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Sunday, October 16, 2011

आप अपनी पोस्ट में लिंक क्यों देते हैं ?

कुछ ऐतराज़ ही करना होता है तो कुछ भाई यही ऐतराज़ कर देते हैं कि 
'आप अपनी पोस्ट में लिंक क्यों देते हैं ?' 
भाई पोस्ट किसी ख़ास वजह से दिखाने के लायक़ होती है। इसीलिए उसका लिंक दिया जाता है। यह एक कॉमन सेंस की बात है लेकिन आदमी विरोध और ज़िद में यह बात बिल्कुल ही भूल जाता है।
चर्चा मंच हिंदी ब्लॉग जगत का एक प्रतिष्ठित ब्लॉग है।
विंडो लाइव राइटर का इस्तेमाल करके लिखी जाने वाली पोस्ट्स इसकी सुंदरता में इज़ाफ़ा कर देती हैं और कभी कभी तो इसके चर्चाकार बहुत ज़्यादा ही मेहनत कर गुज़रते हैं और तब वे एक यादगार पोस्ट दे पाते हैं।
मिसाल के तौर पर आप देखिए यह पोस्ट और जानिए हिंदी ब्लॉग जगत के कुछ सुप्रतिष्ठित ब्लॉगर्स की लेखन शैली के बारे में और साथ में आप उनके फ़ोटो और उनका परिचय भी जान सकते हैं-

तटस्थ रहना पाप नहीं - चर्चा-मंच : 667

इसी पोस्ट के बारे में हमने यह पोस्ट तैयार की है

रविकर जी ने कर दिया कमाल GreatJob

Saturday, October 15, 2011

इस्लाम पर सवाल क्यों आते हैं ?

हिंदू भाई ब्लॉग लिखते है और जिस मत में वे आस्था रखते हैं उसके बारे में वे अक्सर लिखते रहते हैं और आप देखेंगे कि उनकी रीति-नीतियों में कोई मुसलमान वहां कमियां निकालता हुआ नहीं मिलेगा।
इसके विपरीत अगर मुसलमान इस्लाम में आस्था रखता है और वह उसके बारे में लिख रहा है तो आप देखेंगे कि कुछ उत्साही युवा जो हिंदू समझे जाते हैं, अक्सर कमियां निकालने आ जाते हैं।
यह क्या है ?
क्या हिंदू युवा ज़्यादा प्रबुद्ध हैं ?
क्या उनके मुक़ाबले मुसलमान सुप्त हैं ?
क्या हिंदू भाई सत्य के लिए ज़्यादा जिज्ञासा रखते हैं ?
क्या मुसलमान सत्य के प्रति लापरवाह हैं ?
या इसके बात इसके विपरीत है ?
क्या मुसलमान निश्चिंत हैं कि कोई अपने मत का कितना ही प्रचार कर ले, वह किसी मुसलमान को आकर्षित करने के लिए काफ़ी नहीं है ?
क्या हिंदू भाईयों को यह चिंता सताती है कि अगर इस्लाम की छवि पर लगातार कीचड़ न उछाला गया तो अपने पुरातन संस्कारों से दूर भागता हुआ हमारा समाज कहीं इस्लाम की ओर ही आकर्षित न हो जाय ?
हो सकता है कि इनमें से कुछ कारण हों या ये सब कारण हों या इनमें से कोई भी कारण न हो बल्कि कारण कुछ और ही हो लेकिन मुस्लिम ब्लॉगर्स जब भी इस्लाम पर कोई पोस्ट लिखते हैं तो दनादन सवालों की बौछार सी हो जाती है और हम यही सोचते रह जाते हैं कि आखि़र ऐसा हो क्यों रहा है ?
देखिये :

Tuesday, October 11, 2011

दीन-धर्म पर संवाद का सही तरीक़ा

राज जी ! आप कहते हैं कि हम किसी से नफ़रत नहीं करते और बातें आप नफ़रत की ही करते हैं।
आप अब तक अपनी टिप्पणियों को देख लीजिए, उनमें जब भी आप इस्लाम, कुरआन और पैग़म्बर साहब का ज़िक्र करते हैं तो कितनी नफ़रत के साथ और कितने तिरस्कार के साथ करते हैं।
इसमें हम आपकी ग़लती ज़्यादा नहीं मानते।
जब आदमी किसी विशेष पारिवारिक पृष्ठभूमि में पला बढ़ा हो या इस्लाम के विरूद्ध नफ़रत रखने वाले चिंतकों के साथ उठता बैठता हो और खुद अपनी अक्ल खोलकर सोचता न हो तो उसकी दशा यही बनेगी।
दूसरी ओर आप हमें देखिए और आप इस पूरे ब्लॉग को पढ़ लीजिए,
आपको कहीं भी हमारी ओर से कोई भी ग़लत ऐतराज़ हिंदू महापुरूषों पर नहीं मिलेंगे, इसे कहते हैं महापुरूषों को आदर सम्मान देना और उनसे प्यार करना।
केवल कह देना ही काफ़ी नहीं होता।
इस्लाम के विरूद्ध प्रचार कोई नई बात नहीं है। इस्लाम के विरूद्ध हरेक भाषा में बहुत सा ऐसा सहित्य आपको मिल जाएगा जो कि इस्लाम की गलत जानकारी देने के लिए ही लिखा गया है। इस्लाम के खिलाफ नफरत भरा साहित्य पढ़कर या ऐसे प्रवचनों से इस्लाम की जानकारी लेना ऐसा ही है जैसे कि कोई विदेशी टूरिस्ट ‘कसाब‘ के मुंह से भारतीय संस्कृति की जानकारी लेना चाहे,
क्या उसे भारतीय संस्कृति की सही जानकारी का स्रोत माना जा सकता है ?

आप पहले इस्लाम के बारे में उसके प्रामाणिक स्रोतों से जानकारी हासिल कीजिए और उसका तरीका यह नहीं है कि कुरआन के विरोध में लिखे गए साहित्य को पढ़ लिया और फिर कहीं से कुरआन का अनुवाद लेकर उसमें उन आयतों को मिला लिया और समझ लिया कि हम समझ गए।
बल्कि इसका तरीका यह है कि आप पहले मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जीवनी पढ़ें ताकि आपकी जानकारी में यह बात आ जाए कि उनके साथ मक्का और मदीना में क्या क्या अत्याचार किए गए ?
क्या आप यह बात जानते हैं कि एक ईश्वर की उपासना और उसी का आदेश मानने का प्रचार करने की जो दूसरी सज़ाएं उन्हें दी गईं उनके साथ साथ पैग़ंबर साहब को लगभग ढाई साल तक ‘इब्ने अबी तालिब‘ की घाटी में क़ैद रखा गया और इस लंबे अर्से में मक्के के किसी भी व्यापारी ने उन्हें अन्न का एक दाना तक नहीं बेचा यानि मुकम्मल बहिष्कार।
इस क़ैद और इस बहिष्कार में मुहम्मद साहब सल्ल. अकेले नहीं थे बल्कि उनके साथ उनका पूरा क़बीला था और उनके साथ ये सारी तकलीफ़ें उन लोगों ने भी उठाईं जो कि पैग़ंबर साहब के धर्म पर आस्था नहीं लाए थे लेकिन फिर भी उन्होंने उनका साथ दिया क्योंकि वे उनसे प्यार करते थे और उन्होंने पैग़ंबर साहब को कभी दुश्मनों के हाथ नहीं सौंपा। उनके क़बीले के दूध पीते बच्चों और औरतों को भी यह दर्दनाक कष्ट झेलना पड़ा।
इस तरह के वाक़यात इस्लाम विरोधी अपने लिट्रेचर में नहीं छापते, इसलिए आपको पता भी नहीं होंगे।
आप इस्लाम को औरत विरोधी बता रहे हैं लेकिन आपको पता नहीं होगा कि पैग़ंबर साहब सल्ल. के उपदेश पर सबसे पहले आस्था व्यक्त करने वाली भी एक औरत ही थी और वह भी एक औरत ही थी जिसे इस्लाम पर ईमान लाने के जुर्म में इस्लाम विरोधियों ने क़त्ल कर दिया।
जब आप पैग़ंबर साहब की जीवनी पढ़ेंगे तभी आपको पता चलेगा कि उन्होंने क्या कहा था और उनके साथ क्या किया गया था ?
इसके बाद आप कुरआन का कोई ऐसा अनुवाद पढ़ें जिसमें थोड़ा विस्तार से आयतों का संदर्भ प्रसंग भी बताया गया हो ताकि आप जान लें कि कौन सी आयतें सामान्य जीवन के लिए हैं और कौन सी आयतें युद्ध काल और आपत्ति काल के लिए हैं।
तब ही आपको यह पता चल पाएगा कि जब ज़ुल्म अपनी सारी हदें पार कर गया तो मुहम्मद साहब सल्ल. मक्का से चले आए और मदीना के लोगों को उपदेश देना शुरू किया तो उनके क़त्ल के इरादे से उनके दुश्मनों मक्का से आकर मदीना पर हमला कर दिया। तब मुसलमानों को अपने पैग़ंबर, अपने दीन और खुद अपनी जान की हिफाजत के लिए हथियार मजबूरन उठाने पड़े और इन युद्धों में जब बहुत से मुसलमान मारे गए और उनकी विधवाएं बेसहारा हो गईं तो यह हुक्म दिया गया कि मुसलमान उन विधवाओं से निकाह कर लें ताकि उन्हें आर्थिक , सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सहारा मिल सके।
विधवाओं का इससे ज़्यादा अच्छा पुनर्वास कुछ और हो सकता हो तो आप भी सोच कर बताएं और यह भी याद रखें कि यह वह दौर था जबकि विधवाओं को अभागिन और मनहूस समझा जाता था और उन्हें सहारा देने के बजाय उन्हें ज़िंदा जला दिया जाता था और ऐसा करने वाले यह कहते थे कि विश्व में हमसे ज़्यादा सभ्य कोई है ही नहीं।
जब आप इस्लाम के मूल स्रोतों को ढंग से पढ़ लेंगे तो आपकी बहुत सी आपत्तियां दूर हो जाएंगी लेकिन कुछ फिर भी बनी रहेंगी और कुछ इस अध्ययन के दौरान पैदा होंगी।
ये आपत्तियां वास्तव में ऐसी होंगी जिन्हें अध्ययन के दौरान पैदा होने वाली आपत्तियां कहा जाएगा और उनका निराकरण भी किया जाएगा।
क्योंकि किसी भी विषय के अध्ययन के दौरान इस तरह की आपत्तियां पैदा होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
हम ऐसी आपत्तियों का स्वागत करते हैं क्योंकि ज्ञान इसी तरह बढ़ता है और ज्ञान इसी तरह फैलता है।
दूसरी बात आपको यह जान लेनी चाहिए कि ये आपत्तियां आप पहली बार नहीं कर रहे हैं और इन सभी का जवाब दिया जा चुका है जिनमें से कुछ के जवाब हिंदी में नेट पर भी देखे जा सकते हैं। जब भी आपको उनका लिंक दिया जाता है तो आप मज़ाक़ उड़ाने लगते हैं।
यह क्या तरीक़ा है ?
क्या लिंक देना ग़लत बात है ?
जिस बात को लिखा जा चुका है तो क्या उसी बात को हर बार नए सिरे से लिखा जाए ?
आपके बाद फिर कोई तीसरा बंदा यही सवाल लाएगा तो उसे इस पोस्ट का लिंक ही दिया जाएगा न कि उसके लिए फिर नए सिरे से लिखा जाएगा।
इस तरह मज़ाक़ वही उड़ाता है जिसके दिल में सच जानने की कोई ख्वाहिश नहीं होती बल्कि बस चलते हुए काम में अड़चन डालकर मज़ा लेने के लिए या खुद को सुपर दिखाने के लिए कुछ ऐतराज़ कर दिए जाते हैं।
आपसे और आप जैसे दूसरे भाईयों से जब भी ‘कुरआन पढ़ो‘ कहते हैं तो भी मज़ाक़ बनाने लगते हैं।
भाई जब आप कुछ सवाल कर रहे हैं तो जवाब में आपको कुछ पढ़ने के लिए ही तो कहा जाएगा।
आप लोगों को लिंक पर भी ऐतराज़ है और आपको ‘कुरआन पढ़ो‘ की सलाह देने पर भी।
फिर बताइये कि आप अपनी आपत्तियों का निराकरण किस प्रकार चाहते हैं ?

अगर आप यह चाहते हैं कि आपके हरेक सवाल का जवाब यहीं लिखकर दिया जाए तो यही सही लेकिन आप सभी जानते हैं कि सवाल एक-दो लाइन का होता है और जवाब में लिखना पड़ता है लंबा चौड़ा।
लिहाज़ा यह नहीं चलेगा कि आप आए और खिल्ली उड़ाई और दस बीस सवाल लिखे और निकल लिए।
हम इस्लाम में आस्था रखते हैं और इस्लाम पर उठने वाले हरेक सवाल का जवाब तर्कपूर्ण रीति से देने के लिए तैयार हैं लेकिन जो लोग यहां ऐतराज़ करने आते हैं वे भी तो बताएं कि वे किस धर्म-मत-संप्रदाय में आस्था रखते हैं।
जब वे हमें ग़लत समझते हैं तो खुद तो वे ज़रूर किसी न किसी सही आचार संहिता पर आस्था रखते होंगे और फिर उसके अनुसार चलते भी होंगे।
चाहे कोई नास्तिक ही क्यों न हो, उसका भी यहां स्वागत है
वह आए और यहां हमसे इस्लाम के बारे में सवाल करे लेकिन तब हम भी उसकी विचारधारा के बारे में उससे सवाल करेंगे।
एक सवाल हमसे कीजिए तो हमारे भी एक सवाल का जवाब दीजिए,
तभी तो पता चलेगा न कि कौन कितने पानी में है ?
वर्ना तो अपनी पहचान छिपाकर सवाल पूछना और फिर खिसक लेना कौन सी बड़ी बात है ?
आइये, जितने चाहे पूछिए हमसे सवाल, हम आपकी वैचारिक आज़ादी और आलोचना के अधिकार का सम्मान करते हैं .
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राज जी के ऐतराज़ यहाँ देखे जा सकते हैं :

नास्तिकता का ढोंग रचाते हैं कुछ बुद्धिजीवी

Friday, September 30, 2011

जो लोग खाना पेट में उतारना जानते हैं उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उसे पेट में उतारने लायक कैसे बनाया जाए ?

खाना बनाना बनाना वाकई एक कला है और जिसे यह नहीं आती वह जिंदगी में परेशान रहता है। जब हमें घर से दूर रहने का इत्तेफाक हुआ तो बहुत तकलीफ हुई। हम वैसे भी पाक-नापाक का खास खयाल लेकर बड़े हुए। बडे से बडा होटल ले लिया लेकिन जब उसमें अंदर जाकर यह जांच की कि बर्तन कैसे धुल रहे हैं और खाना कैसे बन रहा है तो बनाने वाले भी गंदे मिले और एक ही पानी में बर्तन निकाल कर कपडे से साफ करते हुए मिले। सब देखा और वहीं खाना पडा क्योंकि खुद बनाना नहीं जानते थे।
फिर एक दो डिश बनानी सीखी।
हमारा एक दोस्त फ़रहाद दरियापुरी, ऐसी रोटियां बनाता है कि उसकी बहन भी नहीं बना सकती। उनकी वालिदा बीमार पडीं तो घर का सारा काम उन्हें ही करना पडा, सो वे सीख गए।
जो लोग खाना पेट में उतारना जानते हैं उन्हें यह भी जानना चाहिए कि उसे पेट में उतारने लायक कैसे बनाया जाए ?
आजकल खाने पीने को एक धंधे के तौर पर भी बढिया रेस्पॉन्स मिल रहा है।
हमारे एक जानकार ने कई धंधे किए लेकिन सब फेल और जब उसने रोटी पानी का धंधा किया तो उसके वारे के न्यारे हो गए।

इस विषय पर एक अच्छी पोस्ट यह भी है , देखिये-

नकारात्मक या सकारात्मक क्या ?? अरे खाना बनाना

Saturday, September 24, 2011

कहावत क्यों बने उनके बोल ?

'बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद'
'भैंस के आगे बीन बजाना'
ये और ऐसी दूसरी बहुत सी कहावतें हमारी ज़बान में मशहूर हैं। इस तरह की कहावतें हरेक ज बान में मशहूर हैं। अरबी की एक कहावत है कि
'हरेक बर्तन से वही छलकता है जो कि उसमें होता है।'

 ये कहावतें आम तौर पर समाज के किसी अनुभवी आदमी की वाणी से निकली होती हैं और गुजरे जमाने के ये आदमी आम तौर पर अनपढ  होते थे। अनपढ  होने के बाद भी वे ज्ञानी थे। ज़िन्दगी की किताब को उन्होंने बहुत ध्यान से पढ़ा होता था।
अपनी ज़िन्दगी के तजर्बों को ही वे अपनी ज बान में कहते थे तो उनसे प्यार करने वाले उन्हें ज बानी याद कर लेते थे और फिर वे दूसरों को बताते थे। दूसरों को भी सुनकर लगता था कि हां, बात में तो दम है। सैकड़ों और हज़ारों साल बाद आज भी उनकी बात वैसी ही सच निकलती है जैसी कि तब थी जब उन्होंने उसे कहा था।
ऐसे थे हमारे पूर्वज, जिनकी बात में दम था, सच्चाई थी और अच्छाई थी। आज हमें नहीं मालूम कि किस कहावत को किस आदमी ने कहा ?
लेकिन कहावत को सुनते ही हम जान लेते हैं कि इसे कहने वाले ने ज़िंदगी को कितनी गहराई से महसूस किया होगा ?
आज कहावतें कहने वाले हमारे पूर्वज नहीं हैं, उनकी जगह आज हम खड़े हैं।
क्या हमारी ज़बान से भी ऐसी बातें निकलती हैं कि लोग उन्हें सुनें तो उन्हें 'मार्ग' मिले या सुनकर कम से कम कुछ अच्छा ही लगे ?
जो कुछ हम कहते हैं, वह हमारी सोच को ज़ाहिर ही नहीं करता बल्कि कुछ और लोगों को प्रेरणा भी देता है। अच्छा कलाम अच्छी राह दिखाता है और बुरी बात बुरी राह दिखाती है।
अच्छा आदमी, जो अच्छी राह चलता है कभी बुरी बात मुंह से नहीं निकाल सकता। हमारा कलाम यह भी बताता है कि हम किस राह पर चल रहे हैं ?
ब्लॉगिंग में आज़ादी बेहद है।
यहां हरेक आदमी दिल खोलकर लिखता है।
आदमी जो लिखता है, लिखने के बाद उसे खुद भी पढ़ना चाहिए और अपने कलाम के आईने में उसे खुद को देखना चाहिए कि वह अच्छा आदमी है या बुरा आदमी ?
अपने कलाम की रौशनी में उसे यह भी देखना चाहिए कि वह अच्छी राह पर चल रहा या कि बुरी राह पर ?
उसकी बात से लोगों को अच्छी सीख मिल रही है या कि बुरी ?
इससे फ़ायदा यह होगा कि जो आदमी खुद को बुरी राह पर देखे, वह अपनी राह बदलकर सही राह पर आ जाए।
अगर चाहें तो हम ब्लॉगिंग के ज रिये अपने चरित्र का विकास भी सरलता से कर सकते हैं।
दुनिया भर के बारे में रायज नी करना और खुद से गाफ़िल रहना सिर्फ़ यह बताता है कि चाहे हमने बेहतरीन यूनिवर्सिटीज  में पढ़ा है लेकिन 'ज्ञान' हमें वास्तव में मिला ही नहीं है।
ज्ञान हमें मिला होता तो हमने कुछ अच्छा कहा होता और कुछ अच्छा किया होता।
दूसरों का मज़ाक़ और अश्लील फब्तियां कसना ज्ञानी लोगों का काम न तो पहले कभी था और न ही आज है।
हमने लिखना बेशक सीख लिया है लेकिन अपने पूर्वजों की रीत भुला बैठे, जो कि बोलते थे तो कहावत बन जाया करती थी।
And see
 हदीस-शास्त्र !
● वह व्यक्ति (सच्चा, पूरा, पक्का) मोमिन मुस्लिम नहीं है जिसके उत्पात और जिसकी शरारतों से उसका पड़ोसी सुरक्षित न हो।

Thursday, September 22, 2011

मालिनी मुर्मु की ख़ुदकुशी Suicide due to facebook

Girl kills self as boyfriend dumps her on Facebook

आधुनिकता के नाम पर लड़के और लड़कियां बिना विवाह किए ही संबंध बना रहे हैं और जब दिल भर जाता है तो फिर संबंध तोड़ भी रहे हैं।
इन संबंधों से दोनों को कुछ वक्त के लिए सुकून भी मिलता है और ख़ुशी भी लेकिन जब ये रिश्ते टूटते हैं तो तकलीफ़  भी देते हैं और ज़िल्लत का अहसास भी कराते हैं। बहुत लोग ज़िल्लत और शर्मिंदगी का अहसास लेकर जीते रहते हैं और जो जी नहीं पाते वे ख़ुदकुशी करके मर जाते हैं।

मालिनी मुर्मु की ख़ुदकुशी भी इसी सिलसिले की एक और कड़ी है।
रिश्तों में पवित्रता ईश्वर के नाम से आती है।
पत्नी से संबंध केवल पवित्र इसीलिए तो होता है कि पति और पति ईश्वर के नाम से जुड़ते हैं। जहां यह नाम नहीं होता वहां पवित्रता भी नहीं होती। आज जब लोग पवित्र रिश्तों की जिम्मेदारियों तक को लोग अनदेखा कर रहे हैं। ऐसे में मौज-मस्ती और टाइम पास करने के लिए बनाए गए रिश्तों की गरिमा को निभाने लायक  इंसान बचा ही कहां है ?
ऐसे में या तो फिर बेशर्मों की तरह मोटी चमड़ी  बना लो कि जानवरों की तरह जो चाहो करो और कोई कुछ कहे भी तो फ़ील ही मत करो। जब अहसासे शर्मिंदगी ही न बचेगा तो फिर कोई डिप्रेशन भी नहीं होगा।
लेकिन यह कोई हल नहीं है समस्या का।
समस्या का हल यह है कि रिश्तों की अहमियत को समझो और नेकी के दायरे से कदम बाहर मत निकालो। जब आप मर्यादा का पालन करेंगे तो ऐसी कोई नौबत नहीं आएगी कि आप मुंह न दिखा सकें।
मालिक से जुड़ो, नेक बनो, शान से जियो और लोगों को सही राह दिखाओ।

क्या बड़ा ब्लॉगर टंकी पर ज़रूर चढता है ?

Saturday, September 17, 2011

धर्मशास्त्र की ज़रूरत क्या है ?

जायज़ और नाजायज़ को तय वही कर सकता है जिसे सही ग़लत की तमीज का 'शास्त्रीय बोध' प्राप्त है . जिन्हें यह हासिल नहीं है उनका क़ौल भी ग़लत होगा और उनका अमल भी ग़लत होगा .
हर चीज़ के कुछ नियम होते हैं। उन्हें एक जगह लिख लिया जाता है तो वह शास्त्र बन जाता है। शास्त्र जब तक शुद्ध रहता है, मार्ग दिखाता है। जब आदमी को ज्ञान, गुण और सत्य के बजाय दुनिया के स्वार्थ ज़्यादा प्रिय हो जाते हैं तो फिर वे लोग शास्त्र में ऐसी बातें भी जोड़ देते हैं जो कि सही नहीं होतीं। विकार आ जाने के बाद जो लोग शास्त्र से प्रेम करते हैं, वे भी शास्त्र पर चल नहीं पाते और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि शास्त्रों में ग़लत बात देखकर कह देते हैं कि यह सदा से ही ग़लत है।
भारत शास्त्रों का देश है।
यहां गाने-बजाने का काम भी शास्त्रानुसार किया जाता है। नाचना सिखाना के लिए भी शास्त्र मौजूद है। शास्त्रीय नृत्य को उम्दा नाच माना जाता है। जब भी विश्व पटल पर भारतीय नृत्य की बात की जाती है तो कत्थक और कुचिपुड़ी आदि शास्त्रीय नृत्य को ही पेश किया जाता है। जो शास्त्रीय नृत्य जानते हैं, उन्हें अपनी कला में पारंगत माना जाता है और उन्हें अच्छा सम्मान दिया जाता है।
ये लोग कम होते हैं।
ऐसा नहीं है कि बस जो शास्त्र नहीं जानते, वे नहीं नाचते। नाचते वे भी हैं लेकिन उन्हें शास्त्रीय नर्तकों जैसा सम्मान नहीं दिया जाता।
शास्त्रीय नृत्य करने वाले तो बहुत कम हैं वर्ना तो बाक़ी सारा भारत भी होली, दीवाली और शादी-ब्याह के मौक़ों पर नाचता है। मन की उमंग तो दोनों में ही बराबर है बल्कि हो सकता है कि शास्त्र रहित नृत्य करने वालों में मन की उमंग कुछ ज़्यादा ही पाई जाती हो लेकिन तब भी उनके हाथ पैर फेंकने या झटकने को विश्व स्तर पर ‘भारतीय नृत्य‘ कहकर पेश नहीं किया जाता और न ही इन नर्तकों को कहीं सम्मानित किया जाता है।
भारत में कुछ लोकनृत्य भी प्रचलित हैं। हालांकि उनके नियमों को लिखा नहीं गया है लेकिन वे भी नियमबद्ध ही होते हैं।
जो देश ऐसा हो कि नाचने की कला में भी सही-ग़लत बता सकता हो, क्या वह ऐसा हो सकता है कि वह जीने की कला में सही ग़लत न बता पाए ?
यह असंभव है।
सही ग़लत बताने वाले शास्त्र भी यहां वुजूद में आए और दूसरे देशों में बाद में आए, यहां पहले आए लेकिन इसके बावजूद आज हालत यह है कि भारतवासी नहीं जानते कि किस मक़सद के लिए और किस तरीक़े से जीना सही जीना कहलाएगा ?
आज आपको ऐसे बहुत लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे कि आदमी को इंसान बनना चाहिए और अच्छे काम करने चाहिएं लेकिन जब आप उनसे पूछेंगे कि इंसान बनने के लिए कौन कौन से अच्छे काम करने ज़रूरी हैं ?
तो वह बता नहीं पाएगा।
यही हाल खान-पान और यौन संबंध और अंतिम संस्कार का है।
इनमें से किसी भी बात पर आज भारतीय समाज एक मत नहीं है।
शास्त्रों के देश में यह क्या हो रहा है ?
आज अक्सर आदमी स्वेच्छाचारी क्यों हो गए हैं ?
इस स्वेच्छाचार को कैसे रोका जाए ?
जब तक स्वेच्छाचार को नहीं रोका जाएगा, तब तक भ्रष्टाचार भी नहीं रूकेगा।
भ्रष्टाचार मात्र राजनैतिक और प्रशासनिक समस्या नहीं है बल्कि यह सही ग़लत के ज्ञान की कमी से उपजी एक समस्या है, जिसकी चपेट में आज हम सब हैं, कोई कम है और कोई ज़्यादा।
जब तक हम सदाचार का शास्त्रीय और प्रामाणिक ज्ञान लोगों को उपलब्ध नहीं कराएंगे तब तक लोगों के जीवन में सदाचार आ नहीं सकता।
...और अब तो हालत यह हो गई है कि लोगों को हमारी बात पर ताज्जुब हो सकता है कि क्या सही ग़लत के बारे में भी कोई शास्त्र हो सकता है ?
जबकि हक़ीक़त यह है कि शास्त्र का प्राथमिक और अनिवार्य विषय ही जीवन में सही ग़लत का निर्धारण करना होता है, जीवन के हरेक पहलू में और जीवन के हरेक स्तर पर और यही बात शास्त्र की पहचान भी होती है।
जो ग्रंथ व्यक्ति को आध्यात्मिक रहस्य तो बताए लेकिन यह न बताए कि उस पर उसके परिवार, पड़ोस, देश और विश्व का क्या हक़ है ? वह शास्त्र नहीं होता।
जो ग्रंथ व्यक्ति को उसके व्यक्तिगत जीवन में निर्देश तो दे लेकिन सामूहिक जीवन का मार्ग न बताए, वह शास्त्र नहीं होता।
लोग किसी भी पुस्तक को शास्त्र कहने लगें तो वह शास्त्र नहीं हो जाता।
लोग किसी भी रिवाज को धर्म कहने लगें तो वह धर्म नहीं हो जाता।
शास्त्र और धर्म वही है जो सारी मानव जाति को जीना सिखाए और उसे पेश आने वाले हरेक मसअले का हल बताए।
ऐसे धर्मशास्त्र की ज़रूरत इंसान को सदा ही रही है और आज तो पहले से कहीं बढ़कर है।
जिस चीज़ की आवश्यकता होती है, उस चीज़ की आपूर्ति भी स्वयमेव हो जाया करती है। यह एक प्राकृतिक नियम है।
यह नियम भी शास्त्र में ही लिखा है।
यही नियम आशा जगाता है कि आज हालात चाहे जैसे हों लेकिन हमारा भविष्य बेहतर होगा।
ऐसा भविष्य जहां स्वेच्छाचार के बजाय हमारा अमल शास्त्रानुसार होगा।
...................
कन्या भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है और आज यह समाज का रिवाज है।
ऐसा समाज जो ख़ुद को सभ्य कहता है।
अगर सभ्यता यही है तो फिर दरिंदगी और हैवानियत क्या है ?
देखिए यह वीडियो, जो आपके रोंगटे खड़े कर देगा।

एक आवाज़ कन्या भ्रूण रक्षा के लिए Against Female Feticide

Thursday, September 1, 2011

अखंड भारत को तोड़ने वाले मुजरिम कौन ?

ब्लॉगिंग के माध्यम से हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि दिलों को जोड़ने की कोशिश की जानी चाहिए। दिल जुड़ेंगे तो हम जुड़ेंगे और भारत सशक्त होगा। मज़बूत भारत एशिया को नेतृत्व देगा तो इसका रूतबा विश्व में ऊंचा होगा और त यह अपने आस पास के इलाक़ों को एक महासंघ का रूप देकर अपने खोये हुए टुकड़ों को वापस पा सकता है और यह काम आपसी विश्वास और आपसी प्रेम से ही होगा क्योंकि एशिया में मुलमानों बड़ी आबादी है, सो न तो आप इन्हें नज़र अंदाज़ कर सकते हैं और न ही नज़रअंदाज़ करके कभी सफल हो सकते हैं।
इसके बावजूद कुछ शरारती तत्व ऐसे भी हैं जो कि न सिर्फ़ मुसलमानों को नज़रअंदाज़ करते हैं बल्कि वे मुसलमानों को देश बांटने का दोषी बताकर ग़ददार भी कह देते हैं और क़ुरआन पर भी ऐतराज़ कर देते हैं।
क्या यह कोई सही तरीक़ा है ?
क्या हम आपके धर्म में कोई कमी बता रहे हैं ?
नहीं !
इसके बावजूद भी हमारे साथ छेड़ख़ानी क्यों की जा रही है ?
जो हमारे जलाल को नहीं जानता वह ब्लॉगर डॉट के किसी भी वरिष्ठ ब्लॉगर से हमारे बारे में पता कर ले कि हम कौन हैं और हमारे सामने आपके ऐतराज़ यूं ही आते रहे तो फिर हम क्या करेंगे ?
हमें कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है।
पचास से ज़्यादा ब्लॉग्स और वेबसाइट्स पर सैकड़ों लेख हमारे अपने लिखे हुए तैयार पड़े हैं, उन्हें यहां डालना शुरू कर देंगे।
फिर सबके हाथों से तोते उड़ जाएंगे।
अब से दो पोस्ट पहले एक भाई ने इसी तरह देश के बंटवारे आदि को लेकर हम पर ऐतराज़ जड़ दिया।
हमने उन्हें जवाब जवाब देते हुए कहा कि
आपने सुना होगा कि कभी मलेशिया और अफ़ग़ानिस्तान भी अखंड भारत का ही हिस्सा थे लेकिन जब मुसलमान भारत आए भी नहीं थे। उससे पहले ही हिंदुओं ने अखंड भारत के हज़ारों छोटे छोटे टुकड़े कर दिए थे।
क्या आपने कभी उन हज़ारों राजाओं और उनके लाखों हिंदू सैनिकों को ग़ददार कहा है ?
नफ़रत की बोली बोलने से आप केवल नफ़रत फैला सकते हैं लेकिन किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
जो आदमी ख़ुद ग़ददार हो उसे क्या हक़ है कि वह दूसरों को वही काम करने पर ग़ददार कहे जो कि अपने प्यारे पूर्वज करते आए हैं।

नफ़्स से जिहाद करना सबसे ज़्यादा मुश्किल है

हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का रूतबा हक़ और बातिल को पहचानने में बहुत बुलंद है। मुसलमानों में हरेक फ़िरक़ा उनके बारे में यही राय रखता है। जो आदमी उनके कलाम पर अमल करेगा कभी गुमराह नहीं हो सकता लेकिन आदमी अपने नफ़्स की ख्वाहिश की पैरवी करता है और हक़ को छोड़ देता है या दीन में से भी वह उतनी ही बात मानता है जो उसके नफ़्स को ख़ुशगवार लगती है। नागवार और भारी लगने वाली बातों को आदमी छोड़ देता है।
नमाज़ का हुक्म सबसे अव्वल है इस्लाम में और लोगों के हक़ अदा करने पर भी बहुत ज़ोर है लेकिन मुसलमानों की एक बड़ी तादाद इन दोनों ही हुक्मों की तरफ़ से आम ग़फ़लत की  शिकार है।
यह बहुत अजीब सी बात है।
इसके बाद भी उनका दावा है कि हम मुसलमान हैं।
हम अली को मौला मानते हैं।
अली को मौला मानते हो तो फिर उनकी बात को मानने में सुस्ती क्यों ?
दीन में सुस्ती तो मुनाफ़िक़ों का तरीक़ा है।
हक़ को पाने में सबसे बड़ी रूकावट ख़ुद इंसान का नफ़्स है और इससे जिहाद करके इसकी हैवानी ख़सलतों पर क़ाबू पाना सबसे ज़्यादा मुश्किल काम है। इसीलिए इसे हदीस में जिहादे अकबर कहा गया है।
इस्लाम के दूसरे दुश्मनों का हाल तो यह है कि अगर उन्हें न भी मारा जाये वे तब भी मर जाएंगे या वे तौबा भी कर सकते हैं  लेकिन यह नफ़्स तो बिना क़ाबू किए क़ाबू हो नहीं सकता और इसे क़ाबू करना इंसान के लिए सबसे नागवार काम है।
ऐसे में मुसलमान राहे रास्त पर आएं तो कैसे ?
पहले क्या हुआ यह जानना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम यह तय कर सकें कि अब हमें क्या करना है ?

आपकी पोस्ट अच्छी मालूमात देती है।
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यह कमेन्ट इस पोस्ट पर है -

Monday, August 29, 2011

कामकाजी औरतों का क्लासिफ़िकेशन The classification of working women

आम तौर पर कामाकाजी औरत उस औरत को माना जाता है जो कि मर्दों की तरह घर से बाहर जाकर कुछ काम करती है और कुछ रक़म कमाकर लाती है। जबकि देखा जाय तो घर के काम काज भी काम काज की ही श्रेणी में ही आते हैं। घर के कामों को भी काम काज की श्रेणी में रखा जाए तो कामकाजी औरतों का क्लासिफ़िकेशन यह है -
घरकाजी और बाहरकाजी
दोनों की समस्याएं हैं।
इन दोनों की ही समस्याओं पर विचार विमर्श करना ज़रूरी है।
जो औरतें अपने बाल बच्चों को छोड़ कर बाहर जाकर कमा रही हैं तो वे ऐसा मजबूरी में ही कर रही होंगी। बहरहाल औरत जिस हाल में , जिस मक़ाम पर अपनी योग्यताओं से काम लेकर देश का भला कर रही है, तारीफ़ के लायक़ है।
उन्हें सुरक्षा और सद्प्रेरणा देना हमारी ज़िम्मेदारी है।
जिस समाज की बेहतरी मंज़ूर हो तो उस समाज की औरतों को बेहतर बना दीजिए, ऐसा कहना है डा. अनवर जमाल का।

जो असहमत हो, वह आकर बहस कर ले, वर्ना सब के सब सहमत समझे जाएंगे।
................
यह एक हल्की फुल्की पोस्ट है, जिसे बस यूं ही लिख दिया लेकिन जो भी लिखा है, वह एक हक़ीक़त के तौर पर ही लिखा है।

Wednesday, May 11, 2011

ब्लॉगवुड की तमाम परेशान आत्माओं के नाम एक हर्ष संदेश Advice

मुहब्बत के भाव से भरपूर अनवर जमाल , लखनऊ में 
हमारे ‘षटमित्रों‘ ने हमें क्रोध पर क़ाबू पाने की प्रेरणा समय समय पर दी है और हम भी समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। सो अब वह समय आ गया है। हमारे वे मेहरबान ‘षटमित्र‘ कौन हैं ?
यह भी एक पोस्ट का विषय है लेकिन इनमें हमारे महामित्र अलबेला खत्री जी का नाम ज़रूर शामिल। वही पहले आदमी हैं जिन्होंने हमारे नाम को ईनाम के लिए प्रस्तावित किया और फिर उनका वचन पूरा होते हुए भी हिंदी ब्लॉग जगत ने देख ही लिया।
इस मौक़े पर हमने भाई ख़ुशदीप जी की एक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए एक अहम घोषणा की है :
'आज यह सुनिश्चित हो गया कि आप एक बड़े ब्लॉगर हैं क्योंकि ब्लॉग जगत में यह सिद्धांत प्रचलित है कि ‘टेढ़ा है पर मेरा है की भावना से ओत-प्रोत होते हैं बड़े ब्लॉगर्स‘।
आपकी यह पोस्ट उसी सिद्धांत की पुष्टि करती है।
अभी अभी लखनऊ से लौटा हूं और सबसे पहले तो बधाई देने वालों को शुक्रिया अदा किया। बड़ी मुश्किल से तो दो-चार बंदे शुक्रिया कहने आए और अगर कहीं उन्हें भी थैंक्स न कहा तो अगली बार वे भी रूख़ न करेंगे। इसी क्रम में मक्खनबाज़ी हेतु आपके ब्लॉग पर भी एक टिप्पणी चिपकाने के लिए आ गया।
समय देखकर इस टिप्पणी का उधार आप अवश्य ही चुकता करेंगे। ऐसी सद्-आशा के साथ आपका भाई , अनवर जमाल !
... और हां,
ब्लॉग जगत की तमाम परेशान आत्माओं के नाम एक हर्ष संदेश
आय एम कूल एंड सैटिस्फ़ाई नाओ. 
अब आप मुझे जैसे ढालना चाहें, ढाल लें,
सलाह और सुझाव आमंत्रित हैं,
अवधि मात्र 3 दिवस है।
ऐसा क्यों कह रहा हूं, यह भी एक पूरी पोस्ट का विषय है जो कि मैं बनाऊंगा नहीं। बस, सलाह दीजिए और पालन कराइये।
जय हिंद !'

इसे आप निम्न लिंक पर भी देख सकते हैं :
http://slogover.hamarivani.com/2011/05/blog-post.html?showComment=1304947313542#c4024455052601591001

Tuesday, May 10, 2011

आखि़र ‘समझदार लोग‘ भ्रष्टाचार क्यों न करें, जबकि सदाचार का बदला असीमा के पापा को कुछ भी न मिला हो, सिवाय बर्बादी और गुमनामी के ? Solution


असीमा बहन अपने पापा सुरेश भट्ट के साथ 

प्रिय प्रवीण जी भी विचलित हैं और भाई ख़ुशदीप जी भी। प्रिय प्रवीण जी जब भी देश में फैला भ्रष्टाचार देखते हैं वह विचलित हो जाते हैं। एक फ़ौजी अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार से कभी समझौता नहीं कर सकता। उनके दिमाग़ की फॉरमेटिंग ही ऐसे की जाती है। लेकिन यह भी सोचने वाली बात है कि लोग ईमानदार बनना क्यों नहीं चाहते ?

बात दरअस्ल यह है कि यहां ईमानदार को सिवाय बर्बादी और मुसीबतों के कुछ हाथ नहीं आता, यहां तक कि अगर वह करोड़पति होता है तो एक समय ऐसा आ जाता है कि वह अपने बच्चों तक को सहारा देने के लायक़ नहीं बचता और उसके संगी-साथी अपना मतलब निकलते ही फूट लेते हैं और जनता उन्हें भुला देती है।
असीमा के पिता जी के साथ यही किया गया। उनकी दर्दनाक दास्तान ने ही भाई खुशदीप जी को विचलित कर दिया है।
ख़ुशदीप जी के कहने पर हम वहां गए और हमने कहा कि

असीमा, मेरी बहन ! यह दुनिया ख़ुदग़र्ज़ और अहसान फ़रामोश है। इसके पूंजीपति भी ऐसे ही हैं और इसके ग़रीब भी ऐसे ही हैं। आपके पिता ने अपनी नैतिक चेतना के प्रभाव में आकर जो कुछ किया, वह अपनी जगह दुरूस्त है। किसी के मानने या उसे नकारने से उसके सही होने में कोई अंतर नहीं आएगा और न ही आपके पिता की महानता में कोई कमी-बेशी होगी। जो भी नेकी और सच्चाई की राह पर चला है, आर्थिक रूप से वह अपने साथियों से पिछड़ता ही गया और अंत में उसे वह जनता भी भुला देती है, जिसके लिए वह लड़ता है।
जलियां वाला बाग़ में गोलियां खाने वालों को इस देश के नेता और जनता भुला चुके हैं, आपके पिता के साथ भी यही किया जा रहा है और देशसेवा करने वालों के साथ हमेशा यही किया जाएगा। यह एक सच है।
आपके मन की पीड़ा को मैं समझ सकता हूं। जो लोग कंधों पर उठाए जाने के लायक़ हों, उन्हें यूं नज़रअंदाज़ करने का मतलब है कि आगे से कोई भी ऐसा बलिदान नहीं करेगा और अगर करेगा तो उसका अंजाम भी यही होगा। जितने पढ़े-लिखे लोग हैं, वे इस सच्चाई से वाक़िफ़ हैं, इसीलिए वे 90 प्रतिशत भ्रष्ट हो चुके हैं। नेकी का बदला दुनिया कभी किसी को दे ही नहीं पाई, बदला तो सिर्फ़ वह मालिक ही देता है जिसने बंदे को पैदा किया और उसे नेकी की प्रेरणा दी है। दुनिया की सामूहिक नैतिक चेतना मृत प्रायः है, केवल शरीर ज़िंदा हैं। सारी ज़मीन एक प्रेतलोक बन चुकी है। इन प्रेतों के पास शरीर भी है। लगभग सभी भटक रहे हैं। सत्य और न्याय से तो बहुत कम मतलब रह गया है। हरेक आदमी ऐश करना चाहता है और समृद्ध होना चाहता है।
जो भी नेकी सच्चे मालिक को भुलाकर की जाती है, वह हसरत और अफ़सोस के सिवा कुछ और नहीं दे पाती।
आपके आदरणीय पिता जी के द्वारा जो भी सत्य आप पर प्रकट हुआ है, उसे आप एक और महानतर सत्य को पाने का माध्यम बना लेंगी तो आपके मन की दुनिया में शिकायत और मायूसी के अंधेरों के बीच एक नई आशा का सूरज उगेगा। मुझे यह उजाला हासिल है, आपको भी मैं यही भेंट करता हूं।
आपके लिए और आपके आदरणीय पिता जी के लिए मैं पालनहार से विशेष प्रार्थना करूंगा।
धन्यवाद !

1. देखिए वह पोस्ट जो आपको बताएगी प्रिय प्रवीण जी की चिंता का कारण

“We are told that 80 per cent or 90 per cent of the judges are corrupt,”- Justice Katju

2. देखिए वह पोस्ट जिसमें आपको नज़र आएगा भाई ख़ुशदीप जी के अफ़सोस का कारण

अब दुनिया के सामने एक सवाल हैं मेरे पापा-सुरेश भट्ट

और सबके बाद आप देखिए यह लिंक जिसमें आपको नज़र आएगा समस्या का निवारण

सारी ज़मीन एक प्रेतलोक बन चुकी है Ghostland


सब पढ़िए और सोचिये वह उपाय जो हमें बेईमानी से मुक्ति दिलाये और देशसेवा करना भी सिखाये और देश सेवा करने वालों का सम्मान करना भी सिखाए.

परहेज़ का खाना खाने वालों के लिए सफ़र में बड़ी दिक्क़त हो जाती है Tunde Kababi


सलीम ख़ान साहब हमें दोपहर के खाने के लिए ‘टुंडे कबाबी‘ रेस्टोरेन्ट पर ले गए। यह वाक़या 8 मई 2011 का है। हम दोनों बाइक पर थे। उनके एक और मेहमान जनाब इफ़्तिख़ार साहब भी अपनी बाइक पर हमारे साथ थे। हम कुल पांच आदमी थे। रेस्टोरेन्ट अपने पूरे शबाब पर था। उसकी दोनों मंज़िलें खचाखच भरी हुई थीं। कोई सीट ख़ाली नहीं थी। कुछ देर के बाद बेसमेंट में सीटें नसीब हुईं तो हमें अपने खाने के लायक़ कुछ भी नज़र न आया।
हमें सलीम साहब से कहा कि हमें ऐसी जगह ले जाइयेगा, जहां रोटी के साथ दाल रायता मिलता हो, हम क़ोरमे और कबाब के मतलब के आदमी नहीं है भाई।
वहां जाकर हमें पूरे मेन्यु कोई भी चीज़ ऐसी नहीं मिली, जिसे मैं खा सकता। अब हालत यह हो गई कि एक अपने लिए वहां से उठना भी हमें अच्छा नहीं लगा। हमने दही मंगाई तो वहां दही तक भी न थी। कुछ पानी मिली सी चीज़ को उन्होंने रायता बताया, उसी से हमने खाकर प्रभु का गुण गाया।
Tundey Kababi , Lucknow
Anwer Jamal with Saleem Khan

Tuesday, May 3, 2011

ओसामा कैसे मरा ?, एक कल्पना The Imagination


प्रिय प्रवीण जी ! सच क्या है ?
इस बारे में मीडिया तो हमारी कोई मदद करेगा नहीं क्योंकि वह झूठ बोलने वालों के हाथों में जो है। हमने उर्दू में एक लंबा धारावाहिक नॉवेल अब से 24 साल पहले पढ़ा था, उसका नाम था ‘देवता‘ और उसे लिखा था ‘मुहयुद्दीन नवाब‘ ने। यह लेखक भी पाकिस्तान के ही हैं। एक नॉवेल में 250 से लेकर 350 पृष्ठ होते थे और उसकी हमने 21 क़िस्तें तो पढ़ी हैं। उसमें इंटरनेशनल पॉलिटिक्स को अच्छी तरह समझाया गया है। उसके आधार पर अगर हम ‘ओसामा एनकाउंटर‘ को एक्सप्लेन करने की कोशिश करें तो वह कुछ यूं होगा कि
‘अमेरिका ने ओसामा को अफ़ग़ानिस्तान से बिल्कुल शुरूआती दौर में ही पकड़ लिया था। उसके गुर्दे फ़ेल थे। अपने बेटे की तरह वह भी समझ चुका था कि हथियार किसी समस्या का हल नहीं है। उसकी हथियार क्रांति का लाभ भी अमेरिका और यूरोप की हथियार बेचने वाली कंपनियों को ही मिल रहा था, मुस्लिम मुल्कों को नहीं। अमेरिका नहीं चाहता था कि ओसामा के आतंक को तिल से ताड़ बनाने में जो मेहनत उसने की है, उस पर ओसामा बिल्कुल पानी ही फेर दे और फ़िल्म ‘दादा‘ का सा कोई सीन क्रिएट हो। उसने ओसामा के लिए एक रिहाइश बनवाई और उसकी दीवारें इतनी ऊंची बनवा दीं कि कोई अंदर से बाहर जा न सके। यह कोठी ही उसके लिए जेल थी। उसके बीवी बच्चे उसके साथ थे और उन सब पर कमांडो तैनात थे। इसी कमरे में ओसामा के वीडियो अमेरिका शूट करता था और वही इन्हें सारी दुनिया में फैलाता था। इस तरह अमेरिका ही अलक़ायदा के नाम से दुनिया में आतंक फैला रहा था और ओसामा अपनी बीवी और बेटियों की इज़्ज़त की ख़ातिर अमेरिका की वीडियो फ़िल्मों में ‘एक्टिंग‘ कर रहा था। यहां तक कि डॉक्टरों ने बता दिया कि अब ओसामा केवल कुछ घंटों का ही मेहमान है।
आनन फ़ानन अमेरिकी सद्र को इत्तिला दी गई और उन्होंने ओसामा की मौत के परवाने पर हस्ताक्षर कर दिए। वहां से ओसामा पर तैनात कमांडोज़ को हुक्म दिया गया कि ‘किल हिम‘।
कमांडोज़ ने मृत्यु शय्या पर लेटे ओसामा के सिर में गोली मार दी और फिर बाद में आने वाले विशेषज्ञों ने उसका मेकअप करके मुठभेड़ में मरा हुआ सा रूप भी बना दिया। उसके फ़ोटो खींचे गए जैसे कि चांद पर जाने की झूठी फ़ोटोग्राफ़ी की गई थी। मुठभेड़ फ़र्ज़ी न लगे, इसके लिए दो-तीन और लोग भी मार दिए गए। जिस हैलीकॉप्टर में यह सब सामान ले जाया गया था, उसे सुबूत नष्ट करने के उद्देश्य से नष्ट कर दिया गया ताकि बाद में भी कोई खोजी सच का पता न लगा सके। तकनीकी ख़राबी आने के कारण क़ीमती हैलीकॉप्टर नष्ट करने का रिवाज कहीं भी नहीं है, हर जगह उसकी मरम्मत ही कराई जाती है।
ओसामा ज़िंदा भी अमेरिका के काम आया और उसकी मौत को भी अमेरिका ने भुना लिया है। यह है ‘अमेरिका का इंसाफ़‘, जिसे हरेक बुद्धिजीवी देख भी रहा है और समझ भी रहा है। जो भी एशिया के किसी भी क्षेत्र की मुक्ति के लिए पश्चिमी शक्तियों से लड़ा, उसके साथ उन्होंने यही किया है। ओसामा के मामले में दुनिया खुशनसीब है कि उसे पता चल गया कि वह अब नहीं रहा लेकिन सुभाषचंद्र बोस के बारे में हम इतना भी नहीं जान पाए। पाकिस्तानी हुक्मरां शुरू से ही उसके साथ हैं, जैसे कि हमारे हुक्मरां भी आजकल उसके ही साथ हैं। जो उसके साथ नहीं है, उस पर वह बम बरसा ही रहा है। बड़ा मुश्किल ज़माना है कि लोगों ने समझदारी यह समझ रखी है कि अपने होंठ सी लिए जाएं।
इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के बारे में हम यही कह सकते हैं कि ‘जो दिखता है वह हमेशा सच नहीं होता।‘

देखिये प्रवीन जी की  पोस्ट

पॉलिटिक्स को समझने के लिए Confuse होना बहुत ज़रूरी है - Alok Puranik


(व्यंग्य) 
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लादेन से जुड़े तमाम प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं :
सवाल- लादेन को क्यों मारा गया ? लादेन तो पाकिस्तान का दोस्त था। अमेरिका भी पाकिस्तान का दोस्त है। फिर दोस्त के दोस्त को क्यों मारा ?
जवाब- पाकिस्तान लादेन का दोस्त था। पर इसका मतलब यह नहीं कि पाकिस्तान अमेरिका का भी दोस्त है। मतलब वैसे तो पाकिस्तान अमेरिका का दोस्त है, पर वैसे नहीं भी है। लादेन पाकिस्तान का दोस्त था, पर वैसे नहीं भी था।
सवाल- थोड़ा-सा और क्लियर कीजिए, अब कौन किसके साथ है ? आईएसआई सीआईए के साथ है, या वह लादेन के साथ थी? पाकिस्तान की आर्मी अमेरिकन आर्मी के साथ है, या वह लादेन के साथ थी? जरदारी लादेन के साथ थे, या वह अमेरिका के साथ थे ?
जवाब- जरदारी कहां किसके साथ हैं, यह बात तो खुद जरदारी को नहीं पता। अलबत्ता आईएसआई यूं तो अमेरिका के साथ है, पर वैसे तालिबान के साथ भी है, जो लादेन के साथ थे। लादेन यूं आईएसआई के साथ था, पर वह सीआईए के साथ नहीं था। सीआईए यूं पाकिस्तान के साथ थी, पर यूं नहीं भी थी..।
सवाल- साफ-साफ बताइए। कनफ्यूज न कीजिए। 
जवाब- देखिए, अमेरिकन पॉलिसी को आप बिना कनफ्यूज हुए समझ नहीं सकते। पाकिस्तान की पूरी पॉलिटिक्स को समझने के लिए भी कनफ्यूज होना बहुत  ज़रूरी है।
सवाल- लादेन को अब क्यों मारा गया ?
जवाब- बिल्कुल सही सवाल। अब तो लादेन वीडियो फिल्मों के प्रोड्यूसर हो गए थे। हर महीने दो महीने पर एक नया वीडियो जारी कर देते थे। अब तक तो उनका इस क्षेत्र में प्रमोशन हो जाना चाहिए था।
सवाल- तीन पत्नियों के साथ आराम से रह रहे थे लादेन, यह खबर गलत नहीं लगती क्या ?
जवाब- इस पूरे मसले पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि लादेन तीन पत्नियों के साथ भी आराम से कैसे रह रहे थे। इंडिया में एक ही पत्नी के साथ रहना मुश्किल है। लादेन को मरने से पहले इसका खुलासा करना चाहिए था। क्या पता, खुलासा किया भी हो, बाद में सामने आए। 

Sunday, May 1, 2011

खुशदीप जी जल्दी ही लौट आयेंगे , एक Brake के बाद


हालांकि ख़बर तो कुछ यूं बननी चाहिए थी कि खुशदीप जी ने छोड़ दी है हिंदी ब्लॉगिंग। लेकिन यह एक झूठी बात होती। आदमी आवेश में आकर ग़लत फ़ैसले ले ही लेता है और फिर जब उसे अहसास होता है कि वह गुस्से में आकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार बैठा है तो वह अपने फ़ैसले से पलट जाता है और कहता है कि उसने अमुक आदमी के समझाने पर या अमुक कारण से अपना विचार बदल दिया है। तब भी वह स्वीकार नहीं करता कि उसका फ़ैसला ग़लत था। जल्दी ही आप खुशदीप जी के बारे में भी ऐसा ही होता देखेंगे।
इस विषय में ज़्यादा जानकारी के लिए आप देख सकते हैं:

Tuesday, April 26, 2011

एक खुला न्यौता सबके लिए Invitation

आप सादर  आमंत्रित हैं मेरे दो ब्लॉग का सदस्य बनने के लिए 
किसी भी विचारधारा का ब्लॉगर इसका सदस्य बन सकता है .


Sunday, April 24, 2011

हादसे आपकी पोस्ट को यादगार बना देते हैं But Thanks To Blogprahari


कल देर रात एक पोस्ट पब्लिश की तो सौभाग्य से वह ‘हमारी वाणी‘ पर भाई खुशदीप जी के एकदम ऊपर नज़र आई। यह एक यादगार नज़ारा था। सुबह उठकर हमने फिर इस नज़ारे पर नज़र डालनी चाही तो वह मंज़र दोबारा फिर नज़र नहीं आया। जाने किसकी नज़र उसे लग गई ?
इस तरह यह एक यादगार पोस्ट बन गई। ब्लॉगप्रहरी इस यादगार मंज़र को अभी तक संजोए हुए है।
और शायद यह पोस्ट भी यादगार बन जाए क्योंकि इस ब्लॉग पर मैंने इतनी मुख्तसर पोस्ट आज तक नहीं लिखी।
यह रहा यादगार पोस्ट का लिंक
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/04/blog-fixing.html
और क्यों ऐसा हुआ इस विषय पर एक खोजपूर्ण रिपोर्ट जल्द ही आप पढ़ेंगे ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ पर .




किसने हिंदी ब्लॉग जगत को पहली बार बताया कि ‘छिपकलियां छिनाल नहीं होतीं‘ ? Blog Fixing


आप देख ही रहे हैं कि कैसे बिना तहलका डॉट कॉम की मदद के ही जे. जे. जासूस के स्टाइल में 'ब्लॉग फिक्सिंग और ईनाम घोटाले' के मुल्ज़िमान को बेनक़ाब किया जा रहा है निहायत सलीक़े से, बड़े खूबसूरत तरीक़े और पूछा जा रहा है कि जो आदमी औरत के नंगे फ़ोटो लगाकर मनोरंजन करने-कराने का इतिहास रखता हो, क्या वह सम्मान पाने का पात्र हो सकता है ?
क्या ऐसा ब्लॉगर किसी को सम्मानित करने का कोई हक़ वास्तव में रखता है ?
कौन है वह आदमी जिसने हिंदी ब्लॉग जगत को पहली बार बताया कि ‘छिपकलियां छिनाल नहीं होतीं‘ ?
ऐसी बहुत सी जानकारियां आपको मिलेंगी निम्न लिंक पर 
और आपके मनोरंजन के लिए 

Thursday, April 21, 2011

21 वीं सदी के अंत तक यूरोप का इस्लामीकरण : एक संभावना - Harikrishan Nigam


पश्चिम में यदि द्रुतगति से फैलने वाली आज की यदि कोई आस्था है तो वह है इस्लाम और इसीलिए उन्होंने इस चौंकाने वाली संभावना को रेखांकित किया है कि इस सदी के अंत तक यूरोप इस्लामी रंग को अपना सकता है, चाहे संगठित चर्च संप्रदायों के साथ-साथ उग्रवाद के संबंध में कितनी ही वैचारिक उठापठक की जाए। जनगणनाओं के विश्लेषणों, या जनसांख्यिकी दबाव भी यही सिद्ध करते हैं कि जिन पर तर्कों के जाल में यदि चाहें तो हम लोगों को भ्रमित करते रह सकते हैं। सहसा विश्वास नहीं होता है कि चर्च की यूरोप जैसी अभेद्य हृदयस्थली को, इस्लाम के विरूद्ध प्रचार के बावजूद, बर्नार्ड लिविस जैसे विश्वप्रसिद्ध विचारक भी मानते हैं, इस सदी के अंत तक, मुस्लिम आस्था नियंत्रित कर सकेगी। कभी-कभी ऐसा लगता है कि बर्नार्ड लिविस का यह प्रश्न उठाना आज के विकास क्रम के लिए श्रेयस्कर है क्योंकि इसके द्वारा विश्व राजनीति का मानचित्र फिर बदला सकता है। हाल में फ्रांसीसी समाचार एजेन्सी एएफपी और एसोसिएटेड प्रेस द्वारा प्रसारित ‘द फोरम आन रिलिजन एंड पब्लिक लाइफ’ के एक तीन वर्षीय अध्ययन से यह तथ्य उजागर हुआ है कि आज विश्वभर में हर चार में से एक व्यक्ति इस्लामी आस्था को मानता है। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम जनसंख्या वाले 90 देशों में भारत का स्थान आज तीसरा है। हमारे देश के ऊपर मात्र इण्डोनेशिया और पाकिस्तान ही हैं। चाहे बांग्लादेश हो या मिस्र, ईरान, तुर्की और अल्जीरिया या मोरक्को हो वहां मुसलमानों की संख्या भारत से कम है। हमारे देश में उनकी संख्या 16 करोड़ है। इसी अध्ययन में यह तथ्य भी उजागर हुआ है कि जर्मनी में लेबनान से अधिक मुस्लिम नागरिक हैं, चीन में इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले सीरिया से अधिक हैं और रूस, जार्डन और लीबिया की कुल मिलाकर मुस्लिम जनसंसख्या अधिक है। आज यह अवधारणा कि इसलाम धर्मावलंबी अरब मूल में है ध्वस्त हो चुकी है और यह पूरी तरह से एक वैश्विक समुदाय है।  - हरिकृष्ण निगम
इस लेख को पूरा पढ़ना बहुत से राज़ सामने ले आता है . लिंक यह है :