Saturday, June 25, 2011

डायना बनने की चाह में औरतें बन गईं डायन Vampire

लोगों ने ऐश की ख़ातिर अपना आराम खो दिया है। सुनने में यह बात अटपटी सी लगती है मगर है बिल्कुल सच !
लोगों ने अपना लाइफ़ स्टैंडर्ड बढ़ा लिया तो केवल मर्द की आमदनी से ख़र्चा चलना मुमकिन न रहा और तब औरत को भी पैसा कमाने के लिए बाहर बुला लिया गया लेकिन इससे उसके शरीर और मन पर दो गुने से भी ज़्यादा बोझ लद गया।
औरत आज घर के काम तो करती ही है लेकिन उसे पैसे कमाने के लिए बाहर की दुनिया में काम भी करना पड़ता है। औरत का दिल अपने घर और अपने बच्चों में पड़ा रहता है। बहुत से बच्चे माँ के बाहर रहने के कारण असुरक्षित होते हैं और अप्रिय हादसों के शिकार बन जाते हैं। छोटे छोटे बच्चों का यौन शोषण करने वाले क़रीबी रिश्तेदार और घरेलू नौकर ही होते हैं। जो बच्चे इन सब हादसों से बच भी जाते हैं, वे भी माँ के आँचल से तो महरूम रहते ही हैं और एक मासूम बच्चे के लिए इससे बड़ा हादसा और कुछ भी नहीं होता । माँ रात को लौटती है थकी हुई और उसे सुबह को फिर काम पर जाना है । ऐसे में वह चाह कर भी अपने बच्चों को कुछ ज्यादा दे ही नहीं पाती।
इतिहास के साथ आज के हालात भी गवाह हैं कि जिस सभ्यता में भी औरत को उसके बच्चों से दूर कर दिया गया । उस सभ्यता के नागरिकों का चरित्र कमज़ोर हो गया और जिस सभ्यता के नागरिकों में अच्छे गुणों का अभाव हो जाता है वह बर्बाद हो जाती है ।
औरत का शोषण बंद होना चाहिए ताकि हमारी नस्लें अपनी माँ की मुनासिब देखभाल पा सकें।
जहाँ मजबूरियों के चलते परिवार की सारी ज़िम्मेदारी औरत के कंधों पर आ पड़ी है, वे इस लेख का विषय नहीं हैं । भोग विलास के साधन घर में जमा करने के लिए अपने मासूम बच्चों के अरमानों की बलि देना कैसे उचित है?
यह नई सभ्यता का असर ही तो है कि कहीं तो माँएं अपनी कोख में बच्चों की बलि दे रही है और अगर उन्हें अपना वंश चलाने के पैदा कर भी दिया जाता है तो उनके अरमानों की बलि रोज़ाना चढ़ाई जाती है ।
आधुनिक शिक्षा ने आज माँ को आधुनिक डायन बनाकर रख दिया है।
जो लोग डायन के वुजूद को नकारते हैं, वे चाहें तो अपने आस पास बेशुमार डायनें देख सकते हैं ।

5 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

आज की हकीकत ब्यान कर दी है, इस लेख में, ये पैसों भी भूख नहीं भरती है?

DR. ANWER JAMAL said...

@ संदीप पंवार जी ! यह पैसों की हवस का दौर है। हवस के कारण ही आज नई नस्ल बर्बाद हो रही है। महंगे स्कूल और लग्ज़री आयटम्स के लिए नारी सुलभ ममता खोती जा रही है आज नारी।

शालिनी कौशिक said...

bilkul sahi kaha hai aapne aur maa ke ghar se anupasthiti ka pata unhi bachchon ko chalta hai jinki maa ghar se bahar kam par jati hain .bachchon ke liye yah sthiti behad bhayavah hai kyonki bachche ka poora vikas maa par nirbhar hai aur aaj kee paristhityon me ye bhayavah sthiti paida ho gayee hai kintu aise me maa ko aadhunik dayan kahna anuchit hai kyonki kitni hi maa ye sab apni marji se n kar majboori se karti hain kintu unka lakshay ek matr apni santan kee bhalai hi hota hai.

DR. ANWER JAMAL said...

@ शालिनी जी ! औरत जहाँ मजबूर है , वहाँ तो वह ख़ुद ही मज़लूम है । ऐसी मज़लूम औरतों पर कोई इल्ज़ाम नहीं है । उनके साथ तो हमारी संवेदनाएं होनी चाहिए ।
अपने पति को खोने वाली या पति के निकम्मेपन के कारण या ऐसे ही हालात में जो औरतें कमाने के लिए बाहर आने के लिए मजबूर हो गई हैं , वे भी आदर की पात्र हैं बल्कि वे तो दो गुने सम्मान की पात्र हैं ।
डायन हैं वे औरतें जो अपना लाइफ़ स्टैंडर्ड ऊँचा उठाने के लिए अपनी कोख में भ्रूण मार रही हैं और अपने शिशुओं को बेबी सिटिंग में छोड़कर धन कमा रही हैं ।
यह उपाधि हवस की मारी उन औरतों के लिए है जो ऐश के लिए अपनी जवानी और योग्यताएं अपनी औलाद पर लुटाने के बजाय यहाँ वहाँ लुटा रही हैं।
http://auratkihaqiqat.blogspot.com

devendra gautam said...

बिलकुल सही फ़रमाया है आपने. यह मौजूदा दौर का सच है. कृषि युग के बाद आये औद्योगिक युग ने परिवार और समाज के ढांचे को तोड़कर रख दिया है. पहले संयुक्त परिवार प्रणाली को नष्ट किया. अब एकल परिवार के ढांचे तो भी तोड़ रहा है. सिलसिला जारी रहा तो आत्मकेंद्रित व्यक्तियों का समूह मात्र बनकर रह जायेगा भारतीय समाज. कभी पूरा शहर एक परिवार जैसा लगता था. अब अपना परिवार भी अपना नहीं लगता. यह औद्योगिक क्रांति और उपभोक्तावाद की देन है. सामाजिक विकास की प्रक्रिया अर्थ व्यवस्था के स्वरुप के मुताबिक संचालित होती है लेकिन बदलते वक़्त में इंसानी रिश्तों को कैसे संभाला जाये. संवेदना को कैसे बचाया जाये. इन सवालों पर बहस होनी चाहिए.