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Saturday, February 2, 2013

शिया सुन्नी मतभेद और सच्चाई की तलाश Shiya Sunni Doctrine


बंदे के दिल में इसलाम की मारिफ़त कैसे तरक्क़ी पाती है ?, इस मज़्मून के ज़रिये आप जान सकते हैं।
मैं अहले सुन्नत व अल-जमाअत के एक प्रतिष्ठित यूसुफ़ ज़ई पठान ख़ानदान में पैदा हुआ। हमारा ख़ानदानी शजरा हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्-सलाम से होता हुआ हज़रत इबराहीम अलैहिस्-सलाम तक पहुंचता है। जिन्हें हिन्दू भाई ब्रह्मा जी के नाम से जानते हैं। जिन्हें वे अपना देवता मानते हैं, वह हमारे बाबा हैं। 
हमारी दादी अम्मा ने हमें अम्म का पारा और अल्लाह के 99 नाम ज़ुबानी याद करवा दिए। जैसे आज लोग बच्चों से पोएम सुनते हैं, वैसे ही लोग हमसे क़ुरआन पाक की सूरतें और अल्लाह के नाम सुनकर लुत्फ़अन्दोज़ होते थे। थोड़ा बड़े हुए तो मौलाना घर पर पढ़ाने के लिए आने लगे और हम भी मदरसे जाने लगे। फिर हम स्कूल जाने लगे। हमारी तालीम जारी रही। हम एक मुसलमान की तरह बड़े होने लगे जैसे कि सब मुसलमान होते ही हैं। कभी नमाज़ पढ़ ली और कभी छोड़ दी। कभी क़ुरआन पढ़ लिया और कभी छोड़ दिया। अपने वालिद साहब से हमने फ़िल्में देखना भी सीख लिया। हमें वालिद साहब अपने साथ फ़िल्में दिखाने ख़ुद ले जाया करते थे ताकि हम ग़लत दोस्तों की सोहबत में न पड़ जाएं। बचपन में हम चंपक, पराग, नंदन और कॉमिक्स पढ़ने लगे। पढ़ने का शौक़ नॉविल तक जा पहुंचा और फिर वह सिर्फ़ नॉविल तक ही महदूद न रहा। जिस दुकान में पढ़ने के लिए घुसे तो उसकी सारी किताबें ही पढ़कर ख़त्म कर दीं। एक दुकान ख़त्म कर दी तो दूसरी पकड़ ली। हमारे चाचा मंसूर अनवर ख़ाँ साहब एडवोकेट के दोस्त चोपड़ा जी की दुकान में सबसे ज़्यादा किताबें थीं। उसे भी ख़त्म होने में ज़्यादा दिन न लगे और फिर हम अपने क़स्बे के भ्रातृ मण्डल पुस्तकालय के सदस्य बन गए। यहां वेद, पुराण, स्मृति, इतिहास, आयुर्वेद और योग की पुस्तकें भी पढ़ने के लिए मिलीं। हमने हाई स्कूल से योग करना शुरू किया तो योग करते करते बीएससी तक जा पहुंचे। तब योग के नाम का चलन आम नहीं था और योग का चलन तो आज भी आम नहीं है। 
बहरहाल हम पढ़ते रहे और बढ़ते रहे लेकिन दीन की कोई ख़ास फ़िक्र न थी। हमारी ननिहाल बड़े ज़मींदारों में से एक थी। उनके घराने में दीन का रिवाज हमारी ददिहाल से ज़्यादा था। वहां हरेक आदमी हमारी दादी जैसा था सिवाय हमारे नाना के। गांव पहुंचते तो किताबों की लत याद आती और तब हमारी नानी की दीनी किताबें ही हमारे लिए वक्त गुज़ाराी का ज़रिया बनतीं। ‘दोज़ख़ का खटका‘ पढ़ी तो हम खटक कर रह गए और ‘जन्नत की कुंजी‘ पढ़ी तो ऐसा लगा कि जन्नत जाने में बस हमारे मरने भर की देर है। दीन का शौक़ और बढ़ा तो हमने और ज़्यादा पढ़ा। अब हमारे दीनी क़स्बे के दीनी कुत्बख़ाने हमारा टारगेट बन गए।
हमने पढ़ा कि अल्लाह ने एक जन्नत बनाई है और एक जहन्नम बनाई है। मरने के बाद वह अपनी जन्नत उसे देगा जो उसकी इबादत करेगा और जो उसकी इबादत न करेगा, उसे वह जहन्नम में डाल देगा। 
हमने लड़कपन में ही अल्लाह की इबादत शुरू कर दी। अभी हमने जीना शुरू भी न किया था कि हमने मौत की तैयारी शुरू कर दी। तैयारी के नाम पर तब्लीग़ी जमाअत के साथ गश्त शुरू कर दिया। तब्लीग़ी जमाअत के दोस्तों ने बताया कि अल्लाह किस इबादत पर क्या सवाब देता है और किस तस्बीह पर क्या सवाब देता है ?
हम ज़्यादा से ज़्यादा सवाब का ढेर जमा कर लेना चाहते थे। 
ननिहाल गए तो गाँव के सबसे बड़े बुद्धिजीवी मुंशी जी से मिले। वह जमाअते इसलामी के रूक्न थे। अब उनकी किताबों का नंबर था। मौलाना अबुल आला मौदूदी रह. का लिट्रेचर पढ़ा तो पता चला कि कलिमा, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज तो दीन के सुतून हैं, ये मुकम्मल दीन नहीं हैं। दीन मुकम्मल तब होता है जब कि शरीअत को इन्फ़िरादी और इज्तेमाई तौर पर माना जाए। अगर यह काम न किया तो अल्लाह उम्मत पर दुनिया में भी अज़ाब नाज़िल करेगा और उसे हश्र के मैदान में भी पकड़ लेगा। हम वाक़ई डर गए। हमने यह कोशिश की कि हम इक़ामत ए दीन की कोशिश करें यानि मुसलमानों को नेकी की बात बताने के साथ साथ उन्हें जरायम व गुनाह से भी रोकेंगे।
इसी बीच मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब रह. मिले। पता चला वि बरसों से क़ुरआन के साथ वेद, गीता और पुराण भी पढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि सिर्फ़ मुसलमानों का भला हो जाए और वे जन्नत चले जाएं, यह सोच इसलामी नहीं है। हमारे पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. तो एक एक काफ़िर (नास्तिक, अधर्मी, दुराचारी) के पास सत्तर सत्तर मर्तबा जाया करते थे ताकि वह जहन्नम से बच जाए। उन पर सिलसिला ए नुबूव्वत ख़त्म हो चुका है। अब कोई नया नबी न आएगा। सो हर इंसान तक उस रब का पैग़ाम अब आपको ही पहुंचाना है। अगर आपने अपना फ़र्ज़ पूरा न किया और ग़ैर-मुस्लिम भाई जहन्नम चले गए तो अल्लाह आपको भी न बख्शेगा। सभी आदम की औलाद हैं। सब एक परिवार हैं। लिहाज़ा अब हम चर्च से लेकर आर्य समाज मंदिर तक सब जगह घूमने लगे। हम उस रब का पैग़ाम उसके बंदों तक पहुंचाने लगे। ईसाई हो या हिन्दू, सबको तौहीद, रिसालत और आखि़रत के साथ नेक अमल का पैग़ाम देने लगे।
तसव्वुफ़ की किताबें पढ़ीं तो पता चला कि इख़लास न हो और घमण्ड हो तो हर अमल बेकार है। शैतान को बहकाने वाली चीज़ उसका नफ़स ही थी। अगर इंसान ने अपने नफ़्स का तजि़्कया न किया तो शैतान के साथ वह भी लाज़िमन जहन्नम में जाएगा। हम एक कामिल सूफ़ी हज़रत मौलाना क़ारी अब्दुर्रहमान साहब नक्शबंदी से बैअत हो गए और हमने ज़िक्र ए ख़फ़ी के साथ अपनी अख़लाक़ी ख़राबियां दूर करनी शुरू कर दीं। पढ़ाई भी साथ साथ चलती रही।
अपने क़स्बे से बाहर निकले तो अहले हदीस उर्फ़ वहाबी मिले। उनकी किताबों से पता चला कि शिर्क और बिदअत बहुत बुरी चीज़ है। मुश्रिकाना रस्में और बिदअतें जहन्नम में ले जाती हैं। फ़ातिहा, तीजा, चालीसवां और ईद मीलाद वग़ैरह तो हमारे उलमा पहले ही छुड़वा चुके थे। अब हम क्या छोड़ें सो शिर्क ए ख़फ़ी रिया यानि दिखावे से बचने की कोशिश की। हमें लग रहा था कि अब हम जन्नत ज़रूर पहुंच जाएंगे। 
अब तक हमारा क़ुरआन पर ईमानो यक़ीन बढ़ा ही बढ़ा था और हमारा अमल भी सुधरा था। हमें अपने आपे से मतलब था। हम पैदा हुए हैं और हमें मरना है। हमें अपनी पैदाईश और अपनी मौत पर कोई अख्तियार नहीं है। हमें अपनी ज़िंदगी के मामलात पर कोई अख्तियार नहीं है। हम कहीं से आते हैं और अपनी मर्ज़ी के बिना चले जाते हैं। हम कहीं चले जाते हैं और अपनी मर्ज़ी के खि़लाफ़ चले जाते हैं। 
हम कहाँ से आते हैं और हम कहाँ चले जाते हैं ?
हमें कौन यहाँ लाता है और हमें कौन यहाँ से ले जाता है ?
लाने वाला हमें यहाँ क्यों लाता है और ले जाने वाला हमें यहाँ से क्यों ले जाता है ?
यहाँ आने से पहले हमारे साथ क्या हुआ था और यहाँ से जाने के बाद हमारे साथ क्या होगा ?
क़ुरआन इस सब सवालों को बड़ी अच्छी दलीलों से हल करता है और पूरी तरह मुतमईन भी करता है। जितनी किताबें मैंने पढ़ी हैं। यह उनमें सबसे अच्छी किताब है। यह अकेली किताब है, जिसमें आज तक न कुछ घटा है और न कुछ बढ़ा है।

अब हमारी ज़िंदगी में कुछ शिया दोस्त भी बने। हमने उन्हें सम्मान दिया और उनसे भी सम्मान ही पाया। एक शिया दोस्त ने हमें बताया कि आखि़रत में तुम्हारा हश्र तुम्हारे इमाम के साथ होगा। अगर वह जहन्नमी है तो तुम भी जहन्नम में ही जाओगे और अल्लाह ने जैसे नबी और रसूल को मुक़र्रर किया है वैसे ही उसने इमाम भी मुक़र्रर किया है। हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को अल्लाह ने ही इमाम बनाया है।
हमने पूछा-‘हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु में क्या ख़ास बात है ?‘
बोले-‘अल्लाह ने पंचतन पाक को ख़ास मिटटी से पैदा किया गया था। हज़रत अली अ. उनमें से एक हैं। वे मासूम थे। उनसे ग़लती मुमकिन नहीं है।‘
हमने पूछा-‘...और बाक़ी सहाबा ?‘
बोले-‘वे सादा मिटटी की पैदाईश हैं। इसीलिए उन्होंने ग़लतियां की हैं। अब नबी स. के बाद हमें उसके वसी अली अलैहिस्-सलाम की ही इत्तेबा करनी चाहिए।

हमने पूछा कि ‘अगर हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु नबी स. के वसी हैं तो यह वसीयत कहीं लिखी हुई है ?
बोले कि ‘अल्लाह के नबी स. अपनी वफ़ात से पहले वसीयत लिखना चाह रहे थे लेकिन उनके उम्मतियों ने उन्हें वसीयत लिखने ही नहीं दी।‘
हमें ताज्जुब हुआ कि उम्मतियों की बात ग़लत थी तो अल्लाह के नबी स. और उसके वसी उसे मान कैसे गए ? 
हमने पूछा कि ‘ख़ैर, अल्लाह ने अपने कलाम में, क़ुरआन में नबी स. की नुबूव्वत का ऐलान किया है तो अगर उसने हज़रत अली र. को इमाम मुक़र्रर किया है तो ख़ुद कहीं न कहीं उसे लिखा भी होगा ?
बोले, क़ुरआन में तो कहीं लिखा नहीं मिलता।‘ 
पूछा कि ‘क्यों नहीं लिखा मिलता ?
बोले कि ‘ ऐसा लगता है कि उन आयतों को ख़लीफ़ाओं ने निकाल दिया होगा और आयतों की तरतीब तो उन्होंने बदली ही है। मक्की मदनी आयतें आगे पीछे कर रखी हैं ताकि अहले बैत की फ़ज़ीलत को छिपा दिया जाए। उसी क़ुरआन को उन्होंने उम्मत में फैला दिया।‘
हमने पूछा कि ‘हज़रत अली रज़ि. ने पूरा और सही क़ुरआन याद किया होगा  कि नहीं ?‘
बोले -‘हां, क्यों नहीं ?‘
हमने कहा कि ‘वह क़ुरआन कहां है ?‘
बोले कि ‘ऐसा कोई क़ुरआन तो हज़रत अली रज़ि. ने लिखा ही नहीं है।‘
हमने कहा कि ‘लिखा नहीं है तो उन्होंने दूसरों को हिफ़्ज़ ज़रूर करवाया होगा।‘
बोले कि ‘उन्होंने हिफ़्ज़ भी नहीं करवाया, वह ख़ुद इसी क़ुरआन को पढ़ा करते थे।‘ 
हमने पूछा कि ‘फिर वह असली वाला क़ुरआन किसके पास मिलेगा ?‘
बोले कि ‘वह क़ुरआन तो बारहवें इमाम के पास है।‘
हमने पूछा कि ‘वह कहां हैं ?‘
बोले कि ‘वह ग़ायब हैं।‘

हमने सोचा कि ‘हमारा इमाम ग़ायब है तो फिर अल्लाह ने हमें किस लिए हाज़िर कर दिया ?
हमने पूछा कि ‘इमाम ग़ायब आएंगे कब ?‘
बोले कि ‘इसका भी कुछ पता नहीं है। हज़ार से ज़्यादा तो शियाओं को हो गए उनके आने की इंतेज़ार में।‘
अजीब चक्कर है कि जिस इमाम की इत्तेबा करनी है वह ग़ायब है और जिस हिदायत की पैरवी करनी है,वह भी ग़ायब है और जो किताब मौजूद है, उसका ऐतबार नहीं है और उसका जो आलिम मौजूद है, वह इत्तेबा के लायक़ नहीं है।
जो लोग सादा मिटटी से बने थे। उन्होंने पूरा क़ुरआन याद भी कर लिया और पूरी उम्मत को भी याद करवा दिया और जो अहले बैत और इमाम ख़ास मिटटी से बने थे, वे क़ुरआन को न तो ख़ुद याद रख सके और न ही अपनी उम्मत को याद करवा सके। उनके सामने दूसरों ने क़ुरआन बदल दिया और ख़ुद उन्होंने पूरा ही ग़ायब कर दिया। बारह इमाम न क़ुरआन की हिफ़ाज़त कर सके और न ही उसे उम्मत तक पहुंचा सके। पूरी गुफ़तगू से यह बात सामने आई।
यह कैसी तालीम है जो ईमान बढ़ाने के बजाय उसे मिटा दे, जो अमल को सुधारने के बजाय उसे बिगाड़ दे, जो क़ुरआन पर यक़ीन के बजाय शक पैदा करे, जो अल्लाह, नबी स. और इमाम का अहसान मनवाने के बजाय उन्हें झूठा, कमज़ोर और अपने फ़र्ज़ से ग़ाफ़िल क़रार दे ?
अल्लाह ने नुबूव्वत ख़त्म कर दी है तो इमाम को क़ायम रखता और इमाम को ग़ायब करना था तो अपनी हिदायत को उसकी असल शक्ल में उम्मत के पास बाक़ी छोड़ता और अगर हिदायत को भी उठाना था तो हमें पैदा न करता। हिदायत नहीं है तो हम क्या करें ?

यह सोच सोच कर हम परेशान हो गए। 3 दिन तक हम पर मायूसी तारी रही। बीवी परेशान, बच्चे भी परेशान। 
फिर ख़ुद ही अक्ल दौड़ाई कि जो बात इंसान को मायूस कर दे, वह इसलाम की बात हरगिज़ नहीं हो सकती। जो बात इंसान को शक में डाल दे, वह बात इसलाम की नहीं हो सकती। दुनिया में सिर्फ़ एक ही क़ुरआन मौजूद है। इसकी हिफ़ाज़त का यही सबसे बड़ा सुबूत है। अल्लाह ने इसकी हिफ़ाज़त का वादा किया है और यह क़ुरआन में दर्ज भी है। क़ुरआन इमाम है सबके लिए और क़ियामत तक के लिए। हमारा इमाम ग़ायब नहीं है बल्कि हाज़िर है क्योंकि हम हाज़िर हैं।
हिदायत मौजूद है, जो चाहे इसकी पैरवी करे। हवा, रौशनी और पानी की तरह अल्लाह की हिदायत सबके लिए आम है।
अल-हम्दुलिल्लाह।
फिर से नई हिम्मत पैदा हुई और हम फिर से अमल में जुट गए।

उन शिया भाई ने यह भी बताया था कि सुन्नियों के पास माल आता है तो उनकी दीनदारी बढ़ जाती है और शियाओं के पास माल आता है तो वह दहरिया मुल्हिद (नास्तिक) बन जाता है। उन्होंने यह बात माल के साथ कही है लेकिन हक़ीक़त यह है कि जैसे जैसे सुन्नी अपनी किताबें पढ़ता है और अपने बुज़ुर्गों का कलाम सुनता है तो उसकी दीनदारी बढ़ जाती है और जैसे जैसे एक शिया अपने मसलक की किताबें पढ़ता है और अपने बुज़ुर्गों की मजलिसें सुनता है तो उसका कन्फ़यूझन बढ़ता चला जाता है और उसकी परिणति कुफ्ऱ (नास्तिकता) में हो जाती है।

यह सारी बात इसलिए यहां लिखी है कि इसलाम के बारे में बहुत से नज़रिये वुजूद में आ चुके हैं। एक आदमी जो अल्लाह के रास्ते पर चलने की कोशिश करता है। वह गोया पुल सिरात पर चलने की कोशिश करता है। बहुत सी वजहों से वह इस रास्ते से डिग सकता है लेकिन उसे किसी भी वजह से सीधे रास्ते से नहीं डिगना चाहिए।
अगर आप क़ुरआन व हदीस न भी पढ़े हों तो भी आप कॉमन सेंस से जान सकते हैं कि सच क्या है ?
बशर्ते कि आपको अपनी सच्ची मंज़िल की तलाश हो और दुनिया का कोई लालच या डर आपके दिल में न हो।
दरअसल हुआ यह है कि वक्त के साथ बहुत से नए ख़यालात और नई रिवायतें चल पड़ीं हैं। शिया हों या सुन्नी, सबमें ये नई बातें आज देखी जा सकती हैं। सुन्नियों में देखते ही देखते बारह वफ़ात पर जुलूसे मुहम्मदी की रस्म शुरू हो चुकी है। जैसे हिन्दू भाई अपने महापुरूषों के जन्म दिवस वग़ैरह पर झाँकियाँ निकालते हैं, वैसे ही अब हिन्दुस्तान के मुसलमान भी निकालने लगे हैं। इसी तरह पहले किसी दौर में शियाओं ने ताज़िये निकालने शुरू किए थे।
हज़रत हम्ज़ा शहीद हुए लेकिन पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. ने उनका ताज़िया कभी नहीं निकाला। हज़रत फ़ातिमा र. (शिया नज़रिये के मुताबिक़) शहीद हुईं लेकिन इमाम हज़रत अली र. ने उनका ताज़िया ज़िंदगी में कभी भी न निकाला। हज़रत अली र. शहीद हुए तो इमाम हसन और इमाम हुसैन रज़ि. ने उनका ताज़िया कभी न निकाला। फिर इमाम हसन शहीद हुए तो इमाम हुसैन रज़ि. ने उनका ताज़िया कभी न निकाला। आज इन सबके ताज़िये निकाले जा रहे हैं और इमाम हुसैन का ताज़िया भी निकाला जा रहा है।
इसे इमामों के तरीक़े से हटने के सिवा और क्या कहा जा सकता है ?
शिया भाई भी मानते हैं कि ताज़िये निकालना दीन में ज़रूरी नहीं है। इसके बावजूद भी हर साल ताज़िये निकालते हैं और हर साल दंगों में सैकड़ों हज़ारों लोग मारे जाते हैं। एक ग़ैर ज़रूरी काम के लिए मरना ज़रूरी हो चुका है।
अल्लाह रहम करे, आमीन !
इसका इलाज यही है कि बार बार क्रॉस करके देखते रहिए कि इमाम क्या करते थे और सारे इमामों के इमाम और सारे नबियों के इमाम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क्या करते थे ?
इमामुल अम्बिया पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जन्नत में ज़रूर जाएंगे, जो उनकी पैरवी करता है, वह भी जन्नत में ज़रूर ही जाएगा।
इसमें शिया सुन्नी किसी को कोई शक आज भी नहीं है। यह एक अच्छी बात है। इसी बात की वजह से उम्मीद आज भी क़ायम है और उम्मीद पर ही यह दुनिया क़ायम है।
कोई अमल पास न हो तो भी अल्लाह से अच्छाई की उम्मीद ज़रूर रखनी चाहिए। यह भी अपने अंदर एक अच्छा अमल है। यह सच्चाई है।
आप किसी भी फ़िरक़े के मानने वाले हों लेकिन सच्चाई को तलाश कीजिए और उस पर क़ायम रहिए। आपका भला सिर्फ़ और सच्चाई से ही होगा। सच्चाई दुनिया में भी आपके काम आएगी और दुनिया से जाने के बाद भी। 
आपको यह बात वेद-पुराण से लेकर बाइबिल-क़ुरआन तक में लिखी हुई मिल जाएगी।
हमने ये सब पढ़े हैं, आप भी ये सब पढ़िए।
मालिक आपका भला ज़रूर करेगा।

(एक मज़्मून में थोड़ा सा बढ़ाने के लिए लिखना शुरू किया तो यह एक नया ही मज़्मून बन गया।

बंदे के दिल में इसलाम की मारिफ़त कैसे तरक्क़ी पाती है ?

मैं अहले सुन्नत व अल-जमाअत के लोगों के दरमियान पैदा हुआ। हमारी दादी अम्मा ने हमें अम का पारा और अल्लाह के 99 नाम ज़ुबानी याद करवा दिए। थोड़ा बड़े हुए तो दीन का शौक़ बढ़ा और हमने पढ़ा। 
हमने पढ़ा कि अल्लाह ने एक जन्नत बनाई है और एक जहन्नम बनाई है। मरने के बाद वह अपनी जन्नत अपने इबादत करने वाले बन्दों को देगा और अपनी इबादत न करने वालों को वह जहन्नम में डाल देगा। 
हमने लड़कपन में ही अल्लाह की इबादत शुरू कर दी। अभी हम ढंग से जीने का मतलब भी न जान पाए थे कि हमने मौत की तैयारी शुरू कर दी।
तब्लीग़ी जमाअत के दोस्तों ने बताया कि अल्लाह किस नमाज़ पर क्या सवाब देता है और किस तस्बीह पर क्या सवाब देता है ?
हम ज़्यादा से ज़्यादा सवाब का ढेर जमा कर लेना चाहते थे। 
इसी बीच जमाअते इसलामी का लिटरेचर पढ़ा तो पता चला कि कलिमा, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज तो दीन के सुतून हैं, ये मुकम्मल दीन नहीं हैं। दीन मुकम्मल तब होता है जब कि शरीअत को इन्फ़िरादी और इज्तेमाई तौर पर माना जाए। अगर यह काम न किया तो अल्लाह उम्मत पर दुनिया में भी अज़ाब नाज़िल करेगा और उसे हश्र के मैदान में भी पकड़ लेगा। हम वाक़ई डर गए। हमने यह कोशिश की कि हम इक़ामत ए दीन की कोशिश करें।
इसी बीच मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब रह. मिले। उन्होंने बताया कि नुबूव्वत ख़त्म हो चुकी है। अब कोई नया नबी न आएगा। लिहाज़ा हर इंसान तक उस रब का पैग़ाम अब आपको ही पहुंचाना है। अगर आपने उसका पैग़ाम उसके बंदों तक नहीं पहुंचाया और वे जहन्नम में चले गए तो वे तुम्हें भी जन्नत में न जाने देंगे कि इन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं किया। लिहाज़ा हम उस रब का पैग़ाम उसके बंदों तक पहुंचाने लगे, ईसाई हो या हिन्दू सबको तौहीद, रिसालत और आखि़रत के साथ नेक अमल का पैग़ाम देने लगे।
तसव्वुफ़ की किताबें पढ़ीं तो पता चला कि इख़लास न हो तो हर अमल बेकार है। इंसान ने अपने नफ़्स का तज्किया न किया तो वह लाज़िमन जहन्नम में जाएगा। हम एक कामिल सूफ़ी साहब से बैअत हो गए और हमने अपनी अख़लाक़ी ख़राबियां दूर करनी शुरू कर दीं।
अहले हदीस की किताबों से पता चला कि बिदअत बहुत बुरी चीज़ है। बिदअत जहन्नम में ले जाती है। हमने बिदअतें पकड़ी ही नहीं थीं लेकिन फिर भी ढूंढ ढूंढ कर छोड़नी शुरू कर दीं। हमें लग रहा था कि अब हम जन्नत ज़रूर पहुंच जाएंगे।
अब हमारी ज़िंदगी में एक शिया दोस्त दाखि़ल होते हैं।
उन्होंने बताया कि आखि़रत में तुम्हारा हश्र तुम्हारे इमाम के साथ होगा। अगर वह जहन्नमी है तो तुम भी जहन्नम में ही जाओगे और अल्लाह ने जैसे नबी और रसूल को मुक़र्रर किया है वैसे ही उसने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को इमाम मुक़र्रर किया है। ।
हमने पूछा-‘हज़रत अली में क्या ख़ास बात है ?‘
बोले-‘अल्लाह ने पंचतन पाक को ख़ास मिटटी से पैदा किया गया था। हज़रत अली अ. उनमें से एक हैं। वे मासूम थे। उनसे ग़लती मुमकिन नहीं है।‘
हमने पूछा-‘...और बाक़ी सहाबा ?‘
बोले-‘वे सादा मिटटी की पैदाईश हैं। इसीलिए उन्होंने ग़लतियां की हैं। अब नबी स. के बाद हमें उसके वसी अली अलैहिस्-सलाम की ही इत्तेबा करनी चाहिए

हमने पूछा कि यह हुक्म कहीं लिखा हुआ है ?
बोले कि ‘अल्लाह के नबी स. अपनी वफ़ात से पहले वसीयत लिखना चाह रहे थे लेकिन उनके उम्मतियों ने लिखने नहीं दिया था।‘
हमें ताज्जुब हुआ कि उम्मतियों की बात ग़लत थी तो अल्लाह के रसूल और उसके वसी उसे मान कैसे गए ? 
हमने पूछा कि ‘ख़ैर, अल्लाह ने अपने कलाम में, क़ुरआन में ख़ुद कहीं लिखा होगा ?
बोले, क़ुरआन में तो कहीं लिखा हुआ है नहीं। जितनी आयतों में लिखा था, उन्हें उम्मतियों ने निकाल कर आयतों को जमा कर दिया और आयतों की तरतीब भी बदल दी ताकि अहले बैत की फ़ज़ीलत को छिपा दिया जाए।
हमने पूछा कि ‘हज़रत अली रज़ि. ने पूरा और सही क़ुरआन याद किया होगा  कि नहीं ?‘
बोले -‘हां, क्यों नहीं ?‘
हमने कहा कि ‘वह क़ुरआन कहां है ?‘
बोले कि ‘ऐसा कोई क़ुरआन तो हज़रत अली रज़ि. ने लिखा ही नहीं है।‘
हमने कहा कि ‘लिखा नहीं है तो उन्होंने दूसरों को हिफ़्ज़ ज़रूर करवाया होगा।‘
बोले कि ‘उन्होंने हिफ़्ज़ भी नहीं करवाया, वह ख़ुद इसी क़ुरआन को पढ़ा करते थे।‘ 
हमने पूछा कि ‘फिर वह असली वाला क़ुरआन किसके पास मिलेगा ?‘
बोले कि ‘वह क़ुरआन तो बारहवें इमाम के पास है।‘
हमने पूछा कि ‘वह कहां हैं ?‘
बोले कि ‘वह ग़ायब हैं।‘

हमने सोचा कि ‘हमारा इमाम ग़ायब है तो फिर अल्लाह ने हमें किस लिए हाज़िर कर दिया ?
अजीब चक्कर है कि जिस इमाम की इत्तेबा करनी है वह ग़ायब है और जिस हिदायत की पैरवी करनी है,वह भी ग़ायब है और जो किताब मौजूद है, उसका ऐतबार नहीं है और उसका जो आलिम मौजूद है, वह इत्तेबा के लायक़ नहीं है।
इमाम अपने असहाब को क़ुरआन भी हिफ़्ज़ न करवा सके तो उनकी ज़िंदगी भर की मेहनत से उम्मत को क्या फ़ायदा पहुंचा ?
अल्लाह ने नुबूव्वत ख़त्म कर दी है तो इमाम को क़ायम रखता और इमाम को ग़ायब करना था या उसे उठाना था तो अपनी हिदायत को उसकी असल शक्ल में बाक़ी छोड़ता और अगर हिदायत को भी उठाना था तो हमें पैदा न करता। 

3 दिन तक मुझ पर मायूसी तारी रही। बीवी परेशान, बच्चे भी परेशान।
फिर ख़ुद ही इधर उधर अक्ल दौड़ाई कि जो बात इंसान को मायूस कर दे, वह इसलाम की बात हरगिज़ नहीं हो सकती।
दुनिया में सिर्फ़ एक ही क़ुरआन मौजूद है। इसकी हिफ़ाज़त का यही सबसे बड़ा सुबूत है। अल्लाह ने इसकी हिफ़ाज़त का वादा किया है और यह क़ुरआन में दर्ज भी है। क़ुरआन इमाम है सबके लिए और क़ियामत तक के लिए। हमारा इमाम ग़ायब नहीं है बल्कि हाज़िर है क्योंकि हम हाज़िर हैं।
हिदायत मौजूद है, जो चाहे इसकी पैरवी करे। हवा, रौशनी और पानी की तरह अल्लाह की हिदायत सबके लिए आम है।
अल-हम्दुलिल्लाह।
फिर से नई हिम्मत पैदा हुई और हम फिर से अमल में जुट गए।
यह सारी बात इसलिए यहां लिखी है कि इसलाम के बारे में बहुत से नज़रिये वुजूद में आ चुके हैं। एक आदमी जो अल्लाह के रास्ते पर चलने की कोशिश करता है। वह गोया पुल सिरात पर चलने की कोशिश करता है। बहुत सी वजहों से वह इस रास्ते से डिग सकता है लेकिन उसे किसी भी वजह से सीधे रास्ते से नहीं डिगना चाहिए।
अगर आप क़ुरआन व हदीस न भी पढ़े हों तो भी आप कॉमन सेंस से जान सकते हैं कि सच क्या है ?
बशर्ते कि आपको अपनी सच्ची मंज़िल की तलाश हो और दुनिया का कोई लालच या डर आपके दिल में न हो।

Friday, September 14, 2012

आरएसएस के पूर्व सरसंघ चालक सुदर्शन का निधन Sudarshan


फाइल फोटो
फाइल फोटो
नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व सरसंघ चालक के.एस. सुदर्शन का शनिवार तड़के करीब साढ़ छह बजे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. 
वह 81 वर्ष के थे. उनके घर में उनके भाई हैं. उनका जन्म भी 1931 में रायपुर में ही हुआ था. 
वे दो दिन पहले रायपुर आए थे और कल शाम उन्होंने बीजेपी के पूर्व राज्य सभा सांसद गोपाल व्यास की किताब का विमोचन भी किया था.रोज़ की तरह वे आज सुबह की शाखा मे भी शामिल हुए थे लेकिन इसके बाद अचानक उन्हे दिल का दौरा पडा और उनका निधन हो गया. 

सुदर्शन बीते कुछ समय से बीमार चल रहे थे और उनकी देखभाल के लिए एक व्यक्ति रखा गया था. उनका अंतिम संस्कार नागपुर में किया जाएगा.
Source : http://abpnews.newsbullet.in/ind/34-more/35657-2012-09-15-04-50-15
एबीपी न्यूज़ ब्यूरो
15-9-2012
हमारे पाठकों को याद होगा कि अभी थोड़े वक्त पहले ही हमने अपने ब्लॉग पर के. एस. सुदर्शन जी के बारे में एक पोस्ट भी लिखी थी। उसे इस लिंक पर देखा जा सकता है-



Tuesday, May 22, 2012

बुराई क्या है और बुराई को मिटाने के लिए कोई अपनी जान क्यों गवांए ? Evil

गधों और कुत्तों से बदतर हैं दहेज मांगने वाले
हमने दहेज मांगने वालों का हौसला तोड़ने के लिए यह पोस्ट लिखी तो देहरादून से राजेश कुमारी जी ने अपने कमेंट में कहा कि
अनवर जमाल जी बहुत सटीक और सार्थक बात कही है आजकल इन दहेज़ के लालचियों को इसी भाषा ऐसे ही शब्दों की जरूरत है मेरा बस चले तो इस पोस्ट के कई हजार पोस्टर बनवाकर देश की हर दीवार पर चिपका दूं बहुत बहुत हार्दिक आभार
शुक्रिया राजेश कुमारी जी।
अच्छी बातों का प्रचार ज़्यादा से ज़्यादा होना ही चाहिए।

इस पोस्ट पर कोटा, राजस्थान के जनाब दिनेश राय द्विवेदी जी का कमेंट भी मिला है।
अनवर भाई,
आमिर ने जो भी तीनों मुद्दे सत्यमेव जयते में दिखाए हैं, उनसे सहमति है। लेकिन यह तो टीवी पर बहुत बरसों से दिखाया जा रहा है। लोगों पर उस का कोई असर नहीं होता। लोग शो देखते हैं, भावुक हो कर ताली पीटते हैं, आँसू बहाते हैं और कसमें खाते हैं। समाज वहीं का वहीं रह जाता है। टीवी वाले पैसा बना कर निकल लेते हैं।
यहाँ भी वही होने वाला है।
कोई भी मुद्दा जब तक समाज में सामूहिक रूप से सतत न उठाया जाए तब तक उस का यही अंत होता है।
जरूरत है ऐसे आन्दोलनों की जो समाज में उठें और समाज को इन बुराइयों से मुक्त कराने तक अविराम चलते रहें।
यह भी सोचने की बात है कि इस समाज में ये सब बुराइयाँ आज भी क्यों मौजूद हैं? क्यों कि जो व्यवस्था परिवर्तन होना चाहिए था वह रोक दिया गया। भारत के आजाद होने तक सामन्ती आर्थिक संबंध प्रमुख थे और पूंजीवाद गौण। पूंजीवाद बच्चा था। उस के दो शत्रु एक साथ खड़े हो गए थे. एक तो सामन्तवाद जिसे समाप्त करने की जिम्मेदारी पूंजीवाद की थी। दूसरी मेहनतकश जनता अर्थात किसान, मजदूर और नौकर पेशा लोग। ये पूंजीवाद को खत्म कर देना चाहते थे। पूंजीवाद ने सामंतवाद से हाथ मिला लिया, क्यों कि वह पूंजीवाद को नष्ट नहीं कर सकता था। दोनों मिल कर अब मोर्चा ले रहे हैं। ये सामाजिक बुराइयां,सम्प्रदायवाद, जातिवाद किसान, मजदूर और नौकर पेशा लोगों को एक नहीं होने देते। इस कारण इन सब चीजों को सत्ता का संरक्षण मिलता है।

इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए पूंजीवाद और सामंतवाद के गठजोड़ से बनी वर्तमान फर्जी जनतांत्रिक सत्ता पर हमला बोलना होगा,उसे नष्ट करना होगा उस के स्थान पर वास्तविक जनतंत्र स्थापित करना होगा, मेहनतकश जनता का जनतंत्र।
लेकिन यह सब आमिर नहीं करेंगे। क्यों कि वे भी उसी सत्ता के एक औजार मात्र हैं।
जनाब दिनेश राय द्विवेदी जी के कमेंट का एक जवाब तो हमने अपनी पोस्ट पर ही दे दिया है और थोड़ा सा यहां यह भी कहना है कि
बुराई के ख़ात्मे के लिए एक तो बुराई की पहचान ज़रूरी है और दूसरे उसे ख़त्म करने की इच्छा शक्ति से भरे हुए कार्यकर्ताओं की ज़रूरत है।

बुराई क्या है ?
इसे तय किया जाना ज़रूरी है वर्ना हरेक आदमी जिस बात से दिक्क़त महसूस करेगा, उसी को बुराई घोषित कर देगा।
ग़रीब आदमी पैसे की कमी को बुराई कहेगा और अमीरों के सफ़ाए में अपनी मुक्ति देखेगा तो ऐसे ग़रीबों को पूंजीपति एक बुराई के रूप में देखेंगे और वे उनके सफ़ाए की या दमन की कोशिश करेंगे।
किस की कोशिश सही है और किस की कोशिश ग़लत है ?, यह कैसे तय किया जाएगा ?

वेश्याएं और उनके दलाल ग्राहकों की कमी को अपने लिए बुरा समझेंगे और अपने ग्राहक जुटाने के लिए कोशिश करेंगे तो उनकी कोशिशों को समाज के कुछ लोग बुराई के तौर पर देखेंगे।
बुराई क्या है ?
यह सवाल हर क़दम पर उठेगा।

इसके बाद यह सवाल उठेगा कि एक आदमी पूंजीपति की नौकरी करके अपने बच्चे पाल रहा है। उसके पास घर, बीवी-बच्चे और रोज़गार सब कुछ है।
वह ग़रीब आदमी के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कोई आंदोलन क्यों चलाए और क्यों दुख उठाए ?
आंदोलन और क्रांति में कार्यकर्ताओं की जान भी चली जाती है।
दुख भोगने वाले ग़रीब आंदोलन चलाएं तो समझ में आता है कि वे अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। कुछ पाने की कोशिश में ये ग़रीब मर भी जाते हैं तो ठीक है लेकिन दूसरों का जीवन बेहतर बन जाए, इसके लिए वे क्यों मरें जिनका जीवन आज बेहतर ही है ?
मरने के बाद अगर कुछ मिलने वाला नहीं है और जो कुछ मिलता है, वह सब इसी जीवन में मिलता है तो फिर वे दूसरों के चक्कर में अपना जीवन क्यों गवाएं ?
मरेंगे वे और जीवन बेहतर बनेगा दूसरों का।
दूसरों के चक्कर में कोई भी अक्लमंद आदमी मरना पसंद न करेगा जबकि मरने के बाद कुछ मिलना ही नहीं है, जैसा कि आपकी मान्यता है।

पहली समस्या तो बुराई की पहचान को लेकर खड़ी होती है और दूसरी समस्या इसके सफ़ाए के लिए कार्यकर्ता जुटाने में आती है।

समाज में समस्या है और लोग उसका हल चाहते हैं। उनकी समस्या को लेकर कुछ लोग खड़े होते हैं और वे पूंजीपतियों को डराते हैं कि ग़रीब लोग बहुत ग़ुस्से में हैं।
पूंजीपति उनसे हाथ मिला लेते हैं। ग़रीबों के हक़ के लिए लड़ने वाले पूंजीपतियों की ढाल बन जाते हैं और ग़रीबों के संघर्ष की दिशा बदल देते हैं। ग़रीब लोग उनके नेतृत्व में बरसों नारे लगाते रहते हैं लेकिन कोई सामाजिक क्रांति नहीं आती।
आखि़र कोई भी सामाजिक क्रांति क्यों नहीं आती ?
इसीलिए नहीं आती क्योंकि ग़रीबों के नेता अपना जीवन बेहतर बनाने में जुटे हुए हैं। ग़रीबों के आक्रोश से डराकर वे सरकार और पूंजीपतियों से वसूली करते रहते हैं। इन नेताओं के झोंपड़े महलों में बदल जाते हैं। अगर इन्होंने सचमुच क्रांति की होती तो इनकी जान कब की चली गई होती।
कोई क्यों मरे जबकि ज़िंदगी की हसीन बहारें उसके इस्तक़बाल के लिए तैयार खड़ी हों ?

इन दो सवालों को हल कर लिया जाए तो बुराई का ख़ात्मा किया जा सकता है।
1. बुराई क्या है ?
2. दूसरों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कोई अपना जीवन क्यों गवांए और अपने बीवी बच्चों को दर दर का भिखारी क्यों बनाए ?
जब यह धारणा आम हो जाए कि मरने के बाद कुछ होना नहीं है तो फिर इस ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है क्योंकि वह जानता है कि दुनिया में सज़ा कम ही मिलती है और यह कमज़ोरों को ज़्यादा मिलती है।
देखिए 

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मुंबई।। हरियाणा के यमुनानगर में एक महिला डॉक्टर द्वारा अबॉर्शन के बाद कन्या भ्रूण को टाइलेट में फ्लश करने के बाद उससे भी भयावह मामला सामने आया है। महाराष्ट्र के बीड में एक ऐसे ही 'डॉक्टर डेथ' का पता चला है, जो कन्या भ्रूण के अबॉर्शन के बाद सबूत मिटाने के लिए उसे अपने कुत्तों को खिला देता था।

Tuesday, May 15, 2012

मुस्लिम छात्र ने खिड़की से कूदकर नंगी लड़कियों से जान बचाई

यमन देश के छात्र के प्रति यौन हिंसा करने के इल्ज़ाम में 5 अमेरिकी छात्राएं गिरफ़्तार
वाशिंगटन (एजेंसियां)। ऐरिज़ोना राज्य के एक कॉलिज में यमन का एक छात्र असाम अश-शरई पढ़ता है। उसके आवास में 5 लड़कियां दाखि़ल हुईं और अंदर से ताला लगाकर अपने कपड़े उतार कर असाम अश-शरई को पकड़ लिया। असाम ने उनकी मिन्नत समाजत की लेकिन वे उस पर यौन संबंध बनाने के लिए दबाव डालती रहीं। उन पर कोई असर न पड़ा और उनकी हरकतें बढ़ती गईं तो असाम ने कहा कि ‘मैं एक दीनदार मुसलमान हूं और इसलाम अपनी बीवी के अलावा किसी दूसरी औरत से नाजायज़ ताल्लुक़ात की इजाज़त नहीं देता।‘
उन पांचों लड़कियों पर इस बात का भी कोई असर नहीं पड़ा तो असाम अश-शरई ने खिड़की से कूदकर अपनी जान बचाई और पुलिस को इत्तिला दी। पुलिस ने पांचों लड़कियों को उसके आवास से गिरफ़्तार कर लिया है। उन लड़कियों ने इल्ज़ाम क़ुबूल करते हुए बताया कि उनकी नज़र में असाम साइकोलोजिकली टेंशन में था। हमने उसे कई बार कहा था कि वह उनके साथ अपनी मर्ज़ी से सेक्स करे लेकिन वह तैयार नहीं हुआ तो उन्हें इस तरह उसके आवास में घुसना पड़ा।
यह वाक़या एक ऐसी यूनिवर्सिटी में हुआ है जिसमें शिक्षा सत्र पूरा होने के बाद 5 हज़ार लड़कियां नंगे होकर मैराथन रेस में हिस्सा लेती हैं। उनकी कपड़ों की निगरानी यूनिवर्सिटी की तरफ़ से की जाती है। उनके कपड़ों को तौला गया तो आधा टन वज़्न हुआ।

यह ख़बर कल 15 मई 2012 को राष्ट्रीय सहारा उर्दू के पृ. 12 पर छपी।
इस ख़बर से इस्लाम और पश्चिमी दुनिया की सोच और किरदार एक साथ सामने आ जाते हैं। पश्चिमी दुनिया का नंगापन हिंदुस्तान में भी आम होता जा रहा है। नई तालीम दिलाने वाले मां-बाप अपनी औलाद के लिए ऊंचे ओहदे का ख़याल तो रखते हैं लेकिन उसके किरदार का क्या होगा ?
इसे वे भुला देते हैं।
यही वजह है कि अकेले बेंगलुरू में ही हर साल 2 हज़ार से ज़्यादा लोग ख़ुदकुशी कर रहे हैं।
नंगेपन और ख़ुदकुशी दोनों का इलाज है इसलामी सोच।

Tuesday, April 17, 2012

गाय की आड़ में आतंक का खेल

दिव्या जी की कुछ ताज़ा पोस्ट देखकर ऐसा लगता है कि अब उनके लेखन का मक़सद सिर्फ़ जज़्बात भड़काना भर रह गया है।
ऐसी ही एक पोस्ट का लिंक यह है :
http://zealzen.blogspot.in/2012/04/blog-post_7615.html
दिव्या जी ! आप देखेंगी कि इसके बाद भी लोग न भड़केंगे।
इसके बाद आप उन हिंदुओं को क्या कहेंगी ?
जो इतना साफ़ चित्र देखकर भी आपके भड़काने में नहीं आए ?
हो सकता है कि उन्हें भड़कता न देखकर आप ख़ुद ही भड़क जाएं !
अपनी प्यारी पार्टी की हार के बाद आपका मूड वैसे ही उखड़ा हुआ है।

हिंदू भाई आवागमन की मान्यता के अनुसार मानते हैं कि जो गाय काटता है वह मरकर गाय ही बन जाता है ताकि उसे वह काटे जिसे उसने काटा था।
इस हिसाब से पेशावर के ये पठान पिछले जन्म की वो गायें हैं जिन्हें इस क़साई ने काटा था जो कि अब गाय बना पड़ा है।
इस तरह जिसे आप गाय समझ रही हैं यह पिछले जन्म का क़साई है और जो आज क़साई दिख रहे हैं ये पिछले जन्म की गायें हैं।
अब आप तय कीजिए कि आप पिछले जन्म की कई गायों का साथ देंगी या कि एक क़साई का जो कि आज गाय दिख रहा है ?
यहां एक सवाल यह भी वाजिब है कि कुछ हिंदू वर्ग सुअर को भी चारों तरफ़ से छरियां भोंक भोंक मर मारते हैं और फिर खाते हैं। आपने कभी कोई पोस्ट सुअर हत्या के विरोध में नहीं बनाई जबकि हिंदू धर्म के अनुसार वह भी एक अवतार का रूप है। मछली भी विष्णु जी के अवतार का एक रूप है और हिंदुओं में यह बड़े चाव से खाई जाती है।
यह सरासर दोहरा पैमाना है कि विदेश में अफ़ग़ान बाशिंदे गाय काटें तो विरोध और अपनी बग़ल में गाय कट रही हो तो कोई विरोध नहीं और अपना वर्ग सुअर काट रहा हो और मछली खा रहा हो तो कोई विरोध नहीं।

दिव्या जी यह काम ब्लॉगस्पॉट पर कर रही हैं और यहां उनके विरूद्ध शिकायत भी की जा सकती है लेकिन उनके विरूद्ध शिकायत सुनी जाएगी, इसमें संदेह है।
दलितों और कम्युनिस्टों के ब्लॉग्स के विरूद्ध अक्सर शिकायतें की जाती हैं लेकिन उन्हें बंद नहीं किया गया।
दिव्या जी का भी नहीं होगा।
नफ़रतें दिलों में दीवार खड़ी करती हैं और उनका असर समाज पर देर सवेर ज़रूर आता है। देश के दुश्मन यही काम कर रहे हैं।
दिव्या जी थाईलैंड में रहती हैं। गाय वहां भी काटी जाती है। उन्हें गाय से प्रेम होता तो वह थाईलैंड में गाय बचाने के लिए आंदोलन चलातीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें गाय से नहीं बल्कि रूपयों से प्यार है।
उन्हें अपनी नौकरी-व्यापार प्यारा है। सो थाईलैंड में वह गऊ काट कर खाने वालों की सेहत का रख रखाव दिल लगाकर कर रही हैं। उनके राष्ट्रवाद को गाय से प्रेम नहीं है बल्कि मुसलमानों से नफ़रत है।
उन्होंने गूगल से ढूंढा तो उन्हें एक फ़ोटो नज़र आया जिसमें मुसलमान गाय के पास खड़े हैं। उर्दू से वह जाहिल हैं। सो उन्हें पता भी नहीं चला कि उर्दू में यह लिखा है कि ये लोग अफ़ग़ान शरणार्थी हैं जो पेशावर में पनाह लिए हुए हैं।
अगर दिव्या जी को इन अफ़ग़ान नागरिकों के अमल पर ऐतराज़ है तो वहां जाकर उनका विरोध करें। यह ख़याल ही रोंगटे खड़े कर देने वाला है। वहां तो अमेरिका जाकर पछता रहा है।
गूगल से यह तस्वीर ढूंढने में उन्हें सैकड़ों तस्वीरें नज़र आई होंगी लेकिन उन्होंने इस तस्वीर को ही चुना क्योंकि नफ़रत का ज़हर फैलाने का काम इसी तस्वीर के ज़रिये मुमकिन है।
 दारूल उलूम देवबंद हिंदुस्तान के कुछ ख़ास इलाक़ों में मुसलमानों से गाय न काटने के लिए कह चुका है। जिसका मक़सद हिंदुस्तानी समाज को टकराव से बचाना है। उसके इस फ़तवे को मुल्क के बुद्धिजीवियों ने सराहा भी है। इसके बावजूद उन्होंने यह काम किया है।
घर को आग लगाने वाले चराग़ यही हैं और ख़बरदार करना हमारा काम है।
इसके बावजूद भी हमें दिव्या जी से कोई रंजिश नहीं है। हमें पता है कि आदमी पुराना और ग़लत इतिहास पढ़ता है तो मर चुके महमूद ग़ज़नवी का तो कुछ कर नहीं पाता। मौजूदा मुसलमानों को ही ठिकाने लगाने की मुहिम पर निकल खड़ा होता है जो कि कभी पूरी हो नहीं सकती।
आपस का टकराव ख़त्म हो तो भारत की ताक़त दुनिया की अकेली ताक़त होगी।
जो लोग भारत में टकराव की फ़िज़ा बना रहे हैं वे भारत का भला नहीं कर रहे हैं।
विदेशी आतंकवादियों के आने-बुलाने की ज़मीन यही लोग बनाते हैं।
हमें भारत पर हमले के नाम से ही नफ़रत है। इसलिए जब भी अशांति और आतंकवाद के बीज बोये जाते हैं तो हम उनकी जड़ जमने से पहले ही उन्हें कुरेद कर सबको दिखा देते हैं।
चाहे बीज बोने वाला नाराज़ होकर हमें गालियां ही क्यों न बकने लगे !

Monday, March 5, 2012

अरब और हिंदुस्तान का ताल्लुक़ स्वयंभू मनु के ज़माने से ही है Makka

काबा वह पहला घर है जो मालिक की इबादत के लिए बनाया गया है। इसे हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने सबसे पहले बनाया था। आदम अलैहिस्सलाम को स्वयंभू मनु कहा जाता है। जब उनके बाद जल प्रलय आई तो उसका असर इस घर पर भी पड़ा था। इसके बाद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने आज से लगभग 4 हज़ार वर्ष पहले काबा की जगह पर कुछ दीवारें ऊंची की थीं। छत वह डाल नहीं पाए क्योंकि तब यह इलाक़ा बिल्कुल निर्जन था। उन्होंने वहां अपने बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को उनकी मां के साथ आबाद किया। उस समय उस घर में कोई मूर्ति वग़ैरह न थी। बस उस पैदा करने वाले मालिक को ही पूजा जाता था। तब हिंदुस्तान से भी लोग वहां जाते थे। मक्का को भारतीय लोग मख के नाम से जानते हैं। यज्ञ के पर्यायवाची के तौर पर ‘मख‘ शब्द भी बोला जाता है जैसा कि तुलसीदास ने विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा हेतु श्री रामचंद्र जी के जाने का वर्णन करते हुए कहा है कि
*प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥
होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥1॥
भावार्थ:-सबेरे श्री रघुनाथजी ने मुनि से कहा- आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिए। यह सुनकर सब मुनि हवन करने लगे। आप (श्री रामजी) यज्ञ की रखवाली पर रहे॥1॥

मख‘ शब्द वेदों में भी आया है और मक्का के अर्थों में ही आया है। यज्ञ को यज भी कहा जाता है। दरअस्ल यज और हज एक ही बात है, बस भाषा का अंतर है। पहले यज नमस्कार योग के रूप में किया जाता था और पशु की बलि दी जाती थी। काबा की परिक्रमा भी की जाती थी। बाद में यज का स्वरूप बदलता चला गया। हज में आज भी परिक्रमा, नमाज़ और पशुबलि यही सब किया जाता है और दो बिना सिले वस्त्र पहने जाते हैं जो कि आज भी हिंदुओं के धार्मिक गुरू पहनते हैं।
मक्का का ज़िक्र बाइबिल में भी आया है। देखिए किताब ज़बूर 84, 4 व 6
बाइबिल में यहां मक्का का नाम ‘बक्का‘ बताया गया है। क़ुरआन ने भी बताया है कि मक्का का नाम बक्का है जिसका अर्थ है रूलाने वाला। जो यहां आता है, वह यहां से वापस नहीं जाना चाहता और जब उसे लौटना पड़ता है तो वह रोता है।
संस्कृत में रूलाने वाले को रूद्र कहा जाता है। वेदों में कई रूद्रों का ज़िक्र आया है उनमें से एक काबा है।
ऋग्वेद 5,56,1 में मरूतगण को रूद्र के पुत्र कहा गया है।
मरूतगण का अर्थ मरूस्थलवासी है।
इन मरूतगणों की वेदों में बहुत प्रशंसा आई है और इन्हें इंद्र से भी ज़्यादा महान कहा है।
यह सब बातें हमें याद हो आईं जैसे ही हमें पता चला कि देवबंद में काबा के इमाम डा. शैख़ अबू इब्राहीम अलसऊद तशरीफ़ ला रहे हैं। हमने उनका भाषण सुना जो कि अरबी में था और फिर उर्दू में भी उसका अनुवाद करके बताया कि उन्होंने यह कहा कि मुसलमान दीन की दावत का काम करें और लोगों के साथ नरमी का बर्ताव करें चाहे उनका अक़ीदा कुछ भी हो।
उनके इस्तक़बाल में जो अरबी काव्य पढ़ा गया, उसे सुनकर भी बहुत लुत्फ़ आया और अरबी में इतने सारे भाषण सुनकर ऐसा लगने लगा था मानो हम मक्का की ही एक गली में बैठे हैं।
बहुत ज़्यादा भीड़ थी। मस्जिद ए रशीद के आस पास की गलियां मुसलमानों से भरी हुई थीं। लोग अपने अपने घरों की छतों और दुकानों में भी नमाज़ के लिए बैठे हुए थे।
अरब और हिंदुस्तान का ताल्लुक़ आज से नहीं है बल्कि पहले दिन से है, इस बात को वही लोग जानते हैं जो कि तत्व को जानते हैं।
देखें इस मौक़े की एक रिपोर्ट-

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Shikah al-Shuraim Admires Deoband & Leads Zuhr Salah

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This was historic day in Deoband. The Imam of Ka'ba, Shaikh Abu Ibrahim Sa'ud ibn Ibrahim ibn Muhammad ash-Shuraim visited Darul Uloom Deoband today on 4 March 2012 Sunday.

He arrived in Darul Uloom Deoband via helicopter and landed here around 1 O'clock. Mufti Abul Qasim Nomani presented him Words of Thanks in the grand Jama Rashid and welcomed him in Deoband. The Imam also addressed the gathering and admired Deoband for its important role in the cause of Islam. He conveyed a message of peace and uity and invited the Muslims to pay attention to Dawah and Tabligh. Maulana Arshad Madani summarized the essence of his speech in Urdu for the common audience.

Later, the Imam al-Shurain led the Zuhar Salah and lakhs of Muslims offered the prayer behind him. All the streets leading to Darul Uloom and around were packed with the crowd of people gathered to welcome the Imam and to perform Zuhar Salah behid him.

Imam Ka'ba Shaikh al-Shurain had lunch with the Ulama in Darul Uloom Guest House and flew back from Deoband at around 3:30 pm.
Source : http://www.deoband.net/4/post/2012/03/shaikh-shuraim-deoband-visit.html

Wednesday, January 25, 2012

प्लीज़ क्रांति न करे कोई No Revolution

देश में आज अंग्रेज़ी राज नहीं है और उनके क़ानून में कुछ घटा बढ़ाकर हमने उसे अपना भी बना लिया है लेकिन हमें देखना होगा कि इस क़ानून का लाभ देश के ग़रीबों को कितना मिल रहा है ?
दहेज उत्पीड़न के एक मुक़ददमे को लड़ते हुए आज एक लड़की को चार साल हो गए हैं। हमने देखा है कि उसे अब तक न तो उसके पति से कोई खर्चा मिला है और न ही उसकी ससुराल से उसका सामान ही वापस मिला है। अभी कितने साल और लग जाएं इसका कोई अंदाज़ा नहीं है। ऐसे में ज़ालिम पक्ष को सज़ा दिलाने के लिए कौन कब तक लड़े और अपनी उम्र गंवाए ?

आम हालात यह हैं कि लोग पुलिस और अदालत के चक्कर से बचना बेहतर समझते हैं।
देश में क़ानून का होना ही काफ़ी नहीं है बल्कि उसका फ़ायदा अमीर और ग़रीब सबको मिले और न्याय तेज़ी के साथ हो, यह भी ज़रूरी है।
कुछ लोगों को फांसी का हुक्म दिया जा चुका है लेकिन उन्हें फांसी नहीं दी जा रही है। यह भी चिंता की बात है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी सज़ा पूरी हो चुकी है लेकिन उनके केस की पैरवी करने वाला कोई नहीं है। वे जेलों में बंद हैं।
आज 26 जनवरी है।
लोग ख़ुश हैं। ख़ुश होने की वजह भी है लेकिन जो लोग आज के दिन भी ख़ुश नहीं हैं उनके पास भी ग़मगीन होने की कुछ वजहें हैं। हमारा ख़ुश होना तब तक कोई मायने नहीं रखता जब तक कि हमारे दरम्यान ग़म के ऐसे मारे हुए मौजूद हैं जिनका ग़म हमारी मदद से दूर हो सकता है और हमारी मदद न मिलने की वजह से वह उनकी ज़िंदगी में बना हुआ है।
हमारे अंदर अनुशासन की भावना बढ़े, हम ख़ुद को अनुशासन में रखें और किसी भी परिस्थिति में शासन के लिए टकराव के हालात पैदा न करें।
जो लोग आए दिन धरने प्रदर्शन करते हुए शासन और प्रशासन से टकराते रहते हैं, उन्हें 26 जनवरी पर यह प्रण कर लेना चाहिए कि अब वे देश के क़ानून का सम्मान करेंगे और किसी अधिकारी से नहीं टकराएंगे बल्कि उनका सहयोग करेंगे।
टकराकर देश को बर्बाद न करें।
लोग अंग्रेज़ो से टकराए तो वे देश से चले गए और आज बहुत से लोग यह कहते हुए मिल जाएंगे कि देश में आज जो असुरक्षा के हालात हैं, ऐसे हालात अंग्रेज़ों के दौर में न थे।
कहीं ऐसा न हो कि फिर टकाराया जाए तो देश और गड्ढे में उतर जाए।
सो प्लीज़ हरेक आदमी यह भी प्रण करे कि अब हम क्रांति टाइप कोई काम नहीं करेंगे।
जो राज कर रहा है, उसे राज करने दो।
एक जाएगा तो दूसरा आ जाएगा।
अपना भला हमें ख़ुद ही सोचना है।
शासन करने वालों ने जनता की चिंता कम ही की है।
उनसे आशा ही न रखोगे तो निराशा भी न होगी।
जीवन को सकारात्मक विचारों से भरिए और सरकार और पब्लिक की शिकायतें करने के बजाय यह देखिए कि किसी को हमसे तो कोई शिकायत नहीं है।
इस बार 26 जनवरी को ऐसे मनाएं।

Monday, January 16, 2012

जिहाद का मतलब क्या है और जन्नत का हक़दार कौन है ? Jihad and Jannat

Dr. Anwer Jamal with Maulana Wahiduddin Khan







Dr. Ayaz Ahmad  with Maulana Wahiduddin Khan
Maulana Wahiduddin Khan after session
‘ग़ुस्सा ईमान में फ़साद डाल देता है।‘
मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान साहब पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक हदीस की तश्रीह करते हुए फ़रमा रहे थे।
मैं ईमान से रब्बानी सोच मुराद लेता हूं। ईमान से रब्बानी सोच पर बुरा असर पड़ता है।
ग़ुस्से से आपको बचना है। दुनिया का मामला हो या दीन का मामला हो, ग़ुस्से को मैनेज कीजिए।
‘यू हैव टू मैनेज योर एंगर‘
यह फ़ॉर्मूला है इस्लाम का। इसी में फ़लाह है। दावती ऐतबार से भी और दूसरे मामलात में भी।
इसके बाद मौलाना ने दुआ की और अपना लेक्चर ख़त्म कर दिया। मौलाना के लेक्चर को इंटरनेट के ज़रिये पूरी दुनिया में टेलीकास्ट किया जा रहा था।
हम कल (तारीख़ 15 जनवरी 2012 दिन इतवाद)मौलाना साहब से मिलने के लिए और उनका लेक्चर सुनने के लिए निज़ामुद्दीन , नई दिल्ली गए थे। हमारे साथ अनस ख़ान और डा. अयाज़ अहमद भी थे। अब उनके बायीं तरफ़ भाई रजत मल्होत्रा जी आकर बैठ गए। लोगों ने एक स्लिप पर अपने सवाल लिखकर पूछने शुरू कर दिए और रजत भाई की गोद में रखे हुए लैपटॉप दुनिया के अलग अलग मुल्कों से सवाल और कॉम्पलीमेंट्स आने लगे।
एक सवाल जिहाद के बारे में आया।
मौलाना ने कहा कि जिहाद के माअना कोशिश के हैं। किसी अच्छे काम के लिए पीसफ़ुल एक्टिविटी करना जिहाद है।
जिहाद का मतलब क़िताल (युद्ध) नहीं है। क़ुरआन में आया है कि ‘ व-जाहिद बिहिम जिहादन कबीरा‘ यानि ‘और इस (क़ुरआन) के ज़रिये से उनके साथ जिहाद ए कबीर करो।
क़ुरआन कोई हथियार नहीं है। क़ुरआन कोई तलवार या बम नहीं है।
इस बारे में आप हमारी दो किताबें देखें,
1. ट्रू जिहाद
2. प्रॉफ़ेट ऑफ़ पीस
मौलाना की किताब ‘प्रॉफ़ेट ऑफ़ पीस‘ को पेंग्विन ने पब्लिश किया है।

एक सवाल आया कि कुछ लोग फ़िक्री ताक़त को कम और असलहे की ताक़त को ज़्यादा समझते हैं। क्या यह सही है ?
मौलाना ने फ़रमाया कि यह ग़लत बात है। असलहे की ताक़त से बड़ी कामयाबी मिलने की कोई मिसाल तारीख़ (इतिहास) में नहीं है। रूस अफ़ग़ानिस्तान में और अमेरिका इराक़ में नाकाम हुआ।
पीसफ़ुल एक्टिविटी का तरीक़ा अख्तियार करना फ़िक्री ताक़त का इस्तेमाल करना है।
एक है पीसफ़ुल एक्टिविज़्म और दूसरा है वॉयलेंट एक्टिविज़्म।
1857 में आज़ादी के लिए वॉयलेंट एक्टिविटी की गई लेकिन आज़ादी नहीं मिली जबकि महात्मा गांधी ने 1947 में पीसफ़ुल एक्टिविटी की और आज़ादी मिल गई।
तशद्दुद (हिंसा) सें मक़सद हासिल नहीं होता बल्कि बात और बिगड़ जाती है।
फ़िक्र की ताक़त को इस्तेमाल करने का मतलब है नज़रिये की ताक़त को इस्तेमाल करना।

सैटेनिक वर्सेज़ के बारे में एक सवाल आया कि इस्लमी तारीख़ में इसका क्या मक़ाम है ?
मौलाना ने कहा कि इस्लामी तारीख़ में सैटेनिक वर्सेज़ का कोई मक़ाम ही नहीं है। ख़ुशवंत सिंह ने जब इसे पढ़ा था तो उन्होंने इसके प्लॉट को रद्दी क़रार दिया था। यह फ़ेल हो जाएगा लेकिन मुसलमानों ने इसे लेकर शोर मचाया तो इसकी ख़ूब सेल हुई।

जन्नत के बारे में किसी भाई ने नेट के ज़रिये दरयाफ़त किया कि मौलाना जन्नत पाने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?
मौलाना ने सूरा ए ताहा की 76 वीं आयत पढ़ी ‘व-ज़ालिका जज़ाऊ मन तज़क्का‘ यानि यह बदला है उस शख्स का जो पाकीज़गी (पवित्रता) अख्तियार करे।
जो अपने आपको पाक करता है। उसके लिए जन्नत है। जितनी भी नेगेटिव थिंकिंग्स हैं, उनसे ख़ुद को पाक करना है। नफ़रत, हसद और ग़ुस्से से ख़ुद को पाक करना है।

एक सवाल यह आया कि ‘डिवोटी ऑफ़ गॉड‘ बनने के लिए क्या करना चाहिए ?
मौलाना ने कहा कि गॉड की क्रिएशन में ग़ौरो-फ़िक्र करना चाहिए। क्रिएटर को आप अपनी आंखों से तो देख नहीं सकते। क्रिएटर तक पहुंचने का रास्ता उसकी क्रिएशन है। आप उसे उसकी क्रिएशन में पाते हैं।
‘गॉड अराइज़ेज़‘ मेरी किताब है। उसमें यही है। मैं पेड़ को देखता हूं तो मुझे यही अहसास होता है और जब मैं इंसान को देखता हूं तो मुझे यही अहसास होता है। चांद, सूरज और सितारे को, जिसको भी देखो तो यही अहसास होता है।

फूल और कांटे एक ही शाख़ पर हैं।
एक सवाल के जवाब में मौलाना ने फ़रमाया कि ज़िंदगी प्रॉब्लम्स से भरी हुई है लेकिन इसी के साथ उसमें अपॉरचुनिटीज़ भी होती हैं। फूल और कांटे एक ही शाख़ पर हैं।
‘इन्ना मअल उसरि युसरा‘ (क़ुरआन 94, 6) यानि ‘बेशक मुश्किल के साथ आसानी है‘
प्रॉब्लम को इग्नोर कीजिए और अपॉरचुनिटीज़ को गेन कीजिए।

इसके बाद सभी ने हल्का सा नाश्ता किया। इसके बाद इसी हॉल में हम सबने एक साथ ज़ुह्र की नमाज़ अदा की। मौलाना ज़कवान नदवी साहब ने नमाज़ में इमामत की।
नमाज़ से पहले हमने मौलाना वहीदुददीन ख़ान साहब से बात की और हमने मौलाना से अपने सिरों पर हाथ भी रखवाया और उनसे दुआ भी करवाई।
हमने मौलाना को अपनी डायरी दी और कुछ नसीहत लिखने के लिए कहा तो उन्होंने मौलाना ज़कवान नदवी साहब से हमारी डायरी पर यह लिखवाया-
‘दावत को अपना मिशन बनाइये और बक़िया तमाम चीज़ों को अपना प्रोफ़ेशन‘
इसके नीचे उन्होंने अपने हाथ अपने दस्तख़त कर दिये और ज़कवान साहब ने फिर तारीख़ लिखकर पता लिख दिया।
1 निज़ामुददीन वेस्ट मार्कीट, नई दिल्ली।

ज़कवान नदवी साहब, भाई रजत मल्होत्रा, भाई नवदीप कपूर, भाई साजिद अनवर और भाई नसीब साहब से भी मुलाक़ात हुई। हॉल से निकल कर हम मौलाना के बुक हाउस में आए और कुछ किताबें ख़रीदीं और फिर पास में बनी उनकी कोठी पर भी गए। निज़ामुददीन में सी- 29 उनकी कोठी है। क़ुरआन शरीफ़ के अंग्रेज़ी अनुवाद वह तोहफ़े के तौर पर देते हैं। उन्होंने हमें उनकी कुछ कॉपी दीं और ‘सत्य की खोज‘ और ‘रिएलिटी ऑफ़ लाइफ़‘ की भी कुछ कॉपियां दीं।
सत्य की खोज की एक कॉपी आज हमने अपने दोस्त वैद्य नरेश गिरी जी को दी।

सुबह ट्रेन से निकले थे। हम घर से सुबह पौने पांच बजे निकले थे और मौलाना के सेंटर पर हम तक़रीबन 12 बजे पहुंचे। हम वापस बस से लौटे तो हमें 9 बज गए। सर्दी में यह सफ़र वाक़ई एक मुश्किल सफ़र था लेकिन ख़ुदा की मुहब्बत और उसके बंदे को देखने के शौक़ ने इसे आसान बना दिया।
अनस ख़ान के लिए भी यह एक यादगार सफ़र था। दिल्ली उन्होंने पहली बार देखा है।
मौलाना पीस एंड स्प्रिच्युएलिटी के लिए काम कर रहे हैं और इसे उनके सेंटर पर पूरी तरह महसूस किया जा सकता है। मौलाना से जुड़े हुए औरत मर्द, सभी अलग अलग उम्र के हैं लेकिन सभी के चेहरे पर पीस साफ़ झलकती है।
मौलाना को सुनना, उनसे मिलना अपने आप में एक ऐसा तजर्बा है जिसे बस महसूस ही किया जा सकता है।

Tuesday, January 10, 2012

A reseaerch about human race

Source : हमारे पूर्वज

फोटो फ़ीचर : हमारे पूर्वज

होमो रूडोलफेनियस (20 लाख साल पूर्व)। क़ेन्या में मिले अ‍वशेषों के आधार पर ये मॉडल तैयार किया गया है।
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Wednesday, December 28, 2011

इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में ग़ैर इस्लामी गतिविधियां क्यों होती हैं ?

हमने पिछले साल भी अपने ब्लॉग ‘अहसास की परतें‘ पर ऐतराज़ जताया था कि इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में ग़ैर इस्लामी गतिविधियां क्यों होती हैं ?
हुस्नो-इश्क़ और मयकशी पर शायरी का ताल्लुक़ फ़न ए शायरी से है न कि इस्लाम से।
इस सेंटर में पिछले साल की तरह इस साल भी ग़ालिब की याद में एक मुशायरा संपन्न हुआ और इसमें कुछ काम ऐसे भी हुए जो कि सरासर ग़ैर इस्लामी हैं। इस्लाम के ज़िम्मेदार जो कि दिल्ली में रहते हैं उन्हें इस तरफ़ ध्यान देना चाहिए।
आज दिनांक 28 दिसंबर 2011 के उर्दू अख़बार राष्ट्रीय सहारा में छपी ख़बर भी साथ में मौजूद है।

Thursday, December 22, 2011

स्कूल की ड्राइंग





यह पेंटिंग हमारे साहबज़ादे ने बनाई है . दरअसल यह उनके  स्कूल की ड्राइंग थी. उसमें कंप्यूटर के ज़रिये थोड़ी सी तब्दीली की है .
स्कूल की ड्राइंग यह है :


Tuesday, December 20, 2011

श्री कृष्ण जी को इल्ज़ाम न दो

आजकल गीता पर चर्चा ज़ोरों पर चल रही है क्योंकि रूस में गीता पर पाबंदी लगाने की कोशिश की जा रही है। ज़्यादातर लोग तो गीता के पक्ष में बोल रहे हैं लेकिन कुछ स्वर गीता के विरोध में भी उठ रहे हैं। ऐसे ही एक ब्लॉग को हमने पढ़ा तो उसमें लेखक ने भारत की बर्बादी का इल्ज़ाम श्री कृष्ण जी पर ही डाल दिया और उसने आधार बनाया उस साहित्य को जो कि श्री कृष्ण जी के हज़ारों वर्ष बाद लिखा गया।
गीता महाभारत का एक अंश है। महाभारत के आदि पर्व 1, 117 से पता चलता है कि इसका नाम वास्तव में ‘जय‘ था और उसमें मात्र 8, 800 श्लोक थे और कृष्ण द्वैपायन व्यास ने सबसे पहले इसका संपादन किया था। इसके बाद वैशंपायन ने इसका संपादन किया और श्लोक 24, 000 हो गए। अब इसका नाम भारत हो गया। इसके बाद उग्रश्रवा सौति ने इसमें 96, 244 श्लोक बना दिए और फिर नाम बदलकर महाभारत हो गया। अब यह नहीं कहा जा सकता कि ‘जय‘ के नाम से प्रसिद्ध ग्रंथ के कितने श्लोक इस ग्रंथ में हैं और वे कौन कौन से हैं ?
इस बढ़ोतरी के बाद के अब यह कहना बहुत मुश्किल है कि मूल 8, 800 श्लोक कौन से हैं ?
अगर मूल कथा आज हमारे सामने होती तो शायद बहुत से प्रश्न खड़े ही नहीं होते।
महापुरूषों के चरित्र के बारे में भी बहुत से प्रश्न तब खड़े न होते।
कथा को रोचक बनाने के लिए कवियों ने जो प्रसंग अपनी ओर से बढ़ा दिए हैं, उनकी वजह से लोग श्री कृष्ण जी के बारे में अपमानजनक बातें कर रहे हैं।
यह सरासर ग़लत है।
प्रेरणा लेने से पहले ज्ञान की शुद्धता की जांच ज़रूर कर लेनी चाहिए।

भारत की पवित्र भूमि पर सदाचारी मार्गदर्शकों का अपमान हमारे नैतिक पतन का प्रमाण है।
इस आशय का कमेंट हमने इस पोस्ट पर दिया है। इसे आप भी देखें और हमें अपने विचारों से अवगत करायें:
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/ORISON/entry/%E0%A4%97-%E0%A4%A4-%E0%A4%A8-%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%AC-%E0%A4%A6-%E0%A4%95-%E0%A4%AF-%E0%A4%AD-%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95
ओरिसन लिखता है :
गीता ने बर्बाद किया भारत को 
गीता ने बरबाद किया भारत को, भारत में भावनाओं के अथाह समंदर को गीता ने बरबाद कर दिया, लोग ने लोगों पर विश्वास करना छोड़ दिया, और लोग आपस में नातें-रिश्ते भूलकर, जमीन-जायदाद और धन के लिए अपने ही अपनों के गले काटने लगे, क्यूंकि गीता में ऐसा लिखा है, जिसमे इंसानी भावनाओं से ऊपर जमीन-जायदाद और धन-संम्पत्ति को बड़ा माना गया, और उसके पीछे यह मिसाल दी गयी की जो अपना है, वह अगर किसी के पास भी है तो छीन लो, भले ही वह भाई-हो, नातेदार हो, रिश्तेदार हो, उस भावना को दबा दो, और जमीन और धन के लिए अपने से बड़ों से भी लड़ पड़ो, यह गीता ने सिखाया, जिससे भारत बरबाद हो गया, और भारत में जमीन-जायदाद और धन संम्पति को ज्यादा महत्त्व दिया गया, जबकि भावनाओं और हृदय की बातों को कमजोरी समझा गया, और इसका फायदा उठाया गया, तो इस तरह तो गीता ने एक तरफ कहाँ की जो तुम्हारा है अर्जुन वह किसी भी प्रकार लड़कर छीन लो, फिर दूसरी तरफ गीता ने कहा की तुम क्या लाये तो जो तुम्हारा है, तुम क्या ले जाओगे, इस तरह की विरोधाभाषी वक्तव्य ने भारत के लोगों को भ्रमित कर दिया, तो जो लोग, ताकतवर थे, चालाक थे, उन्होंने दूसरों की भावनाओं का फायदा उठाकर, उन्हें उसी में उलझाये रखा और अपने पास धन-दौलत और जमीन-जायदाद अपने पास रखी, बस यही पारी पाटि भारत में चलती रही, और उसने कमजोर को वैरागी बना दिया, और ताकतवर को अय्याश बना दिया, कमजोर होकर वह वैराग का बाना ओढ़ लिया की अब उसे तो यह जामीन मिलने से रही तो उसने कहाँ की संसार मिथ्या है, और जो ताकतवर था उसने अय्याशी अपना ली | इस तरह से गीता ने पूरे भारत को दो भागों में बाँट दिया, एक जो उस जमीन-जायदाद के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे, उसके लिए किसी के साथ भी लड़ सकते थे, कोई भी पैंतरा अपना सकते थे, और अपने हाथ में दौलत काबू में रखते थे, और दूसरे वो जों भावनाओं के आगे जमीन-जायदाद को भी ठोकर मार देते थे, और अपने ईमान को कभी गन्दा नहीं करते थे, और अपने नाते-रिश्तों और बड़ों का सम्मान करते थे, आज भी भारत इसी ढर्रे पर चल रहा है, जों लोग पैसे वाले होते हैं वह भावुक नहीं होते हैं, और जों गरीब होते हैं वह भावुक होते हैं, और पैसे वाले किसी के सामने दिखावा तो करते हैं की हम सम्मान करते हैं, पर पीठ पीछे छुरा भी घोंप देते हैं, और उनकी भावना झूठी होती है, उस भावना में भी वह उससे गरीब के पास जों होता है, वह हथियाना चाहते हैं, और उसे और गरीब ही रहने देना चाहते हैं, बात तो बड़ी-बड़ी करते हैं की सब माया है, पर भारत वाले जितनी माया इक्कठी करते हैं उतना संसार का कोई आदमी नहीं करता है |

तो आज भी यह गीता किसी भी नाते और रिश्ते को तोड़कर जमीन और जायदाद को महत्त्व देने को कहती है, और गीता के बल पर वह किसी की परवाह नहीं करता है, और बड़े-बूढें की भावनाओं को देखता तक नहीं है, उसके लिए अपना अहंकार ही सबसे बड़ा होता है, और उसका अहंकार किसी भी प्रकार से जमीन और जायदाद हथियाना चाहता है | चाहे उसके लिए किसी को भी मारना पड़े, चाहे वह कोई भी हो, नाते में रिश्ते में।

Friday, December 9, 2011

आत्महत्या से बचाव की कारगर तदबीर

भाई ख़ुशदीप जी सवाल कर रहे हैं कि
ज़िंदगी से क्यों हार रहे हैं लोग ?
उनकी पोस्ट का विषय आत्महत्या है।
 
जीना दुश्वार क्यों ?
आखि़र लोग आत्महत्या का रास्ता क्यों अपना रहे हैं ?
यह आज चिंता का विषय है।
हरेक उम्र और हरेक लिंग और भाषा के लोग आत्महत्या कर रहे हैं।
इसके पीछे एक सही नज़रिये का अभाव है।
लोगों के जीवन में समस्याएं आती हैं और जो लोग उन्हें हल होते नहीं देखते और उनसे उपजने वाले तनाव से वे हताश हो जाते हैं तो ऐसे लोगों में आत्महत्या का विचार सिर उठाने लगता है और कुछ लोग सचमुच आत्महत्या कर लेते हैं।
कोई आदमी अकेला नहीं मरता बल्कि वह अपने से जुड़े हुए लोगों को भी मार डालता है। उन्हें वह सदा के लिए एक न भरने वाला ज़ख्म देकर चला जाता है।
अपने मां बाप और पत्नी-बच्चों के लिए जो भीषण संत्रास वह जीवन भर छोड़ कर जा रहा है और उन्हें जीते जी ही मुर्दा बना रहा है। यह घोर पाप है और इस पाप के दंड से मुक्ति संभव नहीं है।

इस समस्या का हल यह है आदमी यह जान ले कि अपने जीवन का मालिक वह स्वयं नहीं है बल्कि वह रब है जिसने उसे पैदा किया है। उसी ने उसके पैदा होने का समय नियत किया है और उसकी मौत का समय भी उसी ने नियत कर रखा है। उसकी मंशा के खि़लाफ़ हरकत करना एक दंडनीय अपराध है और उसकी सज़ा उसे हर हाल में मिल कर रहेगी। इस तरह वह एक समस्या से बचेगा तो दूसरे कष्ट में जा पड़ेगा।

आदमी यह जीवन ढंग से जी सके इसके लिए ज़रूरी है कि वह जान ले कि मौत के बाद उसके साथ क्या मामला पेश आने वाला है ?
इंसान का हरेक अमल मौत के बाद उसके सामने आना है, यह तय है और इसे हरेक धर्म-मत में मान्यता प्राप्त है।
आधुनिक शिक्षा इस मान्यता को नकारती है और इस तरह वह नई नस्ल को एक ऐसी बुनियाद से वंचित कर रही है जो कि उसे हर हाल में जिलाए रख सकती है।
जब आदमी अपनी योग्यता के बल पर अपने हालात सुधरने से नाउम्मीद हो जाता है, तब भी एक आस्तिक को यह उम्मीद होती है कि उसका रब उसके हालात सुधारने की ताक़त रखता है और वह आशा और विश्वास के साथ प्रार्थना करता रहता है। इससे उसका मनोबल बना रहता है और मनोविज्ञान भी यह कहता है कि अगर आत्महत्या के इच्छुक व्यक्ति को कुछ समय भी आत्महत्या से रोक दिया जाए तो कुछ समय के बाद वह फिर आत्महत्या नहीं करेगा।
ईश्वर में आस्था और पारिवारिक रिश्तों के प्रति ज़िम्मेदारी का सही भाव आदमी को आत्महत्या से बचाते हैं।

Sunday, October 16, 2011

आप अपनी पोस्ट में लिंक क्यों देते हैं ?

कुछ ऐतराज़ ही करना होता है तो कुछ भाई यही ऐतराज़ कर देते हैं कि 
'आप अपनी पोस्ट में लिंक क्यों देते हैं ?' 
भाई पोस्ट किसी ख़ास वजह से दिखाने के लायक़ होती है। इसीलिए उसका लिंक दिया जाता है। यह एक कॉमन सेंस की बात है लेकिन आदमी विरोध और ज़िद में यह बात बिल्कुल ही भूल जाता है।
चर्चा मंच हिंदी ब्लॉग जगत का एक प्रतिष्ठित ब्लॉग है।
विंडो लाइव राइटर का इस्तेमाल करके लिखी जाने वाली पोस्ट्स इसकी सुंदरता में इज़ाफ़ा कर देती हैं और कभी कभी तो इसके चर्चाकार बहुत ज़्यादा ही मेहनत कर गुज़रते हैं और तब वे एक यादगार पोस्ट दे पाते हैं।
मिसाल के तौर पर आप देखिए यह पोस्ट और जानिए हिंदी ब्लॉग जगत के कुछ सुप्रतिष्ठित ब्लॉगर्स की लेखन शैली के बारे में और साथ में आप उनके फ़ोटो और उनका परिचय भी जान सकते हैं-

तटस्थ रहना पाप नहीं - चर्चा-मंच : 667

इसी पोस्ट के बारे में हमने यह पोस्ट तैयार की है

रविकर जी ने कर दिया कमाल GreatJob

Saturday, October 15, 2011

इस्लाम पर सवाल क्यों आते हैं ?

हिंदू भाई ब्लॉग लिखते है और जिस मत में वे आस्था रखते हैं उसके बारे में वे अक्सर लिखते रहते हैं और आप देखेंगे कि उनकी रीति-नीतियों में कोई मुसलमान वहां कमियां निकालता हुआ नहीं मिलेगा।
इसके विपरीत अगर मुसलमान इस्लाम में आस्था रखता है और वह उसके बारे में लिख रहा है तो आप देखेंगे कि कुछ उत्साही युवा जो हिंदू समझे जाते हैं, अक्सर कमियां निकालने आ जाते हैं।
यह क्या है ?
क्या हिंदू युवा ज़्यादा प्रबुद्ध हैं ?
क्या उनके मुक़ाबले मुसलमान सुप्त हैं ?
क्या हिंदू भाई सत्य के लिए ज़्यादा जिज्ञासा रखते हैं ?
क्या मुसलमान सत्य के प्रति लापरवाह हैं ?
या इसके बात इसके विपरीत है ?
क्या मुसलमान निश्चिंत हैं कि कोई अपने मत का कितना ही प्रचार कर ले, वह किसी मुसलमान को आकर्षित करने के लिए काफ़ी नहीं है ?
क्या हिंदू भाईयों को यह चिंता सताती है कि अगर इस्लाम की छवि पर लगातार कीचड़ न उछाला गया तो अपने पुरातन संस्कारों से दूर भागता हुआ हमारा समाज कहीं इस्लाम की ओर ही आकर्षित न हो जाय ?
हो सकता है कि इनमें से कुछ कारण हों या ये सब कारण हों या इनमें से कोई भी कारण न हो बल्कि कारण कुछ और ही हो लेकिन मुस्लिम ब्लॉगर्स जब भी इस्लाम पर कोई पोस्ट लिखते हैं तो दनादन सवालों की बौछार सी हो जाती है और हम यही सोचते रह जाते हैं कि आखि़र ऐसा हो क्यों रहा है ?
देखिये :

Tuesday, October 11, 2011

दीन-धर्म पर संवाद का सही तरीक़ा

राज जी ! आप कहते हैं कि हम किसी से नफ़रत नहीं करते और बातें आप नफ़रत की ही करते हैं।
आप अब तक अपनी टिप्पणियों को देख लीजिए, उनमें जब भी आप इस्लाम, कुरआन और पैग़म्बर साहब का ज़िक्र करते हैं तो कितनी नफ़रत के साथ और कितने तिरस्कार के साथ करते हैं।
इसमें हम आपकी ग़लती ज़्यादा नहीं मानते।
जब आदमी किसी विशेष पारिवारिक पृष्ठभूमि में पला बढ़ा हो या इस्लाम के विरूद्ध नफ़रत रखने वाले चिंतकों के साथ उठता बैठता हो और खुद अपनी अक्ल खोलकर सोचता न हो तो उसकी दशा यही बनेगी।
दूसरी ओर आप हमें देखिए और आप इस पूरे ब्लॉग को पढ़ लीजिए,
आपको कहीं भी हमारी ओर से कोई भी ग़लत ऐतराज़ हिंदू महापुरूषों पर नहीं मिलेंगे, इसे कहते हैं महापुरूषों को आदर सम्मान देना और उनसे प्यार करना।
केवल कह देना ही काफ़ी नहीं होता।
इस्लाम के विरूद्ध प्रचार कोई नई बात नहीं है। इस्लाम के विरूद्ध हरेक भाषा में बहुत सा ऐसा सहित्य आपको मिल जाएगा जो कि इस्लाम की गलत जानकारी देने के लिए ही लिखा गया है। इस्लाम के खिलाफ नफरत भरा साहित्य पढ़कर या ऐसे प्रवचनों से इस्लाम की जानकारी लेना ऐसा ही है जैसे कि कोई विदेशी टूरिस्ट ‘कसाब‘ के मुंह से भारतीय संस्कृति की जानकारी लेना चाहे,
क्या उसे भारतीय संस्कृति की सही जानकारी का स्रोत माना जा सकता है ?

आप पहले इस्लाम के बारे में उसके प्रामाणिक स्रोतों से जानकारी हासिल कीजिए और उसका तरीका यह नहीं है कि कुरआन के विरोध में लिखे गए साहित्य को पढ़ लिया और फिर कहीं से कुरआन का अनुवाद लेकर उसमें उन आयतों को मिला लिया और समझ लिया कि हम समझ गए।
बल्कि इसका तरीका यह है कि आप पहले मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जीवनी पढ़ें ताकि आपकी जानकारी में यह बात आ जाए कि उनके साथ मक्का और मदीना में क्या क्या अत्याचार किए गए ?
क्या आप यह बात जानते हैं कि एक ईश्वर की उपासना और उसी का आदेश मानने का प्रचार करने की जो दूसरी सज़ाएं उन्हें दी गईं उनके साथ साथ पैग़ंबर साहब को लगभग ढाई साल तक ‘इब्ने अबी तालिब‘ की घाटी में क़ैद रखा गया और इस लंबे अर्से में मक्के के किसी भी व्यापारी ने उन्हें अन्न का एक दाना तक नहीं बेचा यानि मुकम्मल बहिष्कार।
इस क़ैद और इस बहिष्कार में मुहम्मद साहब सल्ल. अकेले नहीं थे बल्कि उनके साथ उनका पूरा क़बीला था और उनके साथ ये सारी तकलीफ़ें उन लोगों ने भी उठाईं जो कि पैग़ंबर साहब के धर्म पर आस्था नहीं लाए थे लेकिन फिर भी उन्होंने उनका साथ दिया क्योंकि वे उनसे प्यार करते थे और उन्होंने पैग़ंबर साहब को कभी दुश्मनों के हाथ नहीं सौंपा। उनके क़बीले के दूध पीते बच्चों और औरतों को भी यह दर्दनाक कष्ट झेलना पड़ा।
इस तरह के वाक़यात इस्लाम विरोधी अपने लिट्रेचर में नहीं छापते, इसलिए आपको पता भी नहीं होंगे।
आप इस्लाम को औरत विरोधी बता रहे हैं लेकिन आपको पता नहीं होगा कि पैग़ंबर साहब सल्ल. के उपदेश पर सबसे पहले आस्था व्यक्त करने वाली भी एक औरत ही थी और वह भी एक औरत ही थी जिसे इस्लाम पर ईमान लाने के जुर्म में इस्लाम विरोधियों ने क़त्ल कर दिया।
जब आप पैग़ंबर साहब की जीवनी पढ़ेंगे तभी आपको पता चलेगा कि उन्होंने क्या कहा था और उनके साथ क्या किया गया था ?
इसके बाद आप कुरआन का कोई ऐसा अनुवाद पढ़ें जिसमें थोड़ा विस्तार से आयतों का संदर्भ प्रसंग भी बताया गया हो ताकि आप जान लें कि कौन सी आयतें सामान्य जीवन के लिए हैं और कौन सी आयतें युद्ध काल और आपत्ति काल के लिए हैं।
तब ही आपको यह पता चल पाएगा कि जब ज़ुल्म अपनी सारी हदें पार कर गया तो मुहम्मद साहब सल्ल. मक्का से चले आए और मदीना के लोगों को उपदेश देना शुरू किया तो उनके क़त्ल के इरादे से उनके दुश्मनों मक्का से आकर मदीना पर हमला कर दिया। तब मुसलमानों को अपने पैग़ंबर, अपने दीन और खुद अपनी जान की हिफाजत के लिए हथियार मजबूरन उठाने पड़े और इन युद्धों में जब बहुत से मुसलमान मारे गए और उनकी विधवाएं बेसहारा हो गईं तो यह हुक्म दिया गया कि मुसलमान उन विधवाओं से निकाह कर लें ताकि उन्हें आर्थिक , सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहारा मिल सके।
विधवाओं का इससे ज़्यादा अच्छा पुनर्वास कुछ और हो सकता हो तो आप भी सोच कर बताएं और यह भी याद रखें कि यह वह दौर था जबकि विधवाओं को अभागिन और मनहूस समझा जाता था और उन्हें सहारा देने के बजाय उन्हें ज़िंदा जला दिया जाता था और ऐसा करने वाले यह कहते थे कि विश्व में हमसे ज़्यादा सभ्य कोई है ही नहीं।
जब आप इस्लाम के मूल स्रोतों को ढंग से पढ़ लेंगे तो आपकी बहुत सी आपत्तियां दूर हो जाएंगी लेकिन कुछ फिर भी बनी रहेंगी और कुछ इस अध्ययन के दौरान पैदा होंगी।
ये आपत्तियां वास्तव में ऐसी होंगी जिन्हें अध्ययन के दौरान पैदा होने वाली आपत्तियां कहा जाएगा और उनका निराकरण भी किया जाएगा।
क्योंकि किसी भी विषय के अध्ययन के दौरान इस तरह की आपत्तियां पैदा होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
हम ऐसी आपत्तियों का स्वागत करते हैं क्योंकि ज्ञान इसी तरह बढ़ता है और ज्ञान इसी तरह फैलता है।
दूसरी बात आपको यह जान लेनी चाहिए कि ये आपत्तियां आप पहली बार नहीं कर रहे हैं और इन सभी का जवाब दिया जा चुका है जिनमें से कुछ के जवाब हिंदी में नेट पर भी देखे जा सकते हैं। जब भी आपको उनका लिंक दिया जाता है तो आप मज़ाक़ उड़ाने लगते हैं।
यह क्या तरीक़ा है ?
क्या लिंक देना ग़लत बात है ?
जिस बात को लिखा जा चुका है तो क्या उसी बात को हर बार नए सिरे से लिखा जाए ?
आपके बाद फिर कोई तीसरा बंदा यही सवाल लाएगा तो उसे इस पोस्ट का लिंक ही दिया जाएगा न कि उसके लिए फिर नए सिरे से लिखा जाएगा।
इस तरह मज़ाक़ वही उड़ाता है जिसके दिल में सच जानने की कोई ख्वाहिश नहीं होती बल्कि बस चलते हुए काम में अड़चन डालकर मज़ा लेने के लिए या खुद को सुपर दिखाने के लिए कुछ ऐतराज़ कर दिए जाते हैं।
आपसे और आप जैसे दूसरे भाईयों से जब भी ‘कुरआन पढ़ो‘ कहते हैं तो भी मज़ाक़ बनाने लगते हैं।
भाई जब आप कुछ सवाल कर रहे हैं तो जवाब में आपको कुछ पढ़ने के लिए ही तो कहा जाएगा।
आप लोगों को लिंक पर भी ऐतराज़ है और आपको ‘कुरआन पढ़ो‘ की सलाह देने पर भी।
फिर बताइये कि आप अपनी आपत्तियों का निराकरण किस प्रकार चाहते हैं ?

अगर आप यह चाहते हैं कि आपके हरेक सवाल का जवाब यहीं लिखकर दिया जाए तो यही सही लेकिन आप सभी जानते हैं कि सवाल एक-दो लाइन का होता है और जवाब में लिखना पड़ता है लंबा चौड़ा।
लिहाज़ा यह नहीं चलेगा कि आप आए और खिल्ली उड़ाई और दस बीस सवाल लिखे और निकल लिए।
हम इस्लाम में आस्था रखते हैं और इस्लाम पर उठने वाले हरेक सवाल का जवाब तर्कपूर्ण रीति से देने के लिए तैयार हैं लेकिन जो लोग यहां ऐतराज़ करने आते हैं वे भी तो बताएं कि वे किस धर्म-मत-संप्रदाय में आस्था रखते हैं।
जब वे हमें ग़लत समझते हैं तो खुद तो वे ज़रूर किसी न किसी सही आचार संहिता पर आस्था रखते होंगे और फिर उसके अनुसार चलते भी होंगे।
चाहे कोई नास्तिक ही क्यों न हो, उसका भी यहां स्वागत है
वह आए और यहां हमसे इस्लाम के बारे में सवाल करे लेकिन तब हम भी उसकी विचारधारा के बारे में उससे सवाल करेंगे।
एक सवाल हमसे कीजिए तो हमारे भी एक सवाल का जवाब दीजिए,
तभी तो पता चलेगा न कि कौन कितने पानी में है ?
वर्ना तो अपनी पहचान छिपाकर सवाल पूछना और फिर खिसक लेना कौन सी बड़ी बात है ?
आइये, जितने चाहे पूछिए हमसे सवाल, हम आपकी वैचारिक आज़ादी और आलोचना के अधिकार का सम्मान करते हैं .
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राज जी के ऐतराज़ यहाँ देखे जा सकते हैं :

नास्तिकता का ढोंग रचाते हैं कुछ बुद्धिजीवी

Friday, September 30, 2011

जो लोग खाना पेट में उतारना जानते हैं उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उसे पेट में उतारने लायक कैसे बनाया जाए ?

खाना बनाना बनाना वाकई एक कला है और जिसे यह नहीं आती वह जिंदगी में परेशान रहता है। जब हमें घर से दूर रहने का इत्तेफाक हुआ तो बहुत तकलीफ हुई। हम वैसे भी पाक-नापाक का खास खयाल लेकर बड़े हुए। बडे से बडा होटल ले लिया लेकिन जब उसमें अंदर जाकर यह जांच की कि बर्तन कैसे धुल रहे हैं और खाना कैसे बन रहा है तो बनाने वाले भी गंदे मिले और एक ही पानी में बर्तन निकाल कर कपडे से साफ करते हुए मिले। सब देखा और वहीं खाना पडा क्योंकि खुद बनाना नहीं जानते थे।
फिर एक दो डिश बनानी सीखी।
हमारा एक दोस्त फ़रहाद दरियापुरी, ऐसी रोटियां बनाता है कि उसकी बहन भी नहीं बना सकती। उनकी वालिदा बीमार पडीं तो घर का सारा काम उन्हें ही करना पडा, सो वे सीख गए।
जो लोग खाना पेट में उतारना जानते हैं उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उसे पेट में उतारने लायक कैसे बनाया जाए ?
आजकल खाने पीने को एक धंधे के तौर पर भी बढिया रेस्पॉन्स मिल रहा है।
हमारे एक जानकार ने कई धंधे किए लेकिन सब फेल और जब उसने रोटी पानी का धंधा किया तो उसके वारे के न्यारे हो गए।

इस विषय पर एक अच्छी पोस्ट यह भी है , देखिये-

नकारात्मक या सकारात्मक क्या ?? अरे खाना बनाना