Monday, June 13, 2011

हिंदी ब्लॉगिंग का स्तर गिरा रही है हमारी वाणी , हम तो चले और अब जो जी में आए करो बाबा !!! - Dr. Anwer Jamal

हमारी वाणी पत्रिका को टॉप पर ऐसे दिखाया जाता है कि उस पर नज़र ज़रूर पड़ती है । वह मालिक है अपनी साइट की , वह दिखा सकती है लेकिन क्या घटिया घटनाएं भी वह दिखाएगी ?
आज नज़र पड़ी तो वहाँ एक ऐसे ब्लॉगर का अपने दोस्तों की मंडली में अभिनंदन होते पाया जो 51 ब्लॉगर्स को छोड़कर बाक़ी सभी ब्लॉगर्स को सम्मान से वंचित करने का इतिहास रखता है । इसी आदमी के कारण भाई ख़ुशदीप जी को शर्मिन्दगी उठानी पड़ी । भाई ख़ुशदीप जी हमारी वाणी के एक पिलर हैं । उनके ही सिर पर ऐसे आदमी बिठाना निहायत घटिया हरकत है । इसके पीछे सिवाय ईनाम पाने की ख़्वाहिश के या चापलूसी के और कुछ भी नहीं है वर्ना अभिनंदन तो और ब्लॉगर्स के भी हुए हैं ।
क्या अब हमारी वाणी का स्तर इतना गिर चुका है कि वह 15-20 लोगों के हाथों मिलने वाली इज़्ज़त-ज़िल्लत की ख़बरें भी छापा करेगी और हिंदी ब्लॉगर्स को उन्हें पढ़ने के लिए मजबूर भी करेगी ?
ऐसी हरकतों के कारण ही लोगों का हिंदी ब्लॉगिंग से मोह भंग हो रहा है ।
हिंदी ब्लॉगिंग अभी अपनी शैशवावस्था में है । इसे व्यस्क होने से रोकने वाले यही अभिनंदनबाज़ हैं और इनके कुकर्म को हिंदी ब्लॉगिंग की सेवा बताने वाले हमारी वाणी जैसे चापलूस एग्रीगेटर भी इस जुर्म में बराबर के शरीक हैं।
हम हिंदी ब्लॉगिंग का स्तर घटिया बनाने का विरोध करते हैं और अपनी सदस्ता कैंसिल करते हैं ।
हमारी वाणी , कृप्या हमारे सभी ब्लॉग हटा दीजिए !
ताकि आपको याद रहे कि हमारे बीच सच कहने वाला एक ब्लॉगर अभी ज़िंदा हैं । अगर कोई और भी है तो वह भी विरोध करे और आए हमारे साथ ।

Sunday, June 12, 2011

भारतीय आयुर्वेदाचार्यों ने आहार संबंध में बेहतरीन उसूल दिए हैं

भाइयो, बुजुर्गो और दोस्तों ! अगर आप चिकन-मटन को लौकी के साथ पकाकर खाएंगे तो न तो आप बुज़दिली के शिकार होंगे और न ही आपके स्वभाव में हिंसा की प्रधानता होने पाएगी। मांस के नकारात्मक पक्ष हिंसा का निराकरण लौकी करेगी और लौकी के नकारात्मक पक्ष बुज़दिली का निराकरण चिकन-मटन कर देगा। आपके स्वभाव में नकारात्मक पक्ष किसी का भी न आएगा जबकि सकारात्मक पक्ष दोनों के ही आ जाएंगे।
यह हक़ीक़त है कि आज हर तरफ़ बीमारियों का बोलबाला है। दूसरी वजहों के साथ इसकी एक वजह यह भी है आज आदमी लगातार गेहूं, घी-तेल, मसाले, नमक, चीनी और चंद गिनी चुनी सब्ज़ियां ही खा रहा है। जब से वह खाना चबाना सीखता है तब से वह यही सब खा रहा है और आप जानते हैं कि अगर होम्योपैथिक तरीक़े से किसी दवा को उसके कच्चे रूप में केवल 3 माह तक लिया जाता है तो वह दवा इंसान के शरीर और मन पर अपने लक्षण प्रकट कर देती है। अब आप सोचिए कि जब 40 साल तक आदमी एक सी ही बल्कि एक ही चीज़ें लगातार खाता रहेगा तो क्या वे चीज़ें इंसान के शरीर और मन पर अपने गहरे असर न दिखाएंगी ?
लंबी लाइलाज बीमारियों के शिकार मरीज़ अगर वाक़ई तंदुरूस्त होना चाहते तो वे सबसे पहले ये सारी चीज़ें खाना छोड़ दें और उसके बाद वे ऐसी चीज़ें खाएं जो कि उन्होंने जीवन में बहुत कम खाई हों और जल्दी हज़्म हो जाती हों। इसके बाद अगर वे शहद और त्रिफला भी खाते रहें तो 3 महीने में ही उनकी पुरानी बीमारियां भी काफ़ी हद तक जाती रहेंगी।
आज आदमी बीमार नहीं है र्बिल्क ‘फ़ूड प्रूविंग‘ का शिकार है। यह मेरा अनुसंधान है। मैं इस सब्जेक्ट पर एक किताब भी लिखने वाला था लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग में आ फंसा।
मालिक ने बंदों को सेहतमंद रखने के लिए ही उसे मेहनत करने का हुक्म दिया और इसीलिए उसने अलग अलग मौसम में अलग अलग फ़सलें बनाईं। हरेक मौसम में इंसान की ज़रूरत उसी मौसम के फल सब्ज़ी आदि के ज़रिए पूरी होती हैं। हमारा आहार ही हमारे लिए बेहतरीन औषधि है लेकिन हमने अपनी नादानी की वजह से अपने आहार को आज अपने लिए ज़हर बना लिया है। 
यह ज़हर इतना है कि इसे लैब में भी टेस्ट कराया जा सकता है। सब्ज़ी, दूध-पानी, मिट्टी और हवा हर चीज़ को ज़हरीला बनाने वाले हम ख़ुद ही हैं और फिर मौसम चक्र का उल्लंघन करके मनमर्ज़ी भोजन करने वाले नादान भी हम ही हैं। अगर हम अपनी ग़लती महसूस करें और तौबा करके अपने खान-पान को मौसम के अनुसार कर लें तो हम अपनी बीमारियों से मुक्ति पा सकते हैं।
भारतीय आयुर्वेदाचार्यों ने इस संबंध में बेहतरीन उसूल दिए हैं:
मिसाल के तौर पर उन्होंने कहा है कि 
1. हितभुक  2. मितभुक  3. ऋतभुक
अर्थात हितकारी खाओ, कम खाओ और ऋतु के अनुकूल खाओ।
हमें अपने महान पूर्वजों की ज्ञान संपदा से लाभ उठाना चाहिए।
-----------------------------------------------------------------------------
साथ में देखिये

क्या बुज़दिल बना देता है लौकी का जूस ? , होम्योपैथी में विश्वास रखने वाले ब्लॉगर्स भाइयों से एक विशेष चर्चा -Dr. Anwer Jmal

'बाबा का माददा कैसे बढ़े ?' अब असल मुददा यह होना चाहिए

'करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान' के तहत बाबा रामदेव जी के पास अनुभव भी आ ही जाएगा । अस्ल बात मुददे और माददे की है।
मुददा उनका ठीक है और माददा भी उचित खान पान के ज़रिए उनमें बढ़ ही जाएगा।
अब जब कि बाबा ने खाना पीना शुरू कर ही दिया है और एक क्षत्रिय की तरह उन्होंने अंतिम साँस तक लड़ने का ऐलान भी कर दिया है तो हालात का तक़ाज़ा है कि या तो वे पी. टी. ऊषा को अपना कोच बना लें या फिर प्राचीन आर्य क्षत्रियों की तरह वीरोचित भोजन ग्रहण करना शुरू कर दें । इसके लिए उन्हें अपने आहार में विशेष सुधार करना पड़ेगा।

इस संबंध में देखिए मेरा एक लेख आर्य भोजन पर :
http://aryabhojan.blogspot.com
क्या आदमी को बुज़दिल बना देता है लौकी का जूस ?

Saturday, June 11, 2011

यह सम्मान है या उधार की चीनी ? - Dr. Anwer Jamal

कुछ लोग हालात के तहत मुजरिम बन जाते हैं जबकि कुछ शौक़िया जुर्म करते हैं । कुछ मजरिम एक दो क्राइम करके रूक जाते हैं जबकि कुछ आदी मुजरिम होते हैं । ऐसे ही माँगने वाले भी होते हैं । कोई ज़रूरत में माँगता है और कुछ भिखारी पेशेवर होते हैं । औरतें भी कभी कभार पड़ोसन से चीनी आदि माँग लेती हैं और बाज़ार से आने पर लौटा भी देती हैं ।
ऐसे ही आजकल एक चोचला चल रहा है सम्मान पाने का । ब्लॉग जगत में सम्मान लेना देना आजकल बाक़ायदा एक पेशे की शक्ल बनता जा रहा है । आज फिर कमल 'सवेरा' जी कहीं सम्मानित होते हुए नज़र आ गए । जैसे आदमी खाना खाने के बाद भी एक आध पान वान चबा लेता है ज़ायक़ा संवारने के लिए। ऐसे ही अभी वह दिल्ली में सम्मानित होकर लौटे हैं लेकिन एक छोटा सा सम्मान कल यू. पी. में चटख़ा डाला और ऐसे ही नहीं बाक़ायदा गले में फूल मालाएं भी टंगा रखी थीं ।
सच है जिसे सम्मानित होने की लत पड़ जाए , उसे फिर इस बात की भी परवाह नहीं रहती कि उसे इस हाल में देख कर लोग कितना हंसेगे ?
अब ये साहब इस उधार के सम्मान के बदले पत्रिका वाले को सम्मानित कर डालेंगे । आज पोस्ट 'मिस्टर नाइस' ने लगाई है और तब ये अपनी डॉट कॉम पर चिपका देंगे ।
बिल्कुल उधार की चीनी की तरह !

Thursday, June 9, 2011

... ताकि ‘न्याय की आशा‘ समाप्त न होने पाए - Dr. Anwer Jamal


मेरा मिशन आशा और अनुशासन का मिशन है। लोग बेहतरी की आशा में ही अनुशासन भंग करते हैं और जो लोग अनुशासन भंग करने से बचते हैं, वे भी बेहतरी की आशा में ही ऐसा करते हैं। समाज में चोर, कंजूस, कालाबाज़ारी और ड्रग्स का धंधा करने वाले भी पाए जाते हैं और इसी समाज में सच्चे सिपाही, दानी और निःस्वार्थ सेवा करने वाले भी रहते हैं। हरेक अपने काम से उन्नति की आशा करता है। जो ज़ुल्म कर रहा है वह भी अपनी बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहा है और जो ज़ुल्म का विरोध कर रहा है वह भी अपनी और सबकी बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहा है।
ऐसा क्यों है ?
ऐसा इसलिए है कि मनुष्य सोचने और करने के लिए प्राकृतिक रूप से आज़ाद है। वह कुछ भी सोच सकता है और वह कुछ भी कर सकता है। दुनिया में किसी को भी उसके अच्छे-बुरे कामों का पूरा बदला मिलता नहीं है। क़ानून सभी मुजरिमों को उचित सज़ा दे नहीं पाता बल्कि कई बार तो बेक़ुसूर भी सज़ा पा जाते हैं। ये चीज़ें हमारे सामने हैं। हमारे मन में न्याय की आशा भी है और यह सबके मन में है लेकिन यह न्याय मिलेगा कब और देगा कौन और कहां ?
न्याय हमारे स्वभाव की मांग है। इसे पूरा होना ही चाहिए। अगर यह नज़र आने वाली दुनिया में नहीं मिल रहा है तो फिर इसे नज़र से परे कहीं और मिलना ही चाहिए। यह एक तार्किक बात है।
दुनिया में हरेक घटना का भौतिक परिणाम निकलता है लेकिन नैतिक परिणाम नहीं निकलता। अगर एक आदमी आग में हाथ डालता है तो उसका हाथ जल जाता है। यह इस घटना का भौतिक परिणाम है लेकिन अगर एक दबंग समुदाय किसी कमज़ोर समुदाय के लोगों को ज़िंदा जला देता है तो उसका कोई नैतिक परिणाम यहां नहीं निकलता। विजयी देश को कोई भी युद्ध अपराधी घोषित नहीं कर पाता। जिस घर में कोई बहू दहेज के लिए जला दी जाती है। उसी घर में मृतका की छोटी बहन को उसी युवक से फिर ब्याह दिया जाता है। ऐसी घटनाएं आम हैं। इन सभी घटनाओं को हम सभी देखते हैं और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार निष्कर्ष भी निकालते हैं। इन घटनाओं के आधार पर हम अपने निष्कर्षों में अलग अलग हो जाते हैं। एक वर्ग यह मानता है कि बस यही दुनिया सब कुछ है। इससे परे जीवन होता ही नहीं है। ऐसी दशा में न्याय की आशा संभव नहीं रहती।
जबकि दूसरा वर्ग यह निष्कर्ष निकालता है कि यह दुनिया कर्म करने की जगह है और मरने के बाद आदमी वहां चला गया है जहां उसे अपने कर्मों का अंजाम भुगतना है। इस दशा में न्याय की आशा ज्यों की त्यों बनी रहती है।
हमें वह काम करना चाहिए जिससे समाज में  ‘न्याय की आशा‘ समाप्त न होने पाए। ऐसी मेरी विनम्र विनती है विशेषकर आप जैसे विद्वानों से।
बौद्ध और जैन क्रांतियां स्वाभाविक थीं। 
धर्म एक लोकहितकारी व्यवस्था है। बाद में इसे बिगाड़ दिया गया और इसकी सारी व्यवस्था का लाभ एक वर्ग विशेष लेने लगा। राजनैतिक और सामाजिक हालात ख़राब से ख़राबतर हो गए तो समाज के बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। बहुत से अन्य विद्वानों के साथ महावीर जी और सिद्धार्थ गौतम जी ने भी अपना विरोध दर्ज कराया। अन्य पंथ समय के साथ मिट गए और ये दोनों बचे रह गए। दोनों की ही मान्यताएं अलग-अलग हैं। यह बात भी यही प्रमाणित करती है कि एक ही माहौल में रहने के बावजूद अलग-अलग बुद्धि वाले लोग अलग अलग निष्कर्ष निकालते हैं। महावीर जी आत्मा को मानते हैं लेकिन तथागत आत्मा को नहीं मानते। 
मान्यताएं कितनी भी अलग क्यों न हों ?
हमें समाज पर पड़ने वाले उनके प्रभावों का आकलन ज़रूर करना चाहिए और देखना चाहिए कि यह मान्यता समाज में आशा और अनुशासन , शांति और संतुलन लाने में कितनी सहायक है ?
इसे अपनाने के बाद हमारे देश और हमारे विश्व के लोगों का जीना आसान होगा या कि दुष्कर ?
इसके बावजूद भी मत-भिन्नता रहे तो भी हमें अपने-अपने निष्कर्ष के अनुसार समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए यथासंभव कोशिश करनी चाहिए और इस काम में दूसरों से आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

निम्न लेख भी विषय से संबंधित है और आपकी तवज्जो का तलबगार है :

धार्मिकता की सच्ची कसौटी - Dr. Anwer Jamal

इंसान अपने वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकता। आप भी सोचते होंगे और हम भी सोचते हैं। हमने तो अपनी ज़िंदगी फिर भी बहुत अच्छी गुज़ार ली है, हम ऐसा समझते हैं लेकिन आने वाले समय के बारे में सोचते हैं तो हमारे शरीर में पहले तो झुरझुरियां सी दौड़ने लगती हैं।
मारकाट में हम विश्वास नहीं रखते और क्रांति टाइप कोई परिवर्तन भी हम नहीं  चाहते नहीं क्योंकि इन सबका नुक्सान भी घूम फिर कर जनता को ही उठाना पड़ता है। जो भी नई व्यवस्था बनेगी। उसमें नेता और पूंजीपति फिर से ऐश मारना शुरू कर देंगे। क़ुर्बानी देते हैं चंद सिरफिरे दीवाने और जनता लेकिन ऐश करने के लिए वे लोग आ जाते हैं, जो ख़ुदग़र्ज़ और बुज़दिल होते हैं। इतिहास के जितने भी उलट-फेर आप देखेंगे तो आपका मन कभी नहीं चाहेगा कि कोई क्रांति यहां हो।
आज नेता निश्चिंत हैं और अदालतें सुस्त हैं। नौकरशाह मज़े कर रहे हैं और मोटा माल कमाकर अपने बच्चों को आला तालीम दिला रहे हैं। पढ़-लिखकर वे भी मोटा माल कमाएंगे। पूंजीपति राजाओं की तरह बसर कर ही रहे हैं। आम जनता की रोज़ी-रोटी, शिक्षा और सुरक्षा सब कुछ अनिश्चित है।
साल भर हो चुका है। 8 मई आई और गुज़र गई किसी ने याद नहीं किया कि  8 मई 2010 सोमालिया के लुटेरों ने देश के 22 नौजवानों को पकड़ लिया था। आज तक उन्होंने छोड़ा नहीं और हमारे पक्षी-विपक्षी नेताओं ने उन्हें छुड़वाया नहीं। यहां गाना बजा रहे हैं ‘यह देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का‘ और मलाई चाटने वाले नाच रहे हैं। उनके समर्थक कह रहे हैं कि यह राष्ट्रवाद है।
कभी इस देश का हाल यह था कि रानी लक्ष्मीबाई ने ज़नाना लिबास उतार कर मर्दाना लिबास पहन लिया और घोड़े पर बैठकर दुश्मन की तरफ़ हमला करने भागीं और आज यह आलम है कि जो लड़ने निकला था भ्रष्टाचारियों से वह मर्दाना लिबास उतार ज़नाना लिबास में लड़ाई के मैदान से ही भाग निकला और फिर औरतों की ही तरह वह रोया भी।
आज जिसके पास चार पैसे या चार आदमियों का जुगाड़ हो गया। वह एमपी और पीएम बनने के सपने देख रहा है। पहले तो केवल भ्रष्टाचारी और ग़ुंडे-बदमाश ही नेतागिरी कर रहे थे और फिर हिजड़े और तवायफ़ें भी नेता बन गए। उसके बाद अब समलैंगिक भी नेता बनकर खड़े हो रहे हैं कि देश को रास्ता हम दिखाएंगे।
आप एक बार देश के सभी नेताओं पर नज़र डाल लीजिए। उनमें सही लोगों के साथ-साथ ये सभी तत्व आपको नज़र आ जाएंगे।
जनता इन सबसे आजिज़ आ चुकी है। जिस पर भी वह विश्वास करती है, वही निकम्मा निकल जाता है। लोगों में निराशा घर कर रही है। जिसकी वजह से जगह-जगह आक्रोश में आकर लोग हत्या-आत्महत्या कर रहे हैं। हम सब एक भयानक भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में सांप्रदायिक राष्ट्रवाद कोढ़ में खाज की तरह समस्या को और ज़्यादा बढ़ा रहा है।
ये हालात हैं जिन्हें हम एक दम तो नहीं बदल सकते लेकिन फिर भी लोगों के दिलों में आशा का दीपक ज़रूर जला सकते हैं। आप कुछ करें या न करें लेकिन लोगों की आशा और उनके सपनों को हरगिज़ मरने न दें। आदमी रोटी-पानी और हवा से नहीं जीता बल्कि वह एक आशा के सहारे जीता है। उसे यह आशा बनी रहती है कि एक समय आएगा, जब सब ठीक हो जाएगा।
वह समय कब आएगा ?
इसे न तो हम जानते हैं और न ही आप लेकिन फिर भी यह आशा तो हम सबके मन में है ही। हमारी कोशिश यही है कि हम लोगों में यह आशा ज़्यादा से ज़्यादा जगाएं कि हर रात के बाद एक सुबह होती ही है और यह लोगों के प्रयास से नहीं होती बल्कि यह मालिक की दया से होती है। जब मालिक का नाम आता है तो मन में दम तोड़ती हुई आस भी ज़िंदा हो जाती है। यही आस लोगों को हिंसा और अनुशासनहीनता से दूर रहने के लिए प्रेरित करती है। निराशा से बचाने वाली चीज़ बुद्धि और नास्तिकता नहीं बल्कि आस्था है। मनुष्य अपने स्वभाव से ही आस्थावान और आशावादी है।
हम सब एक ही तरह के मनुष्य हैं। जिसका भी लहू बहेगा वह भी हमारी तरह का ही एक इंसान होगा। वह किसी का बेटा और किसी का भाई होगा। वह खुदा को मानता हो या चाहे न मानता हो लेकिन फिर भी वह बंदा एक ही खुदा का होगा। ईश्वर-अल्लाह हमारी धार्मिकता को इसी कसौटी पर परखता है कि हम समाज में शांति लाने और उसे बनाए रखने के लिए कितना प्रयास करते हैं ?
यह देश धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है तो यहां सबसे बढ़कर शांति होनी चाहिए।
अगर हम विभिन्न मत और संप्रदायों में भी बंट गए हैं और अपने अपने मत और संप्रदाय को सत्य और श्रेष्ठ मानते हैं तो हमें एक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हुए शांति और परोपकार के प्रयासों में एक दूसरे से बढ़ निकलने के लिए भरपूर कम्प्टीशन करना चाहिए।
अपने देश और अपने समाज को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को बचाने का तरीक़ा आज इसके सिवा कोई दूसरा है नहीं। मैं इसी तरीक़े पर चलता हूं और आपको भी इसी तरीक़े पर चलने की सलाह देता हूं।
आप अपने दीपक ख़ुद बन जाइये, मार्ग आपके सामने ख़ुद प्रकट हो जाएगा। तब आप चलेंगे तो मंज़िल तक ज़रूर पहुंचेंगे और कोई भी राह से भटकाने वाला आपको भटका नहीं पाएगा। आपकी मुक्ति, आपके ज्ञान और आपके पुरूषार्थ पर ही टिकी है। किसी और को इससे बेहतर बात पता हो तो वह हमें बताए !

Wednesday, June 8, 2011

अपने पीछे भीड़ जुटाने मात्र से ही कोई भी आदमी नेता नहीं बन जाता जब तक कि वह अपने अंदर नेतृत्व के गुण विकसित न करे और किसी अनुभवी नेता से राजनीति और कूटनीति का व्यवहारिक ज्ञान हासिल न कर ले - Dr. Anwer Jamal


डा. अनवर जमाल अपने योग गुरु पं. अयोध्या प्रसाद मिश्र जी के साथ 
बाबा रामदेव जी ने भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ ऐतिहासिक सत्याग्रह किया। उनकी नीयत कितनी भी नेक क्यों न हो लेकिन उनका तरीक़ा ग़लत रहा है। यह एक खुली हुई सच्चाई है। हम बिल्कुल नहीं चाहते कि किसी भी सत्याग्रही को सताया जाए लेकिन हम यह भी नहीं चाहते कि सत्याग्रही पुलिस के जवानों पर गमले आदि फेकें। पुलिस के जवान भी हमारे ही हैं और वे वही करते हैं जिसका उन्हें आदेश मिलता है। जो नेता आदेश देते हैं वे भी हमारे द्वारा ही चुने हुए होते हैं। यह एक जटिल प्रक्रिया है। इन्हीं नेताओं में से कुछ का रूपया विदेशी बैंकों में जमा है। ये लोग आसानी से यह पैसा देश में लाने वाले नहीं हैं। यह बात हमें पता है तो बाबा रामदेव जी को भी पता होनी चाहिए थी। उन्होंने यह कैसे समझ लिया था कि जैसे ही चार्टर्ड प्लेन से उतर कर मैं अनशन करूंगा, वैसे ही सरकार विदेश से काला धन वापस लाने पर आमादा हो जाएगी ?
यह बाबा का  भोलापन ही था और यह इस वजह से था कि वह इस गंदी राजनीति के हथकंडों को नहीं जानते थे। बाबा ने उस क्षेत्र में क़दम रखा जिस क्षेत्र की क ख ग भी वे नहीं जानते थे और इसी वजह से उन्हें मंच से छलांग लगाकर औरतों बीच छिपना पड़ा। उन्हें लगा कि पुलिस उन्हें मारने के लिए आई है। जबकि ऐसा नहीं होता। कांग्रेस को सबसे ज़्यादा डर बीजेपी के सत्ता में आने से लगता है। बीजेपी के नेता आए दिन अनशन करते रहते हैं और कांग्रेस की भेजी हुई पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करती रहती है और फिर छोड़ देती है। अपने शासन काल में बीजेपी ने यही कांग्रेस के साथ किया। यह एक रूटीन का काम है। आप बताइये कि कांग्रेस ने बीजेपी के और बीजेपी ने कांग्रेस के कितने नेता आज तक मारे हैं ?
एक भी नहीं !
बाबा ने सदा स्वागत सत्कार और जय जयकार ही देखा था। बड़े बड़े आई जी और डीजीपी को अपने चरण छूते ही देखा था।
पुलिस का असली रूप क्या होता है ?
इसे वह जानते ही न थे। इसीलिए उन्होंने हालात का ग़लत अंदाज़ा लगाया और फिर ग़लत ही फ़ैसला लिया और अपनी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिला बैठे।
बाबा को जानना चाहिए कि राजनीति में कोई सांपनाथ है तो कोई नागनाथ। कम यहां कोई भी नहीं है। बाबा राजनीति को इन सांपों और नागों से मुक्त कराना चाहते हैं तो बेशक कराएं लेकिन पहले उन्हें सांप और नाग का फन कुचलने का हुनर सीखना होगा। उसके बिना वह यह काम न कर पाएंगे। हमें बाबा के मक़सद से विरोध नहीं है लेकिन उनके तरीक़े से ज़रूर असहमति है।
अगर कल को कपिल सिब्बल बिना जाने ही लोगों को योगासन कराने लग जाएं तो वे लोगों की जान से खेलने वाले माने जाएंगे। ठीक यही बात बाबा रामदेव जी के बारे में कही जाएगी कि अपने पीछे भीड़ जुटाने मात्र से ही कोई भी आदमी नेता नहीं बन जाता जब तक कि वह अपने अंदर नेतृत्व के गुण विकसित न करे और किसी अनुभवी नेता से राजनीति और कूटनीति का व्यवहारिक ज्ञान हासिल न कर ले। ऐसा किए बिना भीड़ जुटाने वाला आदमी लोगों की जान से खेलने वाला माना जाएगा। इस तरह के काम करने से हालात सुधरने के बजाय और ज़्यादा बिगड़ जाएंगे। हमें अपने देश और समाज में सुधार लाना है न कि दुनिया को अपने ऊपर हंसने का मौक़ा देना है। 4 जून के बाद से लेकर आज तक बाबा ने जो भी किया है उससे सन्यास आश्रम की गरिमा को भी ठेस लगी है और देश की छवि भी ख़राब हुई है।
पुरी के शंकराचार्य जी ने भी बाबा रामदेव को ही इस गड़बड़ी के लिए ज़िम्मेदार माना है।
पुरी के शंकराचार्य बोले, रामदेव हैं ‘कायर’!नई दिल्ली। पुरी के शंकराचार्य स्वामी अधोक्षजानंद तीर्थ ने योगगुरु रामदेव पर कायराना हरकत करने का आरोप लगाते हुए उनकी निंदा की है और कहा कि उन्हें देशवासियों से अपने कृत्य के लिये माफी मांगनी चाहिए।
“रामदेव एक भटके हुए धोखेबाज संन्यासी हैं!” 

शंकराचार्य ने आज यहां बातचीत में कहा कि रामदेव ने जिस तरह अपने अनुयायियों से सरकार से की गई डील को छिपाया और फिर गिरफ्तारी से बचने के लिए महिलाओं के बीच छिपकर तथा उनके वस्त्र पहनकर जो कायराना हरकत की उसके बाद उन्हें भगवा वस्त्र पहनने और क्रान्तिकारियों का नाम लेने का कोई हक नहीं रह जाता।

स्वामी अधोक्षजानंद ने कहा कि रामदेव अब अपने कृत्यों से बेनकाब हो गए हैं तथा अब उन्हें भगवा वस्त्र पुन धारण नहीं करना चाहिए।
उनकी इस हरकत से भगवाधारी साधु-संतों की छवि धूमिल हुई है।

उन्होंने केन्द्र सरकार से देश भर के आश्रमों की तलाशी लेकर उनमें छिपे देशी-विदेशी गुनहगारों को बाहर निकालने तथा रामदेव के साथी बालकृष्ण पर अविलम्ब सख्त कार्रवाई करने की मांग की।
उपरोक्त ख़बर इस वेबाईट से साभार : http://josh18.in.com/showstory.php?id=1072952
समय ने साबित कर दिया है कि शाहरूख़ ख़ान ने बाबा रामदेव जी को जो सलाह दी थी वह ठीक थी कि आदमी वही काम करे जिसे करना वह जानता है।  
इस विषय में हमारे अलावा अन्य ब्लॉगर्स की राय भी यही है। नीचे दिए गए लिंक पर जाकर आप भी देख सकते हैं