Thursday, June 9, 2011

धार्मिकता की सच्ची कसौटी - Dr. Anwer Jamal

इंसान अपने वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकता। आप भी सोचते होंगे और हम भी सोचते हैं। हमने तो अपनी ज़िंदगी फिर भी बहुत अच्छी गुज़ार ली है, हम ऐसा समझते हैं लेकिन आने वाले समय के बारे में सोचते हैं तो हमारे शरीर में पहले तो झुरझुरियां सी दौड़ने लगती हैं।
मारकाट में हम विश्वास नहीं रखते और क्रांति टाइप कोई परिवर्तन भी हम नहीं  चाहते नहीं क्योंकि इन सबका नुक्सान भी घूम फिर कर जनता को ही उठाना पड़ता है। जो भी नई व्यवस्था बनेगी। उसमें नेता और पूंजीपति फिर से ऐश मारना शुरू कर देंगे। क़ुर्बानी देते हैं चंद सिरफिरे दीवाने और जनता लेकिन ऐश करने के लिए वे लोग आ जाते हैं, जो ख़ुदग़र्ज़ और बुज़दिल होते हैं। इतिहास के जितने भी उलट-फेर आप देखेंगे तो आपका मन कभी नहीं चाहेगा कि कोई क्रांति यहां हो।
आज नेता निश्चिंत हैं और अदालतें सुस्त हैं। नौकरशाह मज़े कर रहे हैं और मोटा माल कमाकर अपने बच्चों को आला तालीम दिला रहे हैं। पढ़-लिखकर वे भी मोटा माल कमाएंगे। पूंजीपति राजाओं की तरह बसर कर ही रहे हैं। आम जनता की रोज़ी-रोटी, शिक्षा और सुरक्षा सब कुछ अनिश्चित है।
साल भर हो चुका है। 8 मई आई और गुज़र गई किसी ने याद नहीं किया कि  8 मई 2010 सोमालिया के लुटेरों ने देश के 22 नौजवानों को पकड़ लिया था। आज तक उन्होंने छोड़ा नहीं और हमारे पक्षी-विपक्षी नेताओं ने उन्हें छुड़वाया नहीं। यहां गाना बजा रहे हैं ‘यह देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का‘ और मलाई चाटने वाले नाच रहे हैं। उनके समर्थक कह रहे हैं कि यह राष्ट्रवाद है।
कभी इस देश का हाल यह था कि रानी लक्ष्मीबाई ने ज़नाना लिबास उतार कर मर्दाना लिबास पहन लिया और घोड़े पर बैठकर दुश्मन की तरफ़ हमला करने भागीं और आज यह आलम है कि जो लड़ने निकला था भ्रष्टाचारियों से वह मर्दाना लिबास उतार ज़नाना लिबास में लड़ाई के मैदान से ही भाग निकला और फिर औरतों की ही तरह वह रोया भी।
आज जिसके पास चार पैसे या चार आदमियों का जुगाड़ हो गया। वह एमपी और पीएम बनने के सपने देख रहा है। पहले तो केवल भ्रष्टाचारी और ग़ुंडे-बदमाश ही नेतागिरी कर रहे थे और फिर हिजड़े और तवायफ़ें भी नेता बन गए। उसके बाद अब समलैंगिक भी नेता बनकर खड़े हो रहे हैं कि देश को रास्ता हम दिखाएंगे।
आप एक बार देश के सभी नेताओं पर नज़र डाल लीजिए। उनमें सही लोगों के साथ-साथ ये सभी तत्व आपको नज़र आ जाएंगे।
जनता इन सबसे आजिज़ आ चुकी है। जिस पर भी वह विश्वास करती है, वही निकम्मा निकल जाता है। लोगों में निराशा घर कर रही है। जिसकी वजह से जगह-जगह आक्रोश में आकर लोग हत्या-आत्महत्या कर रहे हैं। हम सब एक भयानक भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में सांप्रदायिक राष्ट्रवाद कोढ़ में खाज की तरह समस्या को और ज़्यादा बढ़ा रहा है।
ये हालात हैं जिन्हें हम एक दम तो नहीं बदल सकते लेकिन फिर भी लोगों के दिलों में आशा का दीपक ज़रूर जला सकते हैं। आप कुछ करें या न करें लेकिन लोगों की आशा और उनके सपनों को हरगिज़ मरने न दें। आदमी रोटी-पानी और हवा से नहीं जीता बल्कि वह एक आशा के सहारे जीता है। उसे यह आशा बनी रहती है कि एक समय आएगा, जब सब ठीक हो जाएगा।
वह समय कब आएगा ?
इसे न तो हम जानते हैं और न ही आप लेकिन फिर भी यह आशा तो हम सबके मन में है ही। हमारी कोशिश यही है कि हम लोगों में यह आशा ज़्यादा से ज़्यादा जगाएं कि हर रात के बाद एक सुबह होती ही है और यह लोगों के प्रयास से नहीं होती बल्कि यह मालिक की दया से होती है। जब मालिक का नाम आता है तो मन में दम तोड़ती हुई आस भी ज़िंदा हो जाती है। यही आस लोगों को हिंसा और अनुशासनहीनता से दूर रहने के लिए प्रेरित करती है। निराशा से बचाने वाली चीज़ बुद्धि और नास्तिकता नहीं बल्कि आस्था है। मनुष्य अपने स्वभाव से ही आस्थावान और आशावादी है।
हम सब एक ही तरह के मनुष्य हैं। जिसका भी लहू बहेगा वह भी हमारी तरह का ही एक इंसान होगा। वह किसी का बेटा और किसी का भाई होगा। वह खुदा को मानता हो या चाहे न मानता हो लेकिन फिर भी वह बंदा एक ही खुदा का होगा। ईश्वर-अल्लाह हमारी धार्मिकता को इसी कसौटी पर परखता है कि हम समाज में शांति लाने और उसे बनाए रखने के लिए कितना प्रयास करते हैं ?
यह देश धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है तो यहां सबसे बढ़कर शांति होनी चाहिए।
अगर हम विभिन्न मत और संप्रदायों में भी बंट गए हैं और अपने अपने मत और संप्रदाय को सत्य और श्रेष्ठ मानते हैं तो हमें एक ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हुए शांति और परोपकार के प्रयासों में एक दूसरे से बढ़ निकलने के लिए भरपूर कम्प्टीशन करना चाहिए।
अपने देश और अपने समाज को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को बचाने का तरीक़ा आज इसके सिवा कोई दूसरा है नहीं। मैं इसी तरीक़े पर चलता हूं और आपको भी इसी तरीक़े पर चलने की सलाह देता हूं।
आप अपने दीपक ख़ुद बन जाइये, मार्ग आपके सामने ख़ुद प्रकट हो जाएगा। तब आप चलेंगे तो मंज़िल तक ज़रूर पहुंचेंगे और कोई भी राह से भटकाने वाला आपको भटका नहीं पाएगा। आपकी मुक्ति, आपके ज्ञान और आपके पुरूषार्थ पर ही टिकी है। किसी और को इससे बेहतर बात पता हो तो वह हमें बताए !

13 comments:

शालिनी कौशिक said...

कभी इस देश का हाल यह था कि रानी लक्ष्मीबाई ने ज़नाना लिबास उतार कर मर्दाना लिबास पहन लिया और घोड़े पर बैठकर दुश्मन की तरफ़ हमला करने भागीं और आज यह आलम है कि जो लड़ने निकला था भ्रष्टाचारियों से वह मर्दाना लिबास उतार ज़नाना लिबास में लड़ाई के मैदान से ही भाग निकला और फिर औरतों की ही तरह वह रोया भी
achchha kataksh kar lete hain aap.aur aapke kataksh me sachchai bhi judi rahti hai.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

भाई,
परिवर्तन तो अवश्यंभावी है। उस के बिना तो जीवन भी संभव नहीं। व्यवस्था भी बदलेगी। पूंजीपति भी मिटेंगे और ये तथाकथित नेता भी नहीं रहेंगे।

पर बोद्धों, जैनों और हम जैसों का क्या जो किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करते। हमारा विश्वास है कि यह प्रकृति ही स्वयंभू है और नियमों से संचालित है। यह संचालन में भेदभाव भी नहीं करती।

मैं आप के विश्वास का सम्मान करता हूँ, और अपने विश्वास का भी। दोनों के अपने अपने विश्वास पर बने रहते हुए भी सहअस्तित्व संभव है। उसे बनाए रखें और मनुष्य और समाज की बेहतरी के लिए जो भी हम से संभव है वह करें।

इस आलेख के लिए साधुवाद!

zeashan zaidi said...

"क़ुर्बानी देते हैं चंद सिरफिरे दीवाने और जनता लेकिन ऐश करने के लिए वे लोग आ जाते हैं, जो ख़ुदग़र्ज़ और बुज़दिल होते हैं।"
100% true

Sunil Deepak said...

अनवर जी, अगर नारी पुरुष जैसे वस्त्र पहने या पुरुष की तरह लड़े तो अच्छी बात और पुरुष नारी की ममता या शालीनता दिखाये तो बुरी बात, क्यों? शायद इसलिए कि पुरुष गुणों को ऊँचा माना जाता है और नारी गुणों को नीचा. मेरे विचार में नारी या पुरुष स्वभाव या व्यवहार में ऊँचा नीचा देखना गलत है, उसके मूल में क्या बात है, क्या वह ठीक है या गलत यह बात करना बेहतर है.

मैं आप से सहमत हूँ कि ईश्वर-अल्लाह हमारी धार्मिकता और मानवता को इसी कसौटी पर परखता है कि हम अपने जीवन में, और समाज और दुनिया में शांति और न्याय लाने के लिए कैसा आचरण करते हैं.

DR. ANWER JAMAL said...

‘न्याय की आशा‘
आदरणीय द्विवेदी जी ! मेरा मिशन आशा और अनुशासन का मिशन है। लोग बेहतरी की आशा में ही अनुशासन भंग करते हैं और जो लोग अनुशासन भंग करने से बचते हैं, वे भी बेहतरी की आशा में ही ऐसा करते हैं। समाज में चोर, कंजूस, कालाबाज़ारी और ड्रग्स का धंधा करने वाले भी पाए जाते हैं और इसी समाज में सच्चे सिपाही, दानी और निःस्वार्थ सेवा करने वाले भी रहते हैं। हरेक अपने काम से उन्नति की आशा करता है। जो ज़ुल्म कर रहा है वह भी अपनी बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहा है और जो ज़ुल्म का विरोध कर रहा है वह भी अपनी और सबकी बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहा है।
ऐसा क्यों है ?
ऐसा इसलिए है कि मनुष्य सोचने और करने के लिए प्राकृतिक रूप से आज़ाद है। वह कुछ भी सोच सकता है और वह कुछ भी कर सकता है। दुनिया में किसी को भी उसके अच्छे-बुरे कामों का पूरा बदला मिलता नहीं है। क़ानून सभी मुजरिमों को उचित सज़ा दे नहीं पाता बल्कि कई बार तो बेक़ुसूर भी सज़ा पा जाते हैं। ये चीज़ें हमारे सामने हैं। हमारे मन में न्याय की आशा भी है और यह सबके मन में है लेकिन यह न्याय मिलेगा कब और देगा कौन और कहां ?
न्याय हमारे स्वभाव की मांग है। इसे पूरा होना ही चाहिए। अगर यह नज़र आने वाली दुनिया में नहीं मिल रहा है तो फिर इसे नज़र से परे कहीं और मिलना ही चाहिए। यह एक तार्किक बात है।
दुनिया में हरेक घटना का भौतिक परिणाम निकलता है लेकिन नैतिक परिणाम नहीं निकलता। अगर एक आदमी आग में हाथ डालता है तो उसका हाथ जल जाता है। यह इस घटना का भौतिक परिणाम है लेकिन अगर एक दबंग समुदाय किसी कमज़ोर समुदाय के लोगों को ज़िंदा जला देता है तो उसका कोई नैतिक परिणाम यहां नहीं निकलता। विजयी देश को कोई भी युद्ध अपराधी घोषित नहीं कर पाता। जिस घर में कोई बहू दहेज के लिए जला दी जाती है। उसी घर में मृतका की छोटी बहन को उसी युवक से फिर ब्याह दिया जाता है। ऐसी घटनाएं आम हैं। इन सभी घटनाओं को हम सभी देखते हैं और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार निष्कर्ष भी निकालते हैं। इन घटनाओं के आधार पर हम अपने निष्कर्षों में अलग अलग हो जाते हैं। एक वर्ग यह मानता है कि बस यही दुनिया सब कुछ है। इससे परे जीवन होता ही नहीं है। ऐसी दशा में न्याय की आशा संभव नहीं रहती।
जबकि दूसरा वर्ग यह निष्कर्ष निकालता है कि यह दुनिया कर्म करने की जगह है और मरने के बाद आदमी वहां चला गया है जहां उसे अपने कर्मों का अंजाम भुगतना है। इस दशा में न्याय की आशा ज्यों की त्यों बनी रहती है।
हमें वह काम करना चाहिए जिससे समाज में ‘न्याय की आशा‘ समाप्त न होने पाए। ऐसी मेरी विनम्र विनती है विशेषकर आप जैसे विद्वानों से। ...

DR. ANWER JAMAL said...

बौद्ध और जैन क्रांतियां स्वाभाविक थीं
धर्म एक लोकहितकारी व्यवस्था है। बाद में इसे बिगाड़ दिया गया और इसकी सारी व्यवस्था का लाभ एक वर्ग विशेष लेने लगा। राजनैतिक और सामाजिक हालात ख़राब से ख़राबतर हो गए तो समाज के बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। बहुत से अन्य विद्वानों के साथ महावीर जी और सिद्धार्थ गौतम जी ने भी अपना विरोध दर्ज कराया। अन्य पंथ समय के साथ मिट गए और ये दोनों बचे रह गए। दोनों की ही मान्यताएं अलग-अलग हैं। यह बात भी यही प्रमाणित करती है कि एक ही माहौल में रहने के बावजूद अलग-अलग बुद्धि वाले लोग अलग अलग निष्कर्ष निकालते हैं। महावीर जी आत्मा को मानते हैं लेकिन तथागत आत्मा को नहीं मानते।
मान्यताएं कितनी भी अलग क्यों न हों ?
हमें समाज पर पड़ने वाले उनके प्रभावों का आकलन ज़रूर करना चाहिए और देखना चाहिए कि यह मान्यता समाज में आशा और अनुशासन , शांति और संतुलन लाने में कितनी सहायक है ?
इसे अपनाने के बाद हमारे देश और हमारे विश्व के लोगों का जीना आसान होगा या कि दुष्कर ?
इसके बावजूद भी मत-भिन्नता रहे तो भी हमें अपने-अपने निष्कर्ष के अनुसार समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए यथासंभव कोशिश करनी चाहिए और इस काम में दूसरों से आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।
मेरे लेख की मंशा से आप सहमत हैं। इसके लिए मैं दिल से आपका आभारी हूं।
धन्यवाद !

DR. ANWER JAMAL said...

... निम्न लेख भी विषय से संबंधित है और आपकी तवज्जो का तलबगार है :
धार्मिक आस्था, ईश्वर और आत्मा की अमरता में आस्था मनुष्य के दिमाग में विश्वास स्वाभाविक और प्राकृतिक तरीके से होते हैं The Great Discovery

DR. ANWER JAMAL said...

@ आदरणीय सुनील दीपक जी ! हमने अपने लेख में औरत को मर्द से कमतर नहीं बताया है बल्कि भिन्न बताया है। औरत और मर्द के तन-मन की संरचना प्राकृतिक रूप से भिन्न होती है, यह एक तथ्य है। औरत के अपने कर्तव्य हैं और मर्द के अपने। दोनों के तन-मन उनके कार्य की प्रकृति के अनुरूप हैं। हरेक अपने स्वाभाविक गुणों के अनुरूप ही बना रहे, यह उत्तम माना जाता है और जो इसके विपरीत करता है वह अधम माना जाता है। औरतें बुज़दिल नहीं होतीं लेकिन उनका स्वभाव प्रायः होता है। इसके बावजूद अपने लोगों का ख़ून बहते देखकर अगर वह कठोर हो जाए और हमलावरों को ढेर कर दे तो यह स्वाभाविक है। रानी लक्ष्मीबाई का काम तो बिल्कुल स्वाभाविक था और मर्दों का लिबास युद्ध आदि की ज़रूरतों को पूरा करता है। इसीलिए उन्होंने उसे धारण किया। इससे उनकी परफ़ॉर्मेंस बेहतर हुई लेकिन बाबा रामदेव जी ने जो किया, वैसा करना न तो सन्यास आश्रम के यम-नियम में आता है और न ही यह भारत के सत्याग्रहियों की रीत रही है बल्कि जो मर्द होगा वह भी ऐसा न करेगा। एक नया सा काम हुआ, इसीलिए हमें अटपटा लगा। बाक़ी हमें तो ख़ुशी है कि चाहे लोकाचार का उल्लंघन करके ही सही लेकिन बाबा अपनी निजी जान बचाने में कामयाब हो गए। अगर वे भीड़ की धक्का-मुक्की में कुचल गए होते तो पूरे मुल्क में दंगे हो रहे होते। हम तो यही चाहेंगे कि सत्याग्रह और अनशन आदि के शौक़ बाबा अपने आश्रम में पूरे कर लिया करें ताकि उनके अनाड़ीपन की वजह से देश में दंगे के हालात पैदा न हों।
आप हमारे ब्लॉग पर आए और हमारे लेख की मंशा से सहमत हैं। इसके लिए हम आपके शुक्रगुज़ार हैं।
धन्यवाद !

सलीम ख़ान said...

great article!

Swachchh Sandesh

एम सिंह said...

वाह अनवर जमाल जी, आपको क्‍या कहा जाए? आप सुनील दीपक जी की बात का जवाब नहीं दे पाए. बच्‍चे को जब तकलीफ होती है तो वह मां के आंचल में आकर छिपता है. अगर वही बच्‍चा बड़ा होकर अपने बचाव के लिए जनाना कपड़े पहन ले तो बुराई क्‍या है?
सोचिए कभी आपकी जान पर बन आए और आपके सामने जनाना कपड़े पहनकर जान बचाने का ही चारा हो तो आप क्‍या करेंगे?
देश है वीर जवानों का गीत पर नाचने वाले नाचें नहीं. मतलब 22 लोगों का अपहरण हो गया तो अब देश में कोई नाच-गा भी नहीं सकता. क्‍या आप जानते हैं नृत्‍य कितने प्रकार का होता है? हर भाव के लिए अलग नृत्‍य है. दुख के लिए सुख के लिए. हर कोई इसमें पारंगत नहीं हो सकता पर उस भाव में आकर नाच तो सकता ही है. भगवान शिव का तांडव आपने पढ़ा ही है.
आप लोग क्‍यों नहीं घर बैठे मक्‍का घूम लेते? क्‍यों जाते हैं वहां? वहां भी भगदड़ मचती है, वहां भी लोग मरते हैं. रामदेव अगर दिल्‍ली पहुंचकर अनशन करे तो आपको बुरा लगता है, आपके नेता वहां बैठे देश को चाट रहे हैं, वह अच्‍छा है. आपकी सोच की दाद देनी होगी सर.
जब उमर अब्‍बदुला जैसे लोग, जिनका डीएनए टेस्‍ट कराया जाए तो जवाहरलाल नेहरू के अंश निकलेंगे, अर्थात जो नाजायज हैं, वह राजनीति कर सकते हैं तो आपको हिजड़ों, तवायफों और समलैंगिकों से दिक्‍कत क्‍यों है. वे भी अल्‍लाह के बनाए बंदे हैं और वह जिससे जैसा चाहे, वैसा करवाता है. क्‍या आप इस बात में विश्‍वास नहीं करते?

अब बात करता हूं आपके दूसरे लेख की-
आपने कहा आदमी विपत्तिकाल में ही पहचाना जाता है. ठीक है. आगे आपने कहा- जरा सी मु‍सीबत... जरा एक बार फिर से देख लीजिए कि वह मुसीबत कितनी जरा सी थी. अगर आपके घर में कोई समारोह चल रहा हो और 100-200 लोग जमे हों. एकाएक कोई आप लोगों पर हमला बोल दे... आपकी एक न सुने... तो आप क्‍या करेंगे? कृपया इसका जवाब दीजिएगा.

संजय भास्कर said...

इस आलेख के लिए आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्द आलेख!
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आजकल के भ्रष्ट नेताओं से महारानी की तुलना कौन कर पाएगा!
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मगर इनकी आँखों पर तो स्वार्थ का मोतियाबिन्द आया हुआ है!
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ऑप्रेशन की जरूरत है!

सुशील बाकलीवाल said...

वो सुबह कभी तो आएगी...