Thursday, April 21, 2011

21 वीं सदी के अंत तक यूरोप का इस्लामीकरण : एक संभावना - Harikrishan Nigam


पश्चिम में यदि द्रुतगति से फैलने वाली आज की यदि कोई आस्था है तो वह है इस्लाम और इसीलिए उन्होंने इस चौंकाने वाली संभावना को रेखांकित किया है कि इस सदी के अंत तक यूरोप इस्लामी रंग को अपना सकता है, चाहे संगठित चर्च संप्रदायों के साथ-साथ उग्रवाद के संबंध में कितनी ही वैचारिक उठापठक की जाए। जनगणनाओं के विश्लेषणों, या जनसांख्यिकी दबाव भी यही सिद्ध करते हैं कि जिन पर तर्कों के जाल में यदि चाहें तो हम लोगों को भ्रमित करते रह सकते हैं। सहसा विश्वास नहीं होता है कि चर्च की यूरोप जैसी अभेद्य हृदयस्थली को, इस्लाम के विरूद्ध प्रचार के बावजूद, बर्नार्ड लिविस जैसे विश्वप्रसिद्ध विचारक भी मानते हैं, इस सदी के अंत तक, मुस्लिम आस्था नियंत्रित कर सकेगी। कभी-कभी ऐसा लगता है कि बर्नार्ड लिविस का यह प्रश्न उठाना आज के विकास क्रम के लिए श्रेयस्कर है क्योंकि इसके द्वारा विश्व राजनीति का मानचित्र फिर बदला सकता है। हाल में फ्रांसीसी समाचार एजेन्सी एएफपी और एसोसिएटेड प्रेस द्वारा प्रसारित ‘द फोरम आन रिलिजन एंड पब्लिक लाइफ’ के एक तीन वर्षीय अध्ययन से यह तथ्य उजागर हुआ है कि आज विश्वभर में हर चार में से एक व्यक्ति इस्लामी आस्था को मानता है। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम जनसंख्या वाले 90 देशों में भारत का स्थान आज तीसरा है। हमारे देश के ऊपर मात्र इण्डोनेशिया और पाकिस्तान ही हैं। चाहे बांग्लादेश हो या मिस्र, ईरान, तुर्की और अल्जीरिया या मोरक्को हो वहां मुसलमानों की संख्या भारत से कम है। हमारे देश में उनकी संख्या 16 करोड़ है। इसी अध्ययन में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि जर्मनी में लेबनान से अधिक मुस्लिम नागरिक हैं, चीन में इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले सीरिया से अधिक हैं और रूस, जार्डन और लीबिया की कुल मिलाकर मुस्लिम जनसंसख्या अधिक है। आज यह अवधारणा कि इसलाम धर्मावलंबी अरब मूल में है ध्वस्त हो चुकी है और यह पूरी तरह से एक वैश्विक समुदाय है।  - हरिकृष्ण निगम
इस लेख को पूरा पढ़ना बहुत से राज़ सामने ले आता है . लिंक यह है :

Sunday, April 17, 2011

पूरी दुनिया की मातृभाषा Mother tounge


वैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य जाति का उद्गम अफ्रीका में हुआ और वहां से मनुष्य सारी दुनिया में फैले। अब एक वैज्ञानिक शोध बताता है कि दुनिया की सभी भाषाओं की उत्पत्ति भी अफ्रीका की एक मूल भाषा से हुई है। अब तक यह माना जाता रहा है कि शायद तमाम भाषाएं मनुष्य के दुनिया में फैलने के बाद अलग-अलग विकसित हुईं, क्योंकि सभी भाषाओं में किसी प्राचीन समानता का पता नहीं चलता।
वैज्ञानिक ज्यादा से ज्यादा 9,000 वर्ष पहले एक भारतीय और यूरोपीय भाषाओं के समान उद्गम तक पहुंचे हैं, जिन्हें इंडो-यूरोपियन या भारोपीय भाषा परिवार कहा जाता है। इससे पीछे किसी भाषा का वंशवृक्ष तलाशना अब तक संभव नहीं हुआ था, लेकिन न्यूजीलैंड के एक जीवशास्त्री क्विंटन डी एटकिंसन ने एक नए तरीके से भाषाओं का वंशवृक्ष बनाने की कोशिश की।
उन्होंने शब्दों के उद्गम के बजाय कुछ बुनियादी ध्वनियों पर ध्यान दिया और यह तलाशने की कोशिश की कि इन ध्वनियों का विस्तार कहां-कहां कैसा है। उन्होंने दुनिया की 500 से ज्यादा भाषाओं में ये ध्वनियां पाईं। उन्होंने पाया कि कुछ अफ्रीकी भाषाओं में ये सौ से ज्यादा ध्वनियां हैं, लेकिन जैसे-जैसे हम अफ्रीका से दूर होते जाते हैं, ये ध्वनियां कम होती जाती हैं।
अंग्रेजी में लगभग 45 ध्वनियां हैं, जबकि हवाई की भाषा में सिर्फ 13 ध्वनियां हैं। यह काफी रोचक और विश्वसनीय शोध है और इसके जरिये शायद हम भाषाओं के इतिहास या प्रागैतिहास में 50,000 वर्ष या उससे पीछे जा पाएं। जाहिर है, अफ्रीका के मूल निवासी अपने ही इलाके में रह गए, इसलिए उनकी भाषा में प्राचीन तत्व ज्यादा रह गए।
दूसरे लोग जो दूरदराज जाकर बसते गए, उनकी भाषा में नए वातावरण, नई जरूरतों के हिसाब से ध्वनियां और वाक्प्रचार आते रहे और प्राचीन भाषा के तत्व और कम हो गए। जो लोग दूरदराज जाकर वहां अलग-थलग पड़ गए, उनकी भी भाषा में मूल तत्व ज्यादा रह गए होंगे, जैसे दुनिया के विभिन्न इलाकों के आदिवासी। लेकिन जिन समाजों और संस्कृतियों में घुलना-मिलना ज्यादा रहा, उन्होंने नए तत्व दूसरे समाजों और संस्कृतियों से भी हासिल किए और इसलिए उनमें ज्यादा बदलाव आए।
किसी भी समाज के विकास के लिए उसका दूसरे समाजों से घुलना- मिलना बहुत जरूरी है। जो समाज भौगोलिक या ऐतिहासिक वजहों से अलग-थलग पड़ जाते हैं, वे अक्सर किसी जगह थम जाते हैं। अगर हम भारतीय भाषाएं ही नहीं, भारतीय समाज के विकास को देखें, तो हम पाएंगे कि हजारों वर्षो से हमारे पुरखे सिर्फ एशिया ही नहीं, यूरोप के लोगों से भी व्यापारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध बनाते रहे हैं, जबकि उस जमाने में यात्राएं कितनी मुश्किल थीं, यह हम आसानी से समझ सकते हैं।
यह जानना जितना रोमांचक है कि पचास हजार या उससे भी पुरानी पहली आदिम मानवीय भाषा की कुछ ध्वनियां हमारी बोलचाल में आज तक मौजूद हैं। उतना ही रोमांचक यह भी है कि तब से अब तक मानव समाज ने कितनी तरक्की की। जिस तरह अफ्रीका के अतीत की  किसी एक औरत से पूरी दुनिया के डीएनए के सूत्र जुड़ते हैं, वैसे ही किसी एक मातृभाषा से भी हम जुड़े हैं। पर उसके बाद का सफर, कम से कम आज से नौ-दस हजार बरस तक का अब भी धुंधला है।
इसे जानना रोमांचक होगा। जो तकनीक एटकिंसन ने अपनाई है, अगर उसकी अन्य वैज्ञानिक तरीकों से तसदीक हो सके, तो भाषा के इतिहास पर नई रोशनी पड़ सकती है। संभव है जैसे डीएनए के नक्शे ने इंसान का इतिहास खोजने में हमारी मदद की, वैसे ही भाषा के ये डीएनए हमारे लिए भाषाओं का इतिहास खोजने में मददगार हों।
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यह लेख आज हिन्दुस्तान दैनिक का सम्पादकीय है, जिसे आप ऑनलाइन भी देख सकते हैं, इस पोस्ट में दिया गया चित्र गूगल से साभार है :

Saturday, April 16, 2011

नीलकंठी ब्रजः वृंदावन की विधवाओं की दुनिया -राजेन्द्र सहगल


इस तथ्य से भला कौन इंकार कर सकता है कि तथाकथित प्रगतिशीलता और उत्तर आधुनिकता के इस दौर में भी भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा धर्म, संस्कृति, परम्परा और मर्यादा के नाम पर स्त्रियों का, विशेषतया विधवाओं का निरंतर दमन एवं शोषण कर रहा है।
रूढ़िवादी समाज की क्रूरताओं और बेड़ियों में छटपटाती विधवाओं के जीवन को आधार बनाकर असमिया की लब्ध प्रतिष्ठित रचनाकार इन्दिरा गोस्वामी का उपन्यास ‘नीलकंठी ब्रज’ विधवाओं के जीवन को दारुण वास्तविकताओं के चित्रण के साथ-साथ पुरुष वर्चस्व की घृणित परिणतियों के शोषण चक्र के रूपाकार की भी निर्मम व्याख्या करता है।
डाक्टर राय चौधरी की कच्ची उम्र में विधवा हुई बेटी सौदामिनी के ईसाई युवक के प्रति आकर्षित होने से कट्टर सनातनी धर्मभीरू पिता का पत्नी अनुपमा सहित ब्रजवास आगमन केउपरांत राधेश्यामियों के बीच जीवन की उद्दाम तरंगों की गला घोंटने की कारूणिकता पाठक को भिगो देती है। ब्रजमंडल की लीलाभूमि में शशिप्रभा का पुजारी आलमगढ़ी द्वारा यौन शोषण तथा रूढ़ियों-बेड़ियों में जकड़ी ‘राधेश्यामी’ विधवाओं के नारकीय जीवन की भयावहता सहज ही झिंझोड़ देती है।
अपनी नैसर्गिक इच्छाओं पर निरंतर दमन से इन ब्रजवासी विधवाओं के कंकाल जैसी देहों पर लिपटी मैली कुचैली धोतियों में लिपटे उनके मनोविज्ञान को उभारते हुए लेखिका का कहना है, ‘एक बार फिर वे प्रेतात्माएं हंस पड़ी। उनकी हंसी इस तरह कर्कशा थी, मानो अस्थियों का खड़ताल बज उठा हो।’
इन्हीं कठोर निर्मम बेड़ियों की जकड़न का ही नतीजा है कि जब महाप्रभु रंगनाथ की परिक्रमा या विलास विनोद की आम्रकुंजके लिए शोभा यात्रा निकलती है तो अपनी जीर्ण शीर्ण टूटी फूटी कोठरियों से ये अनायास निकल पड़ती है और इनके दुबले पतले हाथ पैरों में खून के दौरे से उन्माद सा उतर आता है। लेखिका ने संसार के सार और जगत के कर्म स्थान ब्रज में पंडो-दलालों के दुष्कृत्यों व मरी हुई बुढ़िया के क्रिया कर्म तक में छीनाझपटी व जूतम पैजार की बखिया उधेड़ी है।
शरीर और दिमाग के उत्ताप को जीने की लालसा में सांस लेते इन पात्रों की मनोव्यथा के जरिए लेखिका धर्म, संस्कृति और परम्परा के नाम पर भारतीय समाज में विशेषतया विधवा जीवन के रस को सोखने वाली चालों-कुचालों, एकाकीपन एवं परावलंबन के भीषण यथार्थ को संजीदा अभिव्यक्ति प्रदान करती है।
लेखिकाः इंदिरा गोस्वामी, अनुवादकः दिनेश द्विवेदी, प्रकाशकः भारतीय ज्ञानपीठ, मूल्यः 140 रुपये
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आज 'हिन्दुस्तान' में इस पुस्तक की समीक्षा छपी है . इसे आप ऑनलाइन भी देख सकते हैं :

Monday, April 11, 2011

हमारे पूर्वज हमें ईश्वर से जोड़ते हैं जो कि कल्याणकारी है The Lord Shiva and First Man Shiv ji

शिव का अर्थ है कल्याण करने वाला. यह नाम उस ईश्वर का भी है जिसने इस सृष्टि को पैदा किया है और यही नाम उस प्रथम पुरुष का भी है जिससे यह अनुपम मानव-सृष्टि चली है . यह नाम उनके बाद भी बहुत से लोगों का हुआ है और यह नाम आज भी बहुत से लोगों का है . शिव नाम पवित्र है . ईश्वर भी पवित्र है और प्रथम ऋषि शिव भी पवित्र है . सदाचार और पवित्रता ही उनकी शिक्षा थी . जो बात भी सदाचार और पवित्रता के विरुद्ध पाई जाये , उसे उनके बारे में सत्य न माना जाये तो धर्म का सत्य स्वरुप सामने आ जाता है . अपने शोध में मैंने यही पाया है . 

नाम की समानता के बावजूद हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ईश्वर का नाम भी शिव है और प्रथम ऋषि का भी लेकिन इसके बावजूद ईश्वर उपासनीय है और ऋषि उपासक है. शिव जी हमारे आदि पिता हैं और वे सदैव  परमेश्वर शिव का ध्यान किया करते थे. वे आहार में पवित्र चीज़ें लेते थे और पवित्र कर्म करते थे. मुसलमान स्रष्टा ईश्वर को अरबी में अल्लाह और आदि पिता शिव जी को 'आदम' कहते हैं . शिव जी की पत्नी ही हमारी आदि माता हैं , हिन्दू भाई उन्हें माता पार्वती और मुसलमान  उन्हें अम्मा हव्वा कहते हैं . भविष्य पुराण में उनका एक नाम 'हव्यवती' भी आया है. 

हमारे पूर्वज हमें ईश्वर से जोड़ते हैं. अगर हम अपने पूर्वजों के सत्यस्वरुप को वास्तव में जान लें तो हम बिना किसी अतिरिक्त साधना के सहज भाव से ही ईश्वर से जुड़ जाते है .हम आपस में भी वास्तव में तभी जुड़ सकते हैं जबकि हम पहले अपने पूर्वजों से सही तौर पर जुड़ जाएँ . उनके बारे में फैलाई गयी गलत बातों का खंडन करने  के बाद ही हमारे लिए उनका अनुकरण कर पाना संभव हो पाता है . 

इसी उद्देश्य से मैंने  कुछ लेख लिखे हैं . उनमें से कुछ को मैं यहाँ पाठकों की सुविधा के लिए एक साथ पेश कर रहा हूँ . इसमें अगर किसी  भाई को कोई तथ्य गलत लगता है तो उसे गलत पाए जाने पर तुरंत हटा दिया जायेगा .

क्या काबा सनातन शिव मंदिर है ? Is kaba an ancient sacred hindu temple?

क्या वाक़ई हज्रे अस्वद शिवलिंग है ? Black stone : A sign of ancient spiritual history.

 शिवलिंग की हक़ीक़त क्या है ? The universe is a sign of Lord Shiva . 

 शिव वंश के मरते मिटते सदस्यों को कौन यह बोध कराएगा कि वास्तव में वे आपस में सगे सम्बंधी और एक परिवार हैं ? Holy Family of Aadi Shiva

हे परमेश्वर शिव ! अपने भक्त भोले शिव के नादान बच्चों को क्षमा कर दे क्योंकि वे नहीं जानते कि वे आपके प्रति क्या अपराध कर रहे हैं ? Prayer

'ऋषियों को नाहक़ इल्ज़ाम न दो' Part 3 ; Shiva : The Innocent Father

हमें पंडे पुरोहित और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहिए - स्वामी विवेकानंद Hunger's cry

श्रद्धा के पात्रों को अपनी व्यंग्य विधा का पात्र न बनायें Honourable Personalities

 

Saturday, April 9, 2011

भगवान जो करता है भले के लिए करता है , देखने के लिए बस गहरी नज़र चाहिए Destiny

हे भगवान ! तेरा लाख-लाख शुक्रिया हैं- - स्वेट मार्डन

एक युवक-युवती आपस में एक-दूसरे को बेहद चाहते थे पर युवती को न जाने क्या सूझा कि उसने किसी दूसरे व्यक्ति से शादी कर ली। यह देखकर वह युवक सदमें मे चला गया। उसका खाना-पीना छूट गया। उस पर नशे का भूत सवार हो गया. मात्र दो सालों में वह सूखकर कंकाल हो गया। एक दिन समाचार पत्र में उसने देखा-एक युवक ने फाँसी खाकर आत्महत्या कर ली। वह यह देखकर चौंक उठा क्योंकि वह युवक और कोई नहीं उसकी प्रेमिका का पति था। उसने लिखा था- मैंने जिससे शादी की वह औरत इतनी गुस्सैल थी कि मैं उससे तंग आकर आत्महत्या कर रहा हूँ। यह पढ़ते ही उसने दोनों हाथ ऊपर उठाए और भगवान से कहा- हे भगवान ! तेरा लाख-लाख शुक्रिया हैं। अगर मेरी शादी उससे हो जाती तो आज अखबार में उसका नहीं मेरा फोटो छपा होता।
क्या आप जानते हैं, वही व्यक्ति आगे चलकर दुनियाँ का महान लेखक स्वेट मार्डन के नाम से मशहूर हुआ. उक्त घटनाक्रम से उनका जीवन का क्रम ह़ी बदल गया.
(साभार खबर इंडिया, सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए)

Thursday, April 7, 2011

दो ब्लॉग पर एक ही पोस्ट , अजय जी के साहस को हमारा सलाम मय 11 तोप के गोलों के साथ इसलिए कि शायद सोने वाले जाग जाएं भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ Corruption

अजय कुमार झा जी एक रूतबे वाले पत्रकार हैं और हमारी वाणी के मार्गदर्शक मंडल के प्रमुख से लेकर सामान्य तक हरेक सदस्य से उनकी जान पहचान भी अच्छी है । जो भी हो ग़लत आख़िर ग़लत है ।
अजय जी ने एक ही पोस्ट दो ब्लॉग पर डाल दी है और शीर्षक भी ज्यादा नहीं बदला ।
जगह जगह मौक़ा बेमौक़ा नियमावली बाँचने वाले द्विवेदी जी की पोस्ट भी उनके ऊपर नज़र आ रही है लेकिन ऐसे मौक़ों पर ये लोग धृतराष्ट्र का रोल प्ले करने लगते हैं ।
देखते हैं कि हमारी वाणी धर्म और अजय जी का रूतबा दरकिनार करके उनके दोनों ब्लॉग्स को आज निलंबित करती है या कल ?

Sunday, April 3, 2011

क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है World Cup 2011

क्रिकेट से खुन्नस रखने के पीछे मेरे निजी अनुभव हैं जो कि अच्छे नहीं हैं। जब मैं बच्चा था तो मुहल्ले भर के चाचा और तमाम तरह के दूर नज़्दीक के रिश्तेदार घर में क्रिकेट मैच देखने के लिए जमा हो जाया करते थे क्योंकि तब तक कम घरों में टी. वी. था। उनके घरों में पैसे की तंगी की वजह से टी. वी. नहीं था, ऐसी बात नहीं है। सभी लोग काफ़ी रिच हैं लेकिन तब तक घरों पर उन बड़े बूढ़ों का होल्ड था जो घर में टी. वी. आने की इजाज़त नहीं देते थे।
घर में जमावड़े से हमारे लिए कई तरह की दिक्क़तें खड़ी हो जाती थीं और घर का सारा दूध चाय बनाने में ही ख़र्च हो जाता था। हम सबको चाय सप्लाई करते रहते थे और बाज़ार से दूध और नाश्ते का सामान ही लाते रहते थे। ज़मींदार लोग थे, किसी को कोई काम अपने हाथ से करना नहीं था। नौकर खेतों पर काम करते रहते थे।
सबकी ऐश आ जाती थी और हमारी आफ़त। सबसे ज़्यादा दुख हमें अपनी वालिदा साहिबा को ढेर के ढेर कप धोते हुए देखकर होती थी। वालिद साहब के सामने कोई चूं भी नहीं कर सकता था। जिसने उन्हें न देखा हो वह सनम बेवफ़ा के डैनी या प्राण को देख ले। शलवार कमीज़ , सर पर पगड़ी और एक पठानी खंजर भी। अल्लाह का शुक्र है कि उस पर किसी का खून नहीं लगा। जिसका हमारे वालिद को आज तक मलाल है। कभी कभी सोचता हूं कि अगर सूरज इंसानी शक्ल में हमारे सामने आए तो उसे हमारे वालिद साहब का रूप रंग पूरी तरह मैच करेगा। चेहरा सुर्ख़ और आँखें अंगार, हर समय।
आम दिनों में जब वालिद साहब घर में होते थे तो हम इधर उधर टल जाया करते थे। क्रिकेट के दिनों में वालिद साहब की मौजूदगी का वक्त भी बढ़ जाता था और हम उनकी नज़र के सामने से हट भी नहीं सकते थे। चाय और पान की खि़दमत हमारे सुपुर्द जो हो जाया करती थी। इन सब बातों की वजह से हमें बचपन से ही क्रिकेट से नफ़रत हो गई थी। थोड़ा बड़े हुए तो पता चला कि कई बार इस क्रिकेट की वजह से देश में दंगे हो गए और बेवजह ही लोग मारे गए। इस खेल से हमारी नफ़रत में और ज़्यादा इज़ाफ़ा हो गया।
एम. ए. में पहुंचे तो हमें सोशियोलॉजी में बताया गया कि अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए शासक लोग जनता को खेल और मनोरंजन में लगा देते हैं। इससे उनका ध्यान जीवन के अहम मुद्दों से हट जाता है। यूनानी शासक यही करते थे।
हमने पाया कि जैसे-जैसे देश और दुनिया में समस्याओं का अंबार लगता जा रहा है, वैसे वैसे खेल और मनोरंजन के साधन भी जनता को ज़्यादा से ज़्यादा उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मीडिया ने बताया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन खेलों में प्रतिवर्ष खरबों रूपया ख़र्च करती हैं और उससे कई गुना ज़्यादा कमाती भी हैं। देश का पैसा खिंचकर विदेश में जाता है। पहले से ही कंगाल जनता कुछ और बदहाल हो जाती है और फिर यह भी सामने आ गया कि सट्टा किंग पहले से ही यह तक तय कर देते हैं कि जीतना किसे है ?
बहुत बड़ा गोरखधंधा है यह कप और विश्व कप। जो इसे समझता है, वह न किसी की हार से दुखी होता है और न ही किसी की जीत से खुश। जो नादान हैं वे समझते हैं कि हाय ! हम हार गए या हुर्रे ! हम जीत गए।
अफ़सोस होता है यह देखकर कि देश के 22 नौजवान 8 मई 2010 से सोमालियाई लुटेरों की क़ैद में हैं। जाने उनमें से कौन अब ज़िंदा होगा ?
हम एक एटमी पॉवर हैं और हमसे डरते नहीं हैं समुद्री लुटेरे भी। हमारे आदमी उन्होंने पकड़ लिए। इस बात पर अफ़सोस करने के लिए जो देश एक न हो सका, जो ब्लॉग जगत एक न हो सका और कोई सशक्त आंदोलन न चला सका। वह हिप हिप हुर्रे हुर्रे करके कह रहा है अहा, हम जीत गए।
क्या सचमुच हम जीत गए ?
यह सच है कि हमारी क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीत लिया है । तमाम बातों के बावजूद इसे एक उपलब्धि भी माना जा सकता है लेकिन हरेक चीज़ अपनी उपयोगिता के कारण ही सार्थक या निरर्थक मानी जाती है। आखि़र देश की जनता के लिए इस कप का उपयोग क्या किया जा सकता है ?
जिन देशों की सिरे से ही कोई क्रिकेट टीम नहीं है, क्या वे बेकार देश हैं ?
जिस देश में आज भी लोग मलेरिया के हाथों लाखों की तादाद में मर जाते हैं। जहां करोड़ों माएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं। जहां नशे के कारोबार को सरकारी आश्रय प्राप्त है और नशे की वजह से कितने ही रोड एक्सीडेंट रोज़ होते हैं या फिर कलह के कारण करोड़ों परिवारों का सुख चैन बर्बाद है सदा के लिए।
जहां गुरबत है और ऐसी गुरबत है कि मात्र एक रूपये में इस देश की औरत अपनी आबरू बेच रही है। मैं ऐसे फ़ौजियों से मिला हूं जिन्होंने यह सब खुद देखा है और उस इलाक़े का नाम मुझे बताया है। कश्मीर में भी मुझे यही पता चला। देश का कोई इलाक़ा शायद ऐसा न हो जहां ज़रूरतें इंसान की शर्म और ग़ैरत को न चाट रही हों। जहां ज़रूरतें और मजबूरियां नहीं हैं वहां भी यही सब हो रहा है। वहां वजह बन रही है दौलत की हवस। पति-पत्नी का रिश्ता एक पवित्र संबंध है लेकिन दौलत की हवस यहां भी पैर पसारे आपको मिल जाएगी और दहेज की इसी हवस में कहीं बहुएं जलाई जा रही हैं और कहीं लड़कियां या तो बेमेल ब्याही जा रही हैं या फिर कुंवारी ही बूढ़ी हो रही हैं या फिर गर्भ में ही मारी जा रही हैं। माएं आज बेसहारा हैं और विधवाएं तो हमेशा से हैं ही। जिन समस्याओं को हमें हल करना था, उन्हें हम हल नहीं कर पाए।
ग़रीबी और कुपोषण की वजह से बच्चे बचपन में ही या तो मर जाते हैं या फिर मज़दूरी करते हैं। किसान मज़दूर सूदख़ोर महाजन के ब्याज के फंदे में झूलकर आए दिन आत्महत्या करते हैं। कुछ बाबा और महात्मा ग़रीबों की सेवा पहले भी करते थे और आज भी करते हैं लेकिन इन्हीं का रूप बनाकर पहले भी ठग जनता को ठगते थे और आज भी ठग रहे हैं बल्कि मंत्री और मुख्यमंत्री तक बन चुके हैं। आशीर्वाद और योग को ये लोग कारोबार बना चुके हैं। भारत एक धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है और आस्था इसकी पहचान है लेकिन आज देश की जनता के सामने केवल अधिक से अधिक सुविधा और ऐश बटोरना ही एक मात्र मक़सद है। कभी जनता हड़ताल करती है तो कभी वकील और कभी डाक्टर।
देश का क़ानून टूटता हो तो टूटे , कोई मरता हो तो मरे, इनकी बला से इनके अधिकार कम न हों, इनकी सैलरी बढ़ा दी जाए। ये बुद्धिहीन लोग बुद्धिजीवी कहलाते हैं, यह देश की त्रासदी है। बस केवल सांसद ही कभी हड़ताल नहीं करते। उन्हें जो कुछ सुविधाएं लेनी होती हैं, अपने लिए खुद ही मंजूर कर लेते हैं।
इस आंतरिक मज़बूत एकता के बावजूद ये नेता बाहर से खुद को बंटा हुआ दिखाते हैं ताकि जनता यह समझे कि यह वामपंथी है और वह दक्षिणपंथी, यह समाजवादी है और वह निर्दलीय। यह अमीरों का पिठ्ठू है और वह ग़रीबों का मसीहा है। ये गुट बनाकर आमने सामने डटे रहते हैं और जब भी कोई पार्टी जीतती है तो पब्लिक समझती है कि ‘अहा ! हम जीत गए।‘
लेकिन जब वह पार्टी काम काज संभालती है तो वह भी पुराने ढर्रे पर ही आगे बढ़ती है जिससे जनता की केवल मुसीबतें बढ़ती हैं और उनसे ध्यान बंटाने के लिए उसके लिए खेल और मनोरंजन के साधन बढ़ा दिए जाते हैं।
आज चैराहों पर ढोल बज रहे हैं, पटाख़े छोड़े जा रहे हैं, मिठाईयां बांटी जा रही हैं। हर तरफ़ एक जुनून है, एक खुशी की लहर छाई हुई है। राष्ट्रवादी लोग भी मगन हैं। जो सारा माजरा समझते हैं वे चुप हैं। वे जानते हैं कि दीवानेपन और जुनून की कैफ़ियत में उनकी सही बात सुनेगा ही कौन ?
लेकिन ऐसा नहीं है।
सुनने वाले लोग भी इन्हीं के दरम्यान हैं। सोचने-समझने वाले लोग भी इन्हीं के बीच मौजूद हैं। आप कहेंगे तो बात उन तक ज़रूर पहुँचेगी जिन्हें मार्ग और मंज़िल की तलाश है।
जिन खेलों से सीधे तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होता है या फिर हमारे पूंजीपतियों और निकम्मे हाकिमों को, उनका प्रभाव लाज़िमन हमारे राष्ट्र को कमज़ोर ही करता है।
समस्याओं से त्रस्त लोगों के बीच खड़े होकर कहना कि ‘हम जीत गए।‘
सिर्फ़ यह बताता है कि उन्हें देशवासियों की समस्याओं से वास्तव में कुछ लेना-देना ही नहीं है। उनके लिए तो बस मनोरंजन ही प्रधान है। हमारे हाकिम भी यही चाहते हैं कि हमें होश न रहे। हरेक गली-नुक्कड़ पर नित नए खुलते हुए शराब के ठेके इसी बात की पुष्टि करते हैं। जिस देश में कभी गंगा शुद्ध बहती थी। उसी देश में आज शराब की नदियां बहाई जाएंगी और यह सब होगा राष्ट्रवाद के नाम पर। जो चीज़ राष्ट्र को खोखला करती है उसका इस्तेमाल राष्ट्रवादियों में आम क्यों है ?
महंगाई, मिलावट और नक्सलवाद से लेकर हरेक समस्या ले लीजिए, हम हर मोर्चे पर हार रहे हैं, ऐसे हालात में क्रिकेट के जुनून में दीवाना हो जाना मर्ज़ को और बढ़ा रहा है।
जो देख सकते हैं, वे हालात को सही एंगल से देखने का कष्ट करें मुल्क की भलाई की ख़ातिर, ऐसी हमारी विनती है।
बचपन में तो हम अपने वालिद साहब के सामने कह नहीं सकते थे लेकिन आप लोगों से तो हम कह ही सकते हैं कि क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है।
हरेक सोचे कि इस धरती पर उसके जन्म का उद्देश्य क्या है ?
इसके लिए वह अपने गुरूओं और ग्रंथों की सहायता ले और फिर देखे कि क्रिकेट के ज़रिए वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है या कि उससे दूर होता जा रहा है ?