Tuesday, June 14, 2011

एक विडंबना : बाबा रामदेव हैल्दी होकर लौटे भी तो निगमानंद की मौत के मौक़े पर



स्वामी निगमानंद जी ने अनशन किया और मर गए। लोग कह रहे हैं कि निगमानंद शहीद हो गए हैं।
ये वे लोग हैं जिन्हें यह भी नहीं पता है कि शहीद का अर्थ होता क्या है ?
किसी को पता हो तो बताए कि ‘शहीद‘ किस भाषा का शब्द है और इसका अर्थ क्या है और यह किन लोगों के लिए बोला जाता है ?
पता कुछ है नहीं और मुंह उठाकर किसी के बारे में भी बोल देंगे कि यह तो शहीद हो गया।
बाबा का मुददा अच्छा था, उनकी भावना अच्छी थी लेकिन जैसे कि उन्हें गृहस्थ नहीं कहा जा सकता ऐसे ही उन्हें शहीद भी नहीं कहा जा सकता।

उधर, बाबा रामदेव जी अस्पताल से स्वस्थ होकर अपने आश्रम लौट आए हैं।
‘लौट के बुद्धू घर को आए‘ भी इस घटना पर नहीं कहा जा सकता क्योंकि एक तो अपने रास्ते से हटने वाला बुद्धू होता है और दूसरी बात यह है कि वह लौटकर अपने घर आता है आश्रम में नहीं। बाबा बुद्धू होते तो अपने घर लौटते लेकिन वह तो अपने आश्रम में आए हैं लिहाज़ा साबित हो गया कि वह बुद्धू नहीं हैं।
घर से बुद्धू को कोई आमदनी नहीं होती है जबकि आश्रम से अरबों रूपये की आमदनी होती है। दरअस्ल यह उनकी दुकान है। उन्होंने फ़्री में मिलने वाले योग को अब पैसे में बिकने वाली चीज़ बना डाला। यही बाबा की सबसे बड़ी सेवा है। उनके भाई वग़ैरह की भी पांचों उंगलियां इतनी ज़्यादा तर हैं कि इतना माल तो कोई गृहस्थ भी अपने भाई को न दे पाए।
अब स्वस्थ होकर बाबा फिर आ गए हैं अमीर लोगों को योग बेचने के लिए। दिग्गी बाबू कह रहे हैं कि बाबा रामदेव जी ठग हैं। यह ठीक बात नहीं है। उन्होंने योग को बेचा और सन्यासी होकर बेचा तो इसे एक सन्यासी का भ्रष्टाचार तो कहा जा सकता है लेकिन ठगी नहीं। वह भले ही आगे की पंक्ति वालों से 50,000 रूपये लेते हैं लेकिन बदले में वह उन्हें एक्सरसाईज़ तो कराते हैं।
कोई ठग कभी किसी को कोई सेवा देता है क्या ?
निगमानंद को कुछ बेचना नहीं था, सो वह मर गए। वह शहीद हों या न हों लेकिन एक परोपकारी सन्यासी ज़रूर थे। जैसी भावना उनकी थी उस तक पहुंचना आसान नहीं है और बाबा रामदेव के लिए तो बिल्कुल भी आसान नहीं है।
स्वामी निगमानंद की मौत के अवसर पर बाबा रामदेव का स्वस्थ होकर घर सॉरी अपने आश्रम लौटना एक बड़ी विडंबना है। दोनों के चरित्र को देश की जनता एक साथ देख रही है। दोनों की तुलना करके स्वामी निगमानंद जी को अपेक्षाकृत महान कहने के लिए आज हरेक बुद्धिजीवी मजबूर है।

3 comments:

अमीत तोमर said...

jab koi veykti achche kam ke liye apne prano ki aahuti dedeta he to use shahid kehte hen vese jisse dusron ka bhla ho swami nigmanandji ek ache kam ko karte hue shahid hue hen lekin pta nhi kitne logon ki ankhe khulengi isse

एक बार इसे जरुर पढ़े कॉग्रेस के चार चतुरो की पांच नादानियां | http://www.bharatyogi.net/2011/06/blog-post_15.html

Dr. Ayaz Ahmad said...

अच्छी पोस्ट

Sanjeev said...

Nice post