Wednesday, December 28, 2011

इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में ग़ैर इस्लामी गतिविधियां क्यों होती हैं ?

हमने पिछले साल भी अपने ब्लॉग ‘अहसास की परतें‘ पर ऐतराज़ जताया था कि इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में ग़ैर इस्लामी गतिविधियां क्यों होती हैं ?
हुस्नो-इश्क़ और मयकशी पर शायरी का ताल्लुक़ फ़न ए शायरी से है न कि इस्लाम से।
इस सेंटर में पिछले साल की तरह इस साल भी ग़ालिब की याद में एक मुशायरा संपन्न हुआ और इसमें कुछ काम ऐसे भी हुए जो कि सरासर ग़ैर इस्लामी हैं। इस्लाम के ज़िम्मेदार जो कि दिल्ली में रहते हैं उन्हें इस तरफ़ ध्यान देना चाहिए।
आज दिनांक 28 दिसंबर 2011 के उर्दू अख़बार राष्ट्रीय सहारा में छपी ख़बर भी साथ में मौजूद है।

Thursday, December 22, 2011

स्कूल की ड्राइंग





यह पेंटिंग हमारे साहबज़ादे ने बनाई है . दरअसल यह उनके  स्कूल की ड्राइंग थी. उसमें कंप्यूटर के ज़रिये थोड़ी सी तब्दीली की है .
स्कूल की ड्राइंग यह है :


Tuesday, December 20, 2011

श्री कृष्ण जी को इल्ज़ाम न दो

आजकल गीता पर चर्चा ज़ोरों पर चल रही है क्योंकि रूस में गीता पर पाबंदी लगाने की कोशिश की जा रही है। ज़्यादातर लोग तो गीता के पक्ष में बोल रहे हैं लेकिन कुछ स्वर गीता के विरोध में भी उठ रहे हैं। ऐसे ही एक ब्लॉग को हमने पढ़ा तो उसमें लेखक ने भारत की बर्बादी का इल्ज़ाम श्री कृष्ण जी पर ही डाल दिया और उसने आधार बनाया उस साहित्य को जो कि श्री कृष्ण जी के हज़ारों वर्ष बाद लिखा गया।
गीता महाभारत का एक अंश है। महाभारत के आदि पर्व 1, 117 से पता चलता है कि इसका नाम वास्तव में ‘जय‘ था और उसमें मात्र 8, 800 श्लोक थे और कृष्ण द्वैपायन व्यास ने सबसे पहले इसका संपादन किया था। इसके बाद वैशंपायन ने इसका संपादन किया और श्लोक 24, 000 हो गए। अब इसका नाम भारत हो गया। इसके बाद उग्रश्रवा सौति ने इसमें 96, 244 श्लोक बना दिए और फिर नाम बदलकर महाभारत हो गया। अब यह नहीं कहा जा सकता कि ‘जय‘ के नाम से प्रसिद्ध ग्रंथ के कितने श्लोक इस ग्रंथ में हैं और वे कौन कौन से हैं ?
इस बढ़ोतरी के बाद के अब यह कहना बहुत मुश्किल है कि मूल 8, 800 श्लोक कौन से हैं ?
अगर मूल कथा आज हमारे सामने होती तो शायद बहुत से प्रश्न खड़े ही नहीं होते।
महापुरूषों के चरित्र के बारे में भी बहुत से प्रश्न तब खड़े न होते।
कथा को रोचक बनाने के लिए कवियों ने जो प्रसंग अपनी ओर से बढ़ा दिए हैं, उनकी वजह से लोग श्री कृष्ण जी के बारे में अपमानजनक बातें कर रहे हैं।
यह सरासर ग़लत है।
प्रेरणा लेने से पहले ज्ञान की शुद्धता की जांच ज़रूर कर लेनी चाहिए।

भारत की पवित्र भूमि पर सदाचारी मार्गदर्शकों का अपमान हमारे नैतिक पतन का प्रमाण है।
इस आशय का कमेंट हमने इस पोस्ट पर दिया है। इसे आप भी देखें और हमें अपने विचारों से अवगत करायें:
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/ORISON/entry/%E0%A4%97-%E0%A4%A4-%E0%A4%A8-%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%AC-%E0%A4%A6-%E0%A4%95-%E0%A4%AF-%E0%A4%AD-%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95
ओरिसन लिखता है :
गीता ने बर्बाद किया भारत को 
गीता ने बरबाद किया भारत को, भारत में भावनाओं के अथाह समंदर को गीता ने बरबाद कर दिया, लोग ने लोगों पर विश्वास करना छोड़ दिया, और लोग आपस में नातें-रिश्ते भूलकर, जमीन-जायदाद और धन के लिए अपने ही अपनों के गले काटने लगे, क्यूंकि गीता में ऐसा लिखा है, जिसमे इंसानी भावनाओं से ऊपर जमीन-जायदाद और धन-संम्पत्ति को बड़ा माना गया, और उसके पीछे यह मिसाल दी गयी की जो अपना है, वह अगर किसी के पास भी है तो छीन लो, भले ही वह भाई-हो, नातेदार हो, रिश्तेदार हो, उस भावना को दबा दो, और जमीन और धन के लिए अपने से बड़ों से भी लड़ पड़ो, यह गीता ने सिखाया, जिससे भारत बरबाद हो गया, और भारत में जमीन-जायदाद और धन संम्पति को ज्यादा महत्त्व दिया गया, जबकि भावनाओं और हृदय की बातों को कमजोरी समझा गया, और इसका फायदा उठाया गया, तो इस तरह तो गीता ने एक तरफ कहाँ की जो तुम्हारा है अर्जुन वह किसी भी प्रकार लड़कर छीन लो, फिर दूसरी तरफ गीता ने कहा की तुम क्या लाये तो जो तुम्हारा है, तुम क्या ले जाओगे, इस तरह की विरोधाभाषी वक्तव्य ने भारत के लोगों को भ्रमित कर दिया, तो जो लोग, ताकतवर थे, चालाक थे, उन्होंने दूसरों की भावनाओं का फायदा उठाकर, उन्हें उसी में उलझाये रखा और अपने पास धन-दौलत और जमीन-जायदाद अपने पास रखी, बस यही पारी पाटि भारत में चलती रही, और उसने कमजोर को वैरागी बना दिया, और ताकतवर को अय्याश बना दिया, कमजोर होकर वह वैराग का बाना ओढ़ लिया की अब उसे तो यह जामीन मिलने से रही तो उसने कहाँ की संसार मिथ्या है, और जो ताकतवर था उसने अय्याशी अपना ली | इस तरह से गीता ने पूरे भारत को दो भागों में बाँट दिया, एक जो उस जमीन-जायदाद के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे, उसके लिए किसी के साथ भी लड़ सकते थे, कोई भी पैंतरा अपना सकते थे, और अपने हाथ में दौलत काबू में रखते थे, और दूसरे वो जों भावनाओं के आगे जमीन-जायदाद को भी ठोकर मार देते थे, और अपने ईमान को कभी गन्दा नहीं करते थे, और अपने नाते-रिश्तों और बड़ों का सम्मान करते थे, आज भी भारत इसी ढर्रे पर चल रहा है, जों लोग पैसे वाले होते हैं वह भावुक नहीं होते हैं, और जों गरीब होते हैं वह भावुक होते हैं, और पैसे वाले किसी के सामने दिखावा तो करते हैं की हम सम्मान करते हैं, पर पीठ पीछे छुरा भी घोंप देते हैं, और उनकी भावना झूठी होती है, उस भावना में भी वह उससे गरीब के पास जों होता है, वह हथियाना चाहते हैं, और उसे और गरीब ही रहने देना चाहते हैं, बात तो बड़ी-बड़ी करते हैं की सब माया है, पर भारत वाले जितनी माया इक्कठी करते हैं उतना संसार का कोई आदमी नहीं करता है |

तो आज भी यह गीता किसी भी नाते और रिश्ते को तोड़कर जमीन और जायदाद को महत्त्व देने को कहती है, और गीता के बल पर वह किसी की परवाह नहीं करता है, और बड़े-बूढें की भावनाओं को देखता तक नहीं है, उसके लिए अपना अहंकार ही सबसे बड़ा होता है, और उसका अहंकार किसी भी प्रकार से जमीन और जायदाद हथियाना चाहता है | चाहे उसके लिए किसी को भी मारना पड़े, चाहे वह कोई भी हो, नाते में रिश्ते में।

Friday, December 9, 2011

आत्महत्या से बचाव की कारगर तदबीर

भाई ख़ुशदीप जी सवाल कर रहे हैं कि
ज़िंदगी से क्यों हार रहे हैं लोग ?
उनकी पोस्ट का विषय आत्महत्या है।
 
जीना दुश्वार क्यों ?
आखि़र लोग आत्महत्या का रास्ता क्यों अपना रहे हैं ?
यह आज चिंता का विषय है।
हरेक उम्र और हरेक लिंग और भाषा के लोग आत्महत्या कर रहे हैं।
इसके पीछे एक सही नज़रिये का अभाव है।
लोगों के जीवन में समस्याएं आती हैं और जो लोग उन्हें हल होते नहीं देखते और उनसे उपजने वाले तनाव से वे हताश हो जाते हैं तो ऐसे लोगों में आत्महत्या का विचार सिर उठाने लगता है और कुछ लोग सचमुच आत्महत्या कर लेते हैं।
कोई आदमी अकेला नहीं मरता बल्कि वह अपने से जुड़े हुए लोगों को भी मार डालता है। उन्हें वह सदा के लिए एक न भरने वाला ज़ख्म देकर चला जाता है।
अपने मां बाप और पत्नी-बच्चों के लिए जो भीषण संत्रास वह जीवन भर छोड़ कर जा रहा है और उन्हें जीते जी ही मुर्दा बना रहा है। यह घोर पाप है और इस पाप के दंड से मुक्ति संभव नहीं है।

इस समस्या का हल यह है आदमी यह जान ले कि अपने जीवन का मालिक वह स्वयं नहीं है बल्कि वह रब है जिसने उसे पैदा किया है। उसी ने उसके पैदा होने का समय नियत किया है और उसकी मौत का समय भी उसी ने नियत कर रखा है। उसकी मंशा के खि़लाफ़ हरकत करना एक दंडनीय अपराध है और उसकी सज़ा उसे हर हाल में मिल कर रहेगी। इस तरह वह एक समस्या से बचेगा तो दूसरे कष्ट में जा पड़ेगा।

आदमी यह जीवन ढंग से जी सके इसके लिए ज़रूरी है कि वह जान ले कि मौत के बाद उसके साथ क्या मामला पेश आने वाला है ?
इंसान का हरेक अमल मौत के बाद उसके सामने आना है, यह तय है और इसे हरेक धर्म-मत में मान्यता प्राप्त है।
आधुनिक शिक्षा इस मान्यता को नकारती है और इस तरह वह नई नस्ल को एक ऐसी बुनियाद से वंचित कर रही है जो कि उसे हर हाल में जिलाए रख सकती है।
जब आदमी अपनी योग्यता के बल पर अपने हालात सुधरने से नाउम्मीद हो जाता है, तब भी एक आस्तिक को यह उम्मीद होती है कि उसका रब उसके हालात सुधारने की ताक़त रखता है और वह आशा और विश्वास के साथ प्रार्थना करता रहता है। इससे उसका मनोबल बना रहता है और मनोविज्ञान भी यह कहता है कि अगर आत्महत्या के इच्छुक व्यक्ति को कुछ समय भी आत्महत्या से रोक दिया जाए तो कुछ समय के बाद वह फिर आत्महत्या नहीं करेगा।
ईश्वर में आस्था और पारिवारिक रिश्तों के प्रति ज़िम्मेदारी का सही भाव आदमी को आत्महत्या से बचाते हैं।

Sunday, October 16, 2011

आप अपनी पोस्ट में लिंक क्यों देते हैं ?

कुछ ऐतराज़ ही करना होता है तो कुछ भाई यही ऐतराज़ कर देते हैं कि 
'आप अपनी पोस्ट में लिंक क्यों देते हैं ?' 
भाई पोस्ट किसी ख़ास वजह से दिखाने के लायक़ होती है। इसीलिए उसका लिंक दिया जाता है। यह एक कॉमन सेंस की बात है लेकिन आदमी विरोध और ज़िद में यह बात बिल्कुल ही भूल जाता है।
चर्चा मंच हिंदी ब्लॉग जगत का एक प्रतिष्ठित ब्लॉग है।
विंडो लाइव राइटर का इस्तेमाल करके लिखी जाने वाली पोस्ट्स इसकी सुंदरता में इज़ाफ़ा कर देती हैं और कभी कभी तो इसके चर्चाकार बहुत ज़्यादा ही मेहनत कर गुज़रते हैं और तब वे एक यादगार पोस्ट दे पाते हैं।
मिसाल के तौर पर आप देखिए यह पोस्ट और जानिए हिंदी ब्लॉग जगत के कुछ सुप्रतिष्ठित ब्लॉगर्स की लेखन शैली के बारे में और साथ में आप उनके फ़ोटो और उनका परिचय भी जान सकते हैं-

तटस्थ रहना पाप नहीं - चर्चा-मंच : 667

इसी पोस्ट के बारे में हमने यह पोस्ट तैयार की है

रविकर जी ने कर दिया कमाल GreatJob

Saturday, October 15, 2011

इस्लाम पर सवाल क्यों आते हैं ?

हिंदू भाई ब्लॉग लिखते है और जिस मत में वे आस्था रखते हैं उसके बारे में वे अक्सर लिखते रहते हैं और आप देखेंगे कि उनकी रीति-नीतियों में कोई मुसलमान वहां कमियां निकालता हुआ नहीं मिलेगा।
इसके विपरीत अगर मुसलमान इस्लाम में आस्था रखता है और वह उसके बारे में लिख रहा है तो आप देखेंगे कि कुछ उत्साही युवा जो हिंदू समझे जाते हैं, अक्सर कमियां निकालने आ जाते हैं।
यह क्या है ?
क्या हिंदू युवा ज़्यादा प्रबुद्ध हैं ?
क्या उनके मुक़ाबले मुसलमान सुप्त हैं ?
क्या हिंदू भाई सत्य के लिए ज़्यादा जिज्ञासा रखते हैं ?
क्या मुसलमान सत्य के प्रति लापरवाह हैं ?
या इसके बात इसके विपरीत है ?
क्या मुसलमान निश्चिंत हैं कि कोई अपने मत का कितना ही प्रचार कर ले, वह किसी मुसलमान को आकर्षित करने के लिए काफ़ी नहीं है ?
क्या हिंदू भाईयों को यह चिंता सताती है कि अगर इस्लाम की छवि पर लगातार कीचड़ न उछाला गया तो अपने पुरातन संस्कारों से दूर भागता हुआ हमारा समाज कहीं इस्लाम की ओर ही आकर्षित न हो जाय ?
हो सकता है कि इनमें से कुछ कारण हों या ये सब कारण हों या इनमें से कोई भी कारण न हो बल्कि कारण कुछ और ही हो लेकिन मुस्लिम ब्लॉगर्स जब भी इस्लाम पर कोई पोस्ट लिखते हैं तो दनादन सवालों की बौछार सी हो जाती है और हम यही सोचते रह जाते हैं कि आखि़र ऐसा हो क्यों रहा है ?
देखिये :

Tuesday, October 11, 2011

दीन-धर्म पर संवाद का सही तरीक़ा

राज जी ! आप कहते हैं कि हम किसी से नफ़रत नहीं करते और बातें आप नफ़रत की ही करते हैं।
आप अब तक अपनी टिप्पणियों को देख लीजिए, उनमें जब भी आप इस्लाम, कुरआन और पैग़म्बर साहब का ज़िक्र करते हैं तो कितनी नफ़रत के साथ और कितने तिरस्कार के साथ करते हैं।
इसमें हम आपकी ग़लती ज़्यादा नहीं मानते।
जब आदमी किसी विशेष पारिवारिक पृष्ठभूमि में पला बढ़ा हो या इस्लाम के विरूद्ध नफ़रत रखने वाले चिंतकों के साथ उठता बैठता हो और खुद अपनी अक्ल खोलकर सोचता न हो तो उसकी दशा यही बनेगी।
दूसरी ओर आप हमें देखिए और आप इस पूरे ब्लॉग को पढ़ लीजिए,
आपको कहीं भी हमारी ओर से कोई भी ग़लत ऐतराज़ हिंदू महापुरूषों पर नहीं मिलेंगे, इसे कहते हैं महापुरूषों को आदर सम्मान देना और उनसे प्यार करना।
केवल कह देना ही काफ़ी नहीं होता।
इस्लाम के विरूद्ध प्रचार कोई नई बात नहीं है। इस्लाम के विरूद्ध हरेक भाषा में बहुत सा ऐसा सहित्य आपको मिल जाएगा जो कि इस्लाम की गलत जानकारी देने के लिए ही लिखा गया है। इस्लाम के खिलाफ नफरत भरा साहित्य पढ़कर या ऐसे प्रवचनों से इस्लाम की जानकारी लेना ऐसा ही है जैसे कि कोई विदेशी टूरिस्ट ‘कसाब‘ के मुंह से भारतीय संस्कृति की जानकारी लेना चाहे,
क्या उसे भारतीय संस्कृति की सही जानकारी का स्रोत माना जा सकता है ?

आप पहले इस्लाम के बारे में उसके प्रामाणिक स्रोतों से जानकारी हासिल कीजिए और उसका तरीका यह नहीं है कि कुरआन के विरोध में लिखे गए साहित्य को पढ़ लिया और फिर कहीं से कुरआन का अनुवाद लेकर उसमें उन आयतों को मिला लिया और समझ लिया कि हम समझ गए।
बल्कि इसका तरीका यह है कि आप पहले मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जीवनी पढ़ें ताकि आपकी जानकारी में यह बात आ जाए कि उनके साथ मक्का और मदीना में क्या क्या अत्याचार किए गए ?
क्या आप यह बात जानते हैं कि एक ईश्वर की उपासना और उसी का आदेश मानने का प्रचार करने की जो दूसरी सज़ाएं उन्हें दी गईं उनके साथ साथ पैग़ंबर साहब को लगभग ढाई साल तक ‘इब्ने अबी तालिब‘ की घाटी में क़ैद रखा गया और इस लंबे अर्से में मक्के के किसी भी व्यापारी ने उन्हें अन्न का एक दाना तक नहीं बेचा यानि मुकम्मल बहिष्कार।
इस क़ैद और इस बहिष्कार में मुहम्मद साहब सल्ल. अकेले नहीं थे बल्कि उनके साथ उनका पूरा क़बीला था और उनके साथ ये सारी तकलीफ़ें उन लोगों ने भी उठाईं जो कि पैग़ंबर साहब के धर्म पर आस्था नहीं लाए थे लेकिन फिर भी उन्होंने उनका साथ दिया क्योंकि वे उनसे प्यार करते थे और उन्होंने पैग़ंबर साहब को कभी दुश्मनों के हाथ नहीं सौंपा। उनके क़बीले के दूध पीते बच्चों और औरतों को भी यह दर्दनाक कष्ट झेलना पड़ा।
इस तरह के वाक़यात इस्लाम विरोधी अपने लिट्रेचर में नहीं छापते, इसलिए आपको पता भी नहीं होंगे।
आप इस्लाम को औरत विरोधी बता रहे हैं लेकिन आपको पता नहीं होगा कि पैग़ंबर साहब सल्ल. के उपदेश पर सबसे पहले आस्था व्यक्त करने वाली भी एक औरत ही थी और वह भी एक औरत ही थी जिसे इस्लाम पर ईमान लाने के जुर्म में इस्लाम विरोधियों ने क़त्ल कर दिया।
जब आप पैग़ंबर साहब की जीवनी पढ़ेंगे तभी आपको पता चलेगा कि उन्होंने क्या कहा था और उनके साथ क्या किया गया था ?
इसके बाद आप कुरआन का कोई ऐसा अनुवाद पढ़ें जिसमें थोड़ा विस्तार से आयतों का संदर्भ प्रसंग भी बताया गया हो ताकि आप जान लें कि कौन सी आयतें सामान्य जीवन के लिए हैं और कौन सी आयतें युद्ध काल और आपत्ति काल के लिए हैं।
तब ही आपको यह पता चल पाएगा कि जब ज़ुल्म अपनी सारी हदें पार कर गया तो मुहम्मद साहब सल्ल. मक्का से चले आए और मदीना के लोगों को उपदेश देना शुरू किया तो उनके क़त्ल के इरादे से उनके दुश्मनों मक्का से आकर मदीना पर हमला कर दिया। तब मुसलमानों को अपने पैग़ंबर, अपने दीन और खुद अपनी जान की हिफाजत के लिए हथियार मजबूरन उठाने पड़े और इन युद्धों में जब बहुत से मुसलमान मारे गए और उनकी विधवाएं बेसहारा हो गईं तो यह हुक्म दिया गया कि मुसलमान उन विधवाओं से निकाह कर लें ताकि उन्हें आर्थिक , सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहारा मिल सके।
विधवाओं का इससे ज़्यादा अच्छा पुनर्वास कुछ और हो सकता हो तो आप भी सोच कर बताएं और यह भी याद रखें कि यह वह दौर था जबकि विधवाओं को अभागिन और मनहूस समझा जाता था और उन्हें सहारा देने के बजाय उन्हें ज़िंदा जला दिया जाता था और ऐसा करने वाले यह कहते थे कि विश्व में हमसे ज़्यादा सभ्य कोई है ही नहीं।
जब आप इस्लाम के मूल स्रोतों को ढंग से पढ़ लेंगे तो आपकी बहुत सी आपत्तियां दूर हो जाएंगी लेकिन कुछ फिर भी बनी रहेंगी और कुछ इस अध्ययन के दौरान पैदा होंगी।
ये आपत्तियां वास्तव में ऐसी होंगी जिन्हें अध्ययन के दौरान पैदा होने वाली आपत्तियां कहा जाएगा और उनका निराकरण भी किया जाएगा।
क्योंकि किसी भी विषय के अध्ययन के दौरान इस तरह की आपत्तियां पैदा होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
हम ऐसी आपत्तियों का स्वागत करते हैं क्योंकि ज्ञान इसी तरह बढ़ता है और ज्ञान इसी तरह फैलता है।
दूसरी बात आपको यह जान लेनी चाहिए कि ये आपत्तियां आप पहली बार नहीं कर रहे हैं और इन सभी का जवाब दिया जा चुका है जिनमें से कुछ के जवाब हिंदी में नेट पर भी देखे जा सकते हैं। जब भी आपको उनका लिंक दिया जाता है तो आप मज़ाक़ उड़ाने लगते हैं।
यह क्या तरीक़ा है ?
क्या लिंक देना ग़लत बात है ?
जिस बात को लिखा जा चुका है तो क्या उसी बात को हर बार नए सिरे से लिखा जाए ?
आपके बाद फिर कोई तीसरा बंदा यही सवाल लाएगा तो उसे इस पोस्ट का लिंक ही दिया जाएगा न कि उसके लिए फिर नए सिरे से लिखा जाएगा।
इस तरह मज़ाक़ वही उड़ाता है जिसके दिल में सच जानने की कोई ख्वाहिश नहीं होती बल्कि बस चलते हुए काम में अड़चन डालकर मज़ा लेने के लिए या खुद को सुपर दिखाने के लिए कुछ ऐतराज़ कर दिए जाते हैं।
आपसे और आप जैसे दूसरे भाईयों से जब भी ‘कुरआन पढ़ो‘ कहते हैं तो भी मज़ाक़ बनाने लगते हैं।
भाई जब आप कुछ सवाल कर रहे हैं तो जवाब में आपको कुछ पढ़ने के लिए ही तो कहा जाएगा।
आप लोगों को लिंक पर भी ऐतराज़ है और आपको ‘कुरआन पढ़ो‘ की सलाह देने पर भी।
फिर बताइये कि आप अपनी आपत्तियों का निराकरण किस प्रकार चाहते हैं ?

अगर आप यह चाहते हैं कि आपके हरेक सवाल का जवाब यहीं लिखकर दिया जाए तो यही सही लेकिन आप सभी जानते हैं कि सवाल एक-दो लाइन का होता है और जवाब में लिखना पड़ता है लंबा चौड़ा।
लिहाज़ा यह नहीं चलेगा कि आप आए और खिल्ली उड़ाई और दस बीस सवाल लिखे और निकल लिए।
हम इस्लाम में आस्था रखते हैं और इस्लाम पर उठने वाले हरेक सवाल का जवाब तर्कपूर्ण रीति से देने के लिए तैयार हैं लेकिन जो लोग यहां ऐतराज़ करने आते हैं वे भी तो बताएं कि वे किस धर्म-मत-संप्रदाय में आस्था रखते हैं।
जब वे हमें ग़लत समझते हैं तो खुद तो वे ज़रूर किसी न किसी सही आचार संहिता पर आस्था रखते होंगे और फिर उसके अनुसार चलते भी होंगे।
चाहे कोई नास्तिक ही क्यों न हो, उसका भी यहां स्वागत है
वह आए और यहां हमसे इस्लाम के बारे में सवाल करे लेकिन तब हम भी उसकी विचारधारा के बारे में उससे सवाल करेंगे।
एक सवाल हमसे कीजिए तो हमारे भी एक सवाल का जवाब दीजिए,
तभी तो पता चलेगा न कि कौन कितने पानी में है ?
वर्ना तो अपनी पहचान छिपाकर सवाल पूछना और फिर खिसक लेना कौन सी बड़ी बात है ?
आइये, जितने चाहे पूछिए हमसे सवाल, हम आपकी वैचारिक आज़ादी और आलोचना के अधिकार का सम्मान करते हैं .
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राज जी के ऐतराज़ यहाँ देखे जा सकते हैं :

नास्तिकता का ढोंग रचाते हैं कुछ बुद्धिजीवी

Friday, September 30, 2011

जो लोग खाना पेट में उतारना जानते हैं उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उसे पेट में उतारने लायक कैसे बनाया जाए ?

खाना बनाना बनाना वाकई एक कला है और जिसे यह नहीं आती वह जिंदगी में परेशान रहता है। जब हमें घर से दूर रहने का इत्तेफाक हुआ तो बहुत तकलीफ हुई। हम वैसे भी पाक-नापाक का खास खयाल लेकर बड़े हुए। बडे से बडा होटल ले लिया लेकिन जब उसमें अंदर जाकर यह जांच की कि बर्तन कैसे धुल रहे हैं और खाना कैसे बन रहा है तो बनाने वाले भी गंदे मिले और एक ही पानी में बर्तन निकाल कर कपडे से साफ करते हुए मिले। सब देखा और वहीं खाना पडा क्योंकि खुद बनाना नहीं जानते थे।
फिर एक दो डिश बनानी सीखी।
हमारा एक दोस्त फ़रहाद दरियापुरी, ऐसी रोटियां बनाता है कि उसकी बहन भी नहीं बना सकती। उनकी वालिदा बीमार पडीं तो घर का सारा काम उन्हें ही करना पडा, सो वे सीख गए।
जो लोग खाना पेट में उतारना जानते हैं उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उसे पेट में उतारने लायक कैसे बनाया जाए ?
आजकल खाने पीने को एक धंधे के तौर पर भी बढिया रेस्पॉन्स मिल रहा है।
हमारे एक जानकार ने कई धंधे किए लेकिन सब फेल और जब उसने रोटी पानी का धंधा किया तो उसके वारे के न्यारे हो गए।

इस विषय पर एक अच्छी पोस्ट यह भी है , देखिये-

नकारात्मक या सकारात्मक क्या ?? अरे खाना बनाना

Saturday, September 24, 2011

कहावत क्यों बने उनके बोल ?

'बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद'
'भैंस के आगे बीन बजाना'
ये और ऐसी दूसरी बहुत सी कहावतें हमारी ज़बान में मशहूर हैं। इस तरह की कहावतें हरेक ज बान में मशहूर हैं। अरबी की एक कहावत है कि
'हरेक बर्तन से वही छलकता है जो कि उसमें होता है।'

 ये कहावतें आम तौर पर समाज के किसी अनुभवी आदमी की वाणी से निकली होती हैं और गुजरे जमाने के ये आदमी आम तौर पर अनपढ  होते थे। अनपढ  होने के बाद भी वे ज्ञानी थे। ज़िन्दगी की किताब को उन्होंने बहुत ध्यान से पढ़ा होता था।
अपनी ज़िन्दगी के तजर्बों को ही वे अपनी ज बान में कहते थे तो उनसे प्यार करने वाले उन्हें ज बानी याद कर लेते थे और फिर वे दूसरों को बताते थे। दूसरों को भी सुनकर लगता था कि हां, बात में तो दम है। सैकड़ों और हज़ारों साल बाद आज भी उनकी बात वैसी ही सच निकलती है जैसी कि तब थी जब उन्होंने उसे कहा था।
ऐसे थे हमारे पूर्वज, जिनकी बात में दम था, सच्चाई थी और अच्छाई थी। आज हमें नहीं मालूम कि किस कहावत को किस आदमी ने कहा ?
लेकिन कहावत को सुनते ही हम जान लेते हैं कि इसे कहने वाले ने ज़िंदगी को कितनी गहराई से महसूस किया होगा ?
आज कहावतें कहने वाले हमारे पूर्वज नहीं हैं, उनकी जगह आज हम खड़े हैं।
क्या हमारी ज़बान से भी ऐसी बातें निकलती हैं कि लोग उन्हें सुनें तो उन्हें 'मार्ग' मिले या सुनकर कम से कम कुछ अच्छा ही लगे ?
जो कुछ हम कहते हैं, वह हमारी सोच को ज़ाहिर ही नहीं करता बल्कि कुछ और लोगों को प्रेरणा भी देता है। अच्छा कलाम अच्छी राह दिखाता है और बुरी बात बुरी राह दिखाती है।
अच्छा आदमी, जो अच्छी राह चलता है कभी बुरी बात मुंह से नहीं निकाल सकता। हमारा कलाम यह भी बताता है कि हम किस राह पर चल रहे हैं ?
ब्लॉगिंग में आज़ादी बेहद है।
यहां हरेक आदमी दिल खोलकर लिखता है।
आदमी जो लिखता है, लिखने के बाद उसे खुद भी पढ़ना चाहिए और अपने कलाम के आईने में उसे खुद को देखना चाहिए कि वह अच्छा आदमी है या बुरा आदमी ?
अपने कलाम की रौशनी में उसे यह भी देखना चाहिए कि वह अच्छी राह पर चल रहा या कि बुरी राह पर ?
उसकी बात से लोगों को अच्छी सीख मिल रही है या कि बुरी ?
इससे फ़ायदा यह होगा कि जो आदमी खुद को बुरी राह पर देखे, वह अपनी राह बदलकर सही राह पर आ जाए।
अगर चाहें तो हम ब्लॉगिंग के ज रिये अपने चरित्र का विकास भी सरलता से कर सकते हैं।
दुनिया भर के बारे में रायज नी करना और खुद से गाफ़िल रहना सिर्फ़ यह बताता है कि चाहे हमने बेहतरीन यूनिवर्सिटीज  में पढ़ा है लेकिन 'ज्ञान' हमें वास्तव में मिला ही नहीं है।
ज्ञान हमें मिला होता तो हमने कुछ अच्छा कहा होता और कुछ अच्छा किया होता।
दूसरों का मज़ाक़ और अश्लील फब्तियां कसना ज्ञानी लोगों का काम न तो पहले कभी था और न ही आज है।
हमने लिखना बेशक सीख लिया है लेकिन अपने पूर्वजों की रीत भुला बैठे, जो कि बोलते थे तो कहावत बन जाया करती थी।
And see
 हदीस-शास्त्र !
● वह व्यक्ति (सच्चा, पूरा, पक्का) मोमिन मुस्लिम नहीं है जिसके उत्पात और जिसकी शरारतों से उसका पड़ोसी सुरक्षित न हो।

Thursday, September 22, 2011

मालिनी मुर्मु की ख़ुदकुशी Suicide due to facebook

Girl kills self as boyfriend dumps her on Facebook

आधुनिकता के नाम पर लड़के और लड़कियां बिना विवाह किए ही संबंध बना रहे हैं और जब दिल भर जाता है तो फिर संबंध तोड़ भी रहे हैं।
इन संबंधों से दोनों को कुछ वक्त के लिए सुकून भी मिलता है और ख़ुशी भी लेकिन जब ये रिश्ते टूटते हैं तो तकलीफ़  भी देते हैं और ज़िल्लत का अहसास भी कराते हैं। बहुत लोग ज़िल्लत और शर्मिंदगी का अहसास लेकर जीते रहते हैं और जो जी नहीं पाते वे ख़ुदकुशी करके मर जाते हैं।

मालिनी मुर्मु की ख़ुदकुशी भी इसी सिलसिले की एक और कड़ी है।
रिश्तों में पवित्रता ईश्वर के नाम से आती है।
पत्नी से संबंध केवल पवित्र इसीलिए तो होता है कि पति और पति ईश्वर के नाम से जुड़ते हैं। जहां यह नाम नहीं होता वहां पवित्रता भी नहीं होती। आज जब लोग पवित्र रिश्तों की जिम्मेदारियों तक को लोग अनदेखा कर रहे हैं। ऐसे में मौज-मस्ती और टाइम पास करने के लिए बनाए गए रिश्तों की गरिमा को निभाने लायक  इंसान बचा ही कहां है ?
ऐसे में या तो फिर बेशर्मों की तरह मोटी चमड़ी  बना लो कि जानवरों की तरह जो चाहो करो और कोई कुछ कहे भी तो फ़ील ही मत करो। जब अहसासे शर्मिंदगी ही न बचेगा तो फिर कोई डिप्रेशन भी नहीं होगा।
लेकिन यह कोई हल नहीं है समस्या का।
समस्या का हल यह है कि रिश्तों की अहमियत को समझो और नेकी के दायरे से कदम बाहर मत निकालो। जब आप मर्यादा का पालन करेंगे तो ऐसी कोई नौबत नहीं आएगी कि आप मुंह न दिखा सकें।
मालिक से जुड़ो, नेक बनो, शान से जियो और लोगों को सही राह दिखाओ।

क्या बड़ा ब्लॉगर टंकी पर ज़रूर चढता है ?

Saturday, September 17, 2011

धर्मशास्त्र की ज़रूरत क्या है ?

जायज़ और नाजायज़ को तय वही कर सकता है जिसे सही ग़लत की तमीज का 'शास्त्रीय बोध' प्राप्त है . जिन्हें यह हासिल नहीं है उनका क़ौल भी ग़लत होगा और उनका अमल भी ग़लत होगा .
हर चीज़ के कुछ नियम होते हैं। उन्हें एक जगह लिख लिया जाता है तो वह शास्त्र बन जाता है। शास्त्र जब तक शुद्ध रहता है, मार्ग दिखाता है। जब आदमी को ज्ञान, गुण और सत्य के बजाय दुनिया के स्वार्थ ज़्यादा प्रिय हो जाते हैं तो फिर वे लोग शास्त्र में ऐसी बातें भी जोड़ देते हैं जो कि सही नहीं होतीं। विकार आ जाने के बाद जो लोग शास्त्र से प्रेम करते हैं, वे भी शास्त्र पर चल नहीं पाते और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि शास्त्रों में ग़लत बात देखकर कह देते हैं कि यह सदा से ही ग़लत है।
भारत शास्त्रों का देश है।
यहां गाने-बजाने का काम भी शास्त्रानुसार किया जाता है। नाचना सिखाना के लिए भी शास्त्र मौजूद है। शास्त्रीय नृत्य को उम्दा नाच माना जाता है। जब भी विश्व पटल पर भारतीय नृत्य की बात की जाती है तो कत्थक और कुचिपुड़ी आदि शास्त्रीय नृत्य को ही पेश किया जाता है। जो शास्त्रीय नृत्य जानते हैं, उन्हें अपनी कला में पारंगत माना जाता है और उन्हें अच्छा सम्मान दिया जाता है।
ये लोग कम होते हैं।
ऐसा नहीं है कि बस जो शास्त्र नहीं जानते, वे नहीं नाचते। नाचते वे भी हैं लेकिन उन्हें शास्त्रीय नर्तकों जैसा सम्मान नहीं दिया जाता।
शास्त्रीय नृत्य करने वाले तो बहुत कम हैं वर्ना तो बाक़ी सारा भारत भी होली, दीवाली और शादी-ब्याह के मौक़ों पर नाचता है। मन की उमंग तो दोनों में ही बराबर है बल्कि हो सकता है कि शास्त्र रहित नृत्य करने वालों में मन की उमंग कुछ ज़्यादा ही पाई जाती हो लेकिन तब भी उनके हाथ पैर फेंकने या झटकने को विश्व स्तर पर ‘भारतीय नृत्य‘ कहकर पेश नहीं किया जाता और न ही इन नर्तकों को कहीं सम्मानित किया जाता है।
भारत में कुछ लोकनृत्य भी प्रचलित हैं। हालांकि उनके नियमों को लिखा नहीं गया है लेकिन वे भी नियमबद्ध ही होते हैं।
जो देश ऐसा हो कि नाचने की कला में भी सही-ग़लत बता सकता हो, क्या वह ऐसा हो सकता है कि वह जीने की कला में सही ग़लत न बता पाए ?
यह असंभव है।
सही ग़लत बताने वाले शास्त्र भी यहां वुजूद में आए और दूसरे देशों में बाद में आए, यहां पहले आए लेकिन इसके बावजूद आज हालत यह है कि भारतवासी नहीं जानते कि किस मक़सद के लिए और किस तरीक़े से जीना सही जीना कहलाएगा ?
आज आपको ऐसे बहुत लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे कि आदमी को इंसान बनना चाहिए और अच्छे काम करने चाहिएं लेकिन जब आप उनसे पूछेंगे कि इंसान बनने के लिए कौन कौन से अच्छे काम करने ज़रूरी हैं ?
तो वह बता नहीं पाएगा।
यही हाल खान-पान और यौन संबंध और अंतिम संस्कार का है।
इनमें से किसी भी बात पर आज भारतीय समाज एक मत नहीं है।
शास्त्रों के देश में यह क्या हो रहा है ?
आज अक्सर आदमी स्वेच्छाचारी क्यों हो गए हैं ?
इस स्वेच्छाचार को कैसे रोका जाए ?
जब तक स्वेच्छाचार को नहीं रोका जाएगा, तब तक भ्रष्टाचार भी नहीं रूकेगा।
भ्रष्टाचार मात्र राजनैतिक और प्रशासनिक समस्या नहीं है बल्कि यह सही ग़लत के ज्ञान की कमी से उपजी एक समस्या है, जिसकी चपेट में आज हम सब हैं, कोई कम है और कोई ज़्यादा।
जब तक हम सदाचार का शास्त्रीय और प्रामाणिक ज्ञान लोगों को उपलब्ध नहीं कराएंगे तब तक लोगों के जीवन में सदाचार आ नहीं सकता।
...और अब तो हालत यह हो गई है कि लोगों को हमारी बात पर ताज्जुब हो सकता है कि क्या सही ग़लत के बारे में भी कोई शास्त्र हो सकता है ?
जबकि हक़ीक़त यह है कि शास्त्र का प्राथमिक और अनिवार्य विषय ही जीवन में सही ग़लत का निर्धारण करना होता है, जीवन के हरेक पहलू में और जीवन के हरेक स्तर पर और यही बात शास्त्र की पहचान भी होती है।
जो ग्रंथ व्यक्ति को आध्यात्मिक रहस्य तो बताए लेकिन यह न बताए कि उस पर उसके परिवार, पड़ोस, देश और विश्व का क्या हक़ है ? वह शास्त्र नहीं होता।
जो ग्रंथ व्यक्ति को उसके व्यक्तिगत जीवन में निर्देश तो दे लेकिन सामूहिक जीवन का मार्ग न बताए, वह शास्त्र नहीं होता।
लोग किसी भी पुस्तक को शास्त्र कहने लगें तो वह शास्त्र नहीं हो जाता।
लोग किसी भी रिवाज को धर्म कहने लगें तो वह धर्म नहीं हो जाता।
शास्त्र और धर्म वही है जो सारी मानव जाति को जीना सिखाए और उसे पेश आने वाले हरेक मसअले का हल बताए।
ऐसे धर्मशास्त्र की ज़रूरत इंसान को सदा ही रही है और आज तो पहले से कहीं बढ़कर है।
जिस चीज़ की आवश्यकता होती है, उस चीज़ की आपूर्ति भी स्वयमेव हो जाया करती है। यह एक प्राकृतिक नियम है।
यह नियम भी शास्त्र में ही लिखा है।
यही नियम आशा जगाता है कि आज हालात चाहे जैसे हों लेकिन हमारा भविष्य बेहतर होगा।
ऐसा भविष्य जहां स्वेच्छाचार के बजाय हमारा अमल शास्त्रानुसार होगा।
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कन्या भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है और आज यह समाज का रिवाज है।
ऐसा समाज जो ख़ुद को सभ्य कहता है।
अगर सभ्यता यही है तो फिर दरिंदगी और हैवानियत क्या है ?
देखिए यह वीडियो, जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा।

एक आवाज़ कन्या भ्रूण रक्षा के लिए Against Female Feticide

Thursday, September 1, 2011

अखंड भारत को तोड़ने वाले मुजरिम कौन ?

ब्लॉगिंग के माध्यम से हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि दिलों को जोड़ने की कोशिश की जानी चाहिए। दिल जुड़ेंगे तो हम जुड़ेंगे और भारत सशक्त होगा। मज़बूत भारत एशिया को नेतृत्व देगा तो इसका रूतबा विश्व में ऊंचा होगा और त यह अपने आस पास के इलाक़ों को एक महासंघ का रूप देकर अपने खोये हुए टुकड़ों को वापस पा सकता है और यह काम आपसी विश्वास और आपसी प्रेम से ही होगा क्योंकि एशिया में मुलमानों बड़ी आबादी है, सो न तो आप इन्हें नज़र अंदाज़ कर सकते हैं और न ही नज़रअंदाज़ करके कभी सफल हो सकते हैं।
इसके बावजूद कुछ शरारती तत्व ऐसे भी हैं जो कि न सिर्फ़ मुसलमानों को नज़रअंदाज़ करते हैं बल्कि वे मुसलमानों को देश बांटने का दोषी बताकर ग़ददार भी कह देते हैं और क़ुरआन पर भी ऐतराज़ कर देते हैं।
क्या यह कोई सही तरीक़ा है ?
क्या हम आपके धर्म में कोई कमी बता रहे हैं ?
नहीं !
इसके बावजूद भी हमारे साथ छेड़ख़ानी क्यों की जा रही है ?
जो हमारे जलाल को नहीं जानता वह ब्लॉगर डॉट के किसी भी वरिष्ठ ब्लॉगर से हमारे बारे में पता कर ले कि हम कौन हैं और हमारे सामने आपके ऐतराज़ यूं ही आते रहे तो फिर हम क्या करेंगे ?
हमें कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है।
पचास से ज़्यादा ब्लॉग्स और वेबसाइट्स पर सैकड़ों लेख हमारे अपने लिखे हुए तैयार पड़े हैं, उन्हें यहां डालना शुरू कर देंगे।
फिर सबके हाथों से तोते उड़ जाएंगे।
अब से दो पोस्ट पहले एक भाई ने इसी तरह देश के बंटवारे आदि को लेकर हम पर ऐतराज़ जड़ दिया।
हमने उन्हें जवाब जवाब देते हुए कहा कि
आपने सुना होगा कि कभी मलेशिया और अफ़ग़ानिस्तान भी अखंड भारत का ही हिस्सा थे लेकिन जब मुसलमान भारत आए भी नहीं थे। उससे पहले ही हिंदुओं ने अखंड भारत के हज़ारों छोटे छोटे टुकड़े कर दिए थे।
क्या आपने कभी उन हज़ारों राजाओं और उनके लाखों हिंदू सैनिकों को ग़ददार कहा है ?
नफ़रत की बोली बोलने से आप केवल नफ़रत फैला सकते हैं लेकिन किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
जो आदमी ख़ुद ग़ददार हो उसे क्या हक़ है कि वह दूसरों को वही काम करने पर ग़ददार कहे जो कि अपने प्यारे पूर्वज करते आए हैं।

नफ़्स से जिहाद करना सबसे ज़्यादा मुश्किल है

हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का रूतबा हक़ और बातिल को पहचानने में बहुत बुलंद है। मुसलमानों में हरेक फ़िरक़ा उनके बारे में यही राय रखता है। जो आदमी उनके कलाम पर अमल करेगा कभी गुमराह नहीं हो सकता लेकिन आदमी अपने नफ़्स की ख्वाहिश की पैरवी करता है और हक़ को छोड़ देता है या दीन में से भी वह उतनी ही बात मानता है जो उसके नफ़्स को ख़ुशगवार लगती है। नागवार और भारी लगने वाली बातों को आदमी छोड़ देता है।
नमाज़ का हुक्म सबसे अव्वल है इस्लाम में और लोगों के हक़ अदा करने पर भी बहुत ज़ोर है लेकिन मुसलमानों की एक बड़ी तादाद इन दोनों ही हुक्मों की तरफ़ से आम ग़फ़लत की  शिकार है।
यह बहुत अजीब सी बात है।
इसके बाद भी उनका दावा है कि हम मुसलमान हैं।
हम अली को मौला मानते हैं।
अली को मौला मानते हो तो फिर उनकी बात को मानने में सुस्ती क्यों ?
दीन में सुस्ती तो मुनाफ़िक़ों का तरीक़ा है।
हक़ को पाने में सबसे बड़ी रूकावट ख़ुद इंसान का नफ़्स है और इससे जिहाद करके इसकी हैवानी ख़सलतों पर क़ाबू पाना सबसे ज़्यादा मुश्किल काम है। इसीलिए इसे हदीस में जिहादे अकबर कहा गया है।
इस्लाम के दूसरे दुश्मनों का हाल तो यह है कि अगर उन्हें न भी मारा जाये वे तब भी मर जाएंगे या वे तौबा भी कर सकते हैं  लेकिन यह नफ़्स तो बिना क़ाबू किए क़ाबू हो नहीं सकता और इसे क़ाबू करना इंसान के लिए सबसे नागवार काम है।
ऐसे में मुसलमान राहे रास्त पर आएं तो कैसे ?
पहले क्या हुआ यह जानना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम यह तय कर सकें कि अब हमें क्या करना है ?

आपकी पोस्ट अच्छी मालूमात देती है।
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यह कमेन्ट इस पोस्ट पर है -

Monday, August 29, 2011

कामकाजी औरतों का क्लासिफ़िकेशन The classification of working women

आम तौर पर कामाकाजी औरत उस औरत को माना जाता है जो कि मर्दों की तरह घर से बाहर जाकर कुछ काम करती है और कुछ रक़म कमाकर लाती है। जबकि देखा जाय तो घर के काम काज भी काम काज की ही श्रेणी में ही आते हैं। घर के कामों को भी काम काज की श्रेणी में रखा जाए तो कामकाजी औरतों का क्लासिफ़िकेशन यह है -
घरकाजी और बाहरकाजी
दोनों की समस्याएं हैं।
इन दोनों की ही समस्याओं पर विचार विमर्श करना ज़रूरी है।
जो औरतें अपने बाल बच्चों को छोड़ कर बाहर जाकर कमा रही हैं तो वे ऐसा मजबूरी में ही कर रही होंगी। बहरहाल औरत जिस हाल में , जिस मक़ाम पर अपनी योग्यताओं से काम लेकर देश का भला कर रही है, तारीफ़ के लायक़ है।
उन्हें सुरक्षा और सद्प्रेरणा देना हमारी ज़िम्मेदारी है।
जिस समाज की बेहतरी मंज़ूर हो तो उस समाज की औरतों को बेहतर बना दीजिए, ऐसा कहना है डा. अनवर जमाल का।

जो असहमत हो, वह आकर बहस कर ले, वर्ना सब के सब सहमत समझे जाएंगे।
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यह एक हल्की फुल्की पोस्ट है, जिसे बस यूं ही लिख दिया लेकिन जो भी लिखा है, वह एक हक़ीक़त के तौर पर ही लिखा है।

Tuesday, August 9, 2011

मासूम फ़रिश्ता अमन खान Amn Khan

 अमन खान पैदाइश के चंद मिनट बाद  1 अगस्त 2011
   अमन खान पैदाइश के चंद मिनट बाद हमारी फूफी की गोद में
अमन खान का फोटो हॉस्पिटल में पैदाइश के चंद मिनट बाद ही 
 अमन खान 7 अगस्त 2011 को
अमन खान 7 अगस्त 2011 को
अमन खान 7 अगस्त 2011 को

Friday, July 22, 2011

अनम की क़ब्र के पास

आज के दिन अनम इस दुनिया से रूख़सत हुई थी। एक साल हो गया इस वाक़ये को। आज उसकी क़ब्र पर जाना हुआ। बड़े से क़ब्रिस्तान में सैकड़ों क़ब्रों के बीच एक छोटी सी क़ब्र बिल्कुल कच्ची। बारिश की वजह से उसकी मिट्टी बह कर लगभग ज़मीन के बराबर ही हो गई थी। मैंने फावले से ख़ुद थोड़ी सी मिट्टी डाली ताकि अगली बार आऊं तो पहचान सकूं कि मेरे वुजूद का एक हिस्सा किस जगह दफ़्न है !


वक़्त शाम का था। माहौल शांत था। शहर का यह क़ब्रिस्तान पहले शहर से बाहर था लेकिन अब यह शहर के अंदर ही आ गया है। यही वो जगह है जहां सारे शहर को समाना है एक-एक करके। लोगों ने दो तिहाई से ज़्यादा ज़मीन क़ब्ज़ा कर अपने मकान खड़े कर लिए हैं। अब क़ब्रिस्तान के चारों तरफ़ मकान बने हुए हैं। ज़िंदा और मुर्दा दोनों एक दूसरे के पड़ोस में रह रहे हैं बल्कि कितनी क़ब्रें तो आज मकानों के नीचे आ चुकी हैं। ज़ेरे-ज़मीन मुर्दे आबाद हैं और ज़मीन की सतह पर ज़िंदा। मुर्दों को ज़िंदा होना है और ज़िंदा लोगों को मुर्दा ताकि हरेक अपने अमल का अंजाम देखे।
ज़मीं खा गई आसमां कैसे कैसे ?

जब किसी क़ब्रिस्तान में जाओ तो यही अहसास होता है।

Monday, July 18, 2011

इंसान का परिचय Introduction

मैं एक इंसान हूं और निवास भारत में है। लोगों को बेवजह नफ़रत करते हुए और अपना जीवन व्यर्थ करते हुए देखता हूं तो दुख होता है। लोगों को उसूली ज़िंदगी जीने की प्रेरणा देना मेरा काम है। रोज़ी-रोटी के लिए भी भागदौड़ करनी पड़ती है क्योंकि घर में बीवी बच्चे और मां-बाप भी हैं। हमारे मत और हमारी परंपराएं कुछ भी हो सकती हैं लेकिन हम सब इंसान हैं और जो बात भी इंसानियत के खि़लाफ़ जाती है, वह हमारा मत बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। दुनिया बदल रही है, हमें भी बदलना चाहिए लेकिन यह बदलाव बेहतर इंसान बनने के लिए होना चाहिए। जो बात भी बुराई की तरफ़ ले जाए उसे बदलना नहीं भटकना कहा जाएगा। हमें भटकने और भटकाने से बचना चाहिए। यही मेरी सोच है और यही मेरा मिशन है।

आज ‘नवभारत टाइम्स‘ में अपना ब्लॉग बनाया तो मैंने अपने परिचय में उपरोक्त बातें लिखी हैं
लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आप कौन हैं ?
और क्या कर रहे हैं ?
जबकि आपको करना क्या चाहिए ?

Saturday, July 16, 2011

समलैंगिकता और बलात्कार की घटनाएं क्यों अंजाम देते हैं जवान ? Rape

बीएसएफ़ के जवान हों या कि सेना के, उन्हें सीमा पर देश की जनता की हिफ़ाज़त के लिए नियुक्त किया जाता है लेकिन ऐसे क़िस्से भी सामने आते रहते हैं जबकि इनमें से कोई अपने देश की आबरू ख़ुद ही लूट लेता है। ऐसे में इन्हें सज़ा देना ज़रूरी हो जाता है। हाईकोर्ट ने भी यही किया है, देखिए एक ख़ब : 


दुष्कर्मी जवानों की सजा बरकरार
लगभग 18 साल पहले बंगाल बार्डर पर स्थित एक गांव की गूंगी व बहरी लड़की से दुष्कर्म करने के मामले में नौकरी से हाथ धोने व सात साल की सजा पाने वाले सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के दो सिपाहियों को दिल्ली उच्च न्यायालय ने राहत देने से इंकार कर दिया है। न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग व न्यायमूर्ति सुनील गौड़ की खंडपीठ ने आरोपी भूषण सिंह व अवतार सिंह की याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि तमाम तथ्यों से जाहिर है कि उन्होंने यह अपराध किया था।
अदालत ने उस दलील को भी खारिज कर दिया कि पीडि़ता ने उनको शिनाख्त परेड में ठीक से नहीं पहचाना था। अदालत ने कहा कि हो सकता है कि पीड़िता के गूंगी व बहरी होने के कारण वह अपनी बात को सही तरीके से न रख पाई हो। इतना ही नहीं, कोर्ट ने उस दलील को भी खारिज कर दिया कि घटना के दो दिन बाद क्यों शिकायत की गई। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के मामले में पीड़िता के परिवार को सामाजिक दबाव को देखना पड़ता है। इतना ही नहीं इस मामले में तो बीएसएफ के जवान शामिल थे। ऐसे में उनको जरूर इस बारे में सोचने में समय लगा होगा, लेकिन फिर भी उन्होंने घटना के अगले दिन ही गांव के प्रधान को बता दिया था और उसके एक दिन बाद शिकायत दर्ज हो गई थी।
अवतार सिंह व भूषण सिंह बीएसएफ की 55वीं बटालियन में बतौर कांस्टेबल बंगाल बार्डर पर तैनात थे। इन पर आरोप है कि इन्होंने एक गांव की गूंगी व बहरी लड़की से बीस अक्टूबर 1992 को दुष्कर्म किया। इस मामले में जनवरी 1993 में यह कहते हुए इनके खिलाफ जांच बंद कर दी गई थी कि इन्हें स्थानीय तस्करों के कहने पर फंसाया गया है। मगर बाद में फिर से जांच शुरू कर गई और जनरल सिक्योरटी फोर्स कोर्ट ने दस अक्टूबर 1996 को इन दोनों को नौकरी से बर्खास्त करते हुए सात-सात साल के कारावास की सजा दी थी। इसी आदेश को इन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
Source : http://in.jagran.yahoo.com/news/local/delhi/4_3_8025360.html

यह तो हुई दुष्कर्म की सज़ा लेकिन ध्यान इस पर भी दिया जाना चाहिए कि दुष्कर्म की नौबत क्यों आई ?
अक्सर ऐसा होता है कि नियम तो बना दिए जाते हैं लेकिन नियम बनाने वाले इनसान की ज़रूरतों से वाक़िफ़ ही नहीं होते। सुरक्षा बलों में तैनात जवानों की ड्यूटी ही ऐसी है कि उन्हें अपने घरों से बहुत दूर पोस्ट होना पड़ता है और इस पर भी को उन्हें चार-चार माह बाद छुट्टी मिल पाती है। विदेशियों से लड़ना आसान है लेकिन अपने शरीर में बनने वालों हॉर्मोन्स को हराना बहुत मुश्किल है। इसी के नतीजे में तरह तरह की शर्मनाक घटनाएं सामने आती रहती हैं। सैनिकों और अद्र्ध सैनिक बलों के जवानों का ध्यान पहले से बेहतर रखा जा रहा है लेकिन इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि अभी भी कुछ और सुधार किए जाने की ज़रूरत है, ख़ास तौर से उनकी यौन ज़रूरतों को ध्यान में रखकर कुछ सुधार तुरंत किए जाने चाहिएं।

Wednesday, July 13, 2011

ग़द्दारों से पट गया हिंदुस्तान Ghaddar

कल मुंबई पर फिर आतंकवादी हमला हो गया है। अभी तक 20 लोगों के मारे जाने की सूचना आई है और 100 से ज़्यादा ज़ख्मी हैं। हमारी संवेदनाएं इनके साथ हैं और सारे देश की संवेदनाएं इनके साथ हैं। इस बार भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करने और आतंकवादियों से कड़ाई से निपटने की बातें की जा रही हैं। मुंबई पर किए गए पिछले हमलों के बाद भी यही बातें की गई थीं। यह हमला बता रहा है कि बातों पर ढंग से अमल नहीं हो पाया है।
आतंकवादियों का असल काम लोगों को मारना नहीं होता। मात्र 20-30 लोगों को मारने से भारत की आबादी में कुछ भी कमी होने वाली नहीं है। दरअसल उनका मक़सद भारत के लोगों में एक दूसरे के प्रति अविश्वास और संदेह पैदा करना होता है। आतंकवादी हमलों के बाद जो लोग एक वर्ग विशेष के प्रति सरेआम संदेह व्यक्त करते हैं, दरअसल वे जाने-अनजाने आतंकवादियों के ‘अगले चरण का काम‘ ही पूरा करते हैं। आरोप प्रत्यारोप और संदेह भारतवासियों के प्रेम के उस धागे को कमज़ोर करता है जिससे सारा भारत बंधा है। इस धागे को कोई आतंकवादी आज तक कमज़ोर नहीं कर सका है और न ही कर सकता है। यही हमारी शक्ति है। इस शक्ति को खोना नहीं है।
देश के दुश्मनों के लिए काम करने वाले ग़द्दारों को चुन चुन कर ढूंढने की ज़रूरत है और उन्हें सरेआम चैराहे पर फांसी दे दी जाए। चुन चुन कर ढूंढना इसलिए ज़रूरी है कि आज ये हरेक वर्ग में मौजूद हैं। इनका नाम और संस्कृति कुछ भी हो सकती है, ये किसी भी प्रतिष्ठित परिवार के सदस्य हो सकते हैं। पिछले दिनों ऐसे कई आतंकवादी भी पकड़े गए हैं जो ख़ुद को राष्ट्रवादी बताते हैं और देश की जनता का धार्मिक और राजनैतिक मार्गदर्शन भी कर रहे थे। सक्रिय आतंकवादियों के अलावा एक बड़ी तादाद उन लोगों की है जो कि उन्हें मदद मुहैया कराते हैं। मदद मदद मुहैया कराने वालों में वे लोग भी हैं जिन पर ग़द्दारी का शक आम तौर पर नहीं किया जाता।
‘लिमटी खरे‘ का लेख इसी संगीन सूरते-हाल की तरफ़ एक हल्का सा इशारा कर रहा है :

उच्च स्तर पर बैठे एक राजनयिक और भारतीय विदेश सेवा की बी ग्रेड की अफसर माधुरी गुप्ता ने अपनी हरकतों से देश को शर्मसार कर दिया है, वह भी अपने निहित स्वार्थों के लिए। माधुरी गुप्ता ने जो कुछ भी किया वह अप्रत्याशित इसलिए नहीं माना जा सकता है क्योंकि जब देश को चलाने वाले नीतिनिर्धारक ही देश के बजाए अपने निहित स्वार्थों को प्रथमिक मान रहे हों तब सरकारी मुलाजिमों से क्या उम्मीद की जाए। आज देश का कोई भी जनसेवक करोडपति न हो एसा नहीं है। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और इतिहास खंगाला जाए और आज की उनकी हैसियत में जमीन आसमान का अंतर मिल ही जाएगा। देश के सांसद विधायकों के पास आलीशान कोठियां, मंहगी विलसिता पूर्ण गाडिया और न जाने क्या क्या हैं, फिर नौकरशाह इससे भला क्यों पीछे रहें।

नौकरशाहों के विदेशी जासूस होने की बात कोई नई नहीं है। जासूसी के ताने बाने में देश के अनेक अफसरान उलझे हुए हैं। पडोसी देश पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में पकडी गई राजनयिक माधुरी गुप्ता पहली अधिकारी नहीं हैं, जिन पर जासूसी का आरोप हो। इसके पहले भी अनेक अफसरान इसकी जद में आ चुके हैं, बावजूद इसके भारत सरकार अपनी कुंभकर्णीय निंद्रा में मगन है, जो कि वाकई आश्चर्य का विषय है। लगता है इससे बेहतर तो ब्रितानी हुकूमत के राज में गुलामी ही थी।

भारतीय नौ सेना के एक अधिकारी सुखजिंदर सिंह पर एक रूसी महिला के साथ अवैध संबंधों की जांच अभी भी चल रही है। 2005 से 2007 के बीच उक्त अज्ञात रूसी महिला के साथ सुखजिंदर के आपत्तिजनक हालात में छायाचित्रों के प्रकाश में आने के बाद सेना चेती और इसकी बोर्ड ऑफ इंक्वायरी की जांच आरंभ की। इस दौरान सुखजिंदर पर विमानवाहक पोत एडमिरल गोर्शकेश की मरम्मत का काम देखने का जिम्मा सौंपा गया था। सुखजिंदर पर आरोप है कि उसने पोत की कीमत कई गुना अधिक बताकर भारत सरकार का खजाना हल्का किया था।

बीजिंग में भारतीय दूतावास के एक वरिष्ठ अधिकारी मनमोहन शर्मा को 2008 में चीन की एक अज्ञात महिला के साथ प्रेम की पींगे बढाने के चलते भारत वापस बुला लिया गया था। भारत सरकार को शक था कि कहीं उक्त अधिकारी द्वारा उस महिला के मोहपाश में पडकर गुप्त सूचनाएं लीक न कर दी जाएं। सरकार मान रही थी कि वह महिला चीन की मुखबिर हो सकती है। 1990 के पूर्वार्ध में नेवी के एक अधिकारी अताशे को आईएसआई की एक महिला एजेंट ने अपने मोहपाश में बांध लिया था। उक्त महिला करांची में सेन्य नर्सिंग सर्विस में काम किया करती थी। बाद में अताशे ने अपना गुनाह कबूला तब उसे नौकरी से हटाया गया।

इसी तरह 2007 में रॉ के एक वरिष्ठ अधिकारी (1975 बेच के अधिकारी) को हांगकांग में एक महिला के साथ प्रगाढ संबंधों के कारण शक के दायरे में ले लिया गया था। उस महिला पर आरोप था कि वह चीन की एक जासूसी कंपनी के लिए काम किया करती थी। रॉ के ही एक अन्य अधिकारी रविंदर सिह जो पहले भारत गणराज्य की थलसेना में कार्यरत थे पर अमेरिकन खुफिया एजेंसी सीआईए के लिए काम करने के आरोप लग चुके हैं। रविंदर दक्षिण पूर्व एशिया में रॉ के एक वरिष्ठ अधिकारी के बतौर कर्यरत था। इस मामले में भारत को नाकमी ही हाथ लगी, क्योकि जब तक रविंदर के बारे में सरकार असलियत जान पाती तब तक वह बरास्ता नेपाल अमेरिका भाग चुका था। 80 के दशक में लिट्टे के प्रकरणों को देखने वाले रॉ के एक अफसर को एक महिला के साथ रंगरेलियां मनाते हुए पकडा गया। उक्त महिला अपने आप को पैन अमेरिकन एयरवेज की एयर होस्टेस के बतौर पेश करती थी। इस अफसर को बाद में 1987 में पकडा गया।

इस तरह की घटनाएं चिंताजनक मानी जा सकतीं हैं। देशद्रोही की गिरफ्तारी पर संतोष तो किया जा सकता है, पर यक्ष प्रश्न तो यह है कि हमारा सिस्टम किस कदर गल चुका है कि इनको पकडने में सरकारें कितना विलंब कर देतीं हैं। भारत पाकिस्तान के हर मसले वैसे भी अतिसंवेदनशील की श्रेणी में ही आते हैं, इसलिए भारत सरकार को इस मामले में बहुत ज्यादा सावधानी बरतने की आवश्यक्ता है। वैसे भी आदि अनादि काल से राजवंशों में एक दूसरे की सैन्य ताकत, राजनैतिक कौशल, खजाने की स्थिति आदि जानने के लिए विष कन्याओं को पाला जाता था। माधुरी के मामले में भी कमोबेश एसा ही हुआ है।

माधुरी गुप्ता का यह बयान कि वह अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बदला लेने के लिए आईएसआई के हाथों की कठपुतली बन गई थी, वैसे तो गले नही उतरता फिर भी अगर एसा था कि वह प्रतिशोध की ज्वाला में जल रही थी, तो भारत की सडांध मारती व्यवस्था ने उसे पहले क्यों नहीं पकडा। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत का गुप्तचर तंत्र (इंटेलीजेंस नेटवर्क) पूरी तरह भ्रष्ट हो चुका है। आज देश को आजाद हुए छ: दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, और हमारे ”सम्माननीय जनसेवकों” द्वारा खुफिया तंत्र का उपयोग अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए ही किया जा रहा है। क्या यही है नेहरू गांधी के सपनों का भारत!

लिहाज़ा भावुकता में बहकर अंधे न हों और बेबुनियाद शक न करें। चंद लोगों के कारण पूरे समुदाय की निष्ठा पर सवालिया निशान न लगाएं।

Friday, July 8, 2011

ख़ून बहाना जायज़ ही नहीं है किसी मुसलमान के लिए No Voilence

राई का पहाड़ बन गया, तिल का ताड़ हो गया। मुरादाबाद में केवल ‘एट्टीट्यूड प्रॉब्लम‘ के चलते पुलिस के अफ़सरान घायल हो गए और कई मुसलमान उनकी गोली का शिकार हो गए। वजह केवल यह थी कि पुलिस अपने पुलिसिया अंदाज़ में किसी मुल्ज़िम के घर पहुंची और दबिश के दौरान उसने घर का सामान जो फेंकना शुरू किया तो उसमें पवित्र क़ुरआन को भी फेंक दिया। इसके बाद मसला केवल उस मुल्ज़िम व्यक्ति का न बचा बल्कि गांव के सारे मुसलमानों का हो गया। पुलिस पार्टी चाहती तो माफ़ी मांग कर मसले को वहीं सुलझा सकती थी लेकिन ऐसा न हो सका। नतीजा यह हुआ कि पुलिस और पब्लिक दोनों ही घायल हो गए। पुलिस को क्या करना चाहिए था ?
यह बताने के लिए आला अफ़सरान मौजूद हैं लेकिन मुसलमान के लिए किसी का ख़ून बहाने की इजाज़त नहीं है। इसी विषय पर हमने एक पोस्ट लिखी है और इसे दो जगह पेश किया है :-



दरअस्ल यह पोस्ट हमने साहित्य प्रेमी संघ के लिए लिखी थी। इस संघ की स्थापना इंजीनियर सत्यम शिवम साहब ने की है और यह साहित्य सुमन उगाता है और ख़ुशबू फैलाता है। हमने हमेशा साहित्य की रचना तभी की है जबकि उसका कोई असर व्यक्ति के जीवन और उसके चरित्र पर पड़ता हो। मात्र मनोरंजन के लिए साहित्य लिखना हमारी नज़र में समय को बेकार गंवा देना है।
समाज में चारों ओर समस्याएं हैं, हमें उनके हल के बारे में सोचना चाहिए और ऐसा साहित्य रचना चाहिए जो सबको रास्ता दिखा सके।
एक नज़र आपको ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ पर भी डालनी चाहिए, जो ब्लॉग जगत का सबसे पहला समाचार पत्र है और निष्पक्ष है।
ग़लत बात को ग़लत कहने में और धोखाधड़ी को उजागर करने में यारी और बिरादरी का कोई लिहाज़ नहीं करता। यहां आप अपने ब्लॉग का मुफ़्त प्रचार कर सकते हैं।

Sunday, July 3, 2011

नए ब्लॉगर मैदान में लाएगी हिंदी ब्लॉगिंग गाइड

हिंदी ब्लॉगिंग गाइड की तैयारी का मक़सद यह है कि नए ब्लॉगर्स को मैदान में लाया जा सके क्योंकि गुटबाज़ी, पक्षपात और कम पात्र लोगों को ईनाम से नवाज़े जाने के हादसों ने बहुत से पुराने मगर कमज़ोर हिंदी ब्लॉगर्स के क़दम उखाड़ दिए हैं।
कुछ लोग ब्लॉगिंग के मैदान में आए थे मिशन की ख़ातिर और फिर लग गए नोट बनाने में। माल के लालच में ये लोग अपना ईमान और ज़मीर तक गिरवी रख चुके हैं या हो सकता है कि उसे बिल्कुल ही बेच डाला हो ?
इसके बावजूद वे ख़ुद को किसी मसीहा की मानिंद ही पेश करते हैं।
उनकी अदा और अदाकारी से कोई भी भ्रम में नहीं पड़ता। अलबत्ता वे ख़ुद को ही फ़रेब दे रहे हैं। वे अपनी आय और अपने संबंधों के विस्तार के लिए ही ब्लॉगिंग कर रहे हैं। ब्लॉगिंग का इस्तेमाल आजकल निजी ख़ुशी के लिए ही ज़्यादा हो रहा है। इन लोगों को समाज के सरोकारों से कोई सरोकार ही नहीं है।
एक मुख्यमंत्री के ख़ून सने हाथों से ईनाम पाने के लिए पुराने मीडियाकर्मियों से लेकर न्यूमीडिया के फ़नकार तक सभी बिछे जा रहे थे। यह मंज़र भव्य था और सभी ने इसे देखा है। यही लोग एग्रीगेटर चला रहे हैं। ऐसे में ये किसी भी ऐसी आवाज़ को भला कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं, जो सच कहती हो।
ईमानदारी मुश्किल है, इसीलिए लोग बेईमान हो जाते हैं क्योंकि लोग ईमानदार बनकर ‘बहुमत‘ को अपने खि़लाफ़ करना नहीं चाहते।
झूठ-फ़रेब और दग़ा को साहित्यिक भाषा में कूटनीति कहा जाता है। अभी तक तो मशहूर और सफल हिंदी एग्रीगेटर्स कम या ज़्यादा इसी कूटनीति को ही अपनी नीति बनाए हुए हैं।
बेईमान बहुल लोगों की सेवा करते करते ईमानदार भी उनकी चपेट में आ जाते हैं। इसी के साथ अच्छे लोग भी ब्लॉगिंग कर रहे हैं। उनका दायरा और उनकी ताक़त बढ़ेगी तो ईमानदारी का चलन भी बढ़ेगा।
उम्मीद पर दुनिया क़ायम है।
एग्रीगेटर न हो तो भी ब्लॉगिंग की जा सकती है और लोग ब्लॉग्स तक पहुंचते भी हैं। गूगल ब्लॉगर्स को पाठक भी देता है बशर्ते कि लेख उपयोगी हो और वह ज़्यादातर लोगों की ज़रूरत को पूरा करता हो।
ब्लॉगिंग के ज़रिए से सच कहना आज आसान हो गया है। सच सामने आकर ही रहेगा। अब यह किसी के रोके से रूकने वाला नहीं है।
नए ब्लॉगर आएंगे तो हिंदी ब्लॉगिंग को एक नई ऊर्जा मिलेगी। लोग बढ़ेंगे तो हालात भी आज जैसे न रहेंगे। हिंदी ब्लॉगिंग गाइड लिखने का मक़सद यही है कि हिंदी ब्लॉगिंग को एक सार्थकता दी जाए। उसके ज़रिए से लोगों की सोच को बेहतर बनाया जाए।
हरेक हिंदी ब्लॉगर से इसमें सहयोग की अपील है।
शुक्रिया !

Thursday, June 30, 2011

हे भिक्षुक ! सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था भिक्षा मांगने से रोकती है

'देश और विदेशों में कोई हिन्दू नहीं, यह शब्द केवल कागजों तक ही सीमित है।'
यह दावा किया गया है मशहूर हिंदी ब्लॉग ‘लोकसंघर्ष पत्रिका‘ पर।
भिक्षु विमल कीर्ति महास्थविर (मोबाइल नं. 07398935672) कहते हैं कि
‘हिन्दू’ शब्द का सम्बन्ध धर्म से नहीं, इस शब्द का सम्बन्ध ‘सिन्धु नदी’ से है।
‘हिन्दू’ शब्द मध्ययुगीन है। श्री रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में ‘हिन्दू’ शब्द हमारे प्राचीन साहित्य में नही मिलता है। भारत में इसका सबसे पहले उल्लेख ईसा की आठवीं सदी में लिखे गए एक ‘तन्त्र ग्रन्थ’ में मिलता है। जहाँ इस शब्द का प्रयोग धर्मावलम्बी के अर्थ में नहीं किया गया जाकर, एक, ‘गिरोह’ या ‘जाति’ के अर्थ में किया गया है।
गांधी जी भी ‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी स्वीकार करते हुए कहते थे- हिन्दू धर्म का यथार्थ नाम, ‘वर्णाश्रमधर्म’ है।
हिन्दू शब्द मुस्लिम आक्रमणकारियों का दिया हुआ एक विदेशी नाम है। ‘हिन्दू’ शब्द फारसी के ‘ग़यासुल्-लुग़ात’ नामक शब्दकोश में मिलता है। जिसका अर्थ- काला, काफिर, नास्तिक सिद्धान्त विहीन, असभ्य, वहशी आदि है और इसी घृणित नाम को बुजदिल लोभी ब्राह्मणों ने अपने धर्म का नाम स्वीकार कर लिया है।
हिंसया यो दूषयति अन्यानां मानांसि जात्यहंकार वृन्तिना सततं सो हिन्दू: से बना है, जो जाति अहंकार के कारण हमेशा अपने पड़ोसी या अन्य धर्म के अनुयायी का, अनादर करता है, वह हिन्दू है। डा0 बाबा साहब अम्बेडकर ने सिद्ध किया है कि ‘हिन्दू’ शब्द देश वाचक नहीं है, वह जाति वाचक है। वह ‘सिन्धु’ शब्द से नहीं बना है। हिंसा से ‘हिं’ और दूषयति से ‘दू’ शब्द को मिलाकर हिन्दू बना है।
अपने आपको कोई ‘हिन्दू’ नहीं कहता है, बल्कि अपनी-अपनी जाति बताते हैं।


इसी के साथ वह दावा करते हैं कि
‘‘भगवान बुद्ध की ‘श्रेष्ठ व्यवस्था’, बौद्ध धर्म के बराबर संसार में कोई दूजी व्यवस्था नहीं है।‘‘
इसमें कोई शक नहीं है कि उन्होंने इंसानियत की शिक्षा दी और ऐसे टाइम में दी जबकि ब्राह्मणों का विरोध करना आसान नहीं था। उनका साहस और मानवता के प्रति उनकी करूणा क़ाबिले तारीफ़ है लेकिन यह दावा निःसंदेह अतिश्योक्ति से भरा हुआ है।

भीख मांगना आज जुर्म है और बौद्ध धर्म गुरू का नाम ही भिक्षु है भिक्षा मांगने के कारण। भिक्षा मांगने की व्यवस्था के बारे में तो यह नहीं कहा जा सकता कि इस जैसी व्यवस्था संसार में दूसरी है ही नहीं। दूसरे मतों में भी भिक्षा मांगने की परंपरा रही है।
आज के ज़माने में केवल वही व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ कही जा सकती है जिसमें भिक्षा मांगने से रोका गया हो और मेहनत की कमाई खाने की प्रेरणा दी गई हो।।
पता कीजिए कि वह धर्म कौन सा है जो अपने अनुयायियों को भिक्षा और भीख मांगने से रोकता है ?

Saturday, June 25, 2011

डायना बनने की चाह में औरतें बन गईं डायन Vampire

लोगों ने ऐश की ख़ातिर अपना आराम खो दिया है। सुनने में यह बात अटपटी सी लगती है मगर है बिल्कुल सच !
लोगों ने अपना लाइफ़ स्टैंडर्ड बढ़ा लिया तो केवल मर्द की आमदनी से ख़र्चा चलना मुमकिन न रहा और तब औरत को भी पैसा कमाने के लिए बाहर बुला लिया गया लेकिन इससे उसके शरीर और मन पर दो गुने से भी ज़्यादा बोझ लद गया।
औरत आज घर के काम तो करती ही है लेकिन उसे पैसे कमाने के लिए बाहर की दुनिया में काम भी करना पड़ता है। औरत का दिल अपने घर और अपने बच्चों में पड़ा रहता है। बहुत से बच्चे माँ के बाहर रहने के कारण असुरक्षित होते हैं और अप्रिय हादसों के शिकार बन जाते हैं। छोटे छोटे बच्चों का यौन शोषण करने वाले क़रीबी रिश्तेदार और घरेलू नौकर ही होते हैं। जो बच्चे इन सब हादसों से बच भी जाते हैं, वे भी माँ के आँचल से तो महरूम रहते ही हैं और एक मासूम बच्चे के लिए इससे बड़ा हादसा और कुछ भी नहीं होता । माँ रात को लौटती है थकी हुई और उसे सुबह को फिर काम पर जाना है । ऐसे में वह चाह कर भी अपने बच्चों को कुछ ज्यादा दे ही नहीं पाती।
इतिहास के साथ आज के हालात भी गवाह हैं कि जिस सभ्यता में भी औरत को उसके बच्चों से दूर कर दिया गया । उस सभ्यता के नागरिकों का चरित्र कमज़ोर हो गया और जिस सभ्यता के नागरिकों में अच्छे गुणों का अभाव हो जाता है वह बर्बाद हो जाती है ।
औरत का शोषण बंद होना चाहिए ताकि हमारी नस्लें अपनी माँ की मुनासिब देखभाल पा सकें।
जहाँ मजबूरियों के चलते परिवार की सारी ज़िम्मेदारी औरत के कंधों पर आ पड़ी है, वे इस लेख का विषय नहीं हैं । भोग विलास के साधन घर में जमा करने के लिए अपने मासूम बच्चों के अरमानों की बलि देना कैसे उचित है?
यह नई सभ्यता का असर ही तो है कि कहीं तो माँएं अपनी कोख में बच्चों की बलि दे रही है और अगर उन्हें अपना वंश चलाने के पैदा कर भी दिया जाता है तो उनके अरमानों की बलि रोज़ाना चढ़ाई जाती है ।
आधुनिक शिक्षा ने आज माँ को आधुनिक डायन बनाकर रख दिया है।
जो लोग डायन के वुजूद को नकारते हैं, वे चाहें तो अपने आस पास बेशुमार डायनें देख सकते हैं ।

Monday, June 20, 2011

ज्ञान के मोती



हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया है कि
1. जो शख्स जल्दबाज़ी के साथ हरेक बात का जवाब देता है, वह ठीक जवाब बयान नहीं कर सकता।
2. जो शख्स हक़ (सत्य) की मुख़ालिफ़त करता है, हक़ तआला (परमेश्वर) ख़ुद उसका मुक़ाबला करता है।
3. जो शख्स अपने हरेक काम को पसंद करता है, उसकी अक्ल में नक्स (विकार) आ जाता है।
4. बुरे काम पर राज़ी होने वाला मानो उस का करने वाला है।
5. ऐसा बहुत कम होता है कि जल्दबाज़ नुक्सान न उठाए और सब्र करने वाला कामयाब न हो।
6. जिस शख्स के दिल में जितना ज़्यादा (नाजायज़) लालच होता है, उसको अल्लाह तआला पर उतना ही कम यक़ीन होता है।
स्रोत : राष्ट्रीय सहारा उर्दू, पृ. 7 दिनांक 20 जून २०११

Sunday, June 19, 2011

पाताल लोक में कैसे पहुंचेगी हिंदी ब्लॉगिंग ? - Dr. Anwer Jamal

जागरण जंक्शन में सबसे ज़्यादा देखे जाने वाली एक पोस्ट यह भी है। इसमें लेखक ने एक विशेष पहलू उजागर किया है।

महिलायें कहीं खुद सेक्स सिंबल के सहारे तो जमीनी लड़ाई लडऩे के मूड में नहीं है। कारण, महिलायें भी खुद देह का इस्तेमाल औजार, हथियार के तौर पर करते हुये अब इसे खुले बाजार में वाद का हिस्सा बना दिया है। मर्डर-2 के पांच पोस्टर सबके सब अश्लील, बाजार में उतारे गये हैं। लोगों से अपील की गयी है कि मादक पोस्टर को चुनने में निर्माता-निदेशक को मदद करें। ये फिल्में बच्चों के लिये नहीं हैं। इसकी हीरोइन श्रीलंका से आयात की गयी हैं। क्योंकि भारतीय हीराइनें तो कपड़ा उतारने से रहीं सो श्रीलंकाई सुंदरी जैकलीन फर्नांडीज को सेक्स बम के रूप में परोसा गया है जो भारत के इमरान हाशमी सेलिपटेंगी और यहां के मर्द उसकी मादकता को झेलकर किसी अनजान, सड़कों पर गुजर-बसर करने वाली लड़की को हवस का शिकार बनायेंगे। आज समय ने जरूर सोच को बदल दिया है। लड़कियां हर क्षेत्र में अगुआ बन रही हैं लेकिन भोग्या के रूप में उसके चरित्र में कहीं कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा। वह आज भी दैहिक सुख की एक सुखद परिभाषा भर ही है। जमाना बदला है। सोच बदलने के बाद भी लड़कियां कहीं मर्डर-2 में कपड़े उतारती दिखती है तो कहीं ब्रिटनी सर्वश्रेष्ठ समलैगिंक आइकान चुनी जाती हैं। कारोबार चलाने की अचूक हथियार साबित हो रही हैं ऐसी लड़कियां। पान की दुकान पर बैठी महिला की एक मुस्कान को तरसते लोगों को देखकर तो यही लगता है। एक गांव है। वहां के पुल के बगल में एक पानवाली आजकल, इन दिनों, कुछ दिनों से दुकान चला रही हैं। उस दुकान में सिर्फ और सिर्फ कुछ है तो सिर्फ पान और वह पानवाली। कटघरे में वह दुकान एक जीर्ण मंदिर के कोख में है। वहां पहले रूकना क्या, कोई झांकना भी उचित नहीं समझता था। आज हर किसी की न सिर्फ वहां बैठकी होती है बल्कि जो गुजरता है पानवाली की एक झलक देखे बिना आगे नहीं बढ़ता। अगल-बगल के पानदुकानदारों के सामने एक खिल्ली भी बेचना मुश्किल। पता नहीं उस पानवाली की पान में क्या टेस्ट है कि हर शौकीन वहीं जुट रहे हैं, घंटों राजनीति की बाते वहीं उसी पानवाली की दुकान पर। घंटों बतियाते लोग कई बार पान खाते। बार-बार पानवाली को आंखों से टटोलते। देह विमर्श को निहारते और भारी मन से वहां से विदा होते हैं। शहरी संस्कृति में नित नये प्रयोग हो ही रहे हैं। 

http://manoranjanthakur.jagranjunction.com/2011/06/12/%E0%A4%88%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A1%E0%A5%8B%E0%A4%B2-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%87/

जो बात लेखक ने पान वाली के बारे में अनुभव की है। उसी बात को बहुत से लोग कुछ विशेष महिला लेखिकाओं के बारे में कह चुके हैं। बेचारा पुरूष ब्लॉगर अच्छी और सार्थक पोस्ट को बैठा हुआ ख़ुद ही पढ़ता रहेगा और बार बार स्टैट्स चेक करके देखता रहेगा कि मेरे अलावा कितनों ने और पढ़ी है मेरी पोस्ट ?
जबकि दूसरी तरफ़ वैसे ही बस चुहल करने के लिए भी कोई लिख देगी तो उसे पढ़ने के लिए पुरूष ब्लॉगर्स की भीड़ लग जाएगी बिल्कुल ऐसे ही जैसे कि पान वाली की दुकान पर लग जाती है।
जब भी कोई आवाज़ हिंदी ब्लॉग जगत में लगाई गई कि सार्थक लिखो, मार्ग पर चलो और मार्ग दिखाओ तो यह आवाज़ सबसे ज़्यादा नागवार ब्लॉग जगत की इन पान वालियों को और इनके टिप्पणीकारों को ही लगी।
ऐसा क्यों है ?
इस पर विचार किया जाना आवश्यक है।
कहीं ऐसा न हो कि अब स्वर्ग में ब्लॉगिंग तो एक कल्पना ही रहे और हिंदी ब्लॉगिंग को ही ये लोग पाताल में उतार डालें।   

न्याय और सुरक्षा केवल इस्लाम में ही निहित है

http://www.nnilive.com/2010-10-12-09-44-21/5350-nni-natinol-news.html
मंदिरों और मज़ारों पर लोग चढ़ावे चढ़ाते हैं और वहां दौलत के ढेर लग जाते हैं। साधुओं और क़लंदरों को दौलत की ज़रूरत कभी नहीं रही। उनके रूप बनाकर आजकल नक़ली लोग आस्था का व्यापार कर रहे हैं। अगर इन लोगों के पास केवल ज़रूरतें पूरी होने जितना धन छोड़कर बाक़ी को उसी संप्रदाय के ग़रीब लोगों के कल्याण में ख़र्च कर दिया जाए तो दान दाता का मक़सद पूरा हो जाएगा। जो साधू और जो क़लंदर सरकार के इस क़दम का विरोध करे तो समझ लीजिए कि यह दौलत का पुजारी है ईश्वर का पुजारी नहीं है।
इन जगहों पर दौलत का ढेर लगा है और सरकार इनके खि़लाफ़ कोई क़दम नहीं उठाती है। इसके पीछे कारण यह है कि राजनीति करने वालों का इनसे पैक्ट है कि आप तो जनता का ध्यान हमारी तरफ़ मत आने देना और आपके ख़ज़ानों की तरफ़ हम ध्यान नहीं देंगे। पूंजीपतियों ने भी यही संधि राजनेताओं से कर रखी है। इस संधि को नौकरशाह और मीडिया, दोनों ख़ूब जानते हैं लेकिन फिर भी चुप रहते हैं। इसके एवज़ में उनकी ज़िंदगी ऐश से बसर होती है। अपनी ऐश के लिए इन लोगों ने पूरे देश को भूख, ग़रीबी और जुर्म की दलदल में धंसा दिया है। जो भी पत्रकार इनके खि़लाफ़ बोलता है उसे मार दिया जाता है। जो भी साधु इनके खि़लाफ़ बोलता है उसे भी मार दिया जाता है। मिड डे अख़बार के पत्रकार जे डे को मुंबई में और स्वामी निगमानंद को हरिद्वार-देहरादून में मार दिया गया। सब जानते हैं कि इनकी मौत इनके सच बोलने के कारण हुई है। इस तरह ये लोग अंडरवल्र्ड के क़ातिलों को भी अपने मक़सद के लिए इस्तेमाल करते हैं और बदले में उन्हें देश में अपने अवैध धंधे करने की छूट देते हैं। इस समय हमारे समाज की संरचना यह है। 
जो भी आदमी अपना जो भी कारोबार कर रहा है या नेता बन रहा है, वह इसी संरचना के अंदर कर रहा है। इस संरचना को तोड़ सके, ऐसा जीवट फ़िलहाल किसी में नज़र नहीं आता और न ही किसी के पास इस संरचना को ध्वस्त करने का कोई तरीक़ा है और न ही एक आदर्श समाज की व्यवहारिक संरचना का कोई ख़ाका उन लोगों के पास है जो भ्रष्टाचार आदि के खि़लाफ़ आंदोलन चला रहे हैं। 
यह सब कुछ इस्लाम के अलावा कहीं और है ही नहीं और इस्लाम को ये मानते नहीं। अस्ल समस्या यह है कि समस्याओं के समाधान का जो स्रोत वास्तव में है, उसे लोग मानते ही नहीं। जब लोग सीधे रास्ते पर आगे न बढ़ें तो किसी न किसी दलदल में तो वे गिरेंगे ही। उसके बाद जब ये लोग दलदल में धंस जाते हैं और तरह तरह के कष्ट भोगते हैं तो अपने विचार और अपने कर्म को दोष देने के बजाय दोष ईश्वर को देने लगते हैं। कहते हैं कि ‘क्या ईश्वर ने हमें दुख भोगने के लिए पैदा किया है ?‘
‘नहीं, उसने तो तुम्हें अपना हुक्म मानने के लिए पैदा किया है और दुख से रक्षा का उपाय मात्र यही है तुम्हारे लिए।‘
जो भी बच्चा मेले में अपने बाप की उंगली छोड़ देता है, वह भटक जाता है और जो भटक जाता है वह तब तक कष्ट भोगता है जब तक कि वह दोबारा से अपने बाप की उंगली नहीं थाम लेता।
सुख की सामूहिक उपलब्धि के लिए हमें ईश्वर के बताए ‘सीधे मार्ग‘ पर सामूहिक रूप से ही चलना पड़ेगा वर्ना तब तक जे डे और निगमानंद मरते ही रहेंगे और इनके क़ातिलों के साथ साथ इनका ख़ून उन लोगों की गर्दन पर भी होगा जो कि इस्लाम को नहीं मानते। 
न्याय और सुरक्षा केवल इस्लाम में ही निहित है।
जो क़त्ल करेगा, उसका सिर उसके कंधों पर सलामत नहीं छोड़ती है जो व्यवस्था, उसे अपनाने में आनाकानी क्यों ? 

Saturday, June 18, 2011

क्या नास्तिक बंधु इस नई साइंसी खोज को स्वीकार करेंगे ? - Dr. Anwer Jamal


नास्तिक भाई एक ओर तो यह दावा करते हैं कि वे प्रकृति को मानते हैं और यह भी कि वे विज्ञान को मानते हैं लेकिन हक़ीक़त यह है कि उनके मन में नास्तिकता के जो विचार जड़ जमा चुके हैं उनके सामने वे न तो विज्ञान को मानते हैं और न ही प्राकृतिक नियमों को। 
पिछले दिनों आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी ने हमारी एक पोस्ट पर टिप्पणी की और अपने नास्तिक मत का तज़्करा करते हुए हमसे सवाल किया था। जिसका हमने उचित जवाब दे दिया था। जिसे आप यहां देख सकते हैं

सवाल हल हो चुकने के बावजूद आज उन्होंने फिर वही सवाल दोहरा दिया। अंतर केवल इतना है कि पहले सवाल उन्होंने अपने शब्दों में किया था और इस बार उन्होंने भगत सिंह को उद्धृत किया है
http://islam.amankapaigham.com/2011/06/blog-post_17.html?showComment=1308385296345#c5253925682720558514

भगत सिंह के दिमाग़ में अगर नास्तिकता भरे  सवाल उठे तो उसके पीछे एक बड़ी वजह तो यह रही कि उस समय तक लोगों का ख़याल था कि ईश्वर, आत्मा और धर्म में विश्वास माहौल की देन है लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक रिसर्च के बाद यह हक़ीक़त सामने आई है कि यह इंसान की प्रकृति का अभिन्न अंग है। जो चीज़ इंसान की प्रकृति का अभिन्न अंग है, नास्तिक लोग उससे पलायन कैसे कर सकते हैं और करना ही क्यों चाहते हैं ?
फिर प्रकृति को मानने के दावे का क्या होगा ?
ईश्वर और धर्म के नाम पर पुरोहित वर्ग ने कमज़ोर वर्गों का शोषण किया, इसलिए लोगों को ईश्वर और धर्म से विरक्ति हो गई। अगर इस बात को सही मान लिया जाए तो फिर ईश्वर और आत्मा को न मानने वाले दार्शनिकों के विहारों में भी जमकर अनाचार हुआ और नास्तिक राजाओं ने भी जमकर अत्याचार किया। इससे ज़ाहिर है कि नास्तिकता लोगों के दुखों का हल नहीं है बल्कि यह उनके दुखों को और भी ज़्यादा बढ़ा देती है। अगर ऐसा नहीं है तो किसी एक नास्तिक शासक के राज्य का उदाहरण दीजिए, जहां लोगों की बुनियादी ज़रूरतें किसी धर्म आधारित राज्य से ज़्यादा बेहतर तरीक़े से पूरी हो रही हों ?

हक़ और बातिल की इसी पोस्ट पर प्रिय प्रवीण जी भी अपने हलशुदा सवालों को दोहरा रहे हैं। उन्हें लगता है कि ईश्वर की प्रशंसा करना उसकी ईगो को सहलाने जैसा है। वह कहते हैं :
धर्म अपने पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह देता है कि 'फैसले' के खौफ से ज्यादातर इन्सान नियंत्रण में रहते हैं क्योंकि वो नर्क की आग से डरते हैं और स्वर्ग के सुख भोगना चाहते हैं... इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि अधिकाँश Hypocrite= ढोंगी,पाखण्डी अपने मूल स्वभाव को छुपाकर, अपनी अंदरूनी नीचता को काबू कर, नियत तरीके से 'उस' का नियमित Ego Massage करके स्वर्ग में प्रवेश पाने में कामयाब रहेंगे...
और एक बार स्वर्ग पहुंच कर मानवता की यह गंदगी (Scum of Humanity) अपने असली रूप में आ जायेगी... क्योंकि इनकी Free Will (स्वतंत्र इच्छा) पर 'उस' का कोई जोर तो चलता नहीं!
हक़ीक़त यह है कि स्वर्ग-नर्क का कॉन्सेप्ट ख़ुद हिंदू संप्रदायों में भिन्न-भिन्न मिलता है। यह नज़रिया यहूदी मत, ईसाई मत और इस्लाम धर्म में भी एक समान नहीं पाया जाता। इसलिए प्रिय प्रवीण जी के सवाल से यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने स्वर्ग-नर्क के विषय में किस मत या किस धर्म की धारणा को बुनियाद बनाकर सवाल किया है ?
प्रत्येक कर्म का एक परिणाम अनिवार्य है। नेक काम का अंजाम अच्छा हो और बुरे काम का परिणाम कष्ट हो, ऐसा मानव की प्रकृति चाहती है। अगर दुनिया में सामूहिक चेतना परिष्कृत हो जाय तो दुनिया में ऐसा ही होगा लेकिन दुनिया में ऐसा नहीं होता। इसलिए दुनिया के बाद ही सही लेकिन इंसान की प्रकृति की मांग पूरी होनी ही चाहिए। 
दुनिया में न्याय होता नहीं है। यह एक सत्य बात है। अब अगर लोगों को यह आशा है कि मरने के बाद उन्हें न्याय मिल जाएगा तो नास्तिक बंधु लोगों को न्याय से पूरी तरह निराश क्यों कर देना चाहते हैं ?
ऐसा करके वे समाज को कौन सी सकारात्मक दिशा देना चाहते हैं ?
क्या नास्तिक बंधु इस नई साइंसी खोज को स्वीकार करेंगे ?

Friday, June 17, 2011

इंसान की मौत ही बताती है कि इस दुनिया में एक व्यवस्था काम कर रही है - Dr. Anwer Jamal

आज ज़ाकिर अली ‘रजनीश‘ के ब्लॉग पर एक पोस्ट देखी जिसमें वह नास्तिकों के किसी ब्लॉग ‘संवाद घर‘ की तारीफ़ कर रहे थे। संवाद घर के मालिक हैं संजय ग्रोवर। वह कहते हैं कि नास्तिकों के साथ ईश्वर में आस्था रखने वाले भी मर जाते हैं। इससे पता चलता है कि ईश्वर है ही नहीं।
बड़ी अजीब बात है कि जो चीज़ इंसान को ईश्वर की पहचान कराती है उसे ही ईश्वर के इन्कार का सामान बना लिया।
इंसान की मौत ही बताती है कि इस दुनिया में एक व्यवस्था काम कर रही है। मौत हरेक इंसान को आती है। इसी तरह इंसान की पैदाइश एक व्यवस्था का पता देती है। उसी व्यवस्था को जानने के बाद आज वैज्ञानिक कृत्रिम प्रजनन आदि में सफल हो पाए हैं। यह भी एक सर्वविदित तथ्य है कि व्यवस्था ख़ुद से कभी नहीं होती बल्कि उसे स्थापित करने वाला और उसे बनाए रखने वाला कोई होता ज़रूर है। प्रकृति की व्यवस्था को देखकर हम आसानी से जान सकते हैं कि यह सुव्यवस्थित सृष्टि किसी सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हस्ती का काम है, इसी को ईश्वर, अल्लाह और गॉड कहते हैं। जो इसे मानता है और उसके विधान का पालन करता है उसे आस्तिक कहते हैं और जो इस सत्य का इन्कार करता है उसे नास्तिक कहते हैं। सत्य का इन्कार करने वाला कभी अपनी असल मंज़िल को पा नहीं सकता। 
यह बात सभी नास्तिकों को जान लेनी चाहिए।