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Sunday, July 18, 2010

Orphans जो कोई किसी अनाथ के सिर पर प्यार से हाथ फेरता है तो अल्लाह उसके आमालनामे ने उसके सिर के बालों के बक़दर ही नेकियां लिखवा देता है।-Anwer Jamal

आज अख़बार देखा तो ‘हिन्दुस्तान‘ के आख़री पेज पर ‘वैशाली में बसते हैं फ़ादर टेरेसा‘ शीर्षक पर नज़रें ठिठक गईं। इसमें बताया गया है कि प्रद्युम्न कुमार 1972 में पटना गये थे तो उन्हें सड़क पर एक अनाथ बच्चा बीमारी में तड़पता हुआ मिला। उसे अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। इस वाक़ये से उन्होंने अनाथ बच्चों की देखभाल करने की ठान ली। घरवाले अब तो उनके साथ हैं लेकिन शुरू में उन्होंने भी उन्हें ताने दिये। प्रद्युम्न कुमार के पास आरम्भ में 11 अनाथ बच्चे थे । अनाथ बच्चों की देखभाल वे बिना किसी सरकारी सहायता के करते हैं। इसके लिये उन्हें रेलगाड़ियों और बस अड्डों में भीख तक मांगी। वे बच्चों को सातवीं कक्षा तक अपने आश्रम , लोक सेवा आश्रम, जनकल्याण समिति केन्द्र में शिक्षा देने के बाद आगे की पढ़ाई के लिये दूसरे स्कूलों में दाखि़ल करवा देते हैं और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करते हैं।


यह ख़बर एक रचनात्मक ख़बर है। इसे पढ़कर दूसरी ख़बरों से उपजा क्षोभ काफ़ी कम हो गया।

जैसे कि फ़्रंट पेज पर ख़बरें थीं कि ‘जवान ने 7 साथियों को गोलियों से भूना‘ और ‘एसडीएम ने की ख़ुदकुशी की कोशिश‘ वग़ैरह वग़ैरह।

जो लोग महत्वाकांक्षी होते हैं और केवल अपने ही लिए जीते हैं वे अपने सपनों को ढेर होते देखकर निराश हो जाते हैं और उस रास्ते पर चल पड़ते हैं जिसपर चलने की सलाह वे अपने बच्चों को कभी नहीं दे सकते।

नाश्ता कर ही रहा था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। सामने एक टीन एजर खड़ा था। उसने बताया कि वह नेत्रहीनों के लिए काम करने वाली किसी संस्था की तरफ़ से आया है। मैंने उससे पूछा कि क्या वह अकेला है या उसके साथ कुछ और भी लड़के हैं?

उसने कहा कि उसके साथ दो लड़के और हैं।

मैंने कहा कि क्या आप चाय पीयेंगे ?

उसने निस्संकोच मेरा प्रस्ताव कुबूल कर लिया और अपने साथियों को लेने चला गया। जब तक वह लौट कर आया तब तक चाय और वाय तैयार हो चुकी थी।

मेहमान नवाज़ी भी अदा हो जाए और हिफ़ाज़त के आदाब भी पूरे हो जाएं लिहाज़ा चाय घर से बाहर और बाउंड्री के भीतर ही पिलाई गई। इस दरम्यान मैं उनसे उनके और उनकी संस्था के बारे में बातें करता रहा। उनमें से एक लड़का राजेश पहले भी कई बार मेरे पास आ चुका था। उसके एक पैर में लंगड़ाहट भी है। वह 10 वीं कक्षा में पढ़ रहा है और किसी साहब ने उसकी कम्प्यूटर के कोर्स की फ़ीस देने का वायदा किया है। मैंने उसमें तालीम के लिये लगन पाई।

दूसरे लड़के ने अपना नाम मोहित शर्मा बताया और कहा कि वह टेलरिंग का काम सीख रहा है।

मैंने मोहित से कहा कि जब आपको ही बचपन से अपने मां-बाप का पता नहीं है तो आपको कैसे पता कि आप शर्मा हैं ?

वह बोला कि बस हम तो खुद ही कहते हैं ?

मैंने तालीम का पता किया तो वह बोला कि पढ़ाई तो सातवीं के बाद ही छोड़ दी थी।

मैंने कहा-‘ शर्मा कहते हैं पंडित को और पंडित कहते हैं ज्ञानी को । जब आप खुद को शर्मा कहते हैं तो आपको अपनी पढ़ाई जारी रखनी चाहिये। वक्त बहुत जल्दी बीत जाएगा। आप दिल्ली में रहते हैं, वहां मौक़ों की कमी नहीं है लेकिन मौक़े से फ़ायदा आप तभी उठा पाएंगे जबकि आप तालीमयाफ़्ता होंगे।‘

मैंने देखा कि उसे मेरी बात में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है। दरअस्ल आदमी वही करता है जो उसे आसान लगता है और उसके मन को भाता है। तब मैंने उसे लेडीज़ टेलर बनने की सलाह दी। दरअस्ल औरतों के सामान से जुड़ी हुई किसी भी चीज़ का व्यापार या कारीगरी करने वाले को कभी काम का टोटा नहीं रहता। अपने शौहरों की आमदनी को ये बीवियां ही ठिकाने लगाती हैं। मर्दों की ख़रीदारी भी ये औरतें ही करती हैं।

तीसरे लड़के ने अपना नाम अमित बताया। वह केन्द्र के लिए अपनी सेवाएं दे रहा है। पहले दोनों लड़के ‘नेशनल ब्लाइंड एडल्ट एजुकेशन एंड वोकेशनल ट्रेनिंग सेन्टर‘ में आने से पहले मथुरा और हरिद्वार की संस्थाओं में रह चुके हैं और अमित आरम्भ से ही दिल्ली में रहता है। यह संस्था पिछले डेढ़ साल से काम कर रही है।

इन लड़कों ने मुझे अपनी संस्था का एक कार्ड दिया जिस पर ‘तजराम शर्मा‘ को आर्गेनाइज़र लिखा है। पता है- पूठ कलां, पाकेट 16, निकट मदर डेयरी, सेक्टर 20, रोहिणी, नई दिल्ली-110086, मोबाइल नं.-09350883344, फ़ोन नं.-32625061

मैंने एक हस्बे रिवायत उन्हें एक छोटी सी भेंट दी और उनकी इजाज़त लेकर उनका फ़ोटो खींचा और उन्हें बताया कि मैं उनका ज़िक्र इंटरनेट पर करूंगा। शायद कोई दानदाता उसे पढ़कर उनकी संस्था तक पहुंच जाए।

इस सब वाक़ये से मुझे एक बात कहनी है कि एक अनाथ महज़ आपके चंद रूपयों का ही तलबगार नहीं होता बल्कि उसे आपकी मुहब्बत और आपकी अपनाइय्यत की भी ज़रूरत होती है। अगर आप अपने अमीर दोस्तों के लिए चाय नाश्ते का इंतेज़ाम ज़रूर करते हैं तो ये अनाथ उनसे कहीं ज़्यादा इस बात के मुस्तहिक़ हैं।

याद रखिये कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. भी एक अनाथ ही थे। उनका कथन (मफ़हूमन) है कि जो कोई किसी अनाथ के सिर पर प्यार से हाथ फेरता है तो अल्लाह उसके आमालनामे ने उसके सिर के बालों के बक़दर ही नेकियां लिखवा देता है।

अल्लाह की राह में देने से माल घटता नहीं बल्कि बढ़ता है, यह सच है, पवित्र कुरआन में यह बात अल्लाह ने खुद बताई है। जो अनाथ को धक्के देता है उसका न कोई दीन है और न कोई ईमान है।

और भय्या गिरी जी यह लीजिये आप अपना फ़ोटो जनाब मौलाना वहीदुददीन ख़ान साहब के साथ। आज मौक़ा मिल पाया, सो आज मैंने अपना वादा पूरा किया।