Tuesday, June 7, 2011

पाकिस्तान और कश्मीर समस्या के बारे में क्या सोचते हैं ‘इल्मी मुसलमान‘ ? - Dr. Anwer Jamal

फ़ोटो में प्रेमपूर्ण मुद्रा में साथ खड़े हुए भाई तारकेश्वर गिरी जी

यह लम्हा वाक़ई एक यादगार लम्हा था। यह एक फ़ोटो मात्र नहीं है बल्कि यह भारतीय समाज का आईना भी है। यह फ़ोटो आज का नहीं है बल्कि यह उन दिनों का जब भाई गिरी जी हमारा विरोध करते-करते टॉप पर स्थान ले चुके थे। टिप्पणियां भी उन्हें इतनी मिला करती थीं कि उनकी पोस्ट का पेज छोटा पड़ जाया करता था। बहरहाल वे एक साफ़ सुथरे और प्यार करने वाले आदमी हैं। अपने विरोधियों में मैं उन्हें एक ऐसा विरोधी मानता हूं जिनसे कि मेरे विरोधी बहुत कुछ सीख सकते हैं। 
आज एक पोस्ट पर नज़र पड़ी तो याद आया कि यह आदमी ख़ुद को ब्राह्मण भी समझता है और जाने कैसे प्रोफ़ेसरी का जुगाड़ भी कर लिया है लेकिन भाषा-संवाद और व्यवहार में यह भाई तारकेश्वर गिरी जी से भी गिरा हुआ है। 
कितना गिरा हुआ है ?
इतना गिरा हुआ है कि जिस आदमी के विरोध में यह पोस्ट लिखेगा उसे अपनी पोस्ट पर टिप्पणी भी न करने देगा और अगर कर दी तो डिलीट कर देगा। 
यह ब्लॉगिंग का कौन सा रूप है भाई ?
गिरी जी हरगिज़ ऐसा नहीं करते। वह भले ही किसी आदमी से सहमत न हों और उसी आदमी के विरोध में उन्होंने ग़ुस्से में आकर चाहे दर्जनों पोस्ट लिख दी हों लेकिन तब भी वह उसकी टिप्पणी का भी सदा स्वागत करते हैं। 
प्रोफ़ेसर जैसे संकीर्ण मानसिकता के लोग यहां बुद्धिजीवियों के बीच बैठकर ‘कछुआ कफ़न‘ सी रहे हैं और ‘कफ़न चोरों‘ को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने के लिए जनमन भी बना रहे हैं। इनकी पोस्ट पर ऐसे-ऐसे लोग आकर सहमत हो रहे हैं जिन्हें भविष्य में ‘जयचंद‘ के नाम से भी कोई याद न रखेगा, यह सब देखकर दुख होता है। 
याद रहे कि जयचंद एक अच्छा पिता और एक बहादुर राजा था। उसे नाहक़ बदनाम किया गया है। जिसकी बेटी को कोई उसका विश्वास छलकर भगा ले जाएगा और किसी नैतिकता की परवाह हरगिज़ न करेगा तो वह फिर किसी नैतिकता की पाबंदी भला क्यों करेगा ?
जयचंद को गालियां देने से पहले सोचना चाहिए कि जयचंद को आखि़र किसने जयचंद बनने के लिए मजबूर किया ?
जब एक जयचंद ने ही देश को विदेशियों के हाथ सौंप दिया तो फिर आज एक पूरी क़ौम को जयचंद का इल्ज़ाम देकर उसे सचमुच ही जयचंद बनाने पर क्यों तुले हुए हैं कफ़नचोर ?
सिर्फ़ इसलिए ताकि ख़ुद इनकी ग़द्दारी का पर्दाफ़ाश न होने पाए।
बहरहाल, अगर आप फ़ोटो के संबंध में पूरी पोस्ट पढ़ना चाहते हैं आप नीचे दिए गए लिंक पर जाएं

Monday, June 6, 2011

एक सन्यासी और एक नेता होने के बावजूद बाबा रामदेव जी का औरतों के बीच छिपना कितना उचित कहलाएगा ? Baba Ramdev ji

बाबा रामदेव जी को महिला ड्रेस में देखने के लिए देखें  
http://loksangharsha.blogspot.com/2011/06/blog-post_06.html
योग गुरू बाबा रामदेव जी के साथ जो कुछ अभद्रता की गई वह निंदनीय है लेकिन यह भी सच है कि आदमी विपत्तिकाल में ही पहचाना जाता है। संकट में ही आदमी की वीरता और उसके नेतृत्व की परख होती है। यह देखकर बहुत दुख हुआ कि ज़रा सी मुसीबत पड़ते ही ‘भारत स्वाभिमान ट्रस्ट‘ के संस्थापक औरतों के आंचल तले जा दुबके जो कि न तो एक वीर गृहस्थ को शोभा देता है और न ही एक सन्यासी को। बाबा रामदेव एक आर्य समाजी सन्यासी हैं।
आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद जी ने की थी। उन्होंने आजीवन हिन्दू मत के भ्रष्ट मठाधीशों से जमकर मुक़ाबला किया लेकिन न कभी कहीं से भागे और न ही कभी छिपे। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि उनकी जान को अमुक से ख़तरा है क्योंकि उन्हें पता था कि जो काम वे लेकर चल रहे हैं। उसमें जान जानी ही जानी है।
मैं उनके बहुत से विचारों से सहमत नहीं हूं तो भी उनके जीवट की प्रशंसा ज़रूर ही करूंगा।
ऐसे ही उनके जीवन की एक घटना और भी याद आती है। एक बार वे नदी किनारे ध्यान लगाए बैठे थे तभी एक औरत आई और उसने उनके पैर छू लिए। स्वामी जी ने तुरंत आंखें खोलीं और नदी में छलांग लगा दी। उन्हें यह गवारा नहीं था कि कोई औरत उन्हें छुए क्योंकि एक सन्यासी की मर्यादा यही है। स्वामी जी ने एक सन्यासी की मर्यादा का ध्यान रखा और जीवन के कठिन कष्टों को हंसकर झेला जबकि अच्छे अच्छे भाग खड़े होते हैं। बाबा रामदेव जी पर मुसीबत पड़ी तो वे अपने गुरू जी के पदचिन्हों पर भी न टिक सके और मामूली सी झड़प को अपने जीवन की सबसे काली रात घोषित कर दिया। ऐसी ऐसी रातें तो स्वामी दयानंद जी के जीवन में बहुत गुज़री हैं।
बाबा रामदेव जी को स्वामी दयानंद जी के जीवन से कुछ सबक़ हासिल करना चाहिए और जब तक उनमें नेतृत्व के गुण अच्छी तरह विकसित न हो जाएं तब तक उन्हें योग सिखाना चाहिए और कराटे-कुंगफ़ू सीखना चाहिए ताकि मुसीबत के मौक़ों पर अपनी जान बचाने के लिए आगे उन्हें औरतों के आंचल तले न छिपना पड़े। यह एक सन्यासी की मर्यादा के प्रतिकूल है। ऐसा दृश्य शायद इस महान भूमि पर पहली बार देखा गया है। यह वाक़ई एक शोकपूर्ण घटना है जिसमें कांग्रेस और बाबा दोनों ही फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी के ज़िम्मेदार हैं। 
अंत में हम ब्लॉग प्रसिद्ध वकील जनाब द्विवेदी के शब्दों में कहेंगे कि न बाबा कम और न सरकार!

इस विषय पर हमारी कुछ अद्भुत टाइप की टिप्पणियों का भी आनंद लेना न भूलिएगा।


ZEAL said...


.डॉ अनवर जमाल --

क्या वजह है की कोई भी मुसलमान इस बर्बरता की निंदा नहीं कर रहा ?
क्या आप भारतीय नहीं हैं ? यदि हैं तो आपको निर्दोष लोगों का इस तरह पिटना कष्ट नहीं दे रहा ?
क्या आप 'अल्पसंख्यक' कहलाने में फख्र महसूस करते हैं ।
क्या आपको कांग्रेस की यह बर्बरता की निति सही लगती है।
क्या आपको नहीं लगता की देश से भ्रष्टाचार दूर होना चाहिए ?
क्या आपको नहीं लगता की कला धन विदेशों से वापस लाया जाना चाहिए?
क्या आपको नहीं लगता की राजा और कलमाड़ी जैसे देश के लूटने वालों के खिलाफ कारवाई होनी चाहिए बजाये बाबा के।
क्या क्रूरता और बर्बरता की निंदा करना सिर्फ हिन्दुओं का काम है।
जो लोग घायल हुए हैं , पीटे गए हैं , क्या उनसे सहानुभूति नहीं है आपको ?
जो महिलाएं बेरहमी से घसीट घसीट कर मारी गयीं और भगायीं गयीं , वो किसी की माँ , बहन नहीं ? ....( आपका तो ब्लॉग ही है प्यारी माँ ) ।
क्यूँ नहीं मुसलामानों का रक्त खौलता जब भारत देश की मासूम जनता इस तरह क्रूरता का शिकार होती है तो? सलमान , शाहरुख़ से लेकर सभी ब्लॉगर मुसलमान भाई भी बाबा के खिलाफ क्यूँ है ? आखिर क्या वजह है इसकी?

डॉ अनवर जमाल ,
क्या आपको नहीं लगता की आप लोगों को - "अशफाक उल्ला खान" और श्री एपीजे अब्दुल कलाम जैसे देशभक्तों से कुछ सीखना चाहिए ?












डा. दिव्या श्रीवास्तव जी ! आपने दो तरह के मुसलमानों का ज़िक्र एक साथ कर दिया है :


1. फ़िल्मी मुसलमान

2. इल्मी मुसलमान

शाहरूख़ और सलमान दोनों फ़िल्मी मुसलमान हैं । सिल्वर स्क्रीन इनका फ़ील्ड है । अपने फ़ील्ड में ये लोग आये दिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते ही रहते हैं और देश के युवाओं को भी ऐसी ही प्रेरणा देते रहते हैं । इनकी फिल्मों से प्रेरणा पाने वाले बहुत सारे युवा आज बाबा के साथ हैं ।

दूसरे हैं इल्मी मुसलमान । वे जानते हैं कि बाह्य रूप से भारत में भ्रष्टाचार की केवल ब्राँच है जबकि इसका मूल अमेरिका , ब्रिटेन और इस्राईल में है ।
इल्मी मुसलमान भ्रष्टाचार के मूल पर प्रहार कर रहे हैं और अपने भारत में कोई उपद्रव करना या होते देखना नहीं चाहते । जो मुसलमान नहीं हैं , मूल पर प्रहार करने का माददा और हिम्मत उनमें है नहीं सो वे ब्राँच पर ही ज़ोर आज़माई कर रहे हैं । इस तरह जो कुछ वे कर रहे हैं , उससे एक सन्यासी की मर्यादा पर आँच आ रही है ।

...तो भी काँग्रेसी हिन्दुओं द्वारा अत्याचार निंदनीय है। क्रिश्चियन सोनिया और सिक्ख मनमोहन जी को इनके हाथों की कठपुतली नहीं बनना चाहिए या अगर परिस्थिति इसके विपरीत है तो वह भी नहीं होना चाहिए ।

मुझे बाबा की जान ख़तरे में नज़र आ रही है । लोग काँग्रेस से नाराज़ हैं । ऐसे में अगर बाबा को किसी साथ वाले ने महाप्रयाण करा दिया तो अगली सरकार निश्चित रूप से राष्ट्रवादियों की होगी ।
लेकिन हमें विश्वास रखना चाहिए कि सत्ता पाने के लिए राष्ट्रवादी ऐसा नहीं करेंगे ।

अब आपसे विनती है कि आप सिक्खों से भी पूछें कि वे मनमोहन सिंह जी की भ्रष्टाचारी सरकार को उखाड़ फेंकना क्यों नहीं चाहते ?
उनकी रगों के ख़ून की वफ़ादारी भी चेक कीजिए न ?
हरेक शक और सवाल के दायरे में केवल मुसलमान ही क्यों ?






DR. ANWER JAMAL said...जलियावालाँ काँड की इस घटना से तुलना ही कुछ नहीं । वह योग किस काम का जिसके ज़रिए योगी आत्मरक्षा भी न कर सके ? बाबा रामदेव जी को अब कराटे कुंगफ़ू भी सीखना और सिखाना चाहिए।सत्याग्रह में लाठी गोली और बम ही चलते आए हैं । बाबा जी को पुष्पवर्षा की आशा थी ही क्यों ? मारे डर के औरतों में छिपना सन्यासियों के इतिहास में पहली बार घटित होने वाली एक कलंकित घटना है । भारतीय सन्यासी मौत से कभी नहीं डरते । पता नहीं बाबा का सन्यास किस टाइप का है ?सन्यासी कभी पर स्त्री को स्पर्श नहीं करता।सारी पोल एक झटके में ही खुल गई लेकिन भक्त तो अक़्ल से कोरे ठहरे सो बाबा की अब आ गई मौज !
June 6, 2011 5:20 PM 
3. ज़ाकिर अली भाई के ब्लॉग पर हमारी एक नायाब टिप्पणी

DR. ANWER JAMAL ने कहा…


इसमें कोई शक नहीं है कि मंदिरों और मज़ारों पर चढ़ावे में जो धन संपत्ति दान दी जाती है उसे वहाँ के ज़्यादातर व्यवस्थापक लोकसेवा में लगाने के बजाय अपनी ऐशो इशरत में ख़र्च करते हैं और यह सरासर धार्मिक भ्रष्टाचार है । इसे दूर करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना कि विदेशों में जमा काले धन का राष्ट्रीयकरण करना।
...और यह काम बाबा के बस का है नहीं ।
 6/06/2011 3:32 PM
 ...और एक पूरी पोस्ट ‘हिन्दी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल‘ पर

Saturday, June 4, 2011

क्या छोटे-बड़े हिंदी ब्लॉगर्स को सम्मान से वंचित करने की तैयारी है परिकल्पना का ब्लॉगोत्सव ड्रामा ? ; एक महाविचारणीय प्रश्न

'साथ ही मैं इस निष्कर्ष पर भी पहुंचा हूँ कि परिकल्पना सम्मान-२०११ के लिए पूर्व की भांति उन्ही रचनाकारों में से ५१ सर्जकों का चयन किया जाए जो ब्लॉगोत्सव-२०११ में हिस्सा लेंगे , यानी ब्लॉगोत्सव में हिस्सा न लेने वाले रचनाकार इस बार भी इस सम्मान से वंचित रहेंगे !'
-श्री रवींद्र प्रभात 

 डा. अनवर जमाल और BK संगीता जी


आज हमारी नज़र श्री रवींद्र प्रभात जी के लेख पर पड़ी तो उसमें उपरोक्त पंक्तियां पढ़ने को मिलीं। इससे पता यह चला कि जो भी ब्लॉगर श्री रवींद्र जी को लेख नहीं भेजेगा, उसे वह सम्मान से वंचित कर देंगे जैसे कि वह ब्लॉगोत्सव 2010 में बहुत से ब्लॉगर्स को सम्मान से वंचित कर ही चुके हैं। इस तरह तो यह ब्लॉगोत्सव अधिकतर ब्लॉगर्स को सम्मान से वंचित ही करता रहेगा। 
बिहारी बंधु ! हिंदी ब्लॉगर्स को क्यों सम्मान से वंचित करने पर तुले हुए हो ?
अगर सब इकठ्ठा हो गए तो आप अपमान तक से वंचित हो जाएंगे और एक ब्लॉगर यहां ऐसा भी है जो किसी के इकठ्ठा होने की इंतज़ार नहीं करता बल्कि अकेला ही अपमान की कालिमा का रेनबो सा कलंकित व्यक्ति के चारों ओर फैला देता है।
लेकिन आजकल हम इन चक्करों में पड़ना नहीं चाहते हैं क्योंकि हम ‘हूरों की दुनिया‘ से ताज़ा ताज़ा लौटे हैं और हमने वहां ‘ओम शांति‘ का पाठ भी किया था, ध्यान भी किया था और अपने स्वागत गान में भी यही सुना था।
ऐसे शांतिकाल में हम तो बस यह सलाह देना चाहेंगे कि 

Real Beauty - Dr. Anwer Jamal

Who does not like good looking face and body but mostly are got by birth not by their own attempt.. Nobody has power to grow his hight as he wants. Men and women , who are in the field of modeling are beautiful by birth. They did only polish  and try to keep them fit.It is not right to check anyone seen by his beauty which is not in his hand. Especially then, he is not only a body but he has mind and soul also.
That man is able to entitle beautiful in real, who keep always good thinking and good acts. The man who has positive thinking, his deeds will be maeningful, It is fixed. Such a man is full of qualities like love, peace, co-operation and charity. He tries his best to get remove the troubles of the people around him. The people are among them who sacrify themselves in the interest of their nation and country.

Easy tips to get true beauty
1. Necessary thought- A man needs eating, drinking, house, dress, education and medical care. To get these things whatever he thoughts called nessessary thought.
2. Useless thought- A lot of thoughts about past and future come in useless thoughts.
3. Negative thought- Anger, proud, jealous and greed make a man negative.
4. Positive thought- Against negative thinking love, peace and charity are known as positive thinking. These thoughts are foundation of success for a man and civilization.  Positive thinking makes a man useful and popular in the society.
To know our thoughts and improve them is known as 'Thought management'. By this art anyone can make himself gentle and kind and make his mind good and pure.
Who has made his mind positive, he deserves to be known as beautiful personality in real.

Friday, June 3, 2011

सच्ची सुंदरता के लिए अपने मन को सुमन बनाएं Real Beauty

At Brahmakumari mission
इंसान नाम है शरीर, मन और आत्मा के योग का। इंसान मात्र शरीर नहीं है। आत्मा वैज्ञानिक प्रयोगशाला का विषय नहीं है लेकिन वैज्ञानिक मन के अस्तित्व को मानते हैं। मन विचार करता है और संकल्प लेता है। अच्छे संकल्प मन को शुद्ध करते हैं और शक्तिशाली बनाते हैं। अच्छे विचार और अच्छे संकल्प मन को लगातार निर्मल करते रहते हैं। मन की सुंदरता के लिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी है। यही बात शरीर के लिए भी है कि वह तभी तक सेहतमंद और सुंदर रह सकता है जब तक कि उसके अंदर का मैल पसीने और मल-मूत्र आदि के रूप में बाहर निकलता रहे।
शरीर का मल बाहर निकलता रहे, इसके लिए हम पूरा ध्यान रखते हैं लेकिन अपने मन की बेहतरी के लिए हम ऐसी कोशिश नहीं करते। इसी का नतीजा यह होता है कि हमारे भीतर बहुत से नकारात्मक और फ़ालतू विचार जमा हो जाते हैं और प्रायः वही हमारे मन में घूमते रहते हैं। हमारे फ़ैसले इन्हीं की बुनियाद पर होते हैं। ग़लत फ़ैसलों के नतीजे भी ग़लत ही निकलते हैं और हमारे साथ वे लोग भी दुख भोगते हैं जो हमारे ग़लत फ़ैसलों से प्रभावित होते हैं।
किसी भी मर्द या औरत का सुंदर चेहरा और शरीर अक्सर क़ुदरत का तोहफ़ा होता है। इसीलिए जितने भी सुंदर मर्द या औरतें मॉडलिंग के फ़ील्ड में हैं, वे अपनी मेहनतों से ख़ूबसूरत नहीं बने हैं बल्कि वे पहले से ही ख़ूबसूरत थे। उन्होंने तो बस अपने शरीर की ख़ूबसूरती को निखारा है और उसका रख-रखाव मात्र किया है।
हरेक शरीर अपनी जगह ख़ूबसूरत है लेकिन फिर भी ख़ूबसूरती को आंकने के लिए जो पैमाने बना लिए गए कि लंबाई और वज़न कितना होना चाहिए और किस अंग की नाप कितनी हो ? आदि आदि
इस पैमाने पर पूरा उतरना हरेक मर्द या औरत के लिए आसान नहीं है क्योंकि लंबाई बढ़ा लेना किसी के हाथ में नहीं है। इसी वजह से बहुत कम शरीर सुंदरता के पैमाने पर पूरे उतरते हैं। जो चीज़ किसी इंसान के हाथ में ही न हो। उस पर परखकर इंसान को बेहतर या कमतर क़रार देना ठीक नहीं है और ख़ासकर तब जबकि इंसान मात्र शरीर नहीं है।
इंसान की हक़ीक़त उसके अंदर छिपी रहती है लेकिन उसके विचार और उसके कर्म उसकी हक़ीक़त को ज़ाहिर करते हैं। जिसके विचार सुंदर और कर्म अच्छे हैं, वही इंसान वास्तव में सुंदर कहलाने का हक़दार है, चाहे वह मर्द हो या औरत।
यह हरेक इंसान के हाथ में है कि वह क्या सोचना चाहता है और वह क्या करना चाहता है ?

सच्ची सुंदरता को पाने का सरल उपाय
इंसान के मन में प्रायः चार प्रकार के विचार पाए जाते हैं
1. ज़रूरी विचार
2. व्यर्थ विचार
3. नकारात्मक विचार
4. सकारात्मक विचार

1.ज़रूरी विचार- अपने वुजूद को बाक़ी रखने के लिए इंसान को खाने-पीने, मकान-लिबास, शिक्षा और इलाज की ज़रूरत होती है। इन्हें पाने के लिए जो विचार होते हैं। वे ज़रूरी विचार की श्रेणी में आते हैं।
2. व्यर्थ विचार- जो इंसान अतीत और भविष्य के विषय में अत्यधिक विचार करता है। वह व्यर्थ विचारों में खोया हुआ रहता है। अतीत एक सपना है और भविष्य एक कल्पना है जबकि वर्तमान हमारा अपना है। हमें वर्तमान में जीना चाहिए। हमारा वर्तमान ही हमारे भविष्य को निर्धारित करता है।
3. नकारात्मक विचार- अपने फ़ायदे या अपने इंतक़ाम के लिए दूसरों को नुक्सान पहुंचाने के विचार नकारात्मक विचार कहलाते हैं। ग़ुस्सा, अहंकार और जलन वग़ैरह इसी श्रेणी में आते हैं। इन्हें त्यागने की ज़रूरत है।
4. सकारात्मक विचार- नकारात्मक विचारों के विपरीत प्रेम, शांति और परोपकार के विचार सकारात्मक
विचार कहलाते हैं। इंसान की कामयाबी की बुनियाद और सभ्यता के विकास का आधार यही विचार होते हैं। सकारात्मक विचार ही इंसान को सबके लिए उपयोगी बनाते हैं और समाज में लोकप्रियता दिलाते हैं।
अपने विचारों को जानने और संवारने की यह कला ‘थॉट मैनेजमेंट‘ कहलाती है। इस कला के माध्यम से आदमी अपने मन को सुमन बना सकता है। एक सुंदर व्यक्तित्व कहलाने का हक़दार वास्तव में वही है जिसने अपने मन को सुमन बना लिया है।

Thursday, June 2, 2011

25,000 houries 'हूरों की दुनिया में' अनवर जमाल का स्वागत हुआ गुलाब के फूलों से

स्वागत गान

खुले मन से होता यहां सबका स्वागत
नहीं ग़ैर कोई, ये अपनों की दुनिया
यहां आके जन्नत का कर लो नज़ारा
ये हूरों की दुनिया, फ़रिश्तों की दुनिया

करो आत्मचिंतन करो योग साधना
कि तन होगा निर्मल, कि मन होगा पावन
ये जीवन हो दुनिया की सेवा में अर्पण
तो हो जाए अपनी ये ग़ैरों की दुनिया
खुले मन से...

कहो ओम शांति सुनो ओम शांति
लिखो ओम शांति, पढ़ो ओम शांति
ये है मंत्र ऐसा कि जपने से जिसके 
सदा दूर रहती है कष्टों की दुनिया
खुले मन से...

निराधार मन को आधार है शिव का
ये सृष्टि है शिव की, ये संसार शिव का
बराबर है सबके लिए प्यार शिव का
ये दुनिया है शिव जी के बच्चों की दुनिया

खुले मन से होता, यहां सबका स्वागत
नहीं ग़ैर कोई, ये अपनों की दुनिया
यहां आके जन्नत का कर लो नज़ारा
ये हूरों की दुनिया, फ़रिश्तों की दुनिया

BK राजकुमारी जी, डा. अनवर जमाल, पार्वती जी, संगीता जी, पारूल जी व अन्य

फूल भेंट करते हुए बीके हरिदत्त शर्मा जी

तल्लीन होकर सुनते हुए मुस्लिम विद्वान

संगीता जी जानकारी देते हुए

सेंटर के हॉल का एक दृश्य

सिस्टम पर यह स्वागत गान ब्रह्माकुमारी पारूल जी ने हमारे सम्मान हम सबको सुनाया। सफ़ेद पोशाक में सभी ब्रह्माकुमारियां एक अद्भुत प्रेम और शांति का अनुभव हम सभी को करा रही थीं। उनकी बातों का केन्द्र भी शांति था। यह घटना रियासत रामपुर की घटना है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कल दिनांक 1 जून 2011 को बुधवार के दिन मुस्लिम विद्वानों का एक प्रतिनिधिमंडल ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की रामपुर शाखा पर पहुंचा। इस ग्रुप में हरेक उम्र के मर्द-औरत और लड़के-लड़कियां थे। इनकी तादाद 70 से ज़्यादा थी। इस मुलाक़ात का मक़सद यह था कि सभी मत-संप्रदायों के विद्वान अपने ज़िम्मेदारों की मौजूदगी में समय-समय पर आपस में मिलते रहें तो सभी को एक दूसरे की मान्यताओं के बारे में सही जानकारी मिलती रहेगी और ग़लतफ़हमियां दूर होती रहेंगी। यह प्रक्रिया समाज के सदस्यों को प्रबुद्ध और सहिष्णु भी बनाती है और समाज के साझा हितों के लिए एक दूसरे का सहयोगी भी बनाती है। 
सेंटर के गेट पर सबसे पहले बीके श्री हरिदत्त शर्मा जी ने स्वागत किया और सभी लोगों को गुलाब के फूल भेंट करके अपने प्यार का इज़्हार किया। उसके बाद सबसे पहले हमें एक मधुर स्वर में स्वागत गान सुनाया गया। उसके बाद हमें संस्था के उद्देश्य और उसके कार्यक्रमों और सेवाओं की जानकारी दी गई। बीके पारूल जी और बीके पार्वती जी विशेषकर हमारे लिए बरेली से पधारी थीं। रामपुर की शाखा का कार्यभार ब्रह्माकुमारी संगीता जी संभाले हुए हैं। तीनों विदुषियों ने बारी-बारी से दादा लेखराज जी द्वारा आरंभ किए गए इस मिशन की मान्यताओं के बारे में विस्तार से बताया गया। सबके बाद प्रश्नोत्तर कार्यक्रम हुआ और इसी दरम्यान हल्का सा नाश्ता भी हम सभी को प्रेमपूर्वक भेंट किया गया। 
उन्होंने हमसे क्या कहा और हमने उन्हें क्या बताया ?
अगर इसे लिखना शुरू किया जाए तो इसमें 10 दिन आराम से लग जाएंगे। 
बहरहाल उन्होंने हमसे कहा कि आप हमारे हैडक्वार्टर माउंट आबू पधारें। अब जल्द ही 100 मुस्लिम विद्वानों का एक डेलीगेशन लेकर हम जाएंगे माउंट आबू। इस संस्था में ब्रह्माकुमारियों की कुल तादाद 25,000 है। जो कि दुनिया भर के 137 देशों में राजयोग की शिक्षा दे रही हैं। सभी अनुशासित हैं और साधना व संयम का एक अनोखा नमूना पेश कर रही हैं। ये सभी अविवाहित ही रहती हैं। इनकी वाणी मधुर और विचार स्पष्ट होते हैं। इनके यहां वाक़ई सबका स्वागत होता है और अच्छे तरीक़े से होता है। इनके साथ गुज़रे हुए पलों को यादगार पलों में शुमार किया जाएगा। 
यह एक संक्षिप्त रिपोर्ट है ताकि हमारे प्यारे जान सकें कि हम कब कहां थे और क्या कर रहे थे ?
इसी मक़सद से मोबाइल द्वारा कुछ फ़ोटो भी लिए गए और अब आपके सामने पेश किए जाते हैं।

Wednesday, June 1, 2011

एक ही चीज़ के अलग अलग भाषाओं में नाम अलग अलग होना स्वाभाविक है - Dr. Anwer Jamal



सनातन धर्म सभी मनुष्यों को 'आत्मवत' देखने की शिक्षा देता है और जो ऐसा नहीं करता उसे अज्ञानी , मूर्ख और नर्क में गिरने वाला बताता है। एक परिवार को भाषा, क्षेत्र और संस्कृति के अंतर के कारण खंडित और विभाजित करना सबसे बड़ी ग़लती है। जो मनुष्य यह ग़लती करता है वह धर्म पर होता ही नहीं । सारी मनुष्य जाति मनु की संतान और एक परिवार है. यहाँ सभी अपने हैं, गैर तो यहाँ कोई कभी था ही नहीं और न ही आज है.

आप सनातन धर्म का पालन कीजिए , इस्लाम का पालन ख़ुद ब ख़ुद हो जाएगा। इस्लाम का अर्थ है ईश्वर की आज्ञा का पालन करना। इसी से मन, बुद्धि और आत्मा को शांति मिलती है। मनुष्य का सनातन धर्म यही है।

जो सदा से चला आ रहा हो उसे सनातन कहते हैं।
इस्लाम शब्द सुनकर यह लगता है कि जैसे सनातन धर्म से हटने के लिए कहा जा रहा है, यह भ्राँति मात्र है।
अगर आपको प्यासा देखकर मैं आपके प्यार में आपसे कहूँ कि आइये कोल्ड ड्रिंक ले लीजिए तो क्या आपका यह कहना उचित होगा ?
"कि आपकी सोच तो बहुत गंदी है जो आप मुझसे कोल्ड ड्रिंक पीने के लिए कह रहे हैं । हम तो 'शीतल पेय' पीने वालों में से हैं । जाओ मियाँ जाओ और पहले अपनों को पिलाओ कोल्ड ड्रिंक।"
जो ऐसा कहे, उसे क्या समझा जाए और आख़िर कैसे समझाया जाए ?
कुछ भाई ऐसे हैं जिन्होंने  डेढ़ साल तक मेरे लेख पढ़े और आप आज तक वे यह नहीं जान पाए कि एक ही चीज़ के अलग अलग भाषाओं में नाम अलग अलग होना स्वाभाविक है। लड़ने और बुरा मानने के लिए यह उचित कारण नहीं है मैंने धर्म के लिए अरबी भाषा का शब्द क्यों इस्तेमाल कर लिया ?
यहाँ सभी मेरे प्यारे भाई-बहन हैं और रहेंगे। मैं कभी आपको पराया मानने वाला नहीं हूँ।
इंसान को सच्ची ख़ुशी तभी मिलती है जब वह सबको अपना समझता है और नेकी के जिस रास्ते पर ख़ुद चलता है और दूसरों को भी उसी की प्रेरणा देता है।
ऐसे लोगो की मानसिकता को देखते हुए अब मैं इस्लाम का संस्कृत पर्यायवाची प्रयोग करूंगा और कहूँगा कि आप सनातन धर्म का पालन करें। सनातन धर्म भी गुटखा खाने, शराब पीने, फ़िज़ूलख़र्ची करने और अपनी वासनाओं में जीने से रोकता है जो कि मानवता की तबाही का कारण है.

1. अब आप देख लीजिए कि आप अपनी वासना पर चलते हैं या ईश्वर की आज्ञा पर ?
2. जब आप कोई काम करते हैं तो आप उसमें अपना लाभ और अपनी सुविधा देखते हैं या ईश्वर की आज्ञा ?

अगर आप ईश्वर की आज्ञा पर चलते तो आप मानते कि सारी वसुधा एक परिवार है और इसका मुखिया केवल एक ईश्वर है तब आप सोचें कि यहाँ पराया कौन है?
हरेक मनुष्य अपना है जबकि लोग  मुझसे कहते हैं कि मैं अरबों भाई-बहनों को पराया समझूँ ?
क्या मुझे ऐसा करना चाहिए ?
जबकि हम सभी को मिलकर कहना चाहिए
'धर्म की जय हो'
सादर ,

वंदे ईश्वरम् !
कृपया देखें :