Tuesday, February 15, 2011

हज़रत मुहम्मद साहब स. का आदर्श और विश्व शांति Islam the peace

सच्चे दीन-धर्म का सच्चा बोध
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. इंसानियत पर अहसान करने वालों में सबसे बढ़कर हैं। इंसानियत पर उनके जो अहसान हैं, उन्हें वह कभी भुला नहीं सकती। उन्होंने इंसानियत को भूला हुआ सबक़ याद दिलाया, एक ऐसे वक्त में जबकि दुनिया अपने पालनहार को लगभग भुला चुकी थी या फिर ईश्वर में विश्वास रखने के नाम पर वह तरह तरह के अंधविश्वासों में जकड़ी हुई थी। धर्म का रूप विकृत हो चुका था। धर्म लोगों के जीवन में एक व्यवहार की तरह बाक़ी नहीं बचा था। मात्र कर्मकांड को अंजाम देना, उपासना करना और सभ्य जीवन को छोड़कर एकांतिक साधनाएं करने का नाम धर्म समझा जाने लगा था। ईश्वर के बारे में तरह तरह की कल्पनाएं लोगों के मन में जड़ें जमा चुकी थीं। ईश्वर में भी लोग
खाने-पीने, सोने-जागने, लड़ने-डरने और मौत के डर से मैदान छोड़कर भागने जैसे गुण ही नहीं बल्कि औरतों के साथ मैथुन करने और अपनी संतान के लिए अन्याय करने जैसे गुण भी मानते थे। ईश्वर के बारे में अन्याय और पक्षपात करने जैसी बातें मानने का लाज़िमी नतीजा यही था कि जो पुरोहित खुद को ईश्वर के प्रतिनिधि के तौर पर पेश कर रहे थे और समाज के पेशवा बने बैठे थे, वे खुद अन्याय और पक्षपात कर रहे थे और वास्तव में उन्होंने ईश्वर और उसके संदेशवाहकों के बारे में ऐसी कहानियों को रिवाज ही इसलिए दिया था कि वे समाज के सामने अपने अन्याय और पक्षपात को न्याय और धर्म सिद्ध करके उनका शोषण निर्बाध रूप से कर सकें। ऐसा किसी एक मुल्क में नहीं था बल्कि पूरी दुनिया का हाल यही था जबकि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने उस सच्चे दीन-धर्म को याद दिलाना शुरू किया जिसे हर इलाक़े के इंसानों ने भुला दिया था। ईश्वर, उसकी वाणी, उसका धर्म और उसके संदेशवाहकों के बारे में इंसानियत के पास उस समय शुद्ध ज्ञान का घोर अभाव था। उन्होंने लोगों के अंदर ईश्वर और उसके धर्म का सही बोध जगाने की कोशिश की और मालिक की अपार दया से वे इस कठिन काम में कामयाब भी रहे।
परलोक है इंसान की असल मंज़िल
उन्होंने इंसान की व्यक्तिगत और सामूहिक ज़िंदगी के हरेक पहलू का सुधार किया और उन सभी को ऐसी बुनियादों पर तामीर किया जिससे इंसान दुनिया की ज़िंदगी के साथ परलोक की ज़िंदगी में भी सफल हो सके। परलोक, वह शाश्वत लोक जिसके लिए कि वास्तव में इंसान को रचा गया है और इंसान अपनी उस असल मंज़िल को ही भुला बैठा। सिर्फ़ पैग़म्बरे इस्लाम की मुबारक हस्ती ही थी जिसने अपने समाज को अपनी ज़िंदगी में ही पूरी तरह बदल कर एक ऐसी नस्ल उठाई जिसने पूरी मानव जाति के नज़रिये को ही बदल कर रख दिया। उनके ही प्रभाव की वजह से मानव जाति के ज्ञात इतिहास में पहली बार मानवीय एकत्व, बराबरी और सम्मान जैसे मूल्यों का समाज में रिवाज हो सका। इन मूल्यों पर उन्होंने इतना ज़ोर दिया कि उनके अनुयायियों के ही नहीं बल्कि उनके प्रभाव में आने वाली सारी इंसानियत के चिंतन का यह अटूट हिस्सा बन गया।
उनकी शख्सियत का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों की महज़ ज़बानी तालीम ही नहीं दी बल्कि उसके मुताबिक़ अमल करके भी दुनिया के सामने एक व्यवहारिक आदर्श क़ायम किया। इस वक्त दुनिया में जहां भी मानवीय मूल्य और मानवाधिकार सुरक्षित हैं , वह सब पैग़म्बर स. की तालीम का ही असर है।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब का सबसे बड़ा चमत्कार
चमत्कार को नमस्कार करने वाली दुनिया यह देख सकती है कि यह सब कारनामे उस शख्स ने किये हैं जो बचपन में ही अनाथ हो गया था, बचपन और जवानी की कठिनाईयों से संघर्ष में उन्हें किसी से पढ़ने का अवसर ही न मिला, जीवन का अक्सर हिस्सा ग़रीबों की सोहबत और गुरबत में बीता। वे अनपढ़ थे लेकिन लोगों के चेहरों से झलकने वाली पीड़ा को भी वे पढ़ना जानते थे और उस पीड़ा का अहसास भी वे अपने मन में पढ़ लेते थे जिसे ज़माना अपनी जहालत और गुटबाज़ी की वजह से भोग रहा था। इसका सबसे ज़्यादा शिकार पूरी दुनिया में ग़रीब और कमज़ोर तबक़ा हो रहा था। अरब में भी ग़रीब लोग, गुलाम, औरतें और बच्चे जुल्म की चक्की में पिस रही थीं और उनकी मुक्ति का कोई उपाय किसी अक्ल को सुझाई न देता था। कन्या को पैदा होते ही मार देना वहां आम रिवाज था। व्यक्तिगत सोच की उस क़बीलाई समाज में कोई गुंजाइश ही न थी। एक क़बीला अपने आदमी की हत्या का बदला लेने के लिए दूसरे क़बीले के किसी भी आदमी को मार डालता था और फिर इंतक़ाम का यह सिलसिला कभी बंद नहीं होता था। कई बार तो क़बीले यह तक भूल जाते थे कि यह सिलसिला शुरू किस घटना से हुआ था। उन्हें याद रहता तो बस सिर्फ़ इंतक़ाम। ऐसे ही हालात ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के दिल को तड़पा दिया था और वे घर से अलग होकर मक्का से बाहर एक गुफ़ा ‘हिरा‘ में तन्हाई में बैठे तड़पा करते थे कि इंसानियत का दुख-दर्द दूर कैसे हो ?

उद्धार के लिए ‘अनुपम ज्ञान‘ का अवतरण
तब उनकी तड़प देखकर दयालु पालनहार प्रभु ने उनके अंतःकरण पर अपना ‘ज्ञान‘ अवतरित किया। ऐसा ज्ञान जिसे बनाना किसी अनपढ़ आदमी के तो क्या किसी बड़े से बड़े पढ़े-लिखे आदमी के बस की भी बात नहीं है। सिर्फ़ एक पढ़ा-लिखा आदमी ही नहीं बल्कि विद्वानों की एक पूरी सभा मिलकर भी ‘कुरआन‘ जैसा ज्ञान नहीं बना सकती। पूरी दुनिया के विद्वान मिलकर भी कुरआन जैसी बात कभी न कह सके हैं और न ही आज कह सकते हैं और यह चैलेंज कुरआन के मानने वाले अब नहीं करते बल्कि अपने अवतरण काल से ही यह चैलेंज खुद कुरआन करता है।
आज भी जब किसी देश का संविधान बनाया जाता है तो एक पूरी सभा मिलकर उस संविधान को बनाती है और फिर गुज़रता हुआ वक्त उन्हें उस संविधान के मौलिक सिद्धांतों तक में तब्दीली करने पर मजबूर करता रहता है। बदलते हुए राजनीतिक परिवर्तन भी उन्हें पलटकर रख देते हैं लेकिन इस्लामी क़ानून जिन्हें हज़रत मुहम्मद स. ने अपने मालिक की ओर दुनिया को दिया वह उन प्राकृतिक नियमों ही हिस्सा हैं जो कि खुद इंसानी स्वभाव है, जिसे न कोई दार्शनिक बदल सकता है और न ही कोई राजनीतिक प्रभाव। हरेक दबाव में रहने के बावजूद इंसानियत जैसे ही उन दबावों से मुक्त होकर विचार करेगी तो उसके अंदर से जो मांग उठेगी उसे इस्लामी क़ानून के अलावा किसी अन्य चीज़ से पूरा करना संभव ही नहीं है।
जिन जिन देशों में ऊंचनीच को दार्शनिक पुट देकर सभ्यता का अंग बना दिया गया था और हज़ारों साल तक इंसानियत के अवचेतन तक में उसे बिठा दिया गया, उन देशों में भी जब इंसानियत को सोचने और करने की ज़रा सी आज़ादी मिली तो उन्होंने तुरंत ऊंचनीच के उस सिस्टम पर लात मारकर बराबरी के उसूल को कुबूल कर लिया और फिर बाद में ऊंचनीच के अलम्बरदारों ने भी ऊंचनीच और छूतछात के अमानवीय उसूलों को खुद ही मजबूर होकर कैंसिल कर दिया क्योंकि आज कहीं भी उन उसूलों की पूछ नहीं है बल्कि जो कोई उन उसूलों की तालीम देने की कोशिश करेगा, विश्व भर के सभ्य समाज में ज़लील माना जाएगा। ज़िल्लत के डर से , लोगों द्वारा त्याग दिये जाने और पिछड़ जाने के डर से अपने दर्शन के मौलिक सिद्धांतों को तिलांजलि देकर इस्लाम के उसूलों को अपनाने पर उन्हें मजबूर होना पड़ा। ऐसा क़ायदा-क़ानून एक अनपढ़ व्यक्ति ने दिया है, क्या यह चमत्कार नहीं है ?
क्या यह काफ़ी नहीं है कि आदमी जान ले कि इस्लाम मुहम्मद साहब की देन नहीं है बल्कि दयालु पालनहार की देन है। इस्लाम पालनहार का मानव जाति पर एक महान उपकार है और यह पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. के माध्यम से मिला। हज़रत मुहम्मद स. ने इस्लाम के अनुसार व्यवहार करके मानव जाति के हरेक संशय का निराकरण कर दिया है।

पूर्व ज्ञान और पूर्व काल के ऋषियों की पुष्टि कुरआन से
मानव जाति के महान सुधारक और शिक्षक का शिक्षक खुद पालनहार प्रभु है जो सर्वज्ञ है और जिसके सामने हरेक काल की हरेक घटना बिल्कुल स्पष्ट है। उसी ने उनके अंतःकरण पर कुरआन अवतरित किया और कुरआन को भी उसने सदा के लिए सुरक्षित कर दिया है। न तो मुहम्मद साहब स. अपने से पूर्व आने वाले ऋषियों-नबियों का खंडन करते हैं और न ही कुरआन अपने से पूर्व आ चुके ईशवाणी के संस्करणों को ही नकारता है बल्कि इसके विपरीत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. अपने से पूर्व आने वाले तमाम ऋषियों और नबियों की पुष्टि और समर्थन करते हैं और कहते हैं कि उनका आगमन भी उनकी भविष्यवाणी को ही पूरा करता है और वे कोई नया धर्म नहीं सिखा रहे हैं बल्कि वे ‘दीने क़य्यिम‘ अर्थात सनातन धर्म की ही पुनस्र्थापना कर रहे हैं। कुरआन भी जगह-जगह अपने पूर्व अवतरित ईशवाणी के सभी संस्करणों की पुष्टि करता है और कहता है जो ‘ज्ञान‘ ईश्वर की ओर से मानव जाति को पहले मिल चुका है उसके सिद्धांतों को सामने रखकर मुझे परख लीजिए, आपको कोई भी मौलिक अंतर हरगिज़ न मिलेगा।
इस खुली हक़ीक़त के बावजूद कुरआन, इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम पर बेबुनियाद आरोप लगाने में प्रपंची लोग कोई झिझक महसूस नहीं करते। इसका नुक्सान सिर्फ़ मुसलमानों को ही नहीं बल्कि सारी इंसानियत को पहुंचता है क्योंकि पैग़म्बर साहब स. की शिक्षा से हटने के बाद कुछ भी करना सिर्फ़ और सिर्फ़ गुमराही है। इसे जब चाहे और जो चाहे आज़मा सकता है। उनका वुजूद सारी दुनिया के लिए रहमत है क्योंकि उनसे जुड़ने के बाद ही इंसान को सही-ग़लत और जायज़-नाजायज़ का इल्म हासिल हो सकता है जो कि इंसान होने की बुनियादी शर्त है। इंसान को इंसानियत की बुनियाद उपलब्ध कराने वाले आज अगर कोई हैं तो वह केवल पैग़म्बरे इस्लाम स. हैं। यह एक हक़ीक़त भी और दावा और चैलेंज भी। (अलकुरआन, अलअंबिया, 107)

‘ज्ञान‘ का महत्व
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. पर ईश्वरीय प्रकाशना की शुरूआत ‘इक़रा‘ शब्द से हुआ। उन्होंने ज्ञान पाने पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया और सिर्फ़ कुरआन का ही ज्ञान नहीं बल्कि हर वह ज्ञान और कला जो समाज और सभ्यता के लिए नफ़ाबख्श हो। उन्होंने एक बार फ़रमाया-
‘उत्लुबुल इल्मु वलौ काना बिस्सीन‘ (अलहदीस)
‘इल्म हासिल करो चाहे चीन ही क्यों न जाना पड़े।‘
ज़ाहिर है कि चीन में कुरआन और शरीअत का तो इल्म नहीं था लेकिन काग़ज़ आदि बनाने की कई ज़रूरी कलाओं को चीन से सीखा जा सकता था जो कि इल्म को सुरक्षित रखने और उसे फैलाने में अहम रोल अदा कर सकती थीं और उन्होंने अपना अहम रोल अदा किया भी।
इस हदीस से जहां यह पता चलता है कि उन्होंने इल्म हासिल करने पर कितना ज़ोर दिया वहीं यह भी पता चलता है कि उनकी नज़र में हरेक नफ़ाबख्श इल्म हासिल करने के लायक़ था और दीन के मुताबिक़ जायज़ था। उन्होंने इल्म को ‘दीनी इल्म‘ और ‘दुनियावी इल्म‘ के टुकड़ों में तक़सीम नहीं किया था जैसा कि आज के दीनदार कहलाने वाले लोग कर चुके हैं। उनकी नज़र अरब क़ौम को किसी ग़ैर अरब क़ौम पर भी श्रेष्ठता प्राप्त नहीं थी, यह भी इसी हदीस से पता चलता है। अहंकार का पहला नुक्सान यह होता है कि आदमी अपनी क़ौम को सबसे श्रेष्ठ मानकर यह समझने लगता है कि उसकी क़ौम के अलावा दूसरी तमाम क़ौमें घटिया हैं और जो कुछ उनके पास है वह भी घटिया है, हम श्रेष्ठ हैं, हमें किसी घटिया क़ौम से घटिया चीज़ें सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है। इस तरह अहंकार ज्ञान पाने से रोकता है और इंसानियत को नुक्सान पहुंचाता है। इसके विपरीत ज्ञान अहंकार को मिटा डालता है और इंसानियत का कल्याण करता है। दोनों चीज़ें एक साथ एक दिल में जमा नहीं हो सकतीं।

अहंकार बाधक है सत्य अपनाने में
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई को मानने से जो चीज़ रोकती है वह भी केवल अहंकार है वर्ना तो आदमी अगर एक नज़र उनके सुधार कार्यों पर डाल ले तो वह उनकी सच्चाई का क़ायल हो जाता है। उन्होंने लोगों को गुलाम आज़ाद करने की प्रेरणा दी और लोगों ने गुलाम आज़ाद करने शुरू किए और बहुत थोड़े ही अर्से में गुलाम आज़ाद भी हो गए और उनका पुनर्वास भी इस तरह हो गया कि वे बराबरी के दर्जे के साथ उसी समाज का अंग बन गए। उन्होंने नशा छोड़ने का हुक्म दिया और तमाम देहातों और नगरों के लोगों ने अपनी शराब नाली में बहा दी। उन्होंने कन्या की हत्या से रूकने का हुक्म दिया और लोग रूक गए। न सिर्फ़ उनके ज़माने के अनुयायी रूक गए बल्कि उनके बाद के ज़मानों के अनुयायी आज तक इस घिनौने जुर्म से रूके हुए हैं, जिससे आज हुकूमत भी लोगों को रोक पाने में नाकाम है।

पैग़म्बर साहब स. के सुधार कार्य

मुसलमानों की इल्म और अमल की तमाम कमज़ारियों के बावजूद भी मुस्लिम समाज में कन्या भ्रूण हत्या शून्य है तो यह केवल पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षाओं का ही प्रभाव है।
उन्होंने लोगों से कहा कि वे क़र्ज़दारों पर अपना ब्याज माफ़ कर दें, उन्हें बिना ब्याज के क़र्ज़ दें और मालदार लोग सदक़ा-फितरा आदि दान के अलावा ज़रूरतमंदों को अपने बढ़ने वाले माल का 2.5 प्रतिशत हिस्सा उनके कल्याण के लिए दें बिना यह सोचे कि उनसे किसी भी तरह का कोई बदला या फ़ायदा उठाया जाए। लोगों ने ऐसा किया तो समाज के हरेक सदस्य की बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति यक़ीनी हो गई। आज भी अगर लोग ईमानदार हो जाएं और उस समाज की तरह कालाबाज़ारी, जमाख़ोरी और मिलावट छोड़ दें, सूद-ब्याज लेना छोड़ दें और अपने बढ़ने वाले माल का 2.5 प्रतिशत समाज के ज़रूरतमंदों को देने लगें तो समाज से गुरबत और शोषण का सफ़ाया हो जाएगा बिना किसी आंदोलन और बिना किसी क्रांति के। आज दुनिया में अगर ये समस्याएं मौजूद हैं तो केवल इसलिए कि अहंकार और अज्ञान के कारण इंसानियत पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षाओं का पालन अपने लिए अनिवार्य नहीं मानती हालांकि वह उन्हें एक महान सुधारक भी मानती है।
उनके आगमन से पहले दुनिया की अक्सर क़ौमें सांप्रदायिकता और धड़ेबंदी की शिकार थी और एक दूसरे का खून बहाना उनके लिए गर्व की बात थी। अरब के क़बीले भी दुनिया की दूसरी क़ौमों की तरह आपस में एक दूसरे का खून बहा रहे थे। उनकी शिक्षा के कारण वह सब खून-ख़राबा बंद हुआ और उसका असर पूरी दुनिया तक पहुंचा।
मानव जाति के उनके उपकारों में से एक यह भी है उन्होंने इस्लाम के आह्वान के बावजूद अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले हरेक मत के लोगों को यह आज़ादी दी कि वे अपने मत पर भी क़ायम रह सकते हैं और अपनी मज़हबी रस्मों को भी अंजाम दे सकते हैं। उनका मत कुछ भी हो लेकिन वे बाहरी हमलावर को एक साझा दुश्मन समझें और सभी लोग एकता के साथ उनका मुक़ाबला करें। इस संधि को ‘मीसाक़े मदीना‘ के नाम से जाना जाता है।

विश्व शांति केवल इस्लाम से
यह सिद्धांत आज भी दुनिया के सामने एक आदर्श है। इसका उद्देश्य भी शांति ही था। इस्लाम केवल शांति है और शांति दुनिया में केवल इस्लाम के उसूलों से ही आ सकती है। इस्लाम केवल व्यक्तिगत शांति की बात नहीं करता बल्कि वह व्यक्तिगत शांति के साथ सामूहिक शांति की बात भी करता है। पैग़म्बरे इस्लाम ने केवल शांति की बात ही नहीं की बल्कि उन कारणों को भी बताया जिनकी वजह से समाज में ग़रीब और अमीर तबक़ों के दरमियान फ़ासला और नफ़रत दोनों ही बढ़ते हैं। जिनकी वजह से समाज के लड़के और लड़कियों के विवाह देर से होते हैं वे बेचैन और अशांत रहते हैं। ग़र्ज़ यह कि अशांति कि जितने भी रूप और कारण हो सकते थे, उन्होंने उन सबकी निशानदेही भी की और उनका निवारण करके समाज में शांति स्थापित भी की और उन उसूलों पर चलकर आज भी विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है।
आज भी विश्व में जहां भी शांति की कोई भी गंभीर कोशिश चल रही है, आप उसे ग़ौर से देखिए और उसके सिद्धांतों को देखिए, वहां आपको इस्लामी सिद्धांत ही नज़र आएंगे।
पैग़म्बरे इस्लाम स. की विजय की अस्ल ताक़त उनका नज़रिया, उनके उसूल, उनका चरित्र और उनका व्यवहार था। वे इंसान को हर हाल में एक इंसान मानते थे और उसे हर हाल में एक इंसान का सम्मान देते थे चाहे वह इंसान मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम, चाहे ज़िंदा हो या फिर मुर्दा।
पैग़म्बर साहब स. अगर किसी ग़ैर मुस्लिम (यहूदी) का जनाज़ा भी पास से गुज़रते हुए देखते तो खड़े हो जाते थे। इस पर उनके सत्संगी साथी उनसे पूछते थे कि तो आप कहते थे कि ‘क्या यह इंसान नहीं है ?‘ (बुख़ारी)

पैग़म्बरे इस्लाम स. की शिक्षाएं
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की शिक्षा यह है कि
‘ऐ लोगो ! तुम्हारा रब पालनहार एक है और तुम्हारा बाप भी एक है। तुम सब आदम की औलाद हो और आदम मिट्टी से बने थे। अल्लाह के नज़्दीक तुम में सबसे ज़्यादा प्रतिष्ठित वह है जो तुम में सबसे ज़्यादा जुर्म और पाप से बचने वाला है। किसी अरबी को किसी ग़ैर अरबी पर, किसी गोरे को काले पर बड़ाई हासिल नहीं। बड़ाई सिर्फ़ अल्लाह से डरने के सबब है। यही बड़ाई का पैमाना है, कसौटी है।‘
‘सारी मख्लूक अल्लाह का कुन्बा है, बस तुम में सबसे अच्छा वह है जो अल्लाह के कुन्बे के साथ अच्छा सुलूक करे।‘
‘ख़बरदार, जुल्म न करना, ख़बरदार जुल्म न करना। मेरे बाद मुन्किर न हो जाना कि एक दूसरे की गर्दनें मारने लगो। कोई भी समुदाय सत्य के मार्ग पर रहने के बाद गुमराह हुई है तो उसका सबब यह है कि वे आपस में लड़ बैठे। मुसलमान वह है जिसकी ज़बान और हाथ की तकलीफ़ से लोग महफ़ूज़ रहें। क़ियामत के रोज़ मेरी नज़र में सबसे ज़्यादा प्यारे और मेरे सबसे ज़्यादा क़रीब वह शख्स होगा जिसके अख़लाक़ सबसे अच्छे होंगे। अल्लाह ने मुझे बेहतरीन अख़लाक़ और बेहतरीन आमाल की तकमील के लिए भेजा है। एक मीठा बोल और किसी बात को दरगुज़र कर देना उस सदक़ा और ख़ैरात से बेहतर है जिसके पीछे दुख देना हो। ऐ ईमान वालो, न तो मर्द ही मर्दों का मज़ाक़ उडाएं, मुमकिन है कि वे उनसे बेहतर हों और न ही औरतें औरतों का मज़ाक़ उड़ाएं। हो सकता है कि वे उनसे बेहतर हों और न अपनों पर व्यंग्य करो और न ही एक दूसरे को बुरी उपाधि से पुकारो। बदगुमानी से बचो क्योंकि बाज़ गुमान गुनाह होते हैं और न किसी की टोह में रहो और न ही तुम में से कोई किसी की पीठ पीछे बुराई करे। क्या तुम में से कोई यह बात पसंद करेगा कि अपने मुर्दा भाई का मांस खाए ? तुम उससे नफ़रत करोगे। अल्लाह से डरते रहो और अल्लाह तौबा कुबूल करने वाला है। वादा पूरा करो। क़ियामत के दिन वादे के बारे में लाज़िमी तौर पर पूछा जाएगा। जो कोई अल्लाह और परलोक पर यक़ीन रखता है, वह अपने पड़ोसी को तकलीफ़ न पहुंचाए। खुदा की क़सम वह मोमिन नहीं जिसका पड़ोसी उसके शर से महफ़ूज़ न हो। अल्लाह को यह बात सख्त नापसंद है और वह मोमिन नहीं, जो खुद तो पेट भर कर खाए और उसका पड़ोसी भूखा सो जाए।‘
आज दुनिया में कोई आदमी ऐसा नहीं है जो यह कहे कि उसे इस तालीम की ज़रूरत नहीं है। कोई भी आदमी इस शिक्षा से अच्छी शिक्षा ला नहीं सकता और न ही आज इस शिक्षा को नज़रअंदाज़ करके वह सभ्य समाज में कोई इज़्ज़त ही पा सकता है। दूसरों से ज़्यादा आज खुद मुस्लिम समाज को इस बात की बेहद ज़रूरत है कि वह खुद को पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. की तालीम की रौशनी में जांचे और देखे कि उसके पड़ोसी को उससे कोई तकलीफ़ तो नहीं पहुंच रही है। वह इस बात का कितना ध्यान रखता है कि उसके पड़ोस में कोई भूखा, बीमार और परेशान तो नहीं है।

समाज में किसकी प्रतिष्ठा होती है और क्यों ?
याद रखिए, यह समाज उपयोगिता के सिद्धांत पर ही चलता है। अगर आप अपने आस पास के लोगों की तकलीफ़ें दूर करने के लिए भागदौड़ करते हैं, उनकी बीमारी और उनकी मौत के वक्त आप उन्हें सहारा देते हैं तो फिर उनके दिलों में आपके लिए सम्मान पैदा होने से दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती। अगर आपका अख़लाक़ अच्छा है तो फिर लोग खुद ब खुद आपको अच्छा समझेंगे और आपको इज़्ज़त देंगे, आप पर विश्वास करेंगे और अपने अहम कामों में आपको अपना राज़दार बनाएंगे। आपकी नेकी आपको दुनिया में इज़्ज़त दिलाएगी, आपकी साख बनाएगी, आपकी साख आपके लिए समृद्धि का द्वार खोल देगी। एक व्यापारी अपनी साख का ख़याल सबसे ज़्यादा रखता है। उसकी सारी समृद्धि का दारोमदार उसकी साख पर ही होता है।
अगर आज मुसलामान की साख पर सवालिया निशान लगते हैं तो उसका कारण यह नहीं है कि वह इस्लाम पर चलता है बल्कि इसका कारण यह है कि वह इस्लाम पर ठीक से नहीं चलता है। कुरआन पढ़ने और समझने से जी चुराना, उसके हुक्म को नज़रअंदाज़ करके अपनी ख्वाहिश और समाज की रस्मों के मुताबिक़ जीना, ज़कात अदा न करना, औरतों को विरासत में हिस्सा न देना, दहेज लेना और दिखावे और शान के लिए दिलेरी के साथ गुनाह करना आज अक्सर मुसलमानों का अमल है। धड़ेबंदी करना और खून बहाना भी मुसलमानों में देखा जा सकता है। ये तमाम बातें वे हैं जिनसे पैग़म्बरे इस्लाम ने रोका है। मुसलमान वह है जो उन कामों से रूक जाए जिन कामों से पैग़म्बरे इस्लाम स. ने रूकने के लिए कहा है। इस ज़मीन पर शांति की स्थापना के लिए ऐसा करना निहायत ज़रूरी है। मुसलमान ऐसा करेंगे तो उनका आचरण उन लोगों के लिए भी प्रेरणा बनेगा जो कि शांति के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं, जो कि जीवन के उद्देश्य के बारे में सोचते हैं कि जीवन क्यों है और कौन सा मार्ग है जो उन्हें उनकी असल मंज़िल तक पहुंचा सकता है ?


आपकी असल मंज़िल आपके सामने है, अपने क़दम बढ़ाइये
पैग़म्बरे इस्लाम की ज़िंदगी और उनकी शिक्षा इंसान को उसके हर सवाल का जवाब देती है। मुस्लिम और ग़ैर-मुस्लिम हरेक इंसान इस तथ्य को जब चाहे देख सकता है, उसका कल्याण इसी में है। किसी भी कारण की वजह से आदमी को सच्चाई को स्वीकारने में और खुद को सुधारने में देर नहीं करनी चाहिए। इंसान होने का अर्थ तो यही है। जो इस गुण से ख़ाली है, वह इंसान होने का दावेदार तो हो सकता है लेकिन इंसान नहीं हो सकता।

2 comments:

एस.एम.मासूम said...

अनवर भाई , बहुत दिनों बाद एक अच्छी पोस्ट पढने को मिली

DR. ANWER JAMAL said...

शुक्रिया जनाब मासूम साहब ।