Tuesday, December 14, 2010

भारत के प्रति इमाम हुसैन का विश्वास Karbala part 1

बुज़ुर्गाने दारूल उलूम देवबंद बसीरत व तहक़ीक़ की रौशनी में हज़रत सय्यदना हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नज़रिये को बरहक़ और यज़ीदियों के मौक़फ़ को नफ़्सानियत पर मब्नी समझते हैं ।
-मौलाना मुहम्मद सालिम क़ासमी , शहीदे कर्बला और यज़ीद नामक उर्दू किताब की भूमिका में , लेखक : मौलाना क़ारी तय्यब साहब रह. मोहतमिम दारूल उलूम देवबंद उ.प्र.

इसलिए अक़ाएद अहले सुन्नत व अलजमाअत के मुताबिक़ उनका अदब व अहतराम , उनसे मुहब्बत व अक़ीदत रखना , उनके बारे में बदगोई , बदज़नी बदकलामी और बदएतमादी से बचना फ़रीज़ा ए शरई है और उनके हक़ में बदगोई और बदएतमादी रखने वाला फ़ासिक़ व फ़ाजिर है ।
-(शहीदे कर्बला और यज़ीद ; पृष्ठ 148)

पूरी किताब को पेश कर देना तो फ़िलहाल मेरे लिए मुमकिन नहीं है और न ही कोई एक किताब हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की तालीमात, उनके किरदार या उनकी क़ुर्बानियों को बयान करने के लिए काफ़ी है लेकिन किताब में जो कहा गया है कि इमाम हुसैन का नज़रिया और मार्ग हक़ था वह हरेक फ़िरक़ापरस्ती, गुमराही और आतंकवाद के ख़ात्मे के लिए काफ़ी है ।
शहादते हुसैन सिर्फ़ किसी एक मत या नस्ल या किसी एक इलाक़े के लोगों के लिए वाक़ै नहीं हुई बल्कि यह शहादत सत्य, न्याय और पूरी दुनिया के मानवाधिकार की रक्षा के लिए वाक़ै हुई है। जो लोग दुनिया छोड़कर जंगलों में जा बसे या तो उन्हें पता नहीं था कि दुनिया वालों को क्या रास्ता दिखाएं या फिर उन्होंने ख़ुद को ज़ालिम हुक्मरानों के सामने बेबस पाया। आज उनमें से किसी का तरीक़ा भी ऐसा नहीं है कि उस पर चलकर आज का इंसान सामूहिक रूप से अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को अदा करने के लायक़ बन सके लेकिन इमाम हुसैन का मार्ग ही वास्तव में एकमात्र ऐसा मार्ग है जिसका अनुसरण किसी भी देश का आदमी आज भी कर सकता है। इमाम हुसैन का मार्ग पलायन और निराशा का मार्ग नहीं है। उनका मार्ग आशा और संघर्ष का मार्ग है। उनका मार्ग अपनी और अपने परिवार की जाँबख़शी के लिए ज़मीर का सौदा करने वालों का मार्ग नहीं है और न ही ऐसे ख़ुदग़र्ज़ कभी उनके मार्ग को अपना मार्ग बनाते हैं ।
इंसान अपनी जान व माल और ताक़त का मालिक ख़ुद नहीं है बल्कि इनका मालिक उसे पैदा करने वाला पालनहार है। बंदा अपने हर अमल में उसके हुक्म का पाबंद है और उसके प्रति जवाबदेह है। अपने रब पर यही मुकम्मल ईमान इंसान को मौत के ख़ौफ़ और दुनिया के लालच से मुक्ति देता है। जब तक इस तरह का किरदार लोग अपने अंदर पैदा नहीं करते तब तक समाज में न तो शांति आएगी और न ही किसी को हक़ और इंसाफ़ ही मिलेगा।
वाक़या कर्बला यही बताता है ।
आज की समस्या ज्ञान की कमी की समस्या नहीं है बल्कि आज मानवता के सामने आदर्श का संकट है ।
वास्तव में आदर्श कौन है ?
अधिकतर लोग तो आज भी यह नहीं जानते और जो जानते हैं वे भी प्राय: उस आदर्श पर नहीं चलते।
इमाम हुसैन ने अपने दोस्तों और अपने परिवार समेत अपनी शहादत देकर मानवता को आदर्श के संकट से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया है , ज़रूरत है अपनी तंगनज़री से ऊपर उठकर इमाम हुसैन के नज़रिये और सीरत को समझने की।
आज आदमी ज़ुल्म-ज़्यादती की शिकायतें करता है , कहता है कि उसे सताया जा रहा है , उसका हक़ मारा जा रहा है। कभी वह अपने नेताओं को अपनी बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराता है और कभी अफसरों को लेकिन अपनी बदहाली के लिए दरअस्ल वह खुद जिम्मेदार है क्योंकि वह खुद ज़ालिम है । न तो उसने अपने पैदा करने वाले का हक़ अदा किया और न ही उसूलों की खातिर कुर्बानियाँ देने वालों का ।
इमाम हुसैन से पहले भी हर ज़माने में उसूलों की ख़ातिर महापुरूषों ने कुर्बानियाँ दी हैं लेकिन लोगों ने अक्सर उन्हें भुला दिया और उनके मार्ग को भी और अगर याददाश्त में कुछ वाक़यात बचे भी रहे तो उनमें इतनी कल्पनाएं मिला दीं कि उनकी ऐताहासिकता को ही संदिग्ध बना दिया। लोग उनकी क़ुर्बानियों से सीख तो क्या लेते उल्टे उनके चरित्र पर ही उंगलियां उठाने लगे। ऐसे हालात में इमाम हुसैन ने लोगों के सामने अपनी ज़िंदगी में भी आदर्श पेश किया और अपनी मौत में भी। दुनिया का हर शख़्स उनकी ज़िंदगी को ही नहीं बल्कि उनकी मौत को भी ख़ूब अच्छी तरह परख कर देख सकता है कि वास्तव में वे आदर्श थे कि नहीं ?
और जब वह यह जान ले कि वास्तव में वे आदर्श थे तो उस पर उनका यह हक़ वाजिब हो जाता है कि उनका अनुसरण किया जाए। जो आदमी उनका अनुसरण नहीं करता वह उनका हक़ मारता है , उन पर ज़ुल्म करता है। जो ज़ुल्म करेगा , वह अपने ज़ुल्म की सज़ा ज़रूर पाएगा, यह एक अटल सच्चाई है । आज हर आदमी जो कष्ट भोग रहा है अपने ही ज़ुल्म के नतीजे में भोग रहा है । मानवता के आदर्श का अनुसरण न करने का अंजाम भुगत रहा है । ख़ुदा मुंसिफ़ है , जिसके साथ जो हो रहा है आज भी ऐन इंसाफ़ हो रहा है लेकिन उस रब के इंसाफ़ को हरेक आंख नहीं देख सकती । उसके इंसाफ़ को देखने के लिए भी हुसैनी नज़र और हुसैनी नज़रिया दरकार है ।
इमाम हुसैन पर यज़ीद ने ज़ुल्म किया। उसने इमाम हुसैन का अनुसरण न करके उन्हें शहीद कर दिया । बाद में यज़ीद खुद भी मर गया । यज़ीद तो मर गया लेकिन इमाम हुसैन पर जुल्म का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है । न तो यज़ीद उनका अनुसरण करने के लिए कल तैयार था और न ही दुनिया की अक्सरियत उनके अनुसरण के लिए आज तैयार है।
यज़ीद ने जो ज़ुल्म किया उसे हम न रोक पाए क्योंकि तब हमारा वुजूद नहीं था लेकिन आज हम उनका हक़ अदा करके उन पर होने वाले ज़ुल्म को रोक सकते हैं। यह हम पर हमारे पालनहार ने अनिवार्य ठहराया है।
महापुरूषों को देश और भाषा की बुनियाद पर अपना पराया ठहराना सरासर ज़ुल्म है, अज्ञान है, पाप है। भारत भूमि ज्ञान और पुण्य की भूमि है, यहां तो कम से कम महापुरूषों पर ज़ुल्म के हर प्रकार का उन्मूलन तुरंत ही कर देना चाहिए। केवल यही मार्ग है जिसमें सबका कल्याण है। इसी पर चलकर हम सब एक हो सकते हैं और भारत के गौरव की वापसी भी केवल इसी तरह संभव है।
ख़ुद इमाम हुसैन को भी आशा ही बल्कि पूरा विश्वास था कि भारत में उन पर ज़ुल्म न किया जाएगा । हमें उनके विश्वास पर खरा उतरना ही होगा।

10 comments:

Aslam Qasmi said...

कर्बला पर बहुत ही अच्‍छी जानकारी पेश की है आपने अगली किस्‍त का इन्‍तजार रहेगा

DR. ANWER JAMAL said...

@ क़ासमी साहब ! इंशा अल्लाह दूसरी क़िस्त भी जल्द ही पेश करूंगा !

एस.एम.मासूम said...

एक बेहतरीन पेशकश. एहसान अनवर जमाल भाई

DR. ANWER JAMAL said...

@ जनाब मासूम साहब ! मोमिन का फ़र्ज़ है कि वह हक़ का गवाह बने और नेक रास्ते पर चले और यह भी कि जो भलाई अपने लिए पसंद करे वही दूसरों के लिए भी चाहे ।
मैंने इस लेख के ज़रिये यही किया है । अहसान रसूलों और उनके वारिसों का हम पर है कि आज भी इंसान को सही ग़लत की तमीज़ हासिल है ।
क्या हम उनके अहसानात का इक़रार भी नहीं कर सकते ?

Shah Nawaz said...

अनवर भाई... जितनी भी तारीफें करूँ कम है... बेहद ज़बरदस्त, बेहतरीन सन्देश दिया है आपने इस लेख से रूबरू करवा कर... बहुत-बहुत शुक्रिया!

एस.एम.मासूम said...

कर्बला मैं ऐसा क्या हुआ था की इसकी याद सभी धर्म वाले मिल के मनाते हैं>
क्या कहते हैं संसार के बुद्धीजीवी, दार्शनिक, लेखक और अधिनायक, कर्बला और इमाम हुसैन के बारे में
इमाम हुसैन (ए .स ) के खुतबे

zeashan zaidi said...

Yaqeenan "इमाम हुसैन का मार्ग ही वास्तव में एकमात्र ऐसा मार्ग है जिसका अनुसरण किसी भी देश का आदमी आज भी कर सकता है। इमाम हुसैन का मार्ग पलायन और निराशा का मार्ग नहीं है। उनका मार्ग आशा और संघर्ष का मार्ग है। उनका मार्ग अपनी और अपने परिवार की जाँबख़शी के लिए ज़मीर का सौदा करने वालों का मार्ग नहीं है और न ही ऐसे ख़ुदग़र्ज़ कभी उनके मार्ग को अपना मार्ग बनाते हैं ।"
Nice Article.

Dr. Ayaz Ahmad said...

अनवर साहब आप की बेहतरीन पोस्ट के लिए शुक्रिया ।

Dr. Ayaz Ahmad said...

NICE

एस.एम.मासूम said...

धन्यवाद् इसे पेश करने का. ऐसे ही कुछ लेख और सन्देश यहाँ भी देखें कर्बला मैं ऐसा क्या हुआ था की इसकी याद सभी धर्म वाले मिल के मनाते हैं. हिन्दू शायर दिलगीर लखनवी (झंडू लाल)-"घबराए गी जैनब हिलती है ज़मीन , रोता है फलक : सौज : ज्योति बावरी क्या कहते हैं संसार के बुद्धीजीवी, दार्शनिक, लेखक और अधिनायक, कर्बला और इमाम हुसैन के बारे मिलिए इस हिंदू भाई से जो मौला अली और इमाम हुसैन को मुसलमानों से भी ज्यादा चाहते हैं