Tuesday, March 29, 2011

फ़ानूस बनके जिसकी हिफ़ाज़त हवा करे / वो शम्मा क्या बुझे जिसे रौशन ख़ुदा करे Rest is rust , Work is worship.

शम्मा ए हक़ नूरे इलाही को बुझा सकता है कौन
जिसका हामी हो ख़ुदा
उसको मिटा सकता है कौन
फ़ानूस बनके जिसकी हिफ़ाज़त हवा करे
वो शम्मा क्या बुझे जिसे रौशन
ख़ुदा करे

लीजिए साहिबान ! ताज़ा दम होकर हम एक बार फिर आपके मार्गदर्शन के लिए वापस आ चुके हैं।
आपको जीवन में कोई भी मसला परेशान करे तो आप हमसे बेहिचक पूछ सकते हैं और अगर आप खुद हमसे ही परेशानी महसूस करें तो भी हमें आप बता सकते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं ?
यह अधिकार केवल हमारे समर्थकों को ही नहीं है बल्कि हमारे हरेक प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित ब्लॉगर भाई को है। जो ब्लॉगर हमारे चिर विरोधी हैं, अपनी वापसी से पहले हमने उनसे कहा था कि
आप मेरे नव अवतरण की रूपरेखा बना दें
आपकी पोस्ट को मैंने दोबारा फिर पढ़ा तो मेरी नज़र आपके इस वाक्य पर अटक गई :
आप ऐसे ही करते रहे तो मेरी दुकान बंद हो जाएगी और मैं बहुत सुखी इंसान हो जाऊंगाए क्योंकि मेरा विरोध अनवर जमाल से नही उन बातों से है जिनका विरोध आपने मेरे ब्लॉग पर देखाए मेरी मौत एक सुखद घटना होगी और आपका नव अवतरण उससे भी सुखद।

इसमें कुछ बिन्दु हैं , जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए
1. मेरी दुकान बंद हो जाएगी।
2. मैं सुखी इंसान हो जाऊंगा।
3. मेरा विरोध अनवर जमाल से नहीं है।
4. मेरी मौत एक सुखद घटना होगी।
5. आपका नव अवतरण उससे भी ज़्यादा सुखद होगा।

जब इन तथ्यों पर मैं ईमानदारी से सोचता हूं तो मैं खुद चाहता हूं कि आप एक सुखी इंसान हो जाएं लेकिन मैं यह नहीं चाहता कि आपके ब्लॉग की मौत हो जाए। आप अच्छा लिखते हैं और मैं आपको पढ़ता हूं। आपने मेरी जायज़ बातों का भी विरोध किया, इसलिए मैंने आपकी बात को गंभीरता से नहीं लिया और उसका नतीजा यह हुआ कि जहां आप सही थे, उसे भी मैंने नज़रअंदाज़ कर दिया। यह मेरी ग़लती थी, जिसे कि मैंने आपकी सलाह के मुताबिक़ सुधार लिया है।
आपने मेरे नव अवतरण के प्रति भी अच्छी आशा जताई है और मैं खुद भी यही चाहता हूं कि मेरी वजह से आपमें से किसी को कोई कष्ट न पहुंचे। मेरे नव अवतरण की आउट लाइंस क्या होंगी ?
यह मैं अभी तक तय नहीं कर पा रहा हूं। इसलिए मैं चाहता हूं कि आप ही मेरे नव अवतरण की रूपरेखा तैयार कर दीजिए और मैं उसे फ़ॉलो कर लूं।
मेरे नव अवतरण की भूमिका तैयार करना खुद मेरे लिए जिन कारणों से मुश्किल हो रहा है, वे प्रश्न आपको भी परेशान करेंगे लेकिन मुझे उम्मीद है कि आपकी प्रबुद्ध मंडली उनका कुछ न कुछ हल निकालने में ज़रूर कामयाब होगी।
जो चीज़ मुझे इस वर्चुअल दुनिया में लाई है वह है ईश्वर, धर्म और धार्मिक महापुरूषों का मज़ाक़ बना लेना।
मैं इसे पसंद नहीं करता कि कोई भी व्यक्ति ऐसा करे। इनमें से कुछ लोग रंजिशन ऐसा करते हैं और ज़्यादातर नादानी की वजह से। आज भी श्रीरामचंद्र जी , श्रीकृष्ण जी और शिवजी के बारे में ग़लत बातें लिखी जा रही हैं। मुझे कोई एक भी हिंदू कहलाने वाला भाई ऐसा नज़र नहीं आया जो कि उन्हें इन महापुरूषों की सच्ची शान बता सकता। मैंने जब भी बताया तो मुझसे यह कहा गया कि आप एक मुसलमान हैं, आप हमारे मामलों में दख़ल न दें।
1. आप मुझे बताएं कि अगर हिंदू महापुरूषों और ऋषियों का अपमान कोई हिंदू करता है तो क्या मुझे मूकदर्शक बने रहना चाहिए ?
2. कुछ हिंदू भाई ऐसा लिखते रहते हैं कि कुरआन में अज्ञान की बातें हैं, अल्लाह को गणित नहीं आता, मांस खाना राक्षसों का काम है, औरतों के हक़ में इसलाम एक लानत है। इससे भी बढ़कर पैग़म्बर साहब की शान में ऐसी गुस्ताख़ी करते हैं, जिन्हें मैं लिख भी नहीं सकता। दर्जनों ब्लाग और साइटों पर तो मैं खुद अपील कर चुका हूं और ऐसे अड्डे सैकड़ों से ज़्यादा हैं। जब इस तरह की पोस्ट पर मैं हिंदी ब्लाग जगत के ‘मार्गदर्शकों‘ को वाह वाह करते देखता हूं तो पता चलता है कि अज्ञानता और सांप्रदायिकता किस किस के मन में कितनी गहरी बैठी हुई है ?
ऐसी पोस्ट्स पर मेरी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए ?

3. मैं अपने देशवासियों में अनुशासनहीनता और पाखंड का आम रिवाज देख रहा हूं। एक आदमी खुद को मुसलमान कहता है और शराब का व्यापारी है। जब इसलाम में शराब हराम है तो कोई मुसलमान शराब का व्यापार कर ही कैसे सकता है ?
कैसे कोई मुसलमान सूद ले सकता है ?
कैसे कोई मुसलमान खुद को ऊंची जाति का घोषित कर सकता है जबकि इसलाम में न सूद है और न ही जातिगत ऊंचनीच ?
ऐसा केवल इसलिए है कि इसलाम उनके जीवन में नहीं है बस केवल आस्था में है। चोरी, व्यभिचार, हत्या, बलवा और बहुत से जुर्म आज मुस्लिम समाज में आम हैं जबकि वे सभी इसलाम में हराम हैं।
यही हाल हिंदू समाज का है कि हिंदू दर्शन सबसे ज़्यादा चोट ‘माया मोह‘ पर करता है और मैं देखता हूं कि हिंदू समाज में धार्मिक जुलूसों में रथों की रास पकड़ने से लेकर चंवर डुलाने तक हरेक पद की नीलामी होती है और पैसे के बल पर ‘माया के मालिक‘ इन पदों पर विराजमान होकर अपनी शान ऊंची करते हैं। दहेज भी ये लोग लेते हैं और कन्या भ्रूण हत्या भी केवल दहेज के डर से ही की जा रही है।
जो सन्यासी इन्हें रोक सकते थे, उनके पास भी आज अरबों खरबों रूपये की संपत्ति जमा है। हिंदू बालाएं फ़ैशन और डांस के नाम पर अश्लीलता परोस रही हैं जबकि काम-वासना और अश्लीलता से उन्हें रूकने के लिए खुद उनका धर्म कहता है।
मैं चाहता हूं कि हरेक नर नारी जिस सिद्धांत को अपनी आत्मा की गहराई से सत्य मानता हो, वह उस पर अवश्य चले वर्ना पाखंड रचाकर समाज में धर्म को बदनाम न करे।
हिंदू हो या मुसलमान जब वे नशा करते हैं, दंगों में एक दूसरे का खून बहाते हैं तो उससे धर्म बदनाम होता है। जो लोग कम अक़्ल रखते हैं और धर्म के आधार पर लोगों को नहीं परखते बल्कि लोगों के कामों को ही धर्म समझते हैं वे धर्म का विरोध करने लगते हैं और दूसरों को भी धर्म के खि़लाफ़ बग़ावत के लिए उकसाते हैं जैसा कि पिछले दिनों एक वकील साहब ने किया।
धर्म को बदनाम करने वाले पाखंडियों को धर्म पर चलने के लिए कहना ग़लत है क्या ?
धर्म का विरोध करने वाले नास्तिकों को ईश्वर और धर्म की खिल्ली उड़ाने से कैसे रोका जाए ?
इसी तरह के कुछ सवाल और भी हैं जो इनसे ही उपजते हैं।
मैंने कभी हिंदू धर्म की निंदा नहीं की और हमेशा हिंदू महापुरूषों का आदर किया और उनका आदर करने की ही शिक्षा दी। मेरी सैकड़ों पोस्ट्स इस बात की गवाह हैं। मैं खुद को भी एक हिंदू ही मानता हूं लेकिन डिफ़रेंट और यूनिक टाइप का हिंदू। बहरहाल, अगर आप मुझे हिंदू नहीं मानते तो न मानें। मैं इस पर बहस नहीं करूंगा लेकिन मैं यह ज़रूर चाहूंगा कि आप उपरोक्त सवालों पर ग़ौर करके मेरे नव अवतरण की रूपरेखा बना दें ताकि मेरे शब्द आपके लिए किसी भी तरह कष्ट का कारण न बनें।
मैं आपका आभारी रहूंगा।
शुक्रिया !
http://ahsaskiparten-sameexa.blogspot.com/2011/03/blog-post_19.html?showComment=1300612412366#c5412010183540951113

अपनी वापसी के पहले ही दिन हम विचारवान विरोधियों और समर्थकों से सभी से सलाह आमंत्रित करते हैं।
हम संत टाइप आदमी हैं सो निंदक को नियर रखते हैं। उनकी पहली ख़ासियत तो यह होती है कि वे चापलूस नहीं होते और सौजन्यतावश टिप्पणी नहीं करते और दूसरी बात यह है कि प्रेम करने वालों से तो प्रेम दुनिया करती है। हम उनसे प्रेम करते हैं जो हमसे नफ़रत करते हैं। इंसान नफ़रत के लिए बना ही नहीं है, सो वह देर तक नफ़रत कर भी नहीं सकता। इंसान प्रेम से पैदा होता है। एक नर और एक नारी आपस में प्रेम करते हैं तभी एक और इंसान जन्म लेता है। इसीलिए प्रेम इंसान का स्वभाव है और अपने स्वभाव पर  हरेक इंसान हमेशा रह सकता है। प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। इसलाम प्रेम करना ही सिखाता है। दूसरे लोग अपनी किताब खोलकर देखेंगे तो उन्हें भी वहां प्रेम का उपदेश ही लिखा मिलेगा। अब समय आ चुका है कि उपदेश के अनुसार आचरण भी किया जाए।

5 comments:

akhtar khan akela said...

anvr bhai dhmakedar vaapsi ke liyen mubark ho hmen or khubsurat aese dhmaakon kaa intizaar he jo hmaaraa gyana bdhaayen hmen kuchh sikhaayen jo shaayd jld hi ummid puri hogi . akhtar khan akela kota rajsthan

सलीम ख़ान said...

Wapasi par badhaee!

हरीश सिंह said...

बड़े भाई पहली बात तो यह की कभी आप नहीं गए थे. फिर वापसी की बात कहा हैं. आप को मैं ऑनलाइन देखता था. हा इस बीच आप अलग उर्जा हासिल जरूर किये होंगे. दूसरी बात आपकी बाते खरी होती है आप को मैं व्यक्तिगत तौर पर बेहद पसंद करता हूँ. ब्लॉग जगत में आने के बाद आपको जितना मैंने अपने करीब महसूस किया उतना किसी को नहीं किया. आपको कई बार जानबूझकर भड़काकर आपकी परीक्षा भी ली. आप एक खरे इन्सान हैं इसमें कोई शक नहीं. थोड़ी बहुत कमी सबमे रहती है वह आप में भी है क्योंकि आप भी इन्सान ही है. यही देंखे..."--हिंदू बालाएं फ़ैशन और डांस के नाम पर अश्लीलता परोस रही हैं जबकि काम-वासना और अश्लीलता से उन्हें रूकने के लिए खुद उनका धर्म कहता है।-- " क्या सिर्फ हिन्दू बलाए ही ऐसा करती है जी नहीं तमाम मुस्लिम बालाओ के भी नाम है अश्लीलता परोसने व बेचने में. यह एक मानसिकता भी है और किसी की जरूरते व मजबूरी भी. कृपया ऐसी बातों से बचा करिए. आपकी सोच निश्चित रूप से समाज हित माँ होती है यह एक कटु सत्य है जिसे मैं स्वीकार करता हूँ और कोई करे या न करे.
भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
danke ki chot par

DR. ANWER JAMAL said...

भारत को ‘अपराधमुक्त और अन्यायमुक्त‘ बनाने के लिए हमें अपनी कमज़ोरियां दूर करनी ही होंगी
@ मूंछों वाले मेरे प्यारे भाई पूर्वी ठाकुर ! हमें कुछ मजबूरियों की वजह से आनलाइन रहना पड़ा। उनमें से एक मजबूरी यह भी थी कि आपने हमें अपनी ‘प्रेम महाभारत‘ का कृष्ण बना रखा था। प्रतियोगिता के लेखकों के बीच फ़ैसला देने के लिए हमें ‘भारतीय ब्लाग लेखक संघ‘ के लेख पढ़ने पड़ते थे। आपके प्यार ने हमें कहीं जाने के लायक़ छोड़ा ही कब है भाई ?
आपने मेरी उन पंक्तियों की तरफ़ ध्यान दिलाया है जिनमें मैंने हिन्दू बालाओं द्वारा नग्न प्रदर्शन को हिन्दू धर्म के विरूद्ध बताया है। आपने कहा है कि ‘मुस्लिम लड़कियां भी ऐसा करती हैं और साथ ही आपने कहा है कि मैं ऐसी बातों से बचूं।‘
भाई अगर आप मेरे पूरे लेख को देखेंगे तो पाएंगे कि मैंने मुसलमानों में जातिगत ऊंचनीच और सूद-ब्याज लेने आदि कई ऐसी कुरीतियों का ज़िक्र किया है जो कि हिन्दुओं में भी पाई जाती हैं लेकिन मैंने हिन्दुओं में उनके पाए जाने को अपने लेख में रेखांकित नहीं किया है और न ही मेरे इस लेख का विषय यह है कि कौन बेहतर है ?
इस लेख का विषय यह है कि भारत धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है और इस देश के अधिकतर आदमी चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान या अन्य, वे किसी न किसी धार्मिक पंथ और गुरू में विश्वास रखते हैं लेकिन फिर भी वे अपनी उन बुराईयों को भी छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं जिनसे उन्हें उनका धर्म रोकता है। फिर ऐसे विश्वास से उनका और भारतीय समाज का कल्याण कैसे संभव है ?
इसके विपरीत इस प्रकार के आचरण से लोगों को धर्म और सत्पुरूषों पर ऐतराज़ करने का मौक़ा हाथ आ जाता है। इसी संदर्भ में मैंने नमूने के तौर पर हिन्दू और मुस्लिम केवल दो बड़े समुदायों का ज़िक्र किया है जबकि ये जुर्म तो बौद्ध, सिख, जैन, ईसाई और अन्य मतावलंबी भी कर रहे हैं। हिन्दू और मुसलमान भी जो जुर्म कर रहे हैं, उनके तमाम जुर्मों की सूची देना न तो संभव है और न ही यहां अभीष्ट था। इसीलिए दोनों तरफ़ मौजूद कमियों में से कुछ का ज़िक्र दोनों के साथ कर दिया और कुछ का केवल एक पक्ष के साथ।
इसके बावजूद भी आपकी बात को और जोड़ लिया जाए तो मेरे लेख के मंतव्य पर क्या असर पड़ा ?
कुछ भी नहीं बल्कि मेरे लेख की ही पुष्टि हुई कि मुस्लिम लड़कियां भी इस्लामी मूल्यों की अवहेलना करके अंग प्रदर्शन कर रही हैं और इसी बात पर मैंने अपने लेख में चिंता व्यक्त की है।
इस्लाम को फ़ोलो करने वाला कुछ भी ऐब करने के लिए आज़ाद नहीं है।
किसी भी गुरू को फ़ोलो करने वाला हिन्दू कोई भी जुर्म करने के लिए आज़ाद नहीं है।
हरेक के पास एक सुनिश्चित अवधारणा और नियम है, जिनकी अवहेलना वे करते हैं जो उनमें अपना विश्वास व्यक्त करते हैं। इसे धार्मिक और आध्यात्मिक होना नहीं कहते बल्कि इसे पाखंडी होना कहते हैं या फिर इसे दुर्बल विश्वास की संज्ञा दी जाएगी। इसे ईमान और यक़ीन की कमज़ोरी कहा जाएगा।
जब अपने मूल्यों और शिक्षाओं पर ईमान और विश्वास ही कमज़ोर होगा तो फिर अमल भी कमज़ोर ही होगा और हरेक कमज़ोरी हमारे लिए हर जगह शिकस्त की वजह बनेगी।
भारत को सशक्त बनाने के लिए हमें अपनी कमज़ोरियां दूर करनी ही होंगी और तब भारत खुद ब खुद ‘अपराधमुक्त और अन्यायमुक्त‘ हो जाएगा।
जिसे मेरी बात में कोई शंका हो वह अपनी शंका व्यक्त कर सकता है क्योंकि मार्गदर्शन के लिए ही मैं वापस आया हूं।
आपके प्यार के बोल अच्छे लगे और हौसला मिला।
मैं आपका शुक्रगुज़ार हूं।

हरीश सिंह said...

sahi kaha bade bhai. hame apni kamjoriyon ko door karna hi hoga.