Saturday, February 2, 2013

बंदे के दिल में इसलाम की मारिफ़त कैसे तरक्क़ी पाती है ?

मैं अहले सुन्नत व अल-जमाअत के लोगों के दरमियान पैदा हुआ। हमारी दादी अम्मा ने हमें अम का पारा और अल्लाह के 99 नाम ज़ुबानी याद करवा दिए। थोड़ा बड़े हुए तो दीन का शौक़ बढ़ा और हमने पढ़ा। 
हमने पढ़ा कि अल्लाह ने एक जन्नत बनाई है और एक जहन्नम बनाई है। मरने के बाद वह अपनी जन्नत अपने इबादत करने वाले बन्दों को देगा और अपनी इबादत न करने वालों को वह जहन्नम में डाल देगा। 
हमने लड़कपन में ही अल्लाह की इबादत शुरू कर दी। अभी हम ढंग से जीने का मतलब भी न जान पाए थे कि हमने मौत की तैयारी शुरू कर दी।
तब्लीग़ी जमाअत के दोस्तों ने बताया कि अल्लाह किस नमाज़ पर क्या सवाब देता है और किस तस्बीह पर क्या सवाब देता है ?
हम ज़्यादा से ज़्यादा सवाब का ढेर जमा कर लेना चाहते थे। 
इसी बीच जमाअते इसलामी का लिटरेचर पढ़ा तो पता चला कि कलिमा, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज तो दीन के सुतून हैं, ये मुकम्मल दीन नहीं हैं। दीन मुकम्मल तब होता है जब कि शरीअत को इन्फ़िरादी और इज्तेमाई तौर पर माना जाए। अगर यह काम न किया तो अल्लाह उम्मत पर दुनिया में भी अज़ाब नाज़िल करेगा और उसे हश्र के मैदान में भी पकड़ लेगा। हम वाक़ई डर गए। हमने यह कोशिश की कि हम इक़ामत ए दीन की कोशिश करें।
इसी बीच मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब रह. मिले। उन्होंने बताया कि नुबूव्वत ख़त्म हो चुकी है। अब कोई नया नबी न आएगा। लिहाज़ा हर इंसान तक उस रब का पैग़ाम अब आपको ही पहुंचाना है। अगर आपने उसका पैग़ाम उसके बंदों तक नहीं पहुंचाया और वे जहन्नम में चले गए तो वे तुम्हें भी जन्नत में न जाने देंगे कि इन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं किया। लिहाज़ा हम उस रब का पैग़ाम उसके बंदों तक पहुंचाने लगे, ईसाई हो या हिन्दू सबको तौहीद, रिसालत और आखि़रत के साथ नेक अमल का पैग़ाम देने लगे।
तसव्वुफ़ की किताबें पढ़ीं तो पता चला कि इख़लास न हो तो हर अमल बेकार है। इंसान ने अपने नफ़्स का तज्किया न किया तो वह लाज़िमन जहन्नम में जाएगा। हम एक कामिल सूफ़ी साहब से बैअत हो गए और हमने अपनी अख़लाक़ी ख़राबियां दूर करनी शुरू कर दीं।
अहले हदीस की किताबों से पता चला कि बिदअत बहुत बुरी चीज़ है। बिदअत जहन्नम में ले जाती है। हमने बिदअतें पकड़ी ही नहीं थीं लेकिन फिर भी ढूंढ ढूंढ कर छोड़नी शुरू कर दीं। हमें लग रहा था कि अब हम जन्नत ज़रूर पहुंच जाएंगे।
अब हमारी ज़िंदगी में एक शिया दोस्त दाखि़ल होते हैं।
उन्होंने बताया कि आखि़रत में तुम्हारा हश्र तुम्हारे इमाम के साथ होगा। अगर वह जहन्नमी है तो तुम भी जहन्नम में ही जाओगे और अल्लाह ने जैसे नबी और रसूल को मुक़र्रर किया है वैसे ही उसने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को इमाम मुक़र्रर किया है। ।
हमने पूछा-‘हज़रत अली में क्या ख़ास बात है ?‘
बोले-‘अल्लाह ने पंचतन पाक को ख़ास मिटटी से पैदा किया गया था। हज़रत अली अ. उनमें से एक हैं। वे मासूम थे। उनसे ग़लती मुमकिन नहीं है।‘
हमने पूछा-‘...और बाक़ी सहाबा ?‘
बोले-‘वे सादा मिटटी की पैदाईश हैं। इसीलिए उन्होंने ग़लतियां की हैं। अब नबी स. के बाद हमें उसके वसी अली अलैहिस्-सलाम की ही इत्तेबा करनी चाहिए

हमने पूछा कि यह हुक्म कहीं लिखा हुआ है ?
बोले कि ‘अल्लाह के नबी स. अपनी वफ़ात से पहले वसीयत लिखना चाह रहे थे लेकिन उनके उम्मतियों ने लिखने नहीं दिया था।‘
हमें ताज्जुब हुआ कि उम्मतियों की बात ग़लत थी तो अल्लाह के रसूल और उसके वसी उसे मान कैसे गए ? 
हमने पूछा कि ‘ख़ैर, अल्लाह ने अपने कलाम में, क़ुरआन में ख़ुद कहीं लिखा होगा ?
बोले, क़ुरआन में तो कहीं लिखा हुआ है नहीं। जितनी आयतों में लिखा था, उन्हें उम्मतियों ने निकाल कर आयतों को जमा कर दिया और आयतों की तरतीब भी बदल दी ताकि अहले बैत की फ़ज़ीलत को छिपा दिया जाए।
हमने पूछा कि ‘हज़रत अली रज़ि. ने पूरा और सही क़ुरआन याद किया होगा  कि नहीं ?‘
बोले -‘हां, क्यों नहीं ?‘
हमने कहा कि ‘वह क़ुरआन कहां है ?‘
बोले कि ‘ऐसा कोई क़ुरआन तो हज़रत अली रज़ि. ने लिखा ही नहीं है।‘
हमने कहा कि ‘लिखा नहीं है तो उन्होंने दूसरों को हिफ़्ज़ ज़रूर करवाया होगा।‘
बोले कि ‘उन्होंने हिफ़्ज़ भी नहीं करवाया, वह ख़ुद इसी क़ुरआन को पढ़ा करते थे।‘ 
हमने पूछा कि ‘फिर वह असली वाला क़ुरआन किसके पास मिलेगा ?‘
बोले कि ‘वह क़ुरआन तो बारहवें इमाम के पास है।‘
हमने पूछा कि ‘वह कहां हैं ?‘
बोले कि ‘वह ग़ायब हैं।‘

हमने सोचा कि ‘हमारा इमाम ग़ायब है तो फिर अल्लाह ने हमें किस लिए हाज़िर कर दिया ?
अजीब चक्कर है कि जिस इमाम की इत्तेबा करनी है वह ग़ायब है और जिस हिदायत की पैरवी करनी है,वह भी ग़ायब है और जो किताब मौजूद है, उसका ऐतबार नहीं है और उसका जो आलिम मौजूद है, वह इत्तेबा के लायक़ नहीं है।
इमाम अपने असहाब को क़ुरआन भी हिफ़्ज़ न करवा सके तो उनकी ज़िंदगी भर की मेहनत से उम्मत को क्या फ़ायदा पहुंचा ?
अल्लाह ने नुबूव्वत ख़त्म कर दी है तो इमाम को क़ायम रखता और इमाम को ग़ायब करना था या उसे उठाना था तो अपनी हिदायत को उसकी असल शक्ल में बाक़ी छोड़ता और अगर हिदायत को भी उठाना था तो हमें पैदा न करता। 

3 दिन तक मुझ पर मायूसी तारी रही। बीवी परेशान, बच्चे भी परेशान।
फिर ख़ुद ही इधर उधर अक्ल दौड़ाई कि जो बात इंसान को मायूस कर दे, वह इसलाम की बात हरगिज़ नहीं हो सकती।
दुनिया में सिर्फ़ एक ही क़ुरआन मौजूद है। इसकी हिफ़ाज़त का यही सबसे बड़ा सुबूत है। अल्लाह ने इसकी हिफ़ाज़त का वादा किया है और यह क़ुरआन में दर्ज भी है। क़ुरआन इमाम है सबके लिए और क़ियामत तक के लिए। हमारा इमाम ग़ायब नहीं है बल्कि हाज़िर है क्योंकि हम हाज़िर हैं।
हिदायत मौजूद है, जो चाहे इसकी पैरवी करे। हवा, रौशनी और पानी की तरह अल्लाह की हिदायत सबके लिए आम है।
अल-हम्दुलिल्लाह।
फिर से नई हिम्मत पैदा हुई और हम फिर से अमल में जुट गए।
यह सारी बात इसलिए यहां लिखी है कि इसलाम के बारे में बहुत से नज़रिये वुजूद में आ चुके हैं। एक आदमी जो अल्लाह के रास्ते पर चलने की कोशिश करता है। वह गोया पुल सिरात पर चलने की कोशिश करता है। बहुत सी वजहों से वह इस रास्ते से डिग सकता है लेकिन उसे किसी भी वजह से सीधे रास्ते से नहीं डिगना चाहिए।
अगर आप क़ुरआन व हदीस न भी पढ़े हों तो भी आप कॉमन सेंस से जान सकते हैं कि सच क्या है ?
बशर्ते कि आपको अपनी सच्ची मंज़िल की तलाश हो और दुनिया का कोई लालच या डर आपके दिल में न हो।

2 comments:

zeashan zaidi said...

असली कुरान वही है जो हम और आप पढ़ रहे हैं। इसके अलावा कोई दूसरा कुरान नहीं . मैं शिया हूँ लेकिन किसी और कुरान पर यकीन नहीं रखता।

Dr. Ayaz Ahmad said...

@ अनवर जमाल साहब, आपने बहुत अच्छे तरीक़े से शिया सुन्नी इख्तेलाफ़ पर रौशनी डाली है। क़ुरआन को हज़रत अली रज़ि. के सामने जमा किया गया और उनके सामने ही इसकी कई कॉपियां तैयार करके इसलामी सल्तनत के बहुत से शहरों में पहुंचाई गईं। उन्होंने इस काम में हमेशा सहयोग दिया। उनका सहयोग उनकी तस्दीक़ है। किसी भी इमाम ने इस क़ुरआन के बारे में वे बातें कभी नहीं कीं, जो कि शिया आलिम करते हैं। उनकी बात का माख़ज़ इमामों के अक़वाल नहीं बल्कि कुछ और है।
कुछ और से मुराद यहूदी और मुनाफ़िक़ हैं, जिन्होंने हमेशा क़ुरआन में शक पैदा करने की कोशिश की ताकि इसलाम में फ़िरक़े पैदा हों।

@@ ज़ीशान भाई ! एक मुसलमान तो इसी क़ुरआन को असली क़ुरआन मानेगा और दुनिया भी इसी क़ुरआन को असली क़ुरआन मानेगी क्योंकि दूसरा कोई क़ुरआन कभी था ही नहीं और न ही आज है। बात आपके अकेले की नहीं है बल्कि शिया मुज्तहिदीन की है।
क्या शिया मुज्तहिदीन मानते हैं कि अहले बैत की शान की कोई आयत या हज़रत अली रज़ि. की इमामत के ऐलान की किसी आयत का नुज़ूल नहीं हुआ और न ही अबू बक्र रज़ि. व उमर रज़ि. या किसी और ने उसे क़ुरआ से हटाया है ?
उनके ऐसा मानते ही शिया सुन्नी इख्तेलाफ़ की बुनियाद ही ढह जाती है।