Friday, December 24, 2010

मेरे प्यारे मसीह, खुदा के प्यारे मसीह Jesus The Christ

‘हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने दुनिया को प्रेम की शिक्षा दी है।‘

उन्होंने बताया कि ‘बच्चों की तरह भोले और निष्कपट बनो।‘
कार्यक्रम पेश करते हुए बच्चे
कार्यक्रम देखते हुए

पादरी राकेश चार्ली साहब संबोधित करते हुए
केक काटते हुए आपका भाई अनवर जमाल

आज दुनिया भर के चर्चेज़ में इन्हीं बातों को दोहराया जा रहा है क्योंकि भारतीय समय के हिसाब से आज आने वाली रात में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश की खुशी मनाई जाएगी। हमारे शहर के चर्च में भी आज उनकी याद में केक काटा गया और इस अहम धार्मिक रस्म की अदायगी के वक़्त मुझे ख़ास तौर पर बुलाया मेरे परिचित पादरी मिस्टर राकेश चार्ली और मुकेश लॉरेंस ने। प्यार से बुलाया तो मैं तमाम काम आगे पीछे करके चर्च में पहुंचा। उस समय बच्चे एक बहुत प्यारा सा प्रोग्राम पेश कर रहे थे। अच्छे साउंड सिस्टम के आॅकेस्ट्रा भी था और इस मैथोडिस्ट चर्च के पदाधिकारियों के अलावा सीएनआई वग़ैरह दूसरे चर्च के पदाधिकारी भी मौजूद थे। नगर के सम्मानित व्यक्ति भी थे। मैंने पहुंचने से पहले ही अपने वक़्त की तंगी की वजह बता दी थी सो पादरी साहब ने कार्यक्रम के समापन के बाद केक काटने के बजाय सिर्फ़ मुझे जल्द फ्ऱी करने की ग़र्ज़ से कार्यक्रम के बीच में ही केक काटे जाने की रस्म पूरी की। उन्होंने मुझे केक के साथ ‘नया नियम‘ और ईसाई साहित्य और कैलेंडर आदि भेंटस्वरूप दिए और कल 25 दिसंबर की विशेष प्रार्थना सभा में सपरिवार शामिल होने की रिक्वेस्ट भी की।
ईश्वर और धर्म में विश्वास रखने वाले सभी लोगों को मुझसे प्रेरणा लेनी चाहिए और पादरी राकेश चार्ली साहब से भी कि कैसे एक दूसरे से भिन्न मान्यताएं रखने के बावजूद भी हम एक दूसरे के साथ प्रेम और शांति के साथ रह सकते हैं ?
मैं एक चीज़ को सही मानता हूं और राकेश चार्ली साहब उसी चीज़ को ग़लत। मैंने उन्हें बताया कि अपने अनुसंधान में मैंने क्या सही पाया ?
उन्होंने धैर्यपूर्वक सुना और फिर अपना नज़रिया भी बताया। कुछ बातों मे सहमति जताने के साथ ही उन्होंने बताया कि वे जिस ईमान पर हैं उससे नहीं हटेंगे। हम दोनों में जो भी संवाद हुआ था, उसे मैंने अपने पाठकों के लिए ब्लॉग पर भी पेश किया था। हमने संवाद किया था न कि विवाद और विवाद होना भी नहीं चाहिए। विवाद से शांति भंग होती है, प्रेम और सद्भाव को आघात पहुंचता है। विवाद किये बिना भी हम लोग अपने नज़रिए से एक दूसरे को वाक़िफ़ करा सकते हैं। यह हमारा परम कर्तव्य है। हमें एक दूसरे के बारे में जितनी ज़्यादा जानकारी होती जाएगी, हमारी ग़लतफहमियां उतनी ही ज़्यादा बेबुनियाद साबित होती चली जाएंगी और नफ़रत की सारी बेबुनियाद दीवारें ढह जाएंगी। नफ़रत की दीवारें ढहाने वाला ही प्रेम करना जानता है और जो प्रेम करना जानता है वह दुनिया के दिलों पर राज करता है। वास्तव में वह संसार को जीत लेता है।

इसीलिए हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने दुनिया से रूख्सत होने से पहले कहा था कि ‘मैंने संसार को जीत लिया है।‘
उन्होंने बिल्कुल सही कहा था। आज भी दुनिया के दिलों पर वे हुकूमत कर रहे हैं। दरअस्ल दुनिया वालों के दिलों में अपने पैदा करने वाले मालिक का नाम नक्श है और जो भी उसका नाम लेता है। उसके लिए उनके दिल में आदर ज़रूर पैदा होता है। यह एक ऐसा प्रेम और आदर है जो उनके प्रति चेतन से भी प्रकट होता है और अवचेतन से भी। चेतना के स्तर पर मसीह को सताने वालों ने भी उनकी पीठ पीछे उनकी महानता को स्वीकार किया है।
आज मसीह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका पैग़ाम आज भी हमारे बीच है। दुनिया से जाने से पहले उन्होंने कहा था- ‘इन बातों की आज्ञा मैं तुमको इसलिए देता हूं कि तुम एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि संसार तुम से बैर रखता है तो तुम जानते हो कि उसने तुम से पहिले मुझसे भी बैर रखा। यदि तुम संसार के होते , तो संसार अपनों से प्रीति रखता, परंतु इस कारण कि तुम संसार के नहीं, वरन मैंने तुम्हें संसार में से चुन लिया है इसीलिए संसार तुमसे बैर रखता है।‘ (यूहन्ना, 15, 17 व 18)
‘ये बातें मैंने तुम से इसलिए कहीं कि तुम ठोकर न खाओ।‘ (यूहन्ना, 16, 1)
परमेश्वर नहीं चाहता कि हम ठोकर खाएं इसीलिए उसने ईसा अलैहिस्सलाम को हमारे दरम्यान भेजा। उनके जाने के बाद भी उसने उनकी शिक्षा को हमारे दरम्यान आज तक क़ायम रखा ताकि हम ठोकर न खाएं। फिर आखि़र हम ठोकरें क्यों खा रहे हैं ?

कौन सा मत ऐसा है और कौन सी बानी ऐसी है जिसमें प्रेम की तालीम न हो। इसके बावजूद भी आज इस धरती के वासियों में प्रेम की कमी दिखाई देती है। अगर हममें प्रेम हो तो फिर हमारे नज़रियों का अलग होना भी हमारे लिए केवल संवाद का विषय बनेगा न कि विवाद का।

सत्य का पालन करना हरेक पर अनिवार्य है। हरेक आदमी निष्पक्ष रूप से अध्ययन-मनन के बाद जिस बात को सत्य मानता है, उस पर चले और उसका प्रचार करे और दूसरों के विचार और संस्कार को जानने की कोशिश करे। इस प्रकार हमारे समाज को हरेक सदस्य बौद्धिक रूप से समृद्ध भी होता जाएगा और समाज के हित में अपनी सेवाएं भी दे सकेगा।

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने सेवा की भी शिक्षा दी है। एक बार जब उनके शिष्यों में यह वाद-विवाद हुआ कि उनमें बड़ा कौन है तो उन्होंने अपने बारहों शिष्यों को खड़ा किया और उनके पैर धोए और तब कहा कि तुम में बड़ा वह है जो सब की सेवा करे।

आज दुनिया की तबाही के पीछे एक कारण यह भी है कि व्यक्ति, समुदाय और देश अपना बड़प्पन चाहते हैं और अपना बड़प्पन वे कमज़ोरों को दबाने में समझते हैं। यह तरीक़ा ग़लत है। अगर मसीह का अनुसरण किया जाए तो कमज़ोरों का भी विकास होगा और उनके दिलों में कभी भी अपने बड़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत का या उन्हें मिटा डालने का जज़्बा पैदा नहीं होगा। चाहे हमारे देश का नक्सलवाद हो या फिर विश्व स्तर पर मुस्लिम आक्रोश हो, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के तरीक़े का अनुसरण करके इसे निर्मूल किया जा सकता है।

आज दुनिया मसीह की महानता के गीत गा रही है लेकिन अब हमें गीत गाने से आगे बढ़ना होगा। तरह तरह की आपदाएं और तबाहियां हमें घेरे हुए हैं और जो अभी नहीं आई हैं वे जल्दी ही आने वाली हैं। ऐसा वैज्ञानिक बताते हैं। इन सब तबाहियों की ख़बर भी मसीह पहले ही दे चुके हैं। पूर्ण विनाश से पहले हमें खुद को सुधारना होगा। उद्धार का उपाय बस अब यही है। मसीह यही बताने आए थे, इसीलिए उन्हें उद्धारकर्ता माना जाता है। अंधेरे में आशा की ज्योति हैं मेरे प्यारे मसीह, खुदा के प्यारे मसीह।

इस ज़मीन पर उनका आना हम सबके लिए मुबारक हो।

7 comments:

इस्लामिक वेबदुनिया said...

बहुत ही अच्छी कोशिश अनवर जमाल साहब आपकी जितनी तारीफ की जाये उतनी ही कम है.

Taarkeshwar Giri said...

Ek achhe prayas aur ek achhe kadam ke liye aap badhai ke patra hain.

Ayaz ahmad said...

अच्छी जानकारी

हरीश सिंह said...

डाक्टर साहब मैंने जहा तक पढ़ा है कोई भी धर्म यह नहीं सिखात की आपस में बैर रखो. सभी धर्मो ने शांति, सौहार्द और प्रेम की शिक्षा दी है. जहा तक मैं समझता हू की धर्म की व्याख्या करने वालो ने ही धर्म को बदनाम कर दिया है. शिक्षा के अभाव में लोंगो ने वही समझा जो उन्हें समझाया गया यही वजह है की आज समाज में द्वेस, इर्ष्या, जाति-पाति, छुआ-छूत जैसी भावना पनपी और समाज टुकडो में बाँट गया.महापुरुषों ने किसी भी धर्म में जन्म लिया हो सभी ने मानवता का पाठ पढाया. इशु मसीह खुद शूली पर लटक गए किन्तु लोंगो को प्रेम से रहने को कहा. मोहम्मद साहब ने अपने जीवन में कितने दुःख सहे फिर भी लोंगो को शांति और प्रेम की शिक्षा दी. पुरुषोत्तम राम ने शबरी के जूठे बेर खर खाकर छुआ-छूत से दूर रहने की शिक्षा दी. किन्तु समाज फिर भी बहक गया आखिर क्यों? सच बात तो यह है की सभी धर्म शाश्त्र एक ही इश्वर की बात करते है जिसकी हम सभी संताने है फिर आपस में द्वेष कैसा. आपकी सोच के लिए साधुवाद.

हरीश सिंह said...

क्या हुआ मस्जिद गिरा के,
जब न मंदिर बन सका |
तेरे आपसी षडयंत्र से ,
बिन छत के मौला रह गया |

मेरे लिए जो राम है,
तेरे लिए रहमान है |
अंतर था केवल नाम का,
जिससे खुदा तक बँट गया |

सोचा न था उसने कभी,
जिसने दिया था जन्म फिर,
क्यूँ हाँथ में तलवार ले ,
भाई से भाई कट गया |

तू मांगता कर खोलकर ,
मैं हाँथ जोड़े मांगता हूँ |
फिर अहम् किस बात का,
जाती धरम और पात का |

बीतेगा क्या दिल पर तेरे,
कैसे करेगा तू सामना ,
जब तेरे दश नाम पर,
बच्चे तेरे लड़ने लगे |

आओ यहाँ मिल कर सभी,
पूजा करें कलमा पढ़े |
है चार दिन की ज़िन्दगी,
जाना है सबको फिर वहाँ |

Anonymous said...

बहुत ही अच्छी कोशिश अनवर जमाल साहब आपकी जितनी तारीफ की जाये उतनी ही कम है.

निर्मला कपिला said...

सुन्दर प्रयास। आपको सपरिवार नये साल की हार्दिक शुभकामनायें।