कर देना उस सदक़ा और ख़ैरात से बेहतर है जिसके पीछे दुख देना हो। ऐ ईमान वालो, न तो मर्द ही मर्दों का मज़ाक़ उडाएं, मुमकिन है कि वे उनसे बेहतर हों और न ही औरतें औरतों का मज़ाक़ उड़ाएं। हो सकता है कि वे उनसे बेहतर हों और न अपनों पर व्यंग्य करो और न ही एक दूसरे को बुरी उपाधि से पुकारो। बदगुमानी से बचो क्योंकि बाज़ गुमान गुनाह होते हैं और न किसी की टोह में रहो और न ही तुम में से कोई किसी की पीठ पीछे बुराई करे। क्या तुम में से कोई यह बात पसंद करेगा कि अपने मुर्दा भाई का मांस खाए ? तुम उससे नफ़रत करोगे। अल्लाह से डरते रहो और अल्लाह तौबा कुबूल करने वाला है। वादा पूरा करो। क़ियामत के दिन वादे के बारे में लाज़िमी तौर पर पूछा जाएगा। जो कोई अल्लाह और परलोक पर यक़ीन रखता है, वह अपने पड़ोसी को तकलीफ़ न पहुंचाए। खुदा की क़सम वह मोमिन नहीं जिसका पड़ोसी उसके शर से महफ़ूज़ न हो। अल्लाह को यह बात सख्त नापसंद है और वह मोमिन नहीं, जो खुद तो पेट भर कर खाए और उसका पड़ोसी भूखा सो जाए।‘
आज दुनिया में कोई आदमी ऐसा नहीं है जो यह कहे कि उसे इस तालीम की ज़रूरत नहीं है। कोई भी आदमी इस शिक्षा से अच्छी शिक्षा ला नहीं सकता और न ही आज इस शिक्षा को नज़रअंदाज़ करके वह सभ्य समाज में कोई इज़्ज़त ही पा सकता है। दूसरों से ज़्यादा आज खुद मुस्लिम समाज को इस बात की बेहद ज़रूरत है कि वह खुद को पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की तालीम की रौशनी में जांचे और देखे कि उसके पड़ोसी को उससे कोई तकलीफ़ तो नहीं पहुंच रही है। वह इस बात का कितना ध्यान रखता है कि उसके पड़ोस में कोई भूखा, बीमार और परेशान तो नहीं है।
समाज में किसकी प्रतिष्ठा होती है और क्यों ?
याद रखिए, यह समाज उपयोगिता के सिद्धांत पर ही चलता है। अगर आप अपने आस पास के लोगों की तकलीफ़ें दूर करने के लिए भागदौड़ करते हैं, उनकी बीमारी और उनकी मौत के वक्त आप उन्हें सहारा देते हैं तो फिर उनके दिलों में आपके लिए सम्मान पैदा होने से दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती। अगर आपका अख़लाक़ अच्छा है तो फिर लोग खुद ब खुद आपको अच्छा समझेंगे और आपको इज़्ज़त देंगे, आप पर विश्वास करेंगे और अपने अहम कामों में आपको अपना राज़दार बनाएंगे। आपकी नेकी आपको दुनिया में इज़्ज़त दिलाएगी, आपकी साख बनाएगी, आपकी साख आपके लिए समृद्धि का द्वार खोल देगी। एक व्यापारी अपनी साख का ख़याल सबसे ज़्यादा रखता है। उसकी सारी समृद्धि का दारोमदार उसकी साख पर ही होता है।
अगर आज मुसलामान की साख पर सवालिया निशान लगते हैं तो उसका कारण यह नहीं है कि वह इस्लाम पर चलता है बल्कि इसका कारण यह है कि वह इस्लाम पर ठीक से नहीं चलता है। कुरआन पढ़ने और समझने से जी चुराना, उसके हुक्म को नज़रअंदाज़ करके अपनी ख्वाहिश और समाज की रस्मों के मुताबिक़ जीना, ज़कात अदा न करना, औरतों को विरासत में हिस्सा न देना, दहेज लेना और दिखावे और शान के लिए दिलेरी के साथ गुनाह करना आज अक्सर मुसलमानों का अमल है। धड़ेबंदी करना और खून बहाना भी मुसलमानों में देखा जा सकता है। ये तमाम बातें वे हैं जिनसे पैग़म्बरे इस्लाम ने रोका है। मुसलमान वह है जो उन कामों से रूक जाए जिन कामों से पैग़म्बरे इस्लाम स. ने रूकने के लिए कहा है। इस ज़मीन पर शांति की स्थापना के लिए ऐसा करना निहायत ज़रूरी है। मुसलमान ऐसा करेंगे तो उनका आचरण उन लोगों के लिए भी प्रेरणा बनेगा जो कि शांति के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं, जो कि जीवन के उद्देश्य के बारे में सोचते हैं कि जीवन क्यों है और कौन सा मार्ग है जो उन्हें उनकी असल मंज़िल तक पहुंचा सकता है ?
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. इंसानियत पर अहसान करने वालों में सबसे बढ़कर हैं। इंसानियत पर उनके जो अहसान हैं, उन्हें वह कभी भुला नहीं सकती। उन्होंने इंसानियत को भूला हुआ सबक़ याद दिलाया, एक ऐसे वक्त में जबकि दुनिया अपने पालनहार को लगभग भुला चुकी थी या फिर ईश्वर में विश्वास रखने के नाम पर वह तरह तरह के अंधविश्वासों में जकड़ी हुई थी। धर्म का रूप विकृत हो चुका था। धर्म लोगों के जीवन में एक व्यवहार की तरह बाक़ी नहीं बचा था। मात्र कर्मकांड को अंजाम देना, उपासना करना और सभ्य जीवन को छोड़कर एकांतिक साधनाएं करने का नाम धर्म समझा जाने लगा था। ईश्वर के बारे में तरह तरह की कल्पनाएं लोगों के मन में जड़ें जमा चुकी थीं। ईश्वर में भी लोग
खाने-पीने, सोने-जागने, लड़ने-डरने और मौत के डर से मैदान छोड़कर भागने जैसे गुण ही नहीं बल्कि औरतों के साथ मैथुन करने और अपनी संतान के लिए अन्याय करने जैसे गुण भी मानते थे। ईश्वर के बारे में अन्याय और पक्षपात करने जैसी बातें मानने का लाज़िमी नतीजा यही था कि जो पुरोहित खुद को ईश्वर के प्रतिनिधि के तौर पर पेश कर रहे थे और समाज के पेशवा बने बैठे थे, वे खुद अन्याय और पक्षपात कर रहे थे और वास्तव में उन्होंने ईश्वर और उसके संदेशवाहकों के बारे में ऐसी कहानियों को रिवाज ही इसलिए दिया था कि वे समाज के सामने अपने अन्याय और पक्षपात को न्याय और धर्म सिद्ध करके उनका शोषण निर्बाध रूप से कर सकें। ऐसा किसी एक मुल्क में नहीं था बल्कि पूरी दुनिया का हाल यही था जबकि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने उस सच्चे दीन-धर्म को याद दिलाना शुरू किया जिसे हर इलाक़े के इंसानों ने भुला दिया था। ईश्वर, उसकी वाणी, उसका धर्म और उसके संदेशवाहकों के बारे में इंसानियत के पास उस समय शुद्ध ज्ञान का घोर अभाव था। उन्होंने लोगों के अंदर ईश्वर और उसके धर्म का सही बोध जगाने की कोशिश की और मालिक की अपार दया से वे इस कठिन काम में कामयाब भी रहे।
परलोक है इंसान की असल मंज़िल
उन्होंने इंसान की व्यक्तिगत और सामूहिक ज़िंदगी के हरेक पहलू का सुधार किया और उन सभी को ऐसी बुनियादों पर तामीर किया जिससे इंसान दुनिया की ज़िंदगी के साथ परलोक की ज़िंदगी में भी सफल हो सके। परलोक, वह शाश्वत लोक जिसके लिए कि वास्तव में इंसान को रचा गया है और इंसान अपनी उस असल मंज़िल को ही भुला बैठा। सिर्फ़ पैग़म्बरे इस्लाम की मुबारक हस्ती ही थी जिसने अपने समाज को अपनी ज़िंदगी में ही पूरी तरह बदल कर एक ऐसी नस्ल उठाई जिसने पूरी मानव जाति के नज़रिये को ही बदल कर रख दिया। उनके ही प्रभाव की वजह से मानव जाति के ज्ञात इतिहास में पहली बार मानवीय एकत्व, बराबरी और सम्मान जैसे मूल्यों का समाज में रिवाज हो सका। इन मूल्यों पर उन्होंने इतना ज़ोर दिया कि उनके अनुयायियों के ही नहीं बल्कि उनके प्रभाव में आने वाली सारी इंसानियत के चिंतन का यह अटूट हिस्सा बन गया।
उनकी शख्सियत का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों की महज़ ज़बानी तालीम ही नहीं दी बल्कि उसके मुताबिक़ अमल करके भी दुनिया के सामने एक व्यवहारिक आदर्श क़ायम किया। इस वक्त दुनिया में जहां भी मानवीय मूल्य और मानवाधिकार सुरक्षित हैं , वह सब पैग़म्बर स. की तालीम का ही असर है।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब का सबसे बड़ा चमत्कार
चमत्कार को नमस्कार करने वाली दुनिया यह देख सकती है कि यह सब कारनामे उस शख्स ने किये हैं जो बचपन में ही अनाथ हो गया था, बचपन और जवानी की कठिनाईयों से संघर्ष में उन्हें किसी से पढ़ने का अवसर ही न मिला, जीवन का अक्सर हिस्सा ग़रीबों की सोहबत और गुरबत में बीता। वे अनपढ़ थे लेकिन लोगों के चेहरों से झलकने वाली पीड़ा को भी वे पढ़ना जानते थे और उस पीड़ा का अहसास भी वे अपने मन में पढ़ लेते थे जिसे ज़माना अपनी जहालत और गुटबाज़ी की वजह से भोग रहा था। इसका सबसे ज़्यादा शिकार पूरी दुनिया में ग़रीब और कमज़ोर तबक़ा हो रहा था। अरब में भी ग़रीब लोग, गुलाम, औरतें और बच्चे जुल्म की चक्की में पिस रही थीं और उनकी मुक्ति का कोई उपाय किसी अक्ल को सुझाई न देता था। कन्या को पैदा होते ही मार देना वहां आम रिवाज था। व्यक्तिगत सोच की उस क़बीलाई समाज में कोई गुंजाइश ही न थी। एक क़बीला अपने आदमी की हत्या का बदला लेने के लिए दूसरे क़बीले के किसी भी आदमी को मार डालता था और फिर इंतक़ाम का यह सिलसिला कभी बंद नहीं होता था। कई बार तो क़बीले यह तक भूल जाते थे कि यह सिलसिला शुरू किस घटना से हुआ था। उन्हें याद रहता तो बस सिर्फ़ इंतक़ाम। ऐसे ही हालात ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के दिल को तड़पा दिया था और वे घर से अलग होकर मक्का से बाहर एक गुफ़ा ‘हिरा‘ में तन्हाई में बैठे तड़पा करते थे कि इंसानियत का दुख-दर्द दूर कैसे हो ?
उद्धार के लिए ‘अनुपम ज्ञान‘ का अवतरण
तब उनकी तड़प देखकर दयालु पालनहार प्रभु ने उनके अंतःकरण पर अपना ‘ज्ञान‘ अवतरित किया। ऐसा ज्ञान जिसे बनाना किसी अनपढ़ आदमी के तो क्या किसी बड़े से बड़े पढ़े-लिखे आदमी के बस की भी बात नहीं है। सिर्फ़ एक पढ़ा-लिखा आदमी ही नहीं बल्कि विद्वानों की एक पूरी सभा मिलकर भी ‘कुरआन‘ जैसा ज्ञान नहीं बना सकती। पूरी दुनिया के विद्वान मिलकर भी कुरआन जैसी बात कभी न कह सके हैं और न ही आज कह सकते हैं और यह चैलेंज कुरआन के मानने वाले अब नहीं करते बल्कि अपने अवतरण काल से ही यह चैलेंज खुद कुरआन करता है।
आज भी जब किसी देश का संविधान बनाया जाता है तो एक पूरी सभा मिलकर उस संविधान को बनाती है और फिर गुज़रता हुआ वक्त उन्हें उस संविधान के मौलिक सिद्धांतों तक में तब्दीली करने पर मजबूर करता रहता है। बदलते हुए राजनीतिक परिवर्तन भी उन्हें पलटकर रख देते हैं लेकिन इस्लामी क़ानून जिन्हें हज़रत मुहम्मद स. ने अपने मालिक की ओर दुनिया को दिया वह उन प्राकृतिक नियमों ही हिस्सा हैं जो कि खुद इंसानी स्वभाव है, जिसे न कोई दार्शनिक बदल सकता है और न ही कोई राजनीतिक प्रभाव। हरेक दबाव में रहने के बावजूद इंसानियत जैसे ही उन दबावों से मुक्त होकर विचार करेगी तो उसके अंदर से जो मांग उठेगी उसे इस्लामी क़ानून के अलावा किसी अन्य चीज़ से पूरा करना संभव ही नहीं है।
जिन जिन देशों में ऊंचनीच को दार्शनिक पुट देकर सभ्यता का अंग बना दिया गया था और हज़ारों साल तक इंसानियत के अवचेतन तक में उसे बिठा दिया गया, उन देशों में भी जब इंसानियत को सोचने और करने की ज़रा सी आज़ादी मिली तो उन्होंने तुरंत ऊंचनीच के उस सिस्टम पर लात मारकर बराबरी के उसूल को कुबूल कर लिया और फिर बाद में ऊंचनीच के अलम्बरदारों ने भी ऊंचनीच और छूतछात के अमानवीय उसूलों को खुद ही मजबूर होकर कैंसिल कर दिया क्योंकि आज कहीं भी उन उसूलों की पूछ नहीं है बल्कि जो कोई उन उसूलों की तालीम देने की कोशिश करेगा, विश्व भर के सभ्य समाज में ज़लील माना जाएगा। ज़िल्लत के डर से , लोगों द्वारा त्याग दिये जाने और पिछड़ जाने के डर से अपने दर्शन के मौलिक सिद्धांतों को तिलांजलि देकर इस्लाम के उसूलों को अपनाने पर उन्हें मजबूर होना पड़ा। ऐसा क़ायदा-क़ानून एक अनपढ़ व्यक्ति ने दिया है, क्या यह चमत्कार नहीं है ?
क्या यह काफ़ी नहीं है कि आदमी जान ले कि इस्लाम मुहम्मद साहब की देन नहीं है बल्कि दयालु पालनहार की देन है। इस्लाम पालनहार का मानव जाति पर एक महान उपकार है और यह पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के माध्यम से मिला। हज़रत मुहम्मद स. ने इस्लाम के अनुसार व्यवहार करके मानव जाति के हरेक संशय का निराकरण कर दिया है।
पूर्व ज्ञान और पूर्व काल के ऋषियों की पुष्टि कुरआन से
मानव जाति के महान सुधारक और शिक्षक का शिक्षक खुद पालनहार प्रभु है जो सर्वज्ञ है और जिसके सामने हरेक काल की हरेक घटना बिल्कुल स्पष्ट है। उसी ने उनके अंतःकरण पर कुरआन अवतरित किया और कुरआन को भी उसने सदा के लिए सुरक्षित कर दिया है। न तो मुहम्मद साहब स. अपने से पूर्व आने वाले ऋषियों-नबियों का खंडन करते हैं और न ही कुरआन अपने से पूर्व आ चुके ईशवाणी के संस्करणों को ही नकारता है बल्कि इसके विपरीत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. अपने से पूर्व आने वाले तमाम ऋषियों और नबियों की पुष्टि और समर्थन करते हैं और कहते हैं कि उनका आगमन भी उनकी भविष्यवाणी को ही पूरा करता है और वे कोई नया धर्म नहीं सिखा रहे हैं बल्कि वे ‘दीने क़य्यिम‘ अर्थात सनातन धर्म की ही पुनस्र्थापना कर रहे हैं। कुरआन भी जगह-जगह अपने पूर्व अवतरित ईशवाणी के सभी संस्करणों की पुष्टि करता है और कहता है जो ‘ज्ञान‘ ईश्वर की ओर से मानव जाति को पहले मिल चुका है उसके सिद्धांतों को सामने रखकर मुझे परख लीजिए, आपको कोई भी मौलिक अंतर हरगिज़ न मिलेगा।
इस खुली हक़ीक़त के बावजूद कुरआन, इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम पर बेबुनियाद आरोप लगाने में प्रपंची लोग कोई झिझक महसूस नहीं करते। इसका नुक्सान सिर्फ़ मुसलमानों को ही नहीं बल्कि सारी इंसानियत को पहुंचता है क्योंकि पैग़म्बर साहब स. की शिक्षा से हटने के बाद कुछ भी करना सिर्फ़ और सिर्फ़ गुमराही है। इसे जब चाहे और जो चाहे आज़मा सकता है। उनका वुजूद सारी दुनिया के लिए रहमत है क्योंकि उनसे जुड़ने के बाद ही इंसान को सही-ग़लत और जायज़-नाजायज़ का इल्म हासिल हो सकता है जो कि इंसान होने की बुनियादी शर्त है। इंसान को इंसानियत की बुनियाद उपलब्ध कराने वाले आज अगर कोई हैं तो वह केवल पैग़म्बरे इस्लाम स. हैं। यह एक हक़ीक़त भी और दावा और चैलेंज भी। (अलकुरआन, अलअंबिया, 107)
‘ज्ञान‘ का महत्व
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. पर ईश्वरीय प्रकाशना की शुरूआत ‘इक़रा‘ शब्द से हुआ। उन्होंने ज्ञान पाने पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया और सिर्फ़ कुरआन का ही ज्ञान नहीं बल्कि हर वह ज्ञान और कला जो समाज और सभ्यता के लिए नफ़ाबख्श हो। उन्होंने एक बार फ़रमाया-
‘उत्लुबुल इल्मु वलौ काना बिस्सीन‘ (अलहदीस)
‘इल्म हासिल करो चाहे चीन ही क्यों न जाना पड़े।‘
ज़ाहिर है कि चीन में कुरआन और शरीअत का तो इल्म नहीं था लेकिन काग़ज़ आदि बनाने की कई ज़रूरी कलाओं को चीन से सीखा जा सकता था जो कि इल्म को सुरक्षित रखने और उसे फैलाने में अहम रोल अदा कर सकती थीं और उन्होंने अपना अहम रोल अदा किया भी।
इस हदीस से जहां यह पता चलता है कि उन्होंने इल्म हासिल करने पर कितना ज़ोर दिया वहीं यह भी पता चलता है कि उनकी नज़र में हरेक नफ़ाबख्श इल्म हासिल करने के लायक़ था और दीन के मुताबिक़ जायज़ था। उन्होंने इल्म को ‘दीनी इल्म‘ और ‘दुनियावी इल्म‘ के टुकड़ों में तक़सीम नहीं किया था जैसा कि आज के दीनदार कहलाने वाले लोग कर चुके हैं। उनकी नज़र अरब क़ौम को किसी ग़ैर अरब क़ौम पर भी श्रेष्ठता प्राप्त नहीं थी, यह भी इसी हदीस से पता चलता है। अहंकार का पहला नुक्सान यह होता है कि आदमी अपनी क़ौम को सबसे श्रेष्ठ मानकर यह समझने लगता है कि उसकी क़ौम के अलावा दूसरी तमाम क़ौमें घटिया हैं और जो कुछ उनके पास है वह भी घटिया है, हम श्रेष्ठ हैं, हमें किसी घटिया क़ौम से घटिया चीज़ें सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है। इस तरह अहंकार ज्ञान पाने से रोकता है और इंसानियत को नुक्सान पहुंचाता है। इसके विपरीत ज्ञान अहंकार को मिटा डालता है और इंसानियत का कल्याण करता है। दोनों चीज़ें एक साथ एक दिल में जमा नहीं हो सकतीं।
अहंकार बाधक है सत्य अपनाने में
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई को मानने से जो चीज़ रोकती है वह भी केवल अहंकार है वर्ना तो आदमी अगर एक नज़र उनके सुधार कार्यों पर डाल ले तो वह उनकी सच्चाई का क़ायल हो जाता है। उन्होंने लोगों को गुलाम आज़ाद करने की प्रेरणा दी और लोगों ने गुलाम आज़ाद करने शुरू किए और बहुत थोड़े ही अर्से में गुलाम आज़ाद भी हो गए और उनका पुनर्वास भी इस तरह हो गया कि वे बराबरी के दर्जे के साथ उसी समाज का अंग बन गए। उन्होंने नशा छोड़ने का हुक्म दिया और तमाम देहातों और नगरों के लोगों ने अपनी शराब नाली में बहा दी। उन्होंने कन्या की हत्या से रूकने का हुक्म दिया और लोग रूक गए। न सिर्फ़ उनके ज़माने के अनुयायी रूक गए बल्कि उनके बाद के ज़मानों के अनुयायी आज तक इस घिनौने जुर्म से रूके हुए हैं, जिससे आज हुकूमत भी लोगों को रोक पाने में नाकाम है।
पैग़म्बर साहब स. के सुधार कार्य
मुसलमानों की इल्म और अमल की तमाम कमज़ारियों के बावजूद भी मुस्लिम समाज में कन्या भ्रूण हत्या शून्य है तो यह केवल पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षाओं का ही प्रभाव है।
उन्होंने लोगों से कहा कि वे क़र्ज़दारों पर अपना ब्याज माफ़ कर दें, उन्हें बिना ब्याज के क़र्ज़ दें और मालदार लोग सदक़ा-फितरा आदि दान के अलावा ज़रूरतमंदों को अपने बढ़ने वाले माल का 2.5 प्रतिशत हिस्सा उनके कल्याण के लिए दें बिना यह सोचे कि उनसे किसी भी तरह का कोई बदला या फ़ायदा उठाया जाए। लोगों ने ऐसा किया तो समाज के हरेक सदस्य की बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति यक़ीनी हो गई। आज भी अगर लोग ईमानदार हो जाएं और उस समाज की तरह कालाबाज़ारी, जमाख़ोरी और मिलावट छोड़ दें, सूद-ब्याज लेना छोड़ दें और अपने बढ़ने वाले माल का 2.5 प्रतिशत समाज के ज़रूरतमंदों को देने लगें तो समाज से गुरबत और शोषण का सफ़ाया हो जाएगा बिना किसी आंदोलन और बिना किसी क्रांति के। आज दुनिया में अगर ये समस्याएं मौजूद हैं तो केवल इसलिए कि अहंकार और अज्ञान के कारण इंसानियत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षाओं का पालन अपने लिए अनिवार्य नहीं मानती हालांकि वह उन्हें एक महान सुधारक भी मानती है।
उनके आगमन से पहले दुनिया की अक्सर क़ौमें सांप्रदायिकता और धड़ेबंदी की शिकार थी और एक दूसरे का खून बहाना उनके लिए गर्व की बात थी। अरब के क़बीले भी दुनिया की दूसरी क़ौमों की तरह आपस में एक दूसरे का खून बहा रहे थे। उनकी शिक्षा के कारण वह सब खून-ख़राबा बंद हुआ और उसका असर पूरी दुनिया तक पहुंचा।
मानव जाति के उनके उपकारों में से एक यह भी है उन्होंने इस्लाम के आह्वान के बावजूद अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले हरेक मत के लोगों को यह आज़ादी दी कि वे अपने मत पर भी क़ायम रह सकते हैं और अपनी मज़हबी रस्मों को भी अंजाम दे सकते हैं। उनका मत कुछ भी हो लेकिन वे बाहरी हमलावर को एक साझा दुश्मन समझें और सभी लोग एकता के साथ उनका मुक़ाबला करें। इस संधि को ‘मीसाक़े मदीना‘ के नाम से जाना जाता है।
विश्व शांति केवल इस्लाम से
यह सिद्धांत आज भी दुनिया के सामने एक आदर्श है। इसका उद्देश्य भी शांति ही था। इस्लाम केवल शांति है और शांति दुनिया में केवल इस्लाम के उसूलों से ही आ सकती है। इस्लाम केवल व्यक्तिगत शांति की बात नहीं करता बल्कि वह व्यक्तिगत शांति के साथ सामूहिक शांति की बात भी करता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने केवल शांति की बात ही नहीं की बल्कि उन कारणों को भी बताया जिनकी वजह से समाज में ग़रीब और अमीर तबक़ों के दरमियान फ़ासला और नफ़रत दोनों ही बढ़ते हैं। जिनकी वजह से समाज के लड़के और लड़कियों के विवाह देर से होते हैं वे बेचैन और अशांत रहते हैं। ग़र्ज़ यह कि अशांति कि जितने भी रूप और कारण हो सकते थे, उन्होंने उन सबकी निशानदेही भी की और उनका निवारण करके समाज में शांति स्थापित भी की और उन उसूलों पर चलकर आज भी विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है।
आज भी विश्व में जहां भी शांति की कोई भी गंभीर कोशिश चल रही है, आप उसे ग़ौर से देखिए और उसके सिद्धांतों को देखिए, वहां आपको इस्लामी सिद्धांत ही नज़र आएंगे।
पैग़म्बरे इस्लाम स. की विजय की अस्ल ताक़त उनका नज़रिया, उनके उसूल, उनका चरित्र और उनका व्यवहार था। वे इंसान को हर हाल में एक इंसान मानते थे और उसे हर हाल में एक इंसान का सम्मान देते थे चाहे वह इंसान मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम, चाहे ज़िंदा हो या फिर मुर्दा।
पैग़म्बर साहब स. अगर किसी ग़ैर मुस्लिम (यहूदी) का जनाज़ा भी पास से गुज़रते हुए देखते तो खड़े हो जाते थे। इस पर उनके सत्संगी साथी उनसे पूछते थे कि तो आप कहते थे कि ‘क्या यह इंसान नहीं है ?‘ (बुख़ारी)
पैग़म्बरे इस्लाम स. की शिक्षाएं
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षा यह है कि
‘ऐ लोगो ! तुम्हारा रब पालनहार एक है और तुम्हारा बाप भी एक है। तुम सब आदम की औलाद हो और आदम मिट्टी से बने थे। अल्लाह के नज़्दीक तुम में सबसे ज़्यादा प्रतिष्ठित वह है जो तुम में सबसे ज़्यादा जुर्म और पाप से बचने वाला है। किसी अरबी को किसी ग़ैर अरबी पर, किसी गोरे को काले पर बड़ाई हासिल नहीं। बड़ाई सिर्फ़ अल्लाह से डरने के सबब है। यही बड़ाई का पैमाना है, कसौटी है।‘
‘सारी मख्लूक अल्लाह का कुन्बा है, बस तुम में सबसे अच्छा वह है जो अल्लाह के कुन्बे के साथ अच्छा सुलूक करे।‘
‘ख़बरदार, जुल्म न करना, ख़बरदार जुल्म न करना। मेरे बाद मुन्किर न हो जाना कि एक दूसरे की गर्दनें मारने लगो। कोई भी समुदाय सत्य के मार्ग पर रहने के बाद गुमराह हुई है तो उसका सबब यह है कि वे आपस में लड़ बैठे। मुसलमान वह है जिसकी ज़बान और हाथ की तकलीफ़ से लोग महफ़ूज़ रहें। क़ियामत के रोज़ मेरी नज़र में सबसे ज़्यादा प्यारे और मेरे सबसे ज़्यादा क़रीब वह शख्स होगा जिसके अख़लाक़ सबसे अच्छे होंगे। अल्लाह ने मुझे बेहतरीन अख़लाक़ और बेहतरीन आमाल की तकमील के लिए भेजा है। एक मीठा बोल और किसी बात को दरगुज़र कर देना उस सदक़ा और ख़ैरात से बेहतर है जिसके पीछे दुख देना हो। ऐ ईमान वालो, न तो मर्द ही मर्दों का मज़ाक़ उडाएं, मुमकिन है कि वे उनसे बेहतर हों और न ही औरतें औरतों का मज़ाक़ उड़ाएं। हो सकता है कि वे उनसे बेहतर हों और न अपनों पर व्यंग्य करो और न ही एक दूसरे को बुरी उपाधि से पुकारो। बदगुमानी से बचो क्योंकि बाज़ गुमान गुनाह होते हैं और न किसी की टोह में रहो और न ही तुम में से कोई किसी की पीठ पीछे बुराई करे। क्या तुम में से कोई यह बात पसंद करेगा कि अपने मुर्दा भाई का मांस खाए ? तुम उससे नफ़रत करोगे। अल्लाह से डरते रहो और अल्लाह तौबा कुबूल करने वाला है। वादा पूरा करो। क़ियामत के दिन वादे के बारे में लाज़िमी तौर पर पूछा जाएगा। जो कोई अल्लाह और परलोक पर यक़ीन रखता है, वह अपने पड़ोसी को तकलीफ़ न पहुंचाए। खुदा की क़सम वह मोमिन नहीं जिसका पड़ोसी उसके शर से महफ़ूज़ न हो। अल्लाह को यह बात सख्त नापसंद है और वह मोमिन नहीं, जो खुद तो पेट भर कर खाए और उसका पड़ोसी भूखा सो जाए।‘
आज दुनिया में कोई आदमी ऐसा नहीं है जो यह कहे कि उसे इस तालीम की ज़रूरत नहीं है। कोई भी आदमी इस शिक्षा से अच्छी शिक्षा ला नहीं सकता और न ही आज इस शिक्षा को नज़रअंदाज़ करके वह सभ्य समाज में कोई इज़्ज़त ही पा सकता है। दूसरों से ज़्यादा आज खुद मुस्लिम समाज को इस बात की बेहद ज़रूरत है कि वह खुद को पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की तालीम की रौशनी में जांचे और देखे कि उसके पड़ोसी को उससे कोई तकलीफ़ तो नहीं पहुंच रही है। वह इस बात का कितना ध्यान रखता है कि उसके पड़ोस में कोई भूखा, बीमार और परेशान तो नहीं है।
समाज में किसकी प्रतिष्ठा होती है और क्यों ?
याद रखिए, यह समाज उपयोगिता के सिद्धांत पर ही चलता है। अगर आप अपने आस पास के लोगों की तकलीफ़ें दूर करने के लिए भागदौड़ करते हैं, उनकी बीमारी और उनकी मौत के वक्त आप उन्हें सहारा देते हैं तो फिर उनके दिलों में आपके लिए सम्मान पैदा होने से दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती। अगर आपका अख़लाक़ अच्छा है तो फिर लोग खुद ब खुद आपको अच्छा समझेंगे और आपको इज़्ज़त देंगे, आप पर विश्वास करेंगे और अपने अहम कामों में आपको अपना राज़दार बनाएंगे। आपकी नेकी आपको दुनिया में इज़्ज़त दिलाएगी, आपकी साख बनाएगी, आपकी साख आपके लिए समृद्धि का द्वार खोल देगी। एक व्यापारी अपनी साख का ख़याल सबसे ज़्यादा रखता है। उसकी सारी समृद्धि का दारोमदार उसकी साख पर ही होता है।
अगर आज मुसलामान की साख पर सवालिया निशान लगते हैं तो उसका कारण यह नहीं है कि वह इस्लाम पर चलता है बल्कि इसका कारण यह है कि वह इस्लाम पर ठीक से नहीं चलता है। कुरआन पढ़ने और समझने से जी चुराना, उसके हुक्म को नज़रअंदाज़ करके अपनी ख्वाहिश और समाज की रस्मों के मुताबिक़ जीना, ज़कात अदा न करना, औरतों को विरासत में हिस्सा न देना, दहेज लेना और दिखावे और शान के लिए दिलेरी के साथ गुनाह करना आज अक्सर मुसलमानों का अमल है। धड़ेबंदी करना और खून बहाना भी मुसलमानों में देखा जा सकता है। ये तमाम बातें वे हैं जिनसे पैग़म्बरे इस्लाम ने रोका है। मुसलमान वह है जो उन कामों से रूक जाए जिन कामों से पैग़म्बरे इस्लाम स. ने रूकने के लिए कहा है। इस ज़मीन पर शांति की स्थापना के लिए ऐसा करना निहायत ज़रूरी है। मुसलमान ऐसा करेंगे तो उनका आचरण उन लोगों के लिए भी प्रेरणा बनेगा जो कि शांति के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं, जो कि जीवन के उद्देश्य के बारे में सोचते हैं कि जीवन क्यों है और कौन सा मार्ग है जो उन्हें उनकी असल मंज़िल तक पहुंचा सकता है ?
आपकी असल मंज़िल आपके सामने है, अपने क़दम बढ़ाइये
पैग़म्बरे इस्लाम की ज़िंदगी और उनकी शिक्षा इंसान को उसके हर सवाल का जवाब देती है। मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम हरेक इंसान इस तथ्य को जब चाहे देख सकता है, उसका कल्याण इसी में है। किसी भी कारण की वजह से आदमी को सच्चाई को स्वीकारने में और खुद को सुधारने में देर नहीं करनी चाहिए। इंसान होने का अर्थ तो यही है। जो इस गुण से ख़ाली है, वह इंसान होने का दावेदार तो हो सकता है लेकिन इंसान नहीं हो सकता।
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