Sunday, June 12, 2011

भारतीय आयुर्वेदाचार्यों ने आहार संबंध में बेहतरीन उसूल दिए हैं

भाइयो, बुजुर्गो और दोस्तों ! अगर आप चिकन-मटन को लौकी के साथ पकाकर खाएंगे तो न तो आप बुज़दिली के शिकार होंगे और न ही आपके स्वभाव में हिंसा की प्रधानता होने पाएगी। मांस के नकारात्मक पक्ष हिंसा का निराकरण लौकी करेगी और लौकी के नकारात्मक पक्ष बुज़दिली का निराकरण चिकन-मटन कर देगा। आपके स्वभाव में नकारात्मक पक्ष किसी का भी न आएगा जबकि सकारात्मक पक्ष दोनों के ही आ जाएंगे।
यह हक़ीक़त है कि आज हर तरफ़ बीमारियों का बोलबाला है। दूसरी वजहों के साथ इसकी एक वजह यह भी है आज आदमी लगातार गेहूं, घी-तेल, मसाले, नमक, चीनी और चंद गिनी चुनी सब्ज़ियां ही खा रहा है। जब से वह खाना चबाना सीखता है तब से वह यही सब खा रहा है और आप जानते हैं कि अगर होम्योपैथिक तरीक़े से किसी दवा को उसके कच्चे रूप में केवल 3 माह तक लिया जाता है तो वह दवा इंसान के शरीर और मन पर अपने लक्षण प्रकट कर देती है। अब आप सोचिए कि जब 40 साल तक आदमी एक सी ही बल्कि एक ही चीज़ें लगातार खाता रहेगा तो क्या वे चीज़ें इंसान के शरीर और मन पर अपने गहरे असर न दिखाएंगी ?
लंबी लाइलाज बीमारियों के शिकार मरीज़ अगर वाक़ई तंदुरूस्त होना चाहते तो वे सबसे पहले ये सारी चीज़ें खाना छोड़ दें और उसके बाद वे ऐसी चीज़ें खाएं जो कि उन्होंने जीवन में बहुत कम खाई हों और जल्दी हज़्म हो जाती हों। इसके बाद अगर वे शहद और त्रिफला भी खाते रहें तो 3 महीने में ही उनकी पुरानी बीमारियां भी काफ़ी हद तक जाती रहेंगी।
आज आदमी बीमार नहीं है र्बिल्क ‘फ़ूड प्रूविंग‘ का शिकार है। यह मेरा अनुसंधान है। मैं इस सब्जेक्ट पर एक किताब भी लिखने वाला था लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग में आ फंसा।
मालिक ने बंदों को सेहतमंद रखने के लिए ही उसे मेहनत करने का हुक्म दिया और इसीलिए उसने अलग अलग मौसम में अलग अलग फ़सलें बनाईं। हरेक मौसम में इंसान की ज़रूरत उसी मौसम के फल सब्ज़ी आदि के ज़रिए पूरी होती हैं। हमारा आहार ही हमारे लिए बेहतरीन औषधि है लेकिन हमने अपनी नादानी की वजह से अपने आहार को आज अपने लिए ज़हर बना लिया है। 
यह ज़हर इतना है कि इसे लैब में भी टेस्ट कराया जा सकता है। सब्ज़ी, दूध-पानी, मिट्टी और हवा हर चीज़ को ज़हरीला बनाने वाले हम ख़ुद ही हैं और फिर मौसम चक्र का उल्लंघन करके मनमर्ज़ी भोजन करने वाले नादान भी हम ही हैं। अगर हम अपनी ग़लती महसूस करें और तौबा करके अपने खान-पान को मौसम के अनुसार कर लें तो हम अपनी बीमारियों से मुक्ति पा सकते हैं।
भारतीय आयुर्वेदाचार्यों ने इस संबंध में बेहतरीन उसूल दिए हैं:
मिसाल के तौर पर उन्होंने कहा है कि 
1. हितभुक  2. मितभुक  3. ऋतभुक
अर्थात हितकारी खाओ, कम खाओ और ऋतु के अनुकूल खाओ।
हमें अपने महान पूर्वजों की ज्ञान संपदा से लाभ उठाना चाहिए।
-----------------------------------------------------------------------------
साथ में देखिये

क्या बुज़दिल बना देता है लौकी का जूस ? , होम्योपैथी में विश्वास रखने वाले ब्लॉगर्स भाइयों से एक विशेष चर्चा -Dr. Anwer Jmal

3 comments:

Shah Nawaz said...

अच्छी जानकारी दी आपने...

शालिनी कौशिक said...

dr.sahab ,
aisee post lagane se achchha hai ki aap apne marijon ko hi dekh len kyonki hamare liye to mas khane se achchha hai ki ham bujdil hi rah len aur vaise bi hamme ahinsa kee pradhanta hai aur ham vahi rahna chahte hain.
bhagwan ne sab jeevon ko jeene ka haq diya hai aur hame koi haq nahi hai ki ham apna pet bharne aur apni bujdili ko mitane ke liye unka bhojan karen.

shanno said...

बड़ा दिलचस्प लेख है..आहार पर बिचार करने को मजबूर करता है.