Sunday, May 1, 2011

खुशदीप जी जल्दी ही लौट आयेंगे , एक Brake के बाद


हालांकि ख़बर तो कुछ यूं बननी चाहिए थी कि खुशदीप जी ने छोड़ दी है हिंदी ब्लॉगिंग। लेकिन यह एक झूठी बात होती। आदमी आवेश में आकर ग़लत फ़ैसले ले ही लेता है और फिर जब उसे अहसास होता है कि वह गुस्से में आकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार बैठा है तो वह अपने फ़ैसले से पलट जाता है और कहता है कि उसने अमुक आदमी के समझाने पर या अमुक कारण से अपना विचार बदल दिया है। तब भी वह स्वीकार नहीं करता कि उसका फ़ैसला ग़लत था। जल्दी ही आप खुशदीप जी के बारे में भी ऐसा ही होता देखेंगे।
इस विषय में ज़्यादा जानकारी के लिए आप देख सकते हैं:

3 comments:

शालिनी कौशिक said...

achchhi khabar,ab aate hain hath kee rekhaon par jo batati hain kee kafi bade dil vale vyakti ka hath hai,khoob dikhaya hai aapne bhi.

Khushdeep Sehgal said...

अनवर भाई,
पत्रकार हूं, शब्दों से खुद को सेफ करना अच्छी तरह जानता हूं...इसलिए पहले ही अपनी पोस्ट में संभवत शब्द लगाकर गुंजाइश छोड़ी हुई है कि दोबारा लौट सकूं...आपके कहे अनुसार मुझे ये बहाना बनाने की भी ज़रूरत नहीं कि
आप सब का प्यार मुझे दोबारा खींच लाया...ये प्यार मेरी सबसे बड़ी पूंजी है...मैं इतना खुदगर्ज नहीं कि इस पूंजी को अपने स्वार्थ के लिए यूंही इस्तेमाल करता फिरूं...

सम्मान से मेरा हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा है...मैंने अपनी पोस्ट में पिछले साल अगस्त की एक पोस्ट का लिंक दिया था...जिसे शायद आपने पढ़ा नहीं, उसे फिर यहां दे रहा हूं...
वर्ष के चर्चित उदीयमान ब्लॉगर



जून की इस पोस्ट का लिंक भी शायद आपके लिए पढ़ने की चीज़ हो...
समारोह में किसी का सम्मान हो गया, क्या आदमी वाकई इनसान हो गया

स्टेज पर जाने की बात को भी मैंने टिप्पणी में स्पष्ट किया, जिस पर आपने गौर नहीं किया...
मुझसे पंद्रह-बीस दिन पहले ही शिकागो से राम त्यागी और दुबई से दिगंबर नासवा जी कह चुके थे कि उनका सम्मान भी मैं ग्रहण करूं...दिंगबर जी के सम्मान के लिए मैंने राकेश कुमार जी को तैयार कर लिया, लेकिन राम के सम्मान के लिए तो मुझे स्टेज पर जाना ही था...उस बेचारे का इस पचड़े से क्या लेना-देना...फिर निशंक के साथ स्टेज पर रामदरश मिश्र जैसे साहित्य के श्लाका पुरुष, प्रभाकर जी, अशोक चक्रधर जी, विश्वबंधु गुप्त जैसी विभूतियां भी स्टेज पर मौजूद थी...मेरा न जाना उनका भी अपमान होता...

रही बात रवींद्र प्रभात जी और अविनाश वाचस्पति जी की, तो व्यक्तिगत तौर पर मैं आज भी उनका पहले जैसा ही सम्मान करता हूं...मेरा विरोध सैद्धांतिक है, व्यक्ति विशेष से नहीं...

खैर जो भी है आपने इस पोस्ट से मुझे ये संबल दिया है कि मैंने जो फैसला किया है, उस पर जहां तक संभव हो सके दृढ़ता से टिका रह सकूं...

रब्बा खैर...

जय हिंद...

DR. ANWER JAMAL said...

आपकी टिप्पणी से पता चला कि अभी आप हिंदी ब्लॉग्स पढ़ रहे हैं , लिहाज़ा अभी तक तो हम नहीं मानेंगे कि आपने ब्लौगिंग छोड़ दी है और आप यह भी हम पर छोड़ दीजिये कि हम आपको कहीं जाने नहीं देंगे क्योंकि हम आपको 'अपना' कह चुके हैं. हाँ आपसे यह शिकायत ज़रूर है कि जब इस आयोजन में एक राजनीतिज्ञ के हाथो सम्मान बांटे जाने का विरोध हम कर रहे थे तो आपने साथ न दिया . अगर आप साथ देते तो आपके साथ यह सब पेश ही न आता .
खैर , आप हमें अपनी ईमेल आईडी दीजिये .
शुक्रिया.