Saturday, May 28, 2011

‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौरे ज़मां हमारा‘ _

आज डा. आशुतोष शुक्ला जी की पोस्ट पढ़ी। उन्हें राष्ट्रवादियों के प्रिय मशग़ले में व्यस्त पाया।
वही पाकिस्तान की बातें।
क़सम से हमें तो पाकिस्तान याद भी न आए अगर ये लोग बार-बार न बताएं।
बस ख़ाली-पिल्ली बैठे हुए डर रहे हैं पाकिस्तान से और दूसरों को डरा भी रहे हैं कि यह हो जाएगा और वह हो जाएगा।

http://seedhikharibaat.blogspot.com/2011/05/blog-post_29.html?showComment=1306646899683#c1451670918083948865

हमने उनसे कहा कि

मियां शुभ शुभ बोलो, फ़ालतू की दहशत न फैलाओ और हमारे ब्लॉग पर आओ, शांति और ख़ुशी का ख़ज़ाना पाओ। आने वाला समय हमारा है। किसी की साज़िश भारत का कुछ बिगाड़ नहीं सकती अगर हम और आप आपस में मज़बूत हैं और एक-दूसरे से संतुष्ट हैं। अमेरिका को उसके नागरिक ही ले डूबेंगे। वे गे बनेंगे या ऐसे ही किसी के साथ रहेंगे। मज़े की ख़ातिर बच्चे वे पैदा करते नहीं। बच्चे हमारे यहां हैं। वे हमसे बच्चे मंगाएंगे और अपने देश की कुर्सियों पर बिठाएंगे और बिठा भी रहे हैं। पाक परमाणु बम बनाए तो बनाए हमारे पास प्रेम की शक्ति है। हम अपनी बीवियों से प्यार करेंगे। प्यार के फूल खिलेंगे तो वे बच्चे बनकर धरती पर फैलेंगे। जो फैलता है वह कभी मिटता ही नहीं। पाकिस्तान ख़ुद हमारा ही बच्चा है और अफ़ग़ानिस्तान भी अपना ही पुराना हिस्सा है। ईरान भी अपना ही है। सारा इलाक़ा अपना है, बस ढंग से बात करने की ज़रूरत है। सारे इलाक़े में अपने ही बच्चे आबाद हैं, किस पर कौन बम गिराएगा ?
वहम है सब और राजनीतिक स्टंट भी।
और बाइ दि वे अगर कोई गिरा भी दे और हम सक्षम हैं तो हम पहले से भी ज़्यादा मज़बूत होकर उभरेंगे जैसे कि जापान उभरा।
‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे ज़मां हमारा‘
अल्लामा इक़बाल पूरी तसल्ली देकर गए हैं मियां।
बहुत सोच लिया राष्ट्रवादी बनकर और फ़ालतू में डरकर और डराकर अब तो आप यह देखें

Friday, May 27, 2011

जनाब कुंवर कुसुमेश जी की पूरी ग़ज़ल में एक उम्दा पैग़ाम है '


भाई आज सुबह-सुबह हमें जनाब कुंवर कुसुमेश जी  की एक उम्दा ग़ज़ल पढ़ने के लिए मिल गई। उसके पहले शेर में ही ख़ुदा का नाम था और पूरी ग़ज़ल में एक उम्दा पैग़ाम था। ग़ज़ल पढ़कर हमने लिखा-

हर शेर उम्दा है ऊपर नीचे
हम हो गए आज तेरे पीछे

अब आप भी पढ़िए उनकी ग़ज़ल और बताइये कि इसके सिवा हम और क्या कह सकते थे ?

तारों के पीछे
कुँवर कुसुमेश 

छिपी है शै कोई तारों के पीछे,
ख़ुदा होगा चमत्कारों के पीछे.

मेरे महबूब तू गुम हो गया है,
सुकूने-दिल है दीदारों के पीछे,

सुना है डॉक्टर हड़ताल पर हैं,
खड़ी है मौत बीमारों के पीछे.

खबर सच्ची नहीं मिल पा रही है,
है कोई हाथ अखबारों के पीछे.

हमेशा प्यार से हिल मिल के रहना,
यही पैग़ाम त्योहारों के पीछे.

तेरे अपने 'कुँवर' दुश्मन हैं तो क्या,
चला चल तू इन्हीं यारों के पीछे.
  
 *************
   शै=चीज़,  दीदार=दर्शन, 
     सुकूने-दिल=दिल का सुकून.

सेहतमंद रहना है तो शादी करो -Dr. Anwer Jamal

नई जानकारी बहुत सी पुरानी  परम्पराओं के औचित्य को ही सिद्ध करती हैं जैसे कि यह जानकारी

आमतौर पर माना जाता है कि शादी के बाद स्वास्थ्य को लेकर एक तरह की उदासीनता आ जाती है, लेकिन वैज्ञानिकों ने अपने नए शोध में इस बात/तथ्य को गलत साबित कर दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि शादीशुदा जोड़े अकेले लोगों की तुलना में ज्यादा फिट रहते हैं।
यूके की कार्डिफ यूनिवर्सिटी के इस शोध के मुताबिक उनके स्वास्थ्य में सुधार ही आता जाता है।
शोध की मानें तो शादीशुदा पुरूषों के शारीरिक रूप से स्वस्थ्य रहने का राज है उनकी बीवीयां, जो उनके स्वस्थ्य जीवनचर्या के लिए जिम्मेदार होती हैं। वहीं औरतों के बारे में बात करें तो शादी के बाद वो अपने वैवाहिक जीवन में अपनी कीमत समझती हैं जिससे वो भावनात्मक रूप से स्वस्थ्य रहने लगती है। शादी के बाद पति-पत्नी दोनों शारीरिक और मानसिक तौर पर संतुष्ट रहने लगते हैं और यही बात उनके स्वास्थ्य में सुधार लाने की वजह बनती है. खास बात यह है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे स्वास्थ्य भी अच्छा होता जाता है। लेकिन यह बात सिर्फ शादीशुदा लोगों पर ही लागू होती है। इसलिए अगर आप शादी करने की सोच रहे हैं, तो जल्दी करिए। 

Thursday, May 26, 2011

ख़ुशी के अहसास के लिए आपको जानना होगा कि ‘ख़ुशी का डिज़ायन और आनंद का मॉडल‘ क्या है ? - Dr. Anwer Jamal


इंसान ख़ुशी की तलाश में रहता है और उसे ख़ुशी कभी हासिल नहीं होती। उसकी इच्छा कुछ है और उसे मिलता कुछ और है।
ऐसा क्यों है ?
हक़ीक़त इसके खि़लाफ़ है।
इंसान हमेशा ख़ुशी से भरपूर होता है लेकिन वह इसे कभी जान ही नहीं पाता।
बहुत लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने उम्र भर ग़रीबी में काट दी और जब उनके मरने के बाद किसी वजह से उनका खेत-मकान खोदा गया तो उसमें से गड़ा हुआ धन निकला। ऐसे ही एक सच्चा धन हर इंसान के दिल में हमेशा रहता है। जो उस धन को जान लेता है, उस पर दुख कभी हावी नहीं होते, कोई भी दुख उसे उसके मक़सद से नहीं हटा पाते।
इसके अलावा हमें एक बात और भी समझ लेनी चाहिए कि हमें ख़ुशी के डिज़ायन को समझ लेना चाहिए।
हम चाहते हैं कि हमें ख़ुशी मिले और बड़ी मिले, अखंड मिले जबकि हमें ख़ुशियां एक मुश्त नहीं मिलतीं, हमें छोटी-छोटी ख़ुशियां मिलती हैं और क़िस्तों में मिलती हैं।
या यूं कहें कि जो ख़ुशियां हमें सहज ही रोज़ाना मिलती रहती हैं, उन्हें हम छोटा समझते हैं। हमारी समझ का फेर ही हमें ख़ुशी के अहसास से दूर रखता है।
एक आदमी है जिसकी मां उसके बचपन में ही मर गई है। वह जब भी अपने दोस्तों के घर जाता है तो सबसे पहले वह अपने दोस्तों की मां को ही देखता है और उनकी क़िस्मत पर रश्क करता है कि वे कैसे ख़ुशनसीब हैं कि उनके पास मां है ?
वह सोचता है कि अगर उसकी मां ज़िंदा होती तो वह उसके लिए यह करता, उसके लिए वह करता। वह अपनी ख़ुशी को अपनी मां के साथ जोड़कर देखता है।
वह समझता है कि उसके वे दोस्त बहुत ख़ुश रहते होंगे जिनकी मां ज़िंदा है लेकिन आप और हम जानते हैं कि ऐसा नहीं है। उन्हें अपनी मां को देखकर ख़ुशी का ऐसा कोई अहसास नहीं होता जैसा कि वह आदमी सोचता है जिसकी मां उसके बचपन में ही चल बसी थी।
बच्चे स्कूल जाते हैं। यह एक आम बात है। स्कूल जाते हुए या स्कूल से आते हुए हर साल कितने ही बच्चे रोड एक्सीडेंट में मारे जाते हैं। जो बच्चे मर जाते हैं, उनके मां-बाप जानते हैं कि औलाद खोने का ग़म क्या होता है ?
बहुत बच्चे जब अपने घरों को रोज़ाना लौट आते हैं तो उनके मां-बाप ऐसी कोई कल्पना ही नहीं करते कि उनके बच्चे के साथ कितने हादसे संभव थे और उनमें कोई भी उसके साथ घटित नहीं हुआ। उन बच्चों का सही-सलामत घर लौट आना हम सबके लिए ख़ुशी का एक बहुत बड़ा पल होता है लेकिन यह पल हमारी ज़िंदगी में रोज़ आता है। इसलिए हम इसके आदी हो जाते हैं और इसे ख़ुशी के पलों में शुमार तक नहीं करते। यह हमारी समझ का फेर है।
आप डायलिसिस पर किसी मरीज़ को देखेंगे तो आपको महसूस होगा कि अगर आपके गुर्दे ठीक से काम कर रहे हैं तो यह कितनी बड़ी ख़ुशी की बात है लेकिन यह भी हमें सहज ही हासिल है और हम इसके आदी भी हैं लिहाज़ा हमें इस ख़ुशी का कभी अहसास तक भी नहीं होता। यही बात हमारे दिल, दिमाग़, पेट, जिगर और अन्य अंगों के ठीक से काम करने के बारे में कही जा सकती है। हर आदमी के कुछ रिश्तेदार और कुछ दोस्त भी होते हैं। अकेलापन एक ख़ौफ़नाक सज़ा है। जो इस दौर से गुज़र चुका है वह जानता है कि समय पर काम न आने वाले रिश्तेदार और निकम्मे दोस्त भी इस हालत से बेहतर हैं कि इंसान सिरे से ही अकेला हो। कोई इंसान कुछ दे या न दे लेकिन उनका साथ अपने आप में ही ख़ुशी की एक वजह है।
ख़ुशियां इंसान पर हर तरफ़ से बरस रही हैं लेकिन वह इसे नहीं जानता। अगर वह इन सभी ख़ुशियों पर ध्यान दे तो उसकी ख़ुशी अखंड सी ही हो जाएगी।
हां बीच-बीच में दुख भी आते हैं।
दुख इंसान को नागवार लगते हैं लेकिन ख़ुशी का अहसास यही दुख कराते हैं। यह भी एक अजीब विडंबना है। अगर दुख न हो तो इंसान यहां ख़ुशी का अहसास ही न कर पाए।
आप विदा होकर अपने घर से कहीं दूर जाते हैं। घर से दूर जाते समय आपको दुख होता है, आप रोने लगते हैं। कुछ समय बाद जब आप अपना काम पूरा करके अपने घर लौटने की तैयारी करते हैं और बाज़ार जाकर अपने घर वालों के लिए उनकी पसंद का सामान ख़रीदते हैं तो आपको अपने अंदर कितनी ख़ुशी महसूस होती है, इसे बस आप ही जान सकते हैं। फिर आप ट्रेन-प्लेन में बैठते हैं और घर की तरफ़ रवाना होते हैं। रास्ते भर आप एक उत्तेजना भरी ख़ुशी महसूस करते हैं और आखि़रकार जब आप घर लौट आते हैं तो ख़ुशी के उस अहसास को सिर्फ़ आप ही जानते हैं। फिर आप रोज़ाना उसी घर में सोते हैं और उसी घर में जागते हैं और अपने प्यारों से हर दम घिरे रहते हैं लेकिन आप ख़ुशी का वह अहसास अपने अंदर नहीं पाते बल्कि अब तो आप अपने घर के सदस्यों पर नाराज़ भी होने लगते हैं और उन्हें कड़वी बातें भी कह डालते हैं।
यह सब क्या है ?
यह सब नादानी है, जहालत है और अपने दुख का सामान ख़ुद इकठ्ठा करना है।
मैं नहीं जानता कि मेरे घर में किसकी मौत कब होने वाली है ?
यह कल्पना ही मुझे सिहरा देती है। जब तक मैं उनके साथ हूं, क्यों न उन्हें ख़ुशी का अहसास कराऊं ?
जो चीज़ आप पाना चाहते हैं, दूसरे भी वही पाना चाहते हैं।
वे ख़ुशी के डिज़ायन को नहीं जानते लेकिन आप जान गए हैं। आप उन्हें ख़ुशी दीजिए, पलटकर आपको भी मिलेगी। जिस चीज़ के मिलने का आप इंतेज़ार कर रहे थे, दरहक़ीक़त वह तो आपको देनी थी और तभी आपको मिलनी भी थी।
यही ख़ुशी का डिज़ायन है, आनंद का मॉडल यही है।

Wednesday, May 25, 2011

क्या भारत में अब सन्यासी को भी सच नहीं बोलने दिया जाएगा ? Agnivesh


स्वामी अग्निवेश के सिर की क़ीमत लगाकर कुछ लोगों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है। ये वे लोग हैं जो बताते हैं पाकिस्तान एक बुरा देश है और हमारा देश महान है क्योंकि यहां सहिष्णुता है।
किसी को भी बेवजह मार डालना कहां की सहिष्णुता है ?
देखिए भास्कर की पूरी रिपोर्ट और सोचिए कि हमें जाना कहां था और हम जा रहे हैं कहां ?

ग़ददार निकला जौनपुर का सदाकांत IAS

उन पर जासूसी का इल्ज़ाम है । यह तीसरी मौका है जब किसी सीनियर ऑफिसर पर जासूसी का इल्ज़ाम लगा है । CBI काफी दिनों से उन पर नज़र रखे हुए थी। वह केंद्रीय गृह मंत्रालय में ज्याइंट सेक्रेटरी के पद पर थे और बॉर्डर मैनेजमेंट जैसे संवेदनशील मामले देखते थे।

Monday, May 23, 2011

उसे हंसी आ रही है और मुझे रोना / यहाँ जिसे देखिए एक से एक नमूना

श्री राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी ने अपने ब्लॉग पर घोषणा कर दी है कि

'कुरआन या कोई धर्म माँस खाने को नहीं कहता ।'


इसी के साथ जनाब फ़रमाते हैं कि मुझे क़ुरआन के बारे में यह दावा पढ़कर भी हंसी आती है कि कोई आदमी क़ुरआन जैसा नहीं बना सकता । एक दो जगह और उन्होंने बताया है कि उन्हें हंसी आती है ।
इसलाम का मज़ाक़ उड़ाने वाली उनकी इस पोस्ट को आज वंदना जी ने चर्चामंच पर भी जगह दी। हमने इसका लिंक वहीं देखा और उन्हें बताया कि उनका ख़याल ग़लत है।
आजकल हम ख़ुद को बदलने में लगे हुए हैं इसलिए राजीव जी को बख़्श दिया और बस केवल तथ्य देकर आ गए। उनकी हंसी के बारे में कुछ न कहा।
लेकिन हिंदू ब्लॉगर्स भाई बताएं कि क्या उन्हें हंसना ज़रूरी है ?
क्या उनकी यह हरकत ठीक है ?

अगर ठीक नहीं है तो फिर किसी हिंदू भाई ने उन्हें टोका क्यों नहीं ?
हम टोकेंगे तो आदमी की हंसी मूलाधार चक्र के पास से निकल जाएगी।

आजकल लोग शाँत ब्लॉगिंग कर रहे हैं और हम भी ग़ज़ल और अफ़साने लिख रहे हैं ।
क्या ऐसा करते हुए हम बुरे लग रहे हैं ?
क़ुरआन में जो लिखा है , पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ने उसके अनुसार आचरण करके भी दिखाया है। जो कोई इस्लाम और कुरआन को जानना चाहे , उसे लाज़िम है कि वह मुहम्मद साहब की जीवनी भी पढ़े। तब वह जान लेगा कि वास्तव में खान-पान और रहन-सहन के बारे में इस्लामी व्यवस्था क्या है ?
अगर कोई ऐसा नहीं करता और फिर भी हंसता है तो उसका हंसना यही बताता है उसे सच्चाई की कोई तलाश नहीं है , बस शब्दों के साथ खिलवाड़ करना है ।

इसके बाद जनाब ने सारा ज़ोर इस बात पर लगा दिया कि गो और गौ में क्या अंतर है और गोमांस भक्षण का अर्थ यह नहीं बल्कि यह निकलता है।
भाई साहब एक एक शब्द के कई-कई अर्थ निकलते ही हैं और संभव है कि जो आप बता रहे हैं वह अर्थ भी निकलता हो लेकिन एक नज़र प्राचीन आर्य परंपराओं पर भी डाल लेते तो पता चल जाता कि आर्य ‘गोमांस भक्षण‘ अर्थ क्या लेते थे ?

गोमांस परोसने के कारण यशस्वी बना राजा रंतिदेव : महाभारत 

                        (वनपर्व 208 199/8-१०)


आपको यह इस लिंक पर जानकारी कम लगे तो आप इस लिंक पर चले जाइये आपकी भरपूर तसल्ली हो जायेगी।

अध्याय 11 : क्या हिन्दू कभी गोमांस नहीं खाते थे?



हमने तो उनकी पूरी पोस्ट पढ़ी और यह कमेंट देकर चले आए, जिसे सत्य की खोज वास्तव में है, वह विचार करके बताए कि हमने क्या सही कहा और क्या ग़लत कहा ?


स्वांस स्वांस का करो विचारा । बिना स्वांस का करो आहारा । 
सीधी सी बात है । जिसकी स्वांस का आवागमन होता है । वह जीव है । और उसको मारना पाप ही है । अर्थात इस भक्ष्य अभक्ष्य निर्णय हेतु स्वांस को आधार माना गया है
 @भाई राजीव जी ! आप संतों का आदर करते हैं उनके बताए आहार को ही लेना चाहते हैं तो आप इस धरती पर जीवित नहीं रह सकते। इन संतों को पशु-पक्षी सांस लेते नज़र आए तो लिख दिया कि आहार में श्वास को आधार मानो लेकिन उन्हें ‘सत्य का ज्ञान‘ नहीं था कि पेड़-पौधे भी सांस लेते हैं। आज वैज्ञानिकों ने उस सत्य का पता चला लिया है जिसका पता इन संतों को नहीं था। वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि ‘पेड़-पौधे भी सांस लेते हैं।‘वैज्ञानिक वनस्पति जगत को भी जीवित वस्तुओं में ही शुमार करते हैं। अगर इन संतों की बात मान ली गई तो मानव जाति का जीवन इस पृथ्वी पर संभव नहीं है बल्कि अगर अपने उसूल पर ख़ुद संत ही चलें तो वे ख़ुद भी जीवित न रह पाएंगे। बस जो मन में समा गया उसे नियम बनाकर परोस दिया। इसी का नाम दर्शन और फ़िलॉसफ़ी है और हद तो तब हो जाती है जबकि ये लोग क़ुरआन की मूल भाषा का ज्ञान प्राप्त किए बिना ही उसकी आयतों के अर्थ भी बताने लगते हैं। अगर इन्हें इस्लाम के बारे में कोई बात कहनी है तो उसे कहने से पहले इस्लामी विद्वानों से मिलकर पूरी बात पता कर लेनी चाहिए। आजकल तो ऐसी बहुत सी संस्थाएं हैं कि अगर आप फ़ोन करके भी कुछ जानना चाहें तो वे आपको फ़ोन पर भी पूरी जानकारी देंगी।
 ये फ़ोन नं. ऐसे ही हैं 011-24355454, 41827083, 24356666, 46521511फ़ैक्स 011-45651771इन पर मौलाना वहीदुददीन ख़ान साहब, दिल्ली की ओर से नियुक्त किसी सेवाकर्मी से बात होती है। उनके लेक्चर्स के वीडियो देखने की सुविधा निम्न वेबसाइट पर है  
हिंदू ग्रंथों और मुस्लिम ग्रंथों में मांसाहार को अनुचित नहीं माना गया है। देखिए यह लिंक  

भूख से तड़पती गायें , श्रद्धा रखिये तो कुछ खिलाइए भी 

the cows might have died of eating polythene.

Thursday, May 19, 2011

अगर किसी को कोई तकलीफ़ है तो पहले उसकी तकलीफ़ दूर कर दीजिए, उसके बाद नमाज़ अदा कर लीजिए. Salat ul Juma


राजेंद्र सिंघल नहीं रहे। वे 40 वर्ष के थे। एक सड़क दुघर्टना में वे बस की चपेट में आ गए। संयोग से मैं उस समय हाई वे की एक मस्जिद में जुमा की नमाज़ पढ़ने के लिए अपने मक़ाम से निकला था। यह मस्जिद मेरे मक़ाम से बहुत दूर स्थित है। यह वाक़या कुछ सप्ताह पहले का है।
मस्जिद पहुंचा तो उसके पास बहुत भीड़ लगी हुई थी। हमारी उ. प्र. पुलिस के दरोग़ा और जवान पूरी मुस्तैदी से भीड़ को कवर कर रहे थे लेकिन तब तक किसी ने भी राजेंद्र जी की बॉडी छूकर यह देखने की ज़हमत गवारा न की थी कि कहीं उनमें जान बाक़ी तो नहीं है। सबने सरसरी सी नज़र डालकर ही उन्हें मरा मान लिया था। सारा पुलिस स्टाफ़ मुझे जानता-पहचानता है। सो मैं राजेंद्र जी के पास गया और उनका शरीर छूकर देखा। हादसा ताज़ा होने की वजह से उनका शरीर अभी भी गर्म था। मैंने उनकी नब्ज़ ख़ूब टटोली कि शायद मिल जाए। वह मुझे न मिली तो मैंने वहीं खड़े अपने एक और डाक्टर मित्र से कहा कि ज़रा आप भी देख लें। उन्होंने भी नब्ज़ देखकर उन्हें मृत घोषित कर दिया।
U. P. Police
Investigation
Dead Body, Mr. Rajendra Singhal
At Roadside
At the sheet
Mosque at Highway
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पुलिस स्टाफ़ ने मृतक का नाम श्री राजेंद्र सिंघल बताया और बताया कि वह सिकंद्राबाद ज़िला बुलंदशहर के निवासी हैं। अगले दिन पता चला कि वे दूध के कारोबारी हैं और उनके दो बच्चे हैं।
वे जिस विक्की पर सवार थे। वह एक रोडवेज़ बस की चपेट में आ गई थी और जब वे गिरे तो उनके पेट पर बस का पहिया चढ़ गया था। उनके दोनों कूल्हों की खाल फट गई थी और अंदर की चर्बी साफ़ नज़र आ रही थी। लाश की हालत बहुत ख़राब थी। रोडवेज़ बस उनकी विक्की को लगभग एक-दो किलोमीटर घसीटती हुई ले गई थी। ड्राइवर को गांव के एक लड़के ने अपनी मोटर साइकिल से पीछा करके पकड़ लिया वर्ना वह भागने में कामयाब हो ही जाता। भागने की कोशिश में उसने हाई वे पर बने हुए थाने को भी क्रॉस कर लिया था लेकिन धर लिया गया।
एक तिपहिया टेम्पो आ गया तो एक चादर में मैंने राजेंद्र सिंघल जी की लाश रखी, उसे बंधवाया और कुछ गांव वालों की मदद से उसे टेम्पो में लदवाकर पोस्टमार्टम के लिए रवाना करवाया।
जुमा की नमाज़ का समय क़रीब आ चुका था। मैं मस्जिद में दाखि़ल हुआ और नमाज़ भी अदा की और उसके बाद मैंने अपने लिए और मुल्क और दुनिया में आबाद सारी इंसानियत की बेहतरी के लिए दुआ मांगी। दुआ में राजेंद्र सिंघल के परिजन और उनके छोटे बच्चे भी याद रहे।
राजेंद्र सिंघल जी हैल्मेट नहीं पहने हुए थे और बहुत सी बातें हैं जो इस पोस्ट के माध्यम से मैं कहना चाहता था। उनमें से एक ख़ास बात यह कि यातायात नियमों का पालन ज़रूर करें क्योंकि हादसा कभी आपको बताकर नहीं आएगा। कुछ और बातें आप ख़ुद इस पोस्ट से ग्रहण कर सकते हैं।
इस पूरे वाक़ये में मुझे नमाज़ अदा करने में कोई दिक्क़त पेश नहीं आई जैसा कि निदा फ़ाज़ली ने एक फ़िज़ूल सा ख़याल आम कर रखा है कि

घर से मस्जिद है बड़ी दूर, चलो ये कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए

अगर घर से मस्जिद दूर है तो क्या जाना नहीं चाहिए ?
अगर किसी को कोई तकलीफ़ है तो पहले उसकी तकलीफ़ दूर कर दीजिए, उसके बाद नमाज़ अदा कर लीजिए। 
इस्लाम और  क़ुरआन यही सिखाता है और नमाज़ ख़ुद भी यही सिखाती है।
निदा फ़ाज़ली जैसे नास्तिक न तो दीन को ख़ुद समझते हैं और न ही दूसरों को समझने और समझाने देते हैं।
मौत हरेक की निश्चित है और वह किसे कब आएगी ?
कोई नहीं जानता। मालिक के सामने कोई बहानेबाज़ी काम नहीं आएगी। आप और हम जो भी कर रहे हैं, उसमें कौन सा काम लोक-दिखावे के लिए या अपनी इमेज पॉलिश करने के लिए कर रहे हैं और कौन सा काम ख़ालिस मालिक के हुक्म से और उसी की रज़ा के लिए कर रहे हैं, समय-समय पर अपना जायज़ा लेते रहें।
मालिक हमेशा रहेगा और जो काम आप उसकी रज़ा के लिए करेंगे वह भी हमेशा रहेगा और उसका जो बदला वह मालिक आपको देगा। उससे आपकी आत्मा शांत रहेगी और यह शांति आपके साथ सदा बनी रहेगी।
मालिक के लिए बच्चों और बड़ों के काम आएं और यह काम केवल उस पालनहार की रज़ा के लिए करें। ऐसा हर नमाज़ से पहले करें और हर नमाज़ के बाद करें।
मैं तो इस्लाम की तालीम यही समझा हूं।
आप मेरी पोस्ट से क्या समझे ?

Wednesday, May 18, 2011

जो लोग भारतीय राष्ट्रवाद का दंभ भरते हैं और पाखंड रचते हैं, वे भी आज वृहत्तर भारत और अखंड भारत की हितचिंता से कोई सरोकार नहीं रखते और विदेशियों का साथ देते आसानी से देखे जा सकते हैं The main problem


डा. आशुतोष शुक्ला जी पूछ रहे हैं कि ‘ पाक में घुसकर ओसामा को मारने के बाद भी लगता है कि अमेरिका की आँखों से अभी भी पाक का चश्मा उतरा नहीं है क्योंकि वहां के रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी आज भी पाक को दी जाने वाली सहायता में किसी भी तरह की कटौती के ख़िलाफ़ फिर से बोले हैं।‘
भाई अमेरिका की आंखों से कोई चश्मा तो तब उतरेगा जब कोई चश्मा उन पर चढ़ा हो। पाकिस्तान में जो कुछ हो रहा है वह अमेरिकी डालर की मदद से और उसकी योजना के अनुसार ही हो रहा है। अमेरिका दरअस्ल पाकिस्तान की मदद नहीं कर रहा है बल्कि वह अपनी योजनाओं को पूरा कर रहा है।
सऊदी अरब या पाकिस्तान, इनमें से अमेरिका किसी का भी दोस्त नहीं है। वह केवल अपना दोस्त है और अपना मतलब भी अपने नागरिकों की बहुसंख्या का नहीं बल्कि अमेरिकी पूंजीपति कंपनियों का, अमेरिका इन्हीं कंपनियों का हित साधने के लिए पूरे विश्व में धमाचैकड़ी मचाए हुए है और किसी भी कमज़ोर देश को उसके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं करने देना चाहता।
अपनी कंपनियों के हितों के लिए जो तबाही वह दुनिया में मचाए हुए है उसका विरोध विश्व बिरादरी के साथ ख़ुद उसके देश की जनता भी कर रही है लेकिन वह सुनता ही नहीं है। अमेरिका पर शासन करने वाले पब्लिक के वोटों से चुने जाते हैं लेकिन वे पूंजीपती कंपनियों के हितों के लिए ही अपनी अंतर्राष्ट्रीय नीतियां बनाते हैं और ‘शांति और न्याय‘ के नाम पर मुल्कों पर बम बरसाते हैं।
अमेरिका ने आज तक जिस देश को भी अपना दोस्त बनाया, उसे या तो ग़ुलाम बनाया या अगर उसने आज़ादी की कोशिश की तो उसे तबाह कर डाला। पाकिस्तान आज तबाह हो रहा है तो यह अमेरिका की दोस्ती का अंजाम ही है।
अमेरिका भी यह बात जानता है कि धीरे-धीरे पाकिस्तान ख़ुद ही तबाह हो जाएगा लेकिन तब तक उसे अपने हित भी साधने हैं।
हालांकि सोवियत संघ का विखंडन होने के बाद हमारे नेता भी अमेरिका के दोस्त बन गए हैं और बार-बार कह रहे हैं कि ‘अजी, आप पाकिस्तान को छोड़िए, हमें मदद दीजिए और हमारे अड्डों को इस्तेमाल कीजिए‘
अमेरिका की दोस्ती में तबाह होते हुए पाकिस्तान को देखकर भी यह कहा जा रहा है ?
हैरत है!
मामूली सी बातें लोग समझते नहीं या फिर पाकिस्तान की नफ़रत में समझना नहीं चाहते। अमेरिका और इस्राईल की दोस्ती में आज तक किसी एशियाई देश को कुछ तरक्की नसीब हुई हो तो वह हमें बताए ?
चश्मा अमेरिका की आंखों पर नहीं है बल्कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोगों और उनके नेताओं की आंखों पर है, नफ़रत का।
इसी नफ़रत के कारण आज विदेशी ताक़तें ठीक उसी तरह वृहत्तर भारत को तबाह कर रही हैं जैसे कि पूर्व में बार-बार कर चुकी हैं।
जो लोग भारतीय राष्ट्रवाद का दंभ भरते हैं और पाखंड रचते हैं, वे भी आज वृहत्तर भारत और अखंड भारत की हितचिंता से कोई सरोकार नहीं रखते और विदेशियों का साथ देते आसानी से देखे जा सकते हैं।
दुःखद है यह सब होते देखना।

मैं कांप जाता हूं सोचकर प्यार का अंजाम Life Partner

राजेंद्र तेला जी बिना रूके ‘निरंतर‘ कविताएं लिखे जा रहे थे और हम उन्हें सही तौर पर टिप्पणी भी नहीं दे पा रहे थे। अंदर से हमारा मन ‘गब्बर स्टाइल‘ में बार-बार कह रहा था कि ‘बड़ी नाइंसाफ़ी‘ हो रही है तेला जी के साथ। सो आज हमारी वाणी के सहारे हम जा पहुंचे उनके ब्लॉग पर। वहां राजेंद्र तेला जी अपने प्रियतम से शिकवा कर रहे थे कि अगर वह उनके पास आए और साथ मिलकर बारिश में नहा ले तो उसका क्या बिगड़ जाएगा ?
हमने अपना माथा पीट लिया कि क्यों अपनी जान ख़तरे में डाल रहे हो तेला जी ?
जिस तरह ढोल दूर से ही सुहावने लगते हैं, ऐसे ही महबूब भी दूर से ही भले लगते हैं। अगर आपका महबूब एक बार आपके घर में घुस गया तो फिर ज़िंदगी भर उसे भारत की पुलिस-कचहरी में से कोई भी निकाल नहीं सकती। फिर इतना ही नहीं, महबूब आएगा अकेला और आपका सहयोग लेकर अपनी पूरी फ़ौज खड़ी कर लेगा। हमने अपने इसी तल्ख़ तजर्बे को उनकी पोस्ट पर एक कमेंट की शक्ल में पेश किया है जो कि इत्तेफ़ाक़ से राजेंद्र जी की रचना जैसा ही बन गया है।

जो देखा उसे 
दिल में समाई
बजी शहनाई
वह घर में आई
क़ब्ज़ा लिया 
दिल और चारपाई
फिर ऋतु जो भी आई
बस प्यार ही लाई
प्यार की सौग़ात ही लाई
पांच बच्चों की सूरत दिखाई
आज भी जब 
वह लेती है अंगड़ाई
मैं कांप जाता हूं 
सोचकर
प्यार का अंजाम
मिलन का परिणाम
जो ऋतु हरेक है लाई


...और अब देखिए राजेंद्र तेला जी की रचना
वर्षा ऋतु का 
आना
पानी की बौछारें
मंद हवा का बहना
पेड़ों के पत्तों का 
धुलना
हर दिल में
मिलन इच्छा का 
जगना
इंतज़ार पहले भी था
आज भी है
कोई आए साथ
वर्षा में नहाए
अठखेलियां करे
मिलने की ख़ातिर
मौसम का इंतज़ार 
ना कराए
निरंतर हर ऋतु
मिलन ऋतु हो जाए


राजेंद्र जी को समझाकर फ़ारिग़ हुए तो मोहतरमा आकांक्षा यादव जी की पोस्ट पर नज़र पड़ गई। वहां भी महबूब से यही शिकायत की जा रही थी कि
‘मैं बुलाती रह गई, पर प्राण मेरे तुम न आए‘
हमने फिर अपना सिर पीट लिया।
प्राण न ही आए तो अच्छा है। प्राण आ गया तो फिर सिजेरियन होना तय है। नादान क्यों ख़ामख्वाह अपने निजी प्राण संकट में डाल रही है। हमने वहां भी यही नसीहत चिपका दी।
देखिए आकांक्षा यादव जी के ब्लॉग पर एक उम्दा रचना और बताइये कि लोग आखि़र विरह में इतना क्यों तड़प रहे हैं ?
कहीं कोई नर तड़प रहा है और कहीं कोई नारी तड़प रही है।
आखि़र ये लोग करना क्या चाहते हैं ?
पिछले लोगों के तजर्बों से कोई शिक्षा क्यों नहीं लेता ?

प्राण मेरे तुम न आये : बच्चन लाल बच्चन



मैं बुलाती रह गई, पर प्राण मेरे तुम न आये।
नयन-काजल धुल गए हैं
अश्रु की बरसात से
नींद आती है नहीं-
मुझको कई एक रात से

तिलमिला उर रह गया, पर प्राण मेरे तुम न आये।
तोड़ कर यूँ प्रीत-बंधन
चल पड़े क्यों दूर मुझसे
तुम कदाचित हो उठे थे-
पूर्णतः मजबूर मुझसे

मैं ठगी सी रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।
नेत्र पट पर छवि तुम्हारी
नाचती आठों पहर है
याद तेरी पीर बनकर
ढ़ाहती दिल पर कहर है

मैं बिलखती रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।
मैं बुलाती रह गयी, पर प्राण मेरे तुम न आये।

बच्चन लाल बच्चन,
12/1, मयूरगंज रोड, कोलकाता-700023


Tuesday, May 17, 2011

ईश्वर और आत्मा की अमरता में आस्था मनुष्य के दिमाग में स्वाभाविक और प्राकृतिक तरीके से होते हैं The Great Discovery


नास्तिक लोग ऐसा दिखावा करते हैं जैसे कि वे तर्कवादी हैं और अगर कोई बात तर्क और विज्ञान की कसौटी पर पूरी उतरेगी तो वे उसे मान लेंगे। जबकि हक़ीक़त ये है कि वे अपने हठ और अंधविश्वास में किसी दूसरे अंधविश्वासी के समान ही होते हैं। उनकी बौद्धिकता और निष्पक्षता की आज़माइश के लिए हम एक आधुनिक शोध पेश कर रहे हैं। इसे पढ़ने के बाद भी जो नास्तिक, संशयवादी, और अज्ञेयवादी इसे स्वीकार न करे, उसे किसी सत्य की तलाश नहीं है, ऐसा मानना चाहिए। 
पेश है हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान‘ (दिनांक 16-05-2011) में प्रकाशित संपादकीय आलेख :

जिन लोगों पर पूरे सोवियत साम्राज्य के पतन का कोई असर नहीं हुआ, उनके विश्वास पर पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की करारी हार से भी कोई असर नहीं पड़ेगा। इसकी वजह शायद यह है कि अपने आप को तर्कवादी और वस्तुवादी मानने वाले लोगों के लिए साम्यवाद तर्क आधारित धारणा नहीं है, बल्कि मन की आस्था है।
शायद कट्टर मार्क्सवादी इस बात का बुरा मानें, लेकिन ऐसा लगता तो है। जहां तक धार्मिक आस्था, ईश्वर और आत्मा की अमरता में आस्था का सवाल है, तो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के दो शोधकर्ताओं का कहना है कि ये चीजें सामाजिक या सांस्कृतिक माहौल की वजह से नहीं होतीं, बल्कि मनुष्य के दिमाग में विश्वास स्वाभाविक और प्राकृतिक तरीके से होते हैं।
धर्म या धार्मिक दर्शन सिर्फ इन स्वाभाविक विश्वासों को एक सुव्यवस्थित, वैचारिक ढांचा प्रदान करता है। 57 शोधकर्ताओं ने अलग-अलग संस्कृतियों वाले 20 देशों में 40 से ज्यादा प्रयोगों के विश्लेषण से यह पाया। उनका कहना है कि तमाम संस्कृतियों में धार्मिक आस्था मानव स्वभाव का एक स्वाभाविक अंग है। अब मुमकिन है कि तर्कवादी लोग ईश्वर में नहीं, बल्कि विज्ञान या मार्क्सवाद जैसी विचारधारा के महाशक्तिशाली और दोषरहित होने पर गहरा विश्वास करें, और किसी भी सूरत में अपने विश्वास से न डांवाडोल हों।
मनुष्य का यह सहज स्वभाव है कि वह अपनी व्याप्ति सिर्फ अपने शरीर या मन तक नहीं मानता, वह किसी विराट अस्तित्व का भरोसा अपने अंदर लिए होता है। यह सवाल मनुष्य ने बहुत शुरू से ही पूछना शुरू कर दिया था कि मेरे अस्तित्व का क्या अर्थ है? इसकी सीमाएं क्या हैं? यह सृष्टि कैसे बनी? इसके पीछे कौन-सी ताकत है? और मैं अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कैसे कर सकता हूं?
ऋग्वेद का विख्यात नासदीय सूक्त उस शुरुआती प्रश्नाकुल आदमी के सवालों को सामने लाता है, जो विराट प्रकृति के सामने आकार में छोटा-सा था, लेकिन जिसे लगता था कि अस्तित्व के बुनियादी सवालों के जवाब अगर उसे मिल गए, तो वह अपने छोट-से अस्तित्व का अतिक्रमण कर सकता है। ये सवाल कहीं से रोजमर्रा के भोजन, सुरक्षा और शारीरिक सुखों से जुड़े हुए नहीं थे, तब उसने पाया सृष्टि के दूसरे जीवों और विराट प्रकृति से जुड़कर वह भी विराट हो सकता है।
इसी तरह शरीर की मृत्यु के साथ पूरे अस्तित्व के नष्ट न होने का विश्वास भी बुनियादी है। यह विश्वास भी तमाम संस्कृतियों में किसी न किसी रूप में पाया जाता है। कुछ संस्कृतियां इस विश्वास के चलते शवों को ममी बनाकर रखती थीं। एक स्तर पर यह विश्वास सूक्ष्म, आध्यात्मिक और दार्शनिक हो गया, जिससे ज्यादातर संस्कृतियों में शरीर को संरक्षित रखना जरूरी नहीं माना गया। ये विश्वास स्वाभाविक तौर पर हमारे दिमाग में होते हैं, इसलिए धार्मिक चिंतन में इन्हें स्वयंसिद्ध मानकर ही चला जाता है।
धार्मिक चिंतन की मान्य प्रणाली में पहले आस्था है और उसके बाद तर्क है। लेकिन तर्कवादी विचार प्रणाली में जो चीज तर्क और प्रयोगों में साबित होती है, उसे ही सत्य माना जाता है। आध्यात्मिक विचार में तर्क के अलावा भावना और अंत:प्रेरणा को भी सत्य तक पहुंचने का रास्ता माना जाता है, बल्कि इन्हें ज्यादा प्रामाणिक माना जाता है।
इसीलिए विज्ञान और तर्क के समर्थक धर्म को संदेह से देखते हैं। लेकिन क्या हम सारे विज्ञानवादियों और तर्कवादियों के बारे में दावे से कह सकते हैं कि उनके चिंतन में वैज्ञानिकता और तर्क ही प्रमुख है ? अनुभव यही बताते हैं कि तर्क और विज्ञान पर भी उनकी आस्था ही पहले आती है, पीछे तर्क आता है। इसलिए ही हमारे वामपंथी अपने विश्वास पर टिके रहेंगे, दुनिया चाहे जिधर जाए।
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लेख को साभार लिया गया है इस जगह से 

ट्रिगर मैथड अपनाएं , आत्मविश्वास झट से पाएं Trigger Method


जब भी तुम्हें स्ट्रेस हो या फिर से वही कॉन्फिडेंस पाना चाहो तो ट्रिगर मैथड का इस्तेमाल करो। इसमें दी गई कुछ बातों को फॉलो करो और अंगुली व अंगूठा दबाने की एक्सरसाइज करो। फिर देखिये..
पहला मिनट: सफलता से जुड़े दृश्य 
एक मिनट में सक्सेस से जुड़े सीन देखें। तुम अपने अतीत से जुड़ी या किसी भी भावी सफलता को इमेजिन कर सकते हो..अपनी यादों को खूब रंग-बिरंगी व चलती-फिरती तस्वीरों से सजाना न भूलें।
दूसरा मिनट: दर्पण
1.  एक शीशे के सामने खड़े होकर आंखें बंद करें।
2.  किसी ऐसे इंसान के बारे में सोचें, जो तुम्हें प्यार करता हो, खुद को उसकी नजरों से देखें।
3.  जब तुम तैयार हों, तो आंखें खोलकर शीशे में देखें और खुद को किसी दूसरे की नजरों से देखने दें।
तीसरा मिनट: खुद की तारीफ
खुद को शीशे में देखते हुए पूरे एक मिनट तक भरपूर कॉन्फिडेंस से भरी, मन की आवाज में खुद की तारीफ करो। ऐसा करना भले ही तुम्हें मुश्किल लगे, पर यह तुम्हारे लिए बहुत मायने रखता है। तुम अपनी ऊर्जा बदल रहे हो, इसलिए जो लाइफ से चाहते हो, उसे ज्यादा प्रभावित करोगे।
चौथा मिनट: ‘कॉन्फिडेंस स्विच’; आत्मविश्वास जगाएं
1.   वह टाइम याद करो, जब तुमने खुद को कॉन्फिडेंस से भरा पाया था। उस टाइम में जाने के बाद देखो कि तुमने क्या देखा था-सुनो कि तुमने क्या सुना था और महसूस करो कि क्या महसूस किया था? यदि तुम ऐसी कोई बात याद नहीं कर सकते तो कल्पना करो कि कॉन्फिडेंस से भरपूर होते तो तुम्हारी लाइफ कितनी ज्यादा बेहतर होती।
2.   इन यादों के रंगों को और गहरा, आवाजों को और तेज बनाओ और खुद को मजबूत महसूस करो।
3.   इन अच्छी भावनाओं को फील करते टाइम दोनों में से किसी हाथ के अंगूठे और बीच वाली अंगुली को एक साथ दबाएं।
4.   इन दोनों को थामे हुए, 24 घंटों में सामने आने वाली किसी ऐसी परिस्थिति के बारे में सोचें, जिसके लिए तुम अधिक विश्वस्त होना चाहते हो। कल्पना करो कि सब ठीक चल रहा है, ठीक वैसे, जैसा तुम चाहते हो। देखो कि तुम क्या देखोगे, सुनो कि तुम क्या सुनोगे, महसूस करो कि यह कितना अच्छा लगता है।
हालांकि शुरुआत में यह थोड़ा अजीब लग सकता है। लेकिन यह काफी कारगर है। मैं चाहता हूं कि तुम जब भी किसी स्ट्रेस देने वाली सिच्युएशन में हो, तब इन बातों को फॉलो करो। तुम देखोगे कि तुम्हारा स्ट्रेस गायब हो जाएगा। चाहे जादू जैसा लगे, लेकिन यह एक विज्ञान है। तुम्हें खुद को कुछ मिनटों की एकाग्रता के लिए तैयार करना होगा। यह बहुत मायने रखता है, क्योंकि तुम्हें अंगूठा और अंगुली दबाते हुए उस एक भाव पर लगातार विचार करना है। पीड़ा से धीरे-धीरे भाव घटेगा। जब भी वही आत्मविश्वास पाना चाहें तो अंगुली व अंगूठा दबाना, ट्रिगर का काम करेगा। इस एक्सरसाइज को सप्ताह में एक बार दुहराते रहो।


सूफ़ी साधना और योग साधना में समानता और अंतर Sufism and Yoga

नाम का अभ्यास हुक्म की पाबंदी के साथ करना अनिवार्य है
आदरणीय भूषण जी ! मैं बाबा फ़क़ीरचंद जी को नहीं जानता लेकिन उनकी कुछ बातें सही हैं कि शारीरिक कष्टों के पीछे इंसान का ग़लत खान-पान और ग़लत रहन-सहन है। ये कष्ट केवल ‘नाम‘ के अभ्यास से दूर नहीं हो सकते। 

मैं यह कहना चाहूंगा कि इन आधिभौतिक कष्टों के अलावा हमारी इन्हीं ग़लतियों के कारण आध्यात्मिक और आधिदैविक कष्ट भी मानव जाति पर और स्वयं हम पर सामूहिक रूप से और व्यक्तिगत रूप से आते रहते हैं , ये कष्ट भी ‘नाम‘ के अभ्यास से दूर नहीं हो सकते।
कष्ट के यही तीन प्रकार हैं और यही तीनों ‘नाम‘ के अभ्यास से दूर नहीं होते तो फिर ‘नाम‘ के अभ्यास से दूर कौन से कष्ट होते हैं ?
यह विचारणीय है।
दरअस्ल बात यह है कि नाम को जब भी पैग़ाम और अहकाम (आदेश) से काटा जाएगा तो वह धर्म के बजाय एक दर्शन बन जाएगा और फिर एक के बाद एक बहुत से दर्शन बनते चले जाएंगे। एक दर्शन जिस बात को वर्जित बताएगा, दूसरा दर्शन उसी में मुक्ति बताएगा। भारत में अर्से से यह खेल चल रहा है और आज भी जारी है।
ईश्वर का नाम उसके बताए तरीक़े से लीजिए और उसके हुक्म पर चलिए और ऐसा हमें सामूहिक रूप से करना होगा। समाज का कष्ट अपने न्यूनतम स्तर तक पहुंच जाएगा।
यह तय है।
अब हम आपको कुछ ‘नाम‘ के अभ्यास के बारे में बताते हैं।
ईश्वर का कोई भी नाम आप ले लीजिए।
चाहे आप ‘ऊँ‘ का जाप करें या फिर ‘अल्लाह-अल्लाह‘ का।
आप एक समय नियत कर लीजिए और मन ही मन ‘नाम‘ का जाप कीजिए आधा घंटा या एक घंटा। इसके बाद जब आप दैनिक कार्य करें तब भी आप अपनी तवज्जो अपने मानसिक जाप की ओर बनाए रखें। महीने भर के बाद ही आपकी यह स्थिति हो जाएगी कि यह ‘नाम‘ अब आपकी कोशिश के बिना भी आपके दिल में ख़ुद-ब-ख़ुद चलता रहेगा।
इसे हमारे सूफ़ी सिलसिलों में ‘क़ल्ब का जारी होना‘ कहते हैं। जब साधक की स्थिति यह हो जाती है तो चाहे वह हंस रहा हो या फिर रो रहा हो या लोगों से बातें कर रहा हो, उसका ‘ज़िक्र‘ अखंड रूप से उसके दिल में चलता रहता है, जिसे वह ख़ुद सुनता रहता है। मेरे एक पीरभाई हैं जब वे ज़िक्र करते हैं तो उनके दिल की आवाज़ को हॉल में मौजूद में दूसरे लोग भी सुनते हैं। आप चाहें तो आप भी सुन सकते हैं।
यह मक़ाम हमारे नक्शबंदी सिलसिले में पीर की तवज्जो की बरकत से बहुत जल्द हासिल हो जाता है।
फिर साधक अपने सीने में मौजूद चार और लतीफ़ों से ज़िक्र करता है और उसके बाद वह अपने दिमाग़ के बीच में मौजूद ‘लतीफ़े‘ पर ध्यान केंद्रित करके ‘नाम‘ का अभ्यास करता है और तब बहुत जल्द उसके तमाम बदन से ‘ज़िक्र‘ जारी हो जाता है। उसके बदन का एक-एक रोआं और उसके ख़ून का एक एक अणु ‘अल्लाह-अल्लाह‘ कहता है जिसे नाम लेने वाला साधक ख़ुद सुनता है। इस मंज़िल तक कामिल पीर अपने मुरीद को तीन-चार माह में ही ले आता है। इसके बाद अगली मंज़िलें शुरू हो जाती हैं। 
इस अभ्यास के साथ अल्लाह के हुक्म की पाबंदी अनिवार्य है। वह है तो यह भी सफल है और अगर वह नहीं है तो यह सिर्फ़ एक तमाशा है। इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। अस्ल चीज़ है ‘मालिक की रज़ा‘। मालिक राज़ी है तो हर चीज़ सार्थक है और अगर वह नाराज़ है तो फिर हरेक सिद्धि निरर्थक है।
मुस्लिम सूफ़ी और ग़ैर-मुस्लिम साधकों में अभ्यास और सिद्धि का अंतर नहीं है। उनके दरम्यान मूल अंतर यही है कि ग़ैर-मुस्लिम साधक धर्म के बजाय दर्शन का अनुसरण कर रहे हैं क्योंकि उनके पास ईश्वर की वाणी अब है नहीं जबकि मुस्लिम सूफ़ी सिलसिलों के संस्थापकों ने ‘ईशवाणी‘ की पाबंदी ख़ुद भी की और अपने मुरीदों को भी करना सिखाया। 
जैसे ईश्वर का स्थान कोई मनुष्य नहीं ले सकता वैसे ही ईश्वर के विचार और उसके बनाए नियम की जगह इंसान का कोई विचार या उसका बनाया कोई नियम नहीं ले सकता। धर्म के अधीन हो तो दर्शन और विज्ञान हर चीज़ नफ़ा देगी लेकिन अगर ईश्वरीय व्यवस्था को छोड़कर उन्हें ग्रहण किया जाएगा तो कभी कल्याण होने वाला नहीं है।
दुख के नाश के लिए ईश्वर का केवल ‘नाम‘ लेना ही काफ़ी नहीं है बल्कि अपने मन-बुद्धि और आत्मा हरेक स्तर पर उसके प्रति पूर्ण समर्पण करते हुए उसकी शरण में जाना ज़रूरी है, उसकी भेजी हुई वाणी के आलोक में उसके आदेश का पालन ठीक वैसे ही करना ज़रूरी है जैसे कि उसके ऋषि और पैग़म्बरों ने करके दिखाया है।

इस स्टेटमेंट को आप निम्न लिंक देखेंगे तो आप पूरी पृष्ठभूमि जान लेंगे  :

Monday, May 16, 2011

जनता ख़ुद ग़लत है और ग़लत लोगों को ही वह चुनती है Self Improovement

@ सुरेंद्र जी !
@ भूषण जी !
एक रूख़ से यह बात सही है कि जनता भेड़ की तरह मूंडी जाती है जहां भी वह जाती है लेकिन दूसरा रूख़ यह है कि जो लोग जनता को मूंडते हैं उन्हें जनता ने ख़ुद चुना होता है। अगर वे लोग ग़लत हैं तो उन्हें चुनने वालों की ग़लती है कि जनता हमेशा से ग़लत लोगों को ही क्यों चुनती आ रही है ?
देखिए यह लेख -        
देश में फैल रहे भ्रष्टाचार की ज़िम्मेदार जनता - Sharif Khan


जनता का कैरेक्टर क्या है ?
जनता की अक्सरियत ख़ुद बदमाश है।
आप स्टेशन पर जनता के अंग किसी एक वेंडर से चाय लीजिए। वह आपको ऐसी चाय पिलाएगा कि उसे पीकर आप तुरंत ही चाय पीने से तौबा कर लेंगे। आप बाहर निकलिएगा तो ऑटो  वाला आपसे नाजायज़ किराया मांगेगा। वह भी जनता का ही अंग है। आप रेस्टोरेंट या ढाबे पर जाएंगे तो वह आपको कितनी भी पुरानी सब्ज़ी परोस सकता है। आप पूजा के लिए केसर ख़रीदिए तो उसमें केसर के बजाय भुट्टे के बाल रंगे हुए निकलेंगे। आप पूजा का नारियल ख़रीदिए तो उसमें गिरी ही नहीं निकलेगी। आप अंदर मंदिर में जाएंगे तो वहां आपको पता चलेगा कि  ‘ये स्थल निःसंदेह देव रहित हैं '‘ (लिंक पर जाएं)
जगह-जगह घूमते हुए साधुओं को देखिएगा और उन्हें जानिएगा तो आपको पता चलेगा कि असली साधु तो कम हैं और नक़ली ज़्यादा हैं और उनमें बहुत से तो ऐसे हैं जो कि वांछित अपराधी हैं और इस रूप में फ़रारी काट रहे हैं।
ऐसे ही कुछ लोगों को तो जनता ईश्वर तक मान बैठती है। उन्हें मौत भी आती है और उनके पास से जनता का लूटा हुआ अकूत धन भी मिलता है लेकिन जनता उन्हें फिर भी ईश्वर ही मानती है।
...तो ऐसी है इस देश की जनता। धोखाधड़ी और झूठ आम है यहां। यही जनता दहेज लेती-देती है, जिससे पता चलता है कि इसमें हवस कूट-कूट कर भरी हुई है और इसे सामाजिक सरोकार से कोई लेना-देना नहीं है। यही जनता कन्या भ्रूण को पेट में मार डालती है। खरबों रूपये की शराब यही जनता पीती है। यही जनता राष्ट्रीय संपत्ति में आग लगाती है। यही जनता भड़काऊ लोगों को अपना नेता बनाती है। यही जनता अच्छे प्रतिनिधियों को मात्र इसलिए हरा देती है क्योंकि वह उनकी जाति, संप्रदाय और कल्चर वाला नहीं होता।

जनता ख़ुद ग़लत है और ग़लत लोगों को ही वह चुनती है। ग़लती का अंजाम सही होता ही नहीं और जनता यही चाहती है कि उसके ग़लत रहते हुए भी उसका कल्याण हो जाए, यह संभव नहीं है।
शुक्र है कि हमारे समाज में नेक लोग आज भी मौजूद हैं। उन्हीं के दम से सही और ग़लत की तमीज़ आज भी बाक़ी है लेकिन वे अल्पसंख्यक हैं।
आपने मेरे लेख पर टिप्पणी की , इसके लिए आपका शुक्रिया !

इस पूरे संवाद की पृष्ठभूमि जानने के लिए आपे देखें मेरा पिछला लेख इसी ब्लॉग पर -
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/05/face-off.html

महंगाई की सूरत में लोकतंत्र की क़ीमत चुका रही है जनता Exploitation

जनाब सुशील बाकलीवाल जी पेट्रोल के दाम बढ़ने के संदर्भ में पूछ रहे हैं कि

नेताओं का मूक जवाब है कि जब तक तुम और लोकतंत्र में से कोई एक भी ज़िंदा है तब तक।

बात दरअसल यह है कि जनता को लोकतंत्र चाहिए और लोकतंत्र को जनता के चुने हुए प्रतिनिधि चाहिएं। चुनाव के लिए धन चाहिए और धन पाने के लिए पूंजीपति चाहिएं। पूंजीपति को ‘मनी बैक गारंटी‘ चाहिए, जो कि चुनाव में खड़े होने वाले सभी उम्मीदवारों को देनी ही पड़ती है। 
देश-विदेश सब जगह यही हाल है। जब अंतर्राष्ट्रीय कारणों से महंगाई बढ़ती है तो उसकी आड़ में एक की जगह पांच रूपये महंगाई बढ़ा दी जाती है और अगर जनता कुछ बोलती है तो कुछ कमी कर दी जाती है और यूं जनता लोकतंत्र की क़ीमत चुकाती है और चुकाती रहेगी।
लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी की क़ीमत अगर महज़ 5 रूपये मात्र अदा करनी पड़ रही है तो इसमें क्या बुरा है ?
और जो लोग इससे सहमत नहीं हैं , वे इसका विकल्प सुझाएँ. ऐसा विकल्प जो कि व्यवहारिक हो. नेताओं को दोष देने से पहले जनता खुद भी अपने आपे को देख ले निम्न लिंक पर जाकर :

Sunday, May 15, 2011

जनता ही लुटेरी हो तो देश को कौन बचाएगा ? Face off


लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी की क़ीमत अगर महज़ 5 रूपये अदा करनी पड़ रही है तो इसमें क्या बुरा है ?
कई राज्यों में चुनाव संपन्न हो चुके हैं। पक्ष-विपक्ष में नतीजे भी आ चुके हैं, लिहाज़ा अब तक पेट्रोल की जो क़ीमतें बढ़ने से जबरन रोक कर रखी गई थीं, उन्हें बढ़ा दिया गया और यूं पेट्रोल अब 5 रूपये महंगा हो गया है। इसके बाद सरकार डीज़ल और गैस की क़ीमतें भी बढ़ाएगी। इससे फ़ायदा यह होगा कि जनता को अलग-अलग विरोध प्रदर्शन की ज़हमत नहीं करनी पड़ेगी। जनता पहले ही पेट्रोल की क़ीमत में बढ़ोतरी को लेकर जगह-जगह प्रदर्शन कर रही है। उसी में दो-चार तख्तियों पर गैस और डीज़ल के बारे में भी लिख कर काम चल जाएगा।
हमारी सरकार अपने नागरिकों का कितना ख़याल रखती है ?
नागरिक क्या जानें कि सरकार जिस वक्त किसी भी चीज़ के दाम बढ़ा रही होती है तो उसी समय वह नागरिकों के कोण से भी उनकी चिंता को समझ रही होती है। अभी आप कुछ दिन बाद देखेंगे कि जब जनता आपे से बाहर हो रही होगी और विपक्षी दल जनता के आक्रोश को अपने हक़ में भुनाने के लिए गले फाड़ रहे होंगे, तभी सरकार अचानक पेट्रोल का दाम 2 रूपये घटा देगी। गैस और डीज़ल के साथ भी वह यही करेगी।
विरोध प्रदर्शन करने वालों को भी लगेगा कि उनका विरोध प्रदर्शन करना रंग लाया, उन्होंने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और विपक्षी नेता भी जनता को बताएंगे कि देखा, हमने आपके लिए केंद्र सरकार से पंगा ले लिया, बच्चू अबकी बार ऐसी निकम्मी पार्टी को वोट मत देना बल्कि हमें देना।
हालांकि महंगाई वे ख़ुद भी बढ़ाते आए हैं।
ख़ैर, यह कहानी हम बचपन में ही समझ गए थे, जब हमने राजेश खन्ना की फ़िल्म ‘आज का एमएलए रामअवतार‘ देखी थी।
एक्चुअली, पेट्रोल को महंगा तो होना था डेढ़ रूपया लेकिन उसमें पार्टी फंड और दीगर कमीशन भी जुड़ गए तो उसे 3 रूपया महंगा करना मजबूरी बन गया और अगर महज़ 3 रूपये ही महंगा कर दिया जाता तो फिर जनता के ग़ुस्से को शांत करने के लिए जनप्रतिनिधि क्या अपना कमीशन छोड़ते ?
लिहाज़ा 2 रूपये और बढ़ाना पड़ गया। इस तरह क़ीमत में 5 रूपये का इज़ाफ़ा करना पड़ा। जब जनता का ग़ुस्सा पीक पर पहुंचेगा तो 2 रूपये कम कर दिए जाएंगे और सारा ढर्रा फिर से रूटीन पर आ जाएगा।
जनता की मुसीबत यह है कि अगर विरोध प्रदर्शन न करे तो फिर रेट 5 रूपये पर ही फ़िक्स हो जाएगा।
...और यह जनता भी कमाल है। जनता का जो भी सदस्य जहां बैठा हुआ जो भी चीज़ बेच रहा होगा, उसमें वह भी सरकारी स्टाइल में जायज़ के साथ फ़ालतू के दाम भी बढ़ा देगा। सरकार तो 2 रूपये कम भी कर देगी लेकिन ये जनता कभी कम नहीं करेगी और न ही इसके खि़लाफ़ कोई विरोध प्रदर्शन ही किया जा सकता है।
नेता को लुटेरा बताने वाली जनता ख़ुद लुटेरी है।
लुटेरी जनता से देश को कौन बचाएगा ?

हिंदुस्तानी इंसाफ़ का काला चेहरा Andha Qanoon

अगर आप किसी मजलूम लड़की के बाप या उसके भाई हैं तो आपके लिए हिंदुस्तान में इंसाफ़ नहीं है, हां, इंसाफ़ का तमाशा ज़रूर है। हिंदुस्तानी अदालतें इंसाफ़ की गुहार लगाने वाले को इंसाफ़ की तरफ़ से इतना मायूस कर देती हैं कि आखि़रकार वह हौसला हार कर ज़ालिमों के सामने झुक जाता है।
यह मेरा निजी अनुभव है।
हक़ीक़त यह है कि जिम्मेदारियों की वजह से मैं कभी जान ही नहीं पाया कि उन्मुक्तता भरी जवानी किसे कहते हैं ?
और मौज मस्ती कहते किसे हैं ?
कभी ऐसा वक़्त आया भी तो ज़्यादा देर ठहरा नहीं और किसी ऐसे के पास ठहरेगा भी नहीं , जिसके कोई बहन घर में मौजूद हो और वह उसकी ज़िम्मेदारी महसूस भी करता हो .
मेरी चार बहनों में से एक की हमने शादी की।उसने एक मां की तरह हमारी तमाम ज़रूरतों की  देखभाल की, हर ऐतबार से वह इज़्ज़त के लायक़ है
यह बात मैंने अपने बहनोई को भी उसकी विदाई के वक़्त बताई कि मैं इसे अपनी मां समझता हूं हालांकि मैंने अपनी बहनों को अपनी औलाद की तरह पाला है। इसकी आँख में मैं आंसू नहीं देख सकता.
लेकिन वक़्त भी ऐसा आया की ज़माने भर के आंसू उसकी आँखों में भर दिए.
उसे उसकी ससुराल में सताया गया।
हमने समझाने-बुझाने की पूरी कोशिश की लेकिन लड़के के माता-पिता के मन में लालच और खोट था। कुछ फ़रमाइश का इशारा भी उन्होंने दिया और महर की रक़म पर भी ऐतराज़ जताया.  वे अपने वादे और इरादे से पलट गए। वे चाहते थे कि लड़का पहले की तरह फिर विदेश जाए और कमाए और कमाकर उन्हें भेजता रहे। साल दो साल में लड़का देस में आए और फिर चला जाए। उन्होंने लड़के को विदेश भेज भी दिया और चार माह बाद हमें पता चला कि वह विदेश जा चुका है। इस बीच उसने अपनी पत्नी से किसी भी प्रकार का सलाह मशविरा नहीं किया और न ही अपने विदेश गमन की सूचना दी।
हमने उन्हें बताया कि यह आपकी ग़लत बात है तो उन्होंने अपने वकील के ज़रिए एक क़ानूनी नोटिस भी भेज दिया। जिसमें उन्होंने लड़की पर आरोप लगाया कि वह अपने माता-पिता और भाई के बहकावे में आकर 2 लाख रूपये के ज़ेवर कपड़ा और पति के अस्सी हज़ार रूपये नक़द जो कि उसके पास बतौर अमानत रखवाए गए थे, अपने साथ ले गई है। यह आरोप सरासर झूठे थे और पेशबंदी में लगाए गए थे। हमने सुलह सफ़ाई के लिए सामाजिक प्रक्रिया को अपनाया। काफ़ी कोशिशें कीं लेकिन बेकार गईं।
इसके बाद हमने वकील साहब की सलाह से एक केस उनपर दहेज उत्पीड़न की धाराओं में थाने में दर्ज कराया। इसे दर्ज कराने में हमें 15 दिन लग गए। कई बार एस.एस.पी. साहब से मिले। हमने कोई झूठी मैडिकल रिपोर्ट नहीं बनवाई। उसके बाद एक केस ख़र्चे के लिए डाला और एक केस दहेज वापसी के लिए और एक केस ‘घरेलू हिंसा महिला अधिनियम‘ के तहत भी डाला।
वकील साहब जो कहते रहे हम करते रहे।
आज लगभग चार साल होने जा रहे हैं। लड़की को न तो कोई ख़र्चा मिला है और न ही दहेज का सामान ही वापस मिला है।
पिछले दिनों लड़के ने मीडिएशन कोर्ट इलाहाबाद में अपील की तो लड़की के साथ हम भी वहां तीन बार गए।
समझौते की राह नहीं बनी।
लेकिन वहां से केस लोअर कोर्ट में आने का नाम नहीं ले रहा है।
वकील साहब यह बताते हैं कि भाई यहां सुनवाई का नंबर ही नहीं आता।
आपके केस का नंबर कब आएगा ?
हम बता नहीं सकते।
किसी क़ाबिल जज को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि एक लड़की के मासूम अरमानों को बुरी तरह रौंद दिया गया है और अगर उसके पास उसके बाप और भाई न हों तो वह आर्थिक रूप से भी बेसहारा है।
अपने क़स्बे और शहर का तो कोई वकील पैसे नहीं लेता लेकिन फिर भी बहुत से ख़र्चे हो जाते हैं।
इस बीच लड़का पक्ष की ओर से लड़के के पिता जी ने सरकारी डॉक्टर को पैसा दिया और अपनी पसली टूटी हुई दिखाकर हम चार लोगों पर केस कर दिया और उसमें तीन लोगों को अपनी ज़मानत करानी पड़ी। मैंने नहीं कराई क्योंकि मैं जान गया हूं कि इन काग़ज़ों को चक्कर कैसे कटवाया जाता है ?
एक और केस उन्होंने मारपीट और लूटपाट की धाराओं मे 156 (3) सीआरपीसी के तहत दर्ज कराने की कोशिश एक और दूर के शहर में की लेकिन जज ने लूटपाट की धाराएं तो काट दीं लेकिन मारपीट की धाराएं बाक़ी रखीं। आज तक उस केस का कोई सम्मन मुझे नहीं मिला क्योंकि वे दूर के शहर में पैरवी कर नहीं पाए।
यहां काग़ज़ के पीछे हर सीट पर पैरवी करने वाले को भागना पड़ता है। हरेक सीट पर 50 रूपये से लेकर 100 और 200 रूपये ख़र्च करने पड़ते हैं। इसके बाद जब सम्मन मुल्ज़िम के पास पहुंचता है तो वह सम्मन लाने वाले डाकिये और सिपाही को 100-200 रूपये देता है और वह सरकारी क़लम से लिख देता है कि ‘मकान बंद पाया गया। कोई नहीं मिला।‘ आदि आदि।
इस तरह बहुत से केसों के तो सम्मन ही बरसों तक तामील नहीं होते। मेरे केसेज़ के साथ भी यही हुआ।
‘घरेलू हिंसा महिला अधिनियम‘ में 90 दिनों के भीतर फ़ैसले की व्यवस्था रखी गई है लेकिन आज एक-डेढ़ साल से ज़्यादा हो गया है, प्रोबेशन अधिकारी उसके सम्मन की तामील भी नहीं करा पाया है।
हिंदुस्तानी अदालतों में इंसाफ़ नहीं बल्कि इंसाफ़ के नाम पर एक तमाशा होता है। शुरू शुरू में मुझे हमदर्दों ने कोर्ट-कचहरी से बचने की सलाह दी थी लेकिन मुझे उनकी राय बेकार लगी थी। मैं बड़ी उम्मीद से कोर्ट जाया करता था। हर बार 2-3 माह बाद की तारीख़ लगती थी। किसी दिन पहुंचे तो पता चला कि आज कॉन्डोलेंस हो गई है, कभी किसी वकील के घर में कोई मर गया है और कभी कोई वकील ख़ुद ही मर गया। कभी पता चला कि आजकल जज साहब कोर्ट में बैठ ही नहीं रहे हैं क्योंकि वे अपनी तरक्क़ी के लिए  प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और कभी जज साहब बैठे हैं तो वकील हड़ताल किए बैठे हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बेंच आनी चाहिए या फिर किसी काले क़ानून के विरोध में या अपने किसी साथी वकील की पिटाई को लेकर शहर भर में जुलूस निकालते हुए मिलेंगे। साल में दो बार दो वकील क़त्ल कर दिए गए तो वकील आंदोलन पर चले गए। इस सबके बावजूद जब कोई तारीख़ पड़ भी गई और वकील के घर-बाहर भी सब कुछ सलामत रहा और जज साहब भी कोर्ट में बैठे हुए मिल गए तो विपक्षी पार्टी के वकील साहब की एप्लीकेशन आ गई कि मेरी या मेरे मुवक्किल की तबियत ख़राब हो गई है लिहाज़ा अगली तारीख़ लगा दी जाए और हमारे ‘क़ाबिल जज‘ ने तुरंत ढाई माह बाद की तारीख़ लगा दी बिना यह सोचे कि हम लड़की वालों ने किस तरह एक-एक दिन अंगारों पर गुज़ारा है।
इसी तरह तारीख़ों पर तारीख़ें लगने लगीं तो हमारे वालिद साहब और एक छोटे भाई ने कहा कि इतने लंबे काम की ज़रूरत नहीं थी। उसका काम हम तमाम कर देते हैं। अकेला लड़का है, ज़िंदगी भर रोते रहेंगे उसके मां-बाप। उसने हमारी लड़की की ज़िंदगी तो तबाह कर ही दी है। अब उसे चैन से कैसे जीने दिया जाए ?
इस तरह हिंदुस्तानी अदालतें परोक्ष रूप से उन बहुत से क़त्लों की पृष्ठभूमि और मनोभूमि भी तैयार करती हैं जिनमें वह इंसाफ़ में देर करती है। कई बार इंसाफ़ होता न देखकर वादी पक्ष मुल्ज़िम को मार डालता है और कई बाद इसके उल्टा होता है कि ज़मानत पर छूटकर मुल्ज़िम पक्ष वादी पक्ष की ओर के गवाहों को मार डालता है या फिर फ़रार हो जाता है और इस तरह कभी इंसाफ़ नहीं हो पाता।

मैंने उन्हें मना किया कि वजह जायज़ हो तो जान लेते हुए भी अच्छे लगते हैं और देते हुए भी। महज़ रंजिशन ऑनर किलिंग ख़ुदा को नापसंद है, जिसके लिए जी रहे हैं जब उसे ही नापसंद हो तो फिर उसे क्या मुंह दिखाएंगे ?
ऐसा कहकर मैंने उन्हें रोक दिया।
दास्तान बहुत लंबी और दर्दनाक है जिसे सिर्फ़ एक बेटी वाला ही समझ सकता है लेकिन हिंदुस्तान के जज और वकील बिल्कुल नहीं समझ सकते।
हमारे फूफा एक ट्रांसपोर्टर हैं . वह बताया करते थे कि 'केस ब्याहता भी है यानि कि बच्चे भी देता है'.
हम उनकी बात सुनकर हंसा करते थे लेकिन सचमुच यही होता है . वकील सलाह देता गया और हम केस करते गए और पांच केस कर दिए . एक दहेज उत्पीड़न का, एक खर्चे का , एक दहेज वापसी का , एक घरेलू हिंसा का और एक पता नहीं  किसका . जान बचाने की गर्ज़ से दो फर्ज़ी केस उन्होंने कर दिए. लड़का साल भर बाद खुद हाज़िर होकर जेल चला गया और ज़मानत पर जो निकला तो आज तक वह तारीख पर नहीं आया और न ही कोई अदालत उसे हाज़िर कर पाई . दुबारा जेल जाने की नौबत आई तो उसने हाईकोर्ट में अपील कर दी और यूं सारा केस जाम हो कर रह गया है.   
वकील की व्यवस्था क़ानून ने मददगार के तौर पर की थी लेकिन केस को लंबा खींचने के ज़िम्मेदार यही हैं। मुल्ज़िम पक्ष का हौसला यही बढ़ाते हैं और वादी पक्ष का हौसला भी यही तोड़ते हैं। 
मेरे कुनबे में दस वकील हैं जिनमें से एक मेरे चाचा और एक बहन भी हैं।
चाचा क़स्बे के एक मशहूर वकील हैं और बहन दिल्ली की एक अच्छी वकील है।
आशा करता हूं कि ये दोनों अच्छे वकीलों में से होंगे वर्ना मुझे तो जितने मिले, एक-दो को छोड़कर सारे ही लापरवाह और मनहूस मिले , ख़ास तौर पर वे जिन्हें हमने इलाहाबाद में पैरवी के लिए मुक़र्रर किया। उन्होंने पैसे ले लिए और काम नहीं किया, ऐसा तीन बार किया, तीन वकीलों ने किया। लोकल वकीलों ने शायद सलाम-दुआ की वजह से रियायत कर दी।
यह इतना लंबा केस नहीं था जिसके लिए इतनी ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई और भारी भरकम धाराओं की ज़रूरत पड़ती हो। इस तरह के केस तो आदिवासी लोग एक पंचायत में ही निपटा लेते हैं।
साथ रहना है तो बताओ और अलग होना है तो बताओ।
इतनी सी बात पता करनी होती है इस तरह के केस में , जिसे हमारे क़ाबिल जजों से ज़्यादा बेहतर तरीक़े से आदिवासी लोग पता कर लेते हैं।
नक्सलवादियों की लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि उनकी अदालतों में यह तमाशा नहीं होता। केवल न्याय होता है और तुरंत होता है। जहां-जहां नक्सलवादियों की अदालतें लगती हैं वहां की सरकारी अदालतें ख़ाली पड़ी हैं और वकील बैठे हुए क़िस्मत को रो रहे हैं कि किसी की ज़िंदगी से खेलने का कोई मौक़ा हाथ ही नहीं आ रहा है।
हमारी अजीब आफ़त है कि नक्सलवाद की तारीफ़ भी नहीं कर सकते और हिंदुस्तानी इंसाफ़ को दोष भी नहीं दे सकते लेकिन ज़ुबानों पर ताले लगा देने से सच बदल नहीं जाएगा।
मैं अदालतों से मायूस हो चुका हूं और जब अपनी बहन की बढ़ती हुई उम्र की तरफ़ देखता हूं तो इरादा करता हूं कि ज़ालिमों से सुलह करके मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाए। कुछ वापस मिले या न मिले, उनसे तलाक़ ले ली जाए ताकि हम अपनी बहन की शादी कहीं और तो कर सकें।
हम अदालतों की तरह लापरवाह नहीं हो सकते। हमें तो अपने रिश्ते और ज़िम्मेदारियां निभानी हैं। अदालतों को हमारी बहन की फ़िक्र न हो तो कोई बात नहीं उसका रिश्ता ही क्या है ?
लेकिन हमें अपनी बहन की बेहतरी की फ़िक्र बहरहाल करनी ही है चाहे इसके लिए हमें ज़ालिमों के खि़लाफ़ उठाए गए अपने क़दम वापस ही क्यों न लेने पड़ें।
ऐसा विचार अब पुख्ता हो चुका है और यह सब मेहरबानी है हमारी अदालतों की।यह वह जख्मे-दिल है जिसे मैं जगज़ाहिर नहीं करना चाहता था लेकिन करना पड़ा जब ईरानी अदालत के इंसाफ़ पर उंगली उठाई गई
अब आपके सामने इंसाफ़ के दो मॉडल हैं
एक ईरानी मॉडल और दूसरा हिन्दुस्तानी मॉडल
हिंदुस्तानी अदालतें इंसाफ़ कैसे करती हैं ?
यह तो आपने देख ही लिया है।
अब आप बताएं कि अगर यह इंसाफ़ है तो फिर ज़ुल्म किस चीज़ का नाम है ?
ऐसे में ईरानी न्याय व्यवस्था से कुछ सीखा जा सके तो शायद इस मुल्क में भी मज़लूम को इंसाफ़ मिलने की राह हमवार हो सके वर्ना तो जो भी एक बार अदालत का तजर्बा कर लेता है वह इंसाफ़ से हमेशा के लिए मायूस हो जाता है बिल्कुल मेरी तरह।
आप किसी भी अदालत में जाइये और अपनी बहन-बेटी के साथ इंसाफ़ की आस में भटक रहे लाखों लोगों में से किसी से भी पूछ लीजिए, मेरी बात की तस्दीक़ हो जाएगी।

Thursday, May 12, 2011

शांति व्यवस्था बनाए रखना संतों का मुख्य कर्तव्य होता है Law and Order

जैन मुनि बोले 15 को कर लूंगा आत्मदाह
बड़ौत (बाग़पत) मे जैन मुनि मैत्रि प्रभ सागर जी महाराज का आमरण अनशन 16वें दिन भी जारी रहा। अनशन ख़त्म कराने बड़ौत पहुंचे कमिश्नर भुवनश कुमार की जैन मुनि से वार्ता विफल हो गई।
मुनि ने कमिश्नर के सामने ही चेतावनी दी कि यदि 14 मई तक उन्हें यांत्रिक क़त्लख़ाने बंद करने का लिखित प्रमाण पत्र नहीं मिला तो 15 मई को वह यहीं आत्मदाह कर लेंगे।
... कमिश्नर के स्वामी दयानंद से जैन मुनि को कुछ होने के लिए ज़िम्मेदार ठहराने पर उन्होंने भी जैन मुनि के साथ आत्मदाह करने की धमकी दे दी।
दैनिक हिन्दुस्तान, मुखपृष्ठ दिनांक 12 मई मेरठ संस्करण

जैन मुनि यांत्रिक स्लॉटर हाउस के निर्माण को लेकर चिंतित हैं, हम भी चिंतित हैं। वह उनके निर्माण को रूकवाना चाहते हैं, हम भी चाहते हैं कि यह रूके लेकिन इसी के साथ हम कोई अव्यवस्था खड़ी करने के पक्षधर नहीं हैं। हम दोनों का मक़सद एक होने के बावजूद उसकी वजहें भी अलग हैं और तरीक़ा भी। 
जैन मुनि आत्मदाह की धमकी दे रहे हैं और वह कर भी सकते हैं। हम उनके फ़ैसले या चेतावनी की कोई आलोचना भी नहीं करना चाहते लेकिन हम यह ज़रूर पूछना चाहेंगे कि क्या उनका ऐसा कहना उचित है ?
क्या उनके आत्मदाह के बाद हिंसा नहीं भड़क उठेगी और उसकी आग में मासूम नागरिक और पुलिस-प्रशासन के जवान ही नहीं झुलसेंगे ?
अपने ही नागरिकों को हिंसा में झुलसाने की तैयारी आखि़र क्यों ?
अहिंसा के व्रतधारियों को इस पर गहन चिंतन की आवश्यकता है।
साथ में देखिये मेरा एक और लेख : http://hbfint.blogspot.com/2011/05/15.html

Wednesday, May 11, 2011

संत अमरीक देव और उनके अभियान के बारे में Saint Amreek Singh


यह एक अच्छी खबर है कि दुनिया अभी  इंसानियत से पूरी तरह खाली नहीं हुई है. देखिये पूरी स्टोरी .

चंडीगढ़ [अनुराग अग्रवाल]। आलीशान कोठियों में काम करने वाली बाई हो या फिर रिक्शा चलाकर परिवार पालने वाले दिहाड़ीदार मजदूर, या किसी दुकान पर काम करने वाले कर्मचारी..सुबह-सवेरे अपने बच्चों को बस्ता उठाकर स्कूल जाते देखकर उनके दिल को वह तसल्ली जरूर मिलती होगी, जो उन्होंने कम आमदनी के चलते सपने में भी नहीं सोची होगी।  
अभावों भरी जिंदगी जीने के आदी हो चुके इन लोगों के बच्चे भी अंग्रेजी माध्यम के नामी-गिरामी स्कूलों में पढ़ते हैं, कंप्यूटर चलाते हैं और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं। यह संभव हो पाया है संत अमरीक देव चावला के प्रयासों से। संत बनने तक के सफर में उन्होंने शिक्षा का अनोखा दान किया है।
अंतरिक्ष परी कल्पना चावला के चाचा अमरीक देव अपनी संपत्तिा, तीन स्कूल, एक वृद्धाश्रम और एक व्यावसायिक शिक्षा केंद्र निर्मल आश्रम ऋषिकेश को दान कर संत का जीवन जी रहे हैं। करनाल से जुड़े अमरीक देव चावला ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने असहाय बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा तो उठाया ही, साथ ही दानवीर कर्ण की नगरी में लोगों को वास्तविक आजादी के मायने समझाए हैं। भगत लभ्भा मल करतार कौर चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से उन्होंने अनाथ, लाचार और जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए संत निक्का सिंह के नाम पर तीन स्कूलों की स्थापना की थी।
संत निक्का सिंह पब्लिक स्कूल माडल टाउन में 12वीं तक, सदर बाजार में आठवीं और जरीफा फार्म में भी 12वीं तक के 3370 बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान की जा रही है। इन स्कूलों की खासियत यह है कि यहां सिर्फ गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं, पर किसी से फीस अथवा दान राशि नहीं ली जाती। इन बच्चों को हर साल करीब चार लाख रुपये की किताबें और यूनिफार्म मुफ्त दी जाती है। आईटीआई से संबद्ध संत निक्का सिंह वोकेशनल इंस्टीट्यूट में 140 लड़कियों के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग, सिलाई-कढ़ाई, कटिंग-टेलरिंग और पैथोलाजी लैब के डिप्लोमा की व्यवस्था है।
यह व्यावसायिक कोर्स भी मुफ्त कराए जा रहे हैं। माडल टाउन में 140 कमरों वाले वृद्धाश्रम में इस समय 205 वृद्ध अपनी जिंदगी के सुखद पल जी रहे हैं। कल्पना चावला के पिता एवं अमरीक देव चावला के भाई बनारसी दास चावला स्वयं भी इसी वृद्धाश्रम में रह रहे हैं।
कभी सबसे अधिक आयकर देने वाले संत अमरीक देव ने 17 अक्टूबर 2008 को अपनी सारी संपत्ति, करीब सात एकड़ जमीन तथा करोड़ों रुपये की नगद धनराशि महंत राम सिंह की गद्दी वाले निर्मल आश्रम ऋषिकेश को प्रदान की और स्वयं प्रभु की भक्ति में लीन हो गए। निर्मल आश्रम को जो धनराशि दान की गई है, उसका मासिक ब्याज ही करीब नौ लाख रुपये आता है। ब्याज की इस राशि से बच्चों की समस्त पढ़ाई और यहां तक कि परीक्षा फीस का खर्चा भी चलता है।
संत अमरीक देव, उनके अनुयायी एचजी खुराना व सतीश गोयल का मानना है कि प्रभु के दिए जीवन को प्रभु के बच्चों का भविष्य संवारने में लगाने से बड़ा पुण्य का काम कोई दूसरा नहीं है।