बीएसएफ़ के जवान हों या कि सेना के, उन्हें सीमा पर देश की जनता की हिफ़ाज़त के लिए नियुक्त किया जाता है लेकिन ऐसे क़िस्से भी सामने आते रहते हैं जबकि इनमें से कोई अपने देश की आबरू ख़ुद ही लूट लेता है। ऐसे में इन्हें सज़ा देना ज़रूरी हो जाता है। हाईकोर्ट ने भी यही किया है, देखिए एक ख़बर :
दुष्कर्मी जवानों की सजा बरकरार
लगभग 18 साल पहले बंगाल बार्डर पर स्थित एक गांव की गूंगी व बहरी लड़की से दुष्कर्म करने के मामले में नौकरी से हाथ धोने व सात साल की सजा पाने वाले सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के दो सिपाहियों को दिल्ली उच्च न्यायालय ने राहत देने से इंकार कर दिया है। न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग व न्यायमूर्ति सुनील गौड़ की खंडपीठ ने आरोपी भूषण सिंह व अवतार सिंह की याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि तमाम तथ्यों से जाहिर है कि उन्होंने यह अपराध किया था।
अदालत ने उस दलील को भी खारिज कर दिया कि पीडि़ता ने उनको शिनाख्त परेड में ठीक से नहीं पहचाना था। अदालत ने कहा कि हो सकता है कि पीड़िता के गूंगी व बहरी होने के कारण वह अपनी बात को सही तरीके से न रख पाई हो। इतना ही नहीं, कोर्ट ने उस दलील को भी खारिज कर दिया कि घटना के दो दिन बाद क्यों शिकायत की गई। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के मामले में पीड़िता के परिवार को सामाजिक दबाव को देखना पड़ता है। इतना ही नहीं इस मामले में तो बीएसएफ के जवान शामिल थे। ऐसे में उनको जरूर इस बारे में सोचने में समय लगा होगा, लेकिन फिर भी उन्होंने घटना के अगले दिन ही गांव के प्रधान को बता दिया था और उसके एक दिन बाद शिकायत दर्ज हो गई थी।
अवतार सिंह व भूषण सिंह बीएसएफ की 55वीं बटालियन में बतौर कांस्टेबल बंगाल बार्डर पर तैनात थे। इन पर आरोप है कि इन्होंने एक गांव की गूंगी व बहरी लड़की से बीस अक्टूबर 1992 को दुष्कर्म किया। इस मामले में जनवरी 1993 में यह कहते हुए इनके खिलाफ जांच बंद कर दी गई थी कि इन्हें स्थानीय तस्करों के कहने पर फंसाया गया है। मगर बाद में फिर से जांच शुरू कर गई और जनरल सिक्योरटी फोर्स कोर्ट ने दस अक्टूबर 1996 को इन दोनों को नौकरी से बर्खास्त करते हुए सात-सात साल के कारावास की सजा दी थी। इसी आदेश को इन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
Source : http://in.jagran.yahoo.com/news/local/delhi/4_3_8025360.html
यह तो हुई दुष्कर्म की सज़ा लेकिन ध्यान इस पर भी दिया जाना चाहिए कि दुष्कर्म की नौबत क्यों आई ?
अक्सर ऐसा होता है कि नियम तो बना दिए जाते हैं लेकिन नियम बनाने वाले इनसान की ज़रूरतों से वाक़िफ़ ही नहीं होते। सुरक्षा बलों में तैनात जवानों की ड्यूटी ही ऐसी है कि उन्हें अपने घरों से बहुत दूर पोस्ट होना पड़ता है और इस पर भी को उन्हें चार-चार माह बाद छुट्टी मिल पाती है। विदेशियों से लड़ना आसान है लेकिन अपने शरीर में बनने वालों हॉर्मोन्स को हराना बहुत मुश्किल है। इसी के नतीजे में तरह तरह की शर्मनाक घटनाएं सामने आती रहती हैं। सैनिकों और अद्र्ध सैनिक बलों के जवानों का ध्यान पहले से बेहतर रखा जा रहा है लेकिन इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि अभी भी कुछ और सुधार किए जाने की ज़रूरत है, ख़ास तौर से उनकी यौन ज़रूरतों को ध्यान में रखकर कुछ सुधार तुरंत किए जाने चाहिएं।
