Monday, June 13, 2011

ग़ददारों की जमात : एक ज्वलंत समस्या

इंसान लावारिस नहीं है । वह अपने पैदा करने वाले का पाबंद है । वह अपनी मनमर्ज़ी करने के लिए आज़ाद नहीं है । उसे अपने हर अमल का जवाब उस मालिक को देना है जो हरेक बात का गवाह ख़ुद है । जो उसका हुक्म मानता है वह अच्छा , सच्चा और अमानतदार होगा और जो ऐसा नहीं होगा वह ग़ददार होगा । ऐसा आदमी अपनी जान को आफ़त से बचाने के लिए दूसरों की बलि देने से भी नहीं हिचकता । ऐसे आदमी हरेक क़ौम में पाए जाते हैं । मुसलमानों में भी ऐसे आदमी पाए जाते हैं । अंग्रेज़ों के लिए बहादुर शाह ज़फ़र के क़िले का दरवाज़ा खोलने वाला कोई हिंदू नहीं था बल्कि एक मुसलमान ही था । ऐसे ग़ददार दरअसल मुसलमान होते ही नहीं ।
साफ़ बात यह है कि मुसलमान कभी ग़ददार नहीं होगा और जो ग़ददार होगा वह इसलाम के दायरे से ख़ारिज होगा ।
अल्लाह ने मुसलमानों को पूरे हिंदुस्तान में बिखेर दिया और हिंदुस्तान के सिर पर भी बिठा दिया । कश्मीर जो कि जन्नत कहलाता है , वहाँ मुसलमान ही मुसलमान हैं । वहाँ एक क़स्बा है क़ाज़ीगुंड । वहाँ के बाज़ार में मुसलमानों की ही दुकानें हैं। एक दुकानदार से मैंने 5 किलो बादाम ख़रीदे । खुली हुई बोरी से क़ाग़ज़ी बादाम खिलाकर वह हमें बंद पैकेट देने लगा। मुझे उसकी हरकत पर शक हुआ । मैंने उसे चेक किया तो वह बादाम पत्थर से फ़ोड़ने वाला निकला और उसका चेहरा देखो तो उस पर दाढ़ी , उम्र भी लगभग 55 साल । मेरी टीम में 325 आदमी थे दो चार को छोड़ कर सभी मुसलमान थे। उनमें से जितने लोगों ने अख़रोट बादाम ख़रीदे सभी के साथ उस बाज़ार में यही धोखाधड़ी और लूट खसोट की गई।
हदीस ए पाक में साफ़ आया है कि पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद स. ने फ़रमाया- 'जो धोखा दे , वह हम में से नहीं है।'
जम्मू और कटरा के बाज़ारों में मैंने देखा है कि वहाँ आने वाले हिंदू श्रृद्धालुओं को हिंदू दुकानदार किस तरह लूटते हैं लेकिन आज का विषय मुसलमानों में शामिल ग़ददार हैं । हिंदुओं के दुखों के पीछे हिंदुओं में छिपे ग़ददार हैं और मुसलमानों की तबाही के पीछे मुसलमानों में छिपे ग़ददार हैं ।
सच्चे हिंदू और सच्चे मुसलमान सच का साथ देते हैं जबकि ये ग़ददार केवल वह काम करते हैं जिसमें इन्हें माल और इज़्ज़त मिलती हुई नज़र आती है । सच के लिए तो जान तक देनी पड़ती है और ग़ददार सच के लिए अपनी उंगली तक कभी न कटाए ।
हाँ , मुख़बिरी करके सच्चों की गर्दन ज़रूर कटवाते आए हैं ये ग़ददार ।
आज ये ग़ददार हमारे चारों तरफ़ फैले हुए हैं । छोटे बड़े ओहदों पर भी इन्हें देखा जा सकता है बल्कि आप इन्हें मुस्लिम क़ौम के नेताओं में ढूँढेंगे तो ये आपको वहाँ भी मिलेंगे और ये दोस्तों में तो ये ज़रूर छिपे होते हैं ।
क्या आप जानते हैं कि इन ग़ददारों को कैसे पहचाना जा सकता है ?
मुसलमान का काम है कि वह हक़ अदा करे , लोगों के हक़ भी और मालिक के हक़ भी । मुसलमान का काम यह है कि अमन के रास्ते पर खुद भी चले और दूसरों को भी इसी रास्ते पर चलने की शिक्षा दे । जो मुसलमान यह काम नहीं करता , वास्तव में वह मुसलमान होने की बुनियादी शर्त से भी कोरा है ।
मालिक ने मुसलमानों को थोड़ा थोड़ा हर जगह रखा है ताकि वे हर इलाक़े के लोगों को मालिक की वफ़ादारी करके दिखाएं और उन्हें अमन के साथ जिंदगी बसर करना सिखाएँ लेकिन देखने में यह आ रहा है कि एक आदमी मुसलमान होने का दावा भी कर रहा है और दग़ा भी कर रहा है । माँ-बाप , भाई-बहन , बीवी-माशूक़ा , दोस्त और पड़ोसी इनमें आज हरेक या तो दग़ा दे रहा है या फिर दग़ा खा रहा है ।
किसी को आप उसकी ज़रूरत में कुछ रूपये उधार दे दीजिए । उसके हालात सुधर जाएं तब भी वह उस रक़म को लौटाने वाला नहीं है ।
ऐसे ही आप किसी को अपना राज़दार बनाकर देख लीजिए । कुछ ही दिन बाद आप देखेंगे कि आपका दोस्त ईमान का दावा ठोंकने के बावजूद बदफ़हम लोगों के साथ ठठ्ठे मार रहा होगा और आपकी खबरें भी उन्हें दे चुका होगा ।
मर्डर के कितने ही केस ऐसे हैं जिनमें घर से दोस्त बुलाकर ले गए और फिर दुश्मनों ने घेर मार डाला।
दुश्मन की औक़ात तो कुछ करने लायक़ न कल थी और न ही आज है , अल्हम्दुलिल्लाह !
इनकी बचकाना बातें दुख भी नहीं देतीं लेकिन मुसलमान होकर आदमी ग़ददारों जैसे करे , यह बात दुख देती है ।
बड़े शहरों यह छल , फ़रेब और डबल क्रॉस हुनर माना जाता है लेकिन हमारी किताब में इसे आज भी गुनाह माना जाता है ।
आप देखिए कि कहीं आप किसी के साथ ग़ददारी तो नहीं कर रहे हैं ?
अगर आप नहीं कर रहे हैं तो कोई न कोई आपके साथ ज़रूर ग़ददारी कर रहा है ।
देखिए , चेक कीजिए कि आपके साथ कौन ग़ददारी कर रहा है ?

5 comments:

शालिनी कौशिक said...

ham jante hain gaddar kaise pahchana jata hai ye aankhen hi hain jo sach bolti hain aur ye hindu ya musalman nahi hoti.

DR. ANWER JAMAL said...

@ शालिनी जी ! कृप्या ग़ददारों के कुछ मुख्य लक्षण भी बताएं हम समय रहते इन्हें पहचान सकें ।

अमि'अज़ीम' said...

lo jee aapne to sochne par majbur kar diyaa..

शालिनी कौशिक said...

theek hai dr.sahab ab lagta hai gaddaron par research karni hi hogi.

DR. ANWER JAMAL said...

@ शालिनी जी ! अगर आप वाक़ई रिसर्च करना चाहती हैं तो फिर यह लेख भी आप ज़रूर पढ़िएगा और इसकी टिप्पणियों को भी ध्यान से पढ़िएगा।
हिंदी ब्लॉगिंग का स्तर गिरा रही है हमारी वाणी , हम तो चले और अब जो जी में आए करो बाबा !!! - Dr. Anwer Jamal